Pretika › Tantrik & Black Magic › अधजला
अधजला
Pretika · Tantrik & Black Magic · 26 मिनट
- Writer
- Pretika
- Story
- अधजला
- Chapter
- Single story
- Category
- Tantrik & Black Magic
- Reading time
- 26 min
- Words
- 5200
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
एक — सूखा
ये कहानी मैं ग्यारह साल से किसी को नहीं सुना पाया हूँ।
कोशिश की है। कई बार। मगर हर बार जब मैं शुरू करता हूँ, सामने वाले के चेहरे पर एक ख़ास तरह की मुस्कुराहट आ जाती है — वो मुस्कुराहट जो लोग तब लाते हैं जब उन्हें लगता है कि आप या तो झूठ बोल रहे हैं या पागल हो चुके हैं। और फिर मैं बीच में ही रुक जाता हूँ, हँसकर कह देता हूँ "छोड़ो, मज़ाक़ था", और बात बदल देता हूँ।
आज नहीं बदलूँगा।
मेरा नाम राजीव है। उन दिनों मेरी उम्र सत्ताईस साल थी और मैं सिंचाई विभाग में जूनियर इंजीनियर था। पोस्टिंग बुंदेलखंड में थी — रौनी बाँध। सरकारी नौकरी, सरकारी क्वार्टर, सरकारी ज़िंदगी। सुबह दस बजे दफ़्तर, शाम छह बजे छुट्टी, और बीच में फ़ाइलों का एक ऐसा पहाड़ जिसका कोई सिरा नहीं था।
उस साल सूखा पड़ा था।
आप लोगों ने अख़बारों में पढ़ा होगा। बुंदेलखंड में सूखा कोई नई बात नहीं है — वहाँ सूखा ख़बर नहीं होता, मौसम होता है। मगर उस साल वाला अलग था। दो साल से लगातार बारिश धोखा दे रही थी और तीसरे साल मानसून ने जैसे रास्ता ही भूल गया हो।
रौनी बाँध का जलस्तर गिरना शुरू हुआ अक्टूबर में। दिसंबर तक वो चालीस फ़ीट नीचे था। मार्च में इंजीनियर-इन-चीफ़ का ऑर्डर आया — जलाशय की तलहटी का सर्वे करो, गाद कितनी जमा है नापो, और डिसिल्टिंग का एस्टीमेट भेजो।
यानी हमें बाँध के अंदर, नीचे उतरना था। जहाँ पिछले चवालीस साल से पानी था।
मुझे याद है, ऑर्डर पढ़ते वक़्त मुझे ख़ुशी हुई थी। फ़ील्ड वर्क। फ़ाइलों से छुट्टी। कुछ नया।
आज सोचता हूँ तो हँसी आती है। ज़िंदगी में सबसे बड़ी गलतियाँ हमेशा उन कामों से शुरू होती हैं जिनके लिए हम ख़ुश होते हैं।
अप्रैल के दूसरे हफ़्ते में पानी इतना उतर गया कि पहली चीज़ बाहर निकली — एक मंदिर का शिखर।
पूरे इलाक़े में ख़बर फैल गई। लोग दूर-दूर से देखने आने लगे। पानी में से एक कलश निकला हुआ था, काला, काई से लिपटा, और लोग हाथ जोड़कर खड़े हो जाते थे।
मई तक पूरा गाँव बाहर आ चुका था।
आपने कभी डूबा हुआ गाँव देखा है? मैंने नहीं देखा था। और मैं आपको बता दूँ — वो कोई खंडहर जैसा नहीं दिखता। खंडहर में एक शांति होती है। डूबे हुए गाँव में शांति नहीं होती। वहाँ दीवारें खड़ी होती हैं, दरवाज़ों की चौखटें खड़ी होती हैं, गलियाँ बिल्कुल साफ़ दिखती हैं — बस हर चीज़ पर छह इंच काली गाद जमी होती है, और हर चीज़ इस तरह चुप होती है जैसे उसने अभी-अभी बोलना बंद किया हो।
और एक बात और।
बदबू।
मैंने सोचा था कीचड़ की बदबू होगी। सड़े पानी की, काई की, मरी हुई मछलियों की।
नहीं थी।
रामखिलावन — हमारा हेड लेबर, पचास साल का, तीस साल से विभाग में — उसने पहले दिन ही नाक पर गमछा बाँधते हुए कहा था:
"साहब, ये गीली राख की बास है।"
मैंने हँसकर कहा था, "राख कहाँ से आएगी पानी के अंदर?"
उसने जवाब नहीं दिया। बस मेरी तरफ़ देखा और फिर आगे बढ़ गया।
दो — पागल बाबा
बाँध के दाहिने किनारे पर, बंधे से क़रीब तीन सौ मीटर हटकर, एक झोंपड़ी थी।
छप्पर की, टेढ़ी, इतनी पुरानी कि उसकी लकड़ी काली पड़ चुकी थी। और उसके सामने एक आग जल रही थी।
छोटी सी आग। मुश्किल से एक बालिश्त ऊँची लौ। मगर उस आग के नीचे —
उस आग के नीचे राख का एक ढेर था जो झोंपड़ी से ऊँचा था।
मैं इंजीनियर हूँ। मुझे हिसाब लगाने की आदत है। मैंने अंदाज़ा लगाया — दस फ़ीट ऊँचा, बारह फ़ीट चौड़ा राख का टीला। इतनी राख जमा होने में कितने साल लगेंगे अगर आग हर रोज़, बिना नागा, जलती रहे?
दसियों साल।
झोंपड़ी में एक बूढ़ा रहता था।
उसे इलाक़े के लोग "पागल बाबा" कहते थे। नंगे बदन, कमर पर सिर्फ़ एक कपड़ा, पूरे जिस्म पर भभूत मली हुई। जटाएँ इतनी लंबी और गुँथी हुईं कि वो बाल नहीं, रस्सियाँ लगती थीं। गले में रुद्राक्ष, और बग़ल में हमेशा एक कटोरा — इंसानी खोपड़ी का ऊपरी हिस्सा, जिसे बरसों की रगड़ ने चिकना और भूरा कर दिया था।
अघोरी।
मैंने पहले कभी असली अघोरी नहीं देखा था। यूट्यूब पर देखे थे, टीवी पर देखे थे — वो वाले जो कैमरे के सामने आँखें घुमाते हैं और चिल्लाते हैं।
ये वैसा नहीं था। ये आदमी चुप था। इतना चुप कि उसके पास से गुज़रो तो अजीब लगता था।
लोग कहते थे बाबा चवालीस साल से वहाँ है। बाँध बनने से भी पहले से। कोई उससे बात नहीं करता था, कोई उसे कुछ देता भी नहीं था, और वो किसी से कुछ माँगता भी नहीं था। बस दिन भर वहीं बैठा रहता, आग में लकड़ी डालता रहता, और पानी की तरफ़ देखता रहता।
पानी की तरफ़। हमेशा।
चौथे दिन मैं सर्वे टीम के साथ बंधे पर खड़ा था, नक़्शा हाथ में लिए, और वो पीछे से आकर मेरे बग़ल में खड़ा हो गया।
मैं चौंक गया। आदमी की आवाज़ नहीं हुई थी। बिल्कुल नहीं।
उसने पानी की तरफ़ देखते हुए पूछा — और उसकी आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी ने बहुत दिनों बाद इस्तेमाल की हो:
"पानी कहाँ तक उतरेगा, बाबू?"
मैंने कहा, "जून तक तो पूरा सूख जाएगा। इस बार बारिश भी लेट है। शायद पंद्रह जुलाई के बाद।"
उसने कुछ नहीं कहा।
मैंने मुड़कर देखा।
बूढ़ा रो रहा था।
बिना आवाज़ के। आँसू उसके गालों की भभूत पर लकीरें बना रहे थे और नीचे टपक रहे थे, और वो पलक तक नहीं झपका रहा था।
मैंने घबराकर पूछा, "बाबा? क्या हुआ?"
उसने मेरी तरफ़ देखा। और उसने जो कहा, वो मुझे उस वक़्त बकवास लगा था।
"बाबू, तुम लोग वहाँ खुदाई मत करना।"
"क्यों?"
"क्योंकि वहाँ जो गड़ा है, वो गड़ा नहीं है।" उसने कहा। "वो सिर्फ़ भीगा हुआ है।"
तीन — मंदिर नहीं था
मई के आख़िर में तलहटी पूरी तरह सूख गई।
आपने कभी सूखा हुआ जलाशय देखा है? दो किलोमीटर लंबा, एक किलोमीटर चौड़ा, और पूरा का पूरा फटा हुआ। मिट्टी दरारों में बँटी हुई — हर दरार दो-दो इंच चौड़ी, और उन दरारों में इतना गहरा अँधेरा कि पत्थर डालो तो आवाज़ ही न आए।
और उस मैदान के बीचोंबीच वो गाँव था।
हम सर्वे करते हुए मंदिर तक पहुँचे। और तभी पहली गड़बड़ पकड़ में आई।
वो मंदिर नहीं था।
बाहर से शिखर जैसा दिखता था — मगर वो शिखर नहीं, एक ऊँची मीनार थी, ठोस, अंदर से भरी हुई। मंदिर में गर्भगृह होता है। यहाँ नहीं था। मंदिर में मूर्ति होती है, चौखट पर नक़्क़ाशी होती है, कहीं न कहीं कोई देवता होता है।
यहाँ कुछ नहीं था।
यहाँ बस एक चौकोर पत्थर का चबूतरा था — पचास फ़ीट बाई पचास फ़ीट, काले पत्थर का — और उसके ठीक बीच में एक गड्ढा।
गोल गड्ढा। क़रीब आठ फ़ीट चौड़ा, चार फ़ीट गहरा। और उसके अंदर की दीवारें —
मैं नीचे उतरा और मैंने हाथ लगाकर देखा।
काँच जैसी थीं।
आप जानते हैं पत्थर काँच जैसा कब होता है? जब उस पर बहुत लंबे समय तक, बहुत ज़्यादा तापमान की आग जले। इतनी देर तक कि पत्थर की ऊपरी सतह पिघलकर दोबारा जम जाए।
भट्ठी में ऐसा होता है। ईंट के भट्ठे में। सीमेंट के किल्न में।
पूजा की धूनी में नहीं होता।
मैंने ऊपर देखा और चिल्लाकर रामखिलावन को बुलाया।
"रामखिलावन! ये क्या चीज़ है?"
वो चबूतरे के किनारे पर खड़ा था। नीचे नहीं आया।
"साहब," उसने कहा, "मैं इस पर पैर नहीं रखूँगा।"
"अरे क्यों?"
"बाप ने मना किया था।"
और उसी दिन, चबूतरे के पश्चिम की तरफ़, गाद हटाते हुए, हमें हड्डियाँ मिलीं।
पहले तो हम घबरा गए — पुलिस केस बन जाएगा, काम रुक जाएगा, ऊपर से जाँच बैठेगी। मगर फिर हमने देखा कि हड्डियाँ बहुत पुरानी थीं। सैकड़ों साल पुरानी। और वो दफ़्न नहीं थीं — बस बिखरी पड़ी थीं, पूरे इलाक़े में, जैसे किसी ने मुट्ठी भरकर फेंकी हों।
मैंने एक उठाई। जाँघ की हड्डी थी।
और तब मैंने वो चीज़ देखी जो आज भी, ग्यारह साल बाद, मेरी नींद में मेरे सामने आ जाती है।
हड्डी आधी काली थी और आधी सफ़ेद।
बिल्कुल आधी। लंबाई में, ठीक बीच से बँटी हुई। एक तरफ़ जली हुई — कोयले जैसी काली, भुरभुरी। दूसरी तरफ़ बिल्कुल साफ़ — सफ़ेद, चिकनी, जैसे कभी आग के पास गई ही न हो।
मैंने दूसरी उठाई। वैसी ही।
तीसरी। चौथी। दसवीं।
हर एक। हर एक हड्डी आधी जली हुई थी।
आप समझ रहे हैं इसका क्या मतलब है? किसी लाश को जलाओ तो या तो वो पूरी जलती है, या पूरी नहीं जलती। आग एक तरफ़ से नहीं रुकती। आग को ये पता नहीं होता कि "यहाँ तक"।
सिवाय इसके कि कोई उसे रोक दे।
रामखिलावन ने वहीं से आवाज़ दी — "साहब, फेंक दीजिए। हाथ धो लीजिए।"
मैंने हड्डी फेंक दी।
मगर एक और मज़दूर था — बीस-बाईस साल का लड़का, नाम था छोटू, नया था, शहर से आया था और उसे इन सब बातों में मज़ा आता था। उसने गाद में से एक खोपड़ी उठा ली।
आधी जली हुई खोपड़ी। बायाँ हिस्सा काला, दायाँ हिस्सा सफ़ेद।
उसने उसे अपने सिर के ऊपर उठाया और नाटक करने लगा — "ऐ, फ़ोटो खींचो! रील बनेगी!"
सब हँसने लगे।
रामखिलावन नहीं हँसा। रामखिलावन दौड़कर आया और उसने वो खोपड़ी छोटू के हाथ से छीनकर ज़मीन पर पटक दी।
छोटू चिढ़ गया। "अरे काका, क्या हुआ?"
रामखिलावन ने उसका कॉलर पकड़ा। उसका चेहरा सफ़ेद पड़ा हुआ था।
"तूने उठाया," उसने कहा। "उठाया मतलब क़ुबूल किया। अब वो तुझे पहचान गया।"
चार — पहली मौत
छोटू अगली सुबह अपने टेंट में मरा हुआ मिला।
मुझे साढ़े छह बजे फ़ोन आया। मैं भागकर पहुँचा। तब तक टेंट के बाहर पंद्रह-बीस लोग जमा हो चुके थे और कोई अंदर जाने की हिम्मत नहीं कर रहा था।
मैं अंदर गया।
मैं आपको जो बताने जा रहा हूँ, वो पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी लिखा है। मैंने वो रिपोर्ट अपने पास रखी हुई है। ग्यारह साल से।
छोटू अपने बिस्तर पर था। करवट लेकर, हाथ चेहरे के नीचे, बिल्कुल वैसे जैसे सोते हुए आदमी होता है।
उसके शरीर का बायाँ हिस्सा जल चुका था।
पूरी तरह। कंधे से लेकर कूल्हे तक, बायाँ हाथ, बाईं जाँघ, चेहरे का बायाँ आधा — कोयला। हड्डी दिख रही थी। मांस भुनकर सिकुड़ चुका था।
और दायाँ हिस्सा?
दायाँ हिस्सा बिल्कुल ठीक था।
उसकी दाईं आँख खुली हुई थी और साफ़ थी। दाएँ गाल पर हल्की सी दाढ़ी थी, बिल्कुल सलामत। दाएँ हाथ के नाख़ून साफ़ थे।
और अब वो चीज़ सुनिए जो पुलिस को सबसे ज़्यादा परेशान करती रही।
उसके कपड़े नहीं जले थे।
बनियान पहने हुए था। सफ़ेद बनियान। उसके बाईं तरफ़ का शरीर हड्डी तक जल चुका था और बनियान का बायाँ हिस्सा — सफ़ेद था। साफ़। एक भी छेद नहीं। एक भी झुलसा हुआ रेशा नहीं।
टेंट नहीं जला। बिस्तर नहीं जला। तकिया नहीं जला।
उसके सिरहाने एक थर्मस रखा था। पुलिस ने खोलकर देखा।
चाय अभी भी गर्म थी।
पोस्टमार्टम में लिखा गया — "थर्ड-डिग्री बर्न्स ऑफ़ अननोन ओरिजिन।" पुलिस ने फ़ाइल बंद कर दी। ऊपर से हमारे विभाग को नोटिस आया कि लापरवाही हुई है, सुरक्षा नियमों का पालन नहीं हुआ।
लापरवाही।
एक आदमी अपने बिस्तर पर आधा जल गया और उसकी बनियान साफ़ रही, और सरकार की फ़ाइल में उसका कारण "लापरवाही" लिखा गया।
उस शाम, मज़दूरों में से आधे भाग गए।
और मैं — मैं शाम को बंधे पर गया और बूढ़े की झोंपड़ी की तरफ़ चल दिया।
पाँच — बाबा की कहानी
बाबा आग के सामने बैठा था। उसने मेरी तरफ़ देखा और सिर्फ़ इतना कहा:
"तो शुरू हो गया।"
मैं उसके सामने ज़मीन पर बैठ गया। मुझे नहीं पता मैं क्यों बैठा। शायद इसलिए कि पूरे इलाक़े में वो अकेला आदमी था जो हैरान नहीं था।
"बाबा, वहाँ क्या है?"
उसने बहुत देर तक जवाब नहीं दिया। लकड़ी उठाई, आग में डाली, और फिर बोलना शुरू किया। और उसकी आवाज़ ऐसी थी जैसे कोई बहुत भारी चीज़ कंधे से उतार रहा हो।
"उस जगह का नाम मसान-कोट था। गाँव का नाम कुछ और था — रौनी। मगर श्मशान का नाम मसान-कोट था। और वो श्मशान सात सौ साल पुराना था।"
"सात सौ साल?"
"उससे भी ज़्यादा। किसी को ठीक-ठीक नहीं मालूम। मेरे गुरु के गुरु के गुरु — उन्हें भी नहीं मालूम था। बस इतना पता था कि जब से लोग वहाँ मरना शुरू हुए, तब से वहाँ एक आग जल रही थी। और वो आग कभी नहीं बुझी। एक बार भी नहीं। सात सौ साल में एक बार भी नहीं।"
"अखंड धूनी," मैंने कहा।
उसने सिर हिलाया। "तुम पढ़े-लिखे हो। तो तुम्हें ये भी लगता होगा कि वो पूजा के लिए थी। भगवान के लिए।"
"तो नहीं थी?"
बाबा ने अपनी खोपड़ी वाला कटोरा उठाया, उसमें से पानी पिया, और नीचे रख दिया।
"बाबू, तुम्हें एक बात बताता हूँ जो अघोर में सिखाई जाती है और बाहर कोई नहीं जानता। जब लाश ठीक से जलती है — पूरी, पूरी की पूरी, राख होने तक — तो जो चीज़ अंदर होती है वो चली जाती है। ख़त्म। रास्ता साफ़।"
"और जब पूरी नहीं जलती?"
"तब वो जाती नहीं।"
आग चटक रही थी। मुझे याद है कि उस वक़्त हवा बिल्कुल बंद थी।
"अब सोचो," बाबा ने कहा। "सात सौ साल। उसमें कितने अकाल आए होंगे? कितनी महामारी? कितनी लड़ाइयाँ? कितनी बाढ़?"
मैं चुप रहा।
"जिस साल प्लेग आया था, मसान-कोट में एक दिन में सत्तर लाशें आती थीं। और लकड़ी? लकड़ी दस लाशों की होती थी। तो साठ लाशें क्या होती थीं, बाबू? उनको ऊपर से थोड़ी-सी आग दिखाकर नदी में डाल दिया जाता था। जिस साल अकाल पड़ता था, लोगों के पास लकड़ी ख़रीदने के पैसे नहीं होते थे — आधी लकड़ी, आधा जला, बाक़ी दफ़्न। जिस साल बाढ़ आती थी, चिता बीच में बुझ जाती थी और लाश बहकर चली जाती थी।"
उसने मेरी आँखों में देखा।
"सात सौ साल में लाखों अधजली चीज़ें उस एक जगह पर छूट गईं, बाबू। और अधजली चीज़ें अकेली नहीं रहतीं।"
मेरे हाथ ठंडे हो रहे थे। मई की रात में।
"वो आपस में जुड़ती हैं। एक का हाथ, दूसरे का जबड़ा, तीसरे का आधा सीना। धीरे-धीरे, सौ साल, दो सौ साल, तीन सौ साल... और एक दिन वो एक चीज़ बन जाती हैं।"
"उसका... कोई नाम है?"
बाबा ने आग की तरफ़ देखा।
"नाम रखना पड़ा था। क्योंकि बात करनी पड़ती थी उसके बारे में। तो हमारे पुरखों ने उसे बुलाना शुरू किया — अधजला।"
छह — जो चाहिए उसे
"और वो धूनी?" मैंने पूछा। "वो क्यों?"
"क्योंकि आग एक ताला है।"
बाबा ने आगे झुककर कहा — और उसकी आवाज़ धीमी हो गई, जैसे उसे डर हो कि कोई सुन लेगा।
"जब तक उस कुंड में आग जलती रहती है, अधजला हमेशा 'जलने के बीच' में रहता है। समझे? आधा हुआ, हमेशा आधा ही रहेगा। वो जुड़ नहीं सकता, हिल नहीं सकता, उठ नहीं सकता। सात सौ साल तक हमारे पुरखे बस यही करते रहे — लकड़ी डालते रहे। पीढ़ी दर पीढ़ी। कोई पूजा नहीं, कोई मंत्र नहीं। बस लकड़ी।"
"और फिर बाँध बना," मैंने कहा।
"उन्नीस सौ उन्यासी में।"
बाबा की आवाज़ में कोई शिकायत नहीं थी। बस थकान थी।
"सरकार आई। नोटिस लगा। मुआवज़ा बँटा। गाँव उठ गया। मेरे गुरु — बाबा शंभूनाथ — वो कलेक्टर के पास तीन बार गए। तीन बार। उन्होंने हाथ जोड़े। उन्होंने कहा कि गाँव ले जाओ, खेत ले जाओ, हमारी झोंपड़ियाँ ले जाओ — बस उस चबूतरे को पानी में मत डुबाओ, उसके चारों तरफ़ दीवार बना दो, कुछ भी कर दो।"
"कलेक्टर ने क्या कहा?"
"उसने कहा — बाबा, अंधविश्वास मत फैलाओ। देश आगे बढ़ रहा है।"
बाबा हँसा। पहली बार मैंने उसे हँसते देखा और मुझे उसकी हँसी से ज़्यादा डरावनी चीज़ आज तक नहीं सुनी।
"मैं उन्नीस साल का था। गुरु ने मुझे बुलाया और कहा — 'शंभू यहीं रहेगा। तू जा। किनारे पर बैठ जा। एक आग जला और उसे मत बुझने देना। एक दिन पानी उतरेगा। जिस दिन उतरे, उस दिन ये आग लेकर वापस जाना।'"
"और वो?"
"वो कुंड के पास बैठे रहे।"
बाबा ने पानी की तरफ़ देखा — उस ख़ाली, फटी हुई ज़मीन की तरफ़ जो कभी पानी थी।
"पानी सत्रह दिन में आया। मैंने किनारे से देखा। पहले पैर डूबे, फिर घुटने, फिर कमर। वो हिले नहीं। और जब पानी सीने तक पहुँचा — तब कुंड की आग बुझी।"
उसने बहुत गहरी साँस ली।
"मैंने वो आवाज़ सुनी, बाबू। सात सौ साल पुरानी आग जब बुझी न — तो एक फुसफुसाहट हुई। जैसे कोई बहुत बड़ी चीज़ राहत की साँस ले रही हो।"
मैं काफ़ी देर तक कुछ नहीं बोल पाया।
फिर मैंने वो सवाल पूछा जिसका जवाब मैं सुनना नहीं चाहता था।
"बाबा, अधजला चाहता क्या है? खाना? ख़ून? बदला?"
बाबा ने सिर हिलाया।
"नहीं। और यही सबसे बुरी बात है। अगर वो भूखा होता तो हम उसे खिला देते। अगर वो गुस्से में होता तो कभी न कभी ठंडा हो जाता।"
"तो?"
"वो पूरा होना चाहता है।"
मैं समझा नहीं। मेरे चेहरे से दिख गया होगा।
"बाबू, वो लाखों अधूरी चीज़ों से बना है। और हर अधूरी चीज़ की एक ही तमन्ना होती है — पूरी हो जाना। उसे जलना है। ठीक से, पूरा, राख होने तक। ताकि वो जा सके।"
"तो जला क्यों नहीं लेता ख़ुद को?"
"क्योंकि उसे जलना आता ही नहीं।"
बाबा ने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखों में जो चीज़ थी, वो तरस थी — मेरे लिए नहीं, उस चीज़ के लिए।
"उसने कभी पूरी आग देखी ही नहीं। उसने सिर्फ़ आधी आग जानी है। तो वो जब किसी को छूता है, वो उसे आधा जला देता है। वो कोशिश करता है, हर बार, कि इस बार पूरा हो जाए — और हर बार आधा रह जाता है। और जो आधा रह जाता है..."
"...वो उसमें जुड़ जाता है," मैंने कहा।
बाबा ने सिर हिलाया।
"तुम्हारा वो लड़का। छोटू। वो अब वहीं है, बाबू। उसमें।"
उस रात मैं रेस्ट हाउस में लेटा था और मुझे नींद नहीं आ रही थी।
और तीन बजे के आसपास मुझे आवाज़ सुनाई दी।
खिड़की से बाहर, दो किलोमीटर दूर, उस सूखे मैदान से — घसीटने की आवाज़। जैसे कोई बहुत भारी गीली चीज़ मिट्टी पर खींची जा रही हो।
और हवा में वो बास आई जो रामखिलावन ने पहले दिन बताई थी।
गीली राख की बास।
बुझी हुई चिता पर बारिश पड़ जाए तो जो बदबू आती है — मीठी, भारी, और ऐसी कि गले में चिपक जाए।
सात — दूसरी और तीसरी
अगले दो दिन में दो और गए।
पहला मुनीर था। बीस साल से विभाग में। उसे हमने सुबह मैदान के बीचोंबीच पाया — खड़ा हुआ। कमर तक मिट्टी में धँसा हुआ, दोनों हाथ ऊपर, आँखें खुली, मुँह खुला।
हमें लगा वो फँस गया है और उसे निकाल लेंगे।
चार आदमी उसे खींचने गए।
उन्होंने उसकी बाँहें पकड़ीं और खींचा।
और वो —
बाँहें अलग हो गईं।
खाल पूरी सही थी। बाहर से मुनीर बिल्कुल मुनीर लग रहा था। मगर अंदर से वो पक चुका था। जैसे कोई चीज़ ओवन में रखी गई हो — बाहर की परत सलामत, अंदर का सब कुछ भुन चुका।
मैं उस दिन के बाद तीन महीने तक मांस नहीं खा पाया।
तीसरा — बंसी — कभी मिला ही नहीं।
उसका दायाँ जूता मिला, चबूतरे से चालीस फ़ीट दूर।
और उससे भी चालीस फ़ीट दूर, उसकी दाईं टाँग मिली — घुटने तक। घुटने के ऊपर वाला हिस्सा राख था और वो राख अभी भी गर्म थी जब हमने उसे देखा। सुबह के आठ बजे थे।
काम बंद हो गया।
एस.डी.ओ. साहब भोपाल से आए। दो घंटे मौक़े पर रहे — मैदान में एक क़दम नहीं रखा, बंधे पर से देखते रहे — और फिर उन्होंने मुझे बुलाया।
"राजीव, रिपोर्ट में क्या लिख रहे हो?"
मैंने सच बताने की कोशिश की। मैंने कहा कि पहले उस चबूतरे को समझना पड़ेगा, कि हमें पुरातत्व विभाग को बुलाना चाहिए, कि यहाँ कुछ है जो हमारी समझ से बाहर है।
उन्होंने मेरी पूरी बात सुनी। बहुत ध्यान से। और फिर उन्होंने कहा:
"बेटा, तुम्हारी उम्र कितनी है?"
"सत्ताईस।"
"नौकरी कितने साल की है?"
"चार।"
"तो पैंतीस साल और बाक़ी हैं।" उन्होंने सिगरेट सुलगाई। "रिपोर्ट में लिखो — तलहटी में मीथेन गैस का जमाव पाया गया, दुर्घटनावश आग लगी, तीन मज़दूरों की मृत्यु। साइट अगले आदेश तक बंद।"
"सर, गैस से आदमी आधा नहीं जलता।"
एस.डी.ओ. साहब ने सिगरेट का धुआँ छोड़ा और मैदान की तरफ़ देखा।
और उन्होंने बहुत धीरे से कहा — इतना धीरे कि मुझे लगा वो ख़ुद से कह रहे हैं:
"मेरे पिताजी उन्नीस सौ उन्यासी में इसी बाँध में ओवरसियर थे, राजीव। उन्होंने भी एक रिपोर्ट लिखी थी। सच वाली।"
उन्होंने सिगरेट फेंकी और जीप की तरफ़ चल दिए।
"वो प्रमोशन के बिना रिटायर हुए। और आख़िरी दस साल उन्होंने रात में लाइट जलाकर सोना शुरू कर दिया था।"
तीन दिन में पूरी साइट ख़ाली हो गई।
सब चले गए। मज़दूर, चौकीदार, बाबू, ड्राइवर।
मैं नहीं गया।
आज तक मुझसे लोग पूछते हैं — क्यों नहीं गए? आप इंजीनियर थे, आपकी ज़िम्मेदारी ख़त्म हो चुकी थी, ऑर्डर हो चुका था।
मेरे पास इसका कोई अच्छा जवाब नहीं है।
बस इतना है कि उस बूढ़े ने चवालीस साल एक आग जलाई थी। और मैंने उसे रोते हुए देखा था। और मुझे लगा कि अगर मैं भी चला गया, तो इस पूरी दुनिया में उस आदमी के साथ कोई नहीं बचेगा।
आठ — आग ले जानी है
"पंद्रह जुलाई," बाबा ने कहा।
हम उसकी झोंपड़ी के सामने बैठे थे। जून की आख़िरी तारीख़ थी। आसमान में पहली बार बादल दिख रहे थे — पतले, दूर, मगर थे।
"पंद्रह जुलाई तक बारिश आ जाएगी," उसने कहा। "और जिस दिन बारिश आई, ये आग बुझ जाएगी।"
"ढँक देंगे। तिरपाल लगा देंगे।"
उसने सिर हिलाया। "चवालीस साल से लगा रहा हूँ, बाबू। हर मानसून। हर बार आग एक इंच रह जाती है। अब मैं अस्सी साल का हूँ। इस बार मैं रात भर जागकर नहीं बचा पाऊँगा।"
फिर उसने वो बात कही जो पूरी कहानी की जड़ है।
"और वैसे भी, आग को यहाँ नहीं रहना है। आग को वहाँ जाना है।"
"कुंड में?"
"कुंड में। जहाँ से चवालीस साल पहले पानी ने भगाया था।"
मैंने कहा, "बाबा, तो चलिए। कल चलते हैं। मैं डीज़ल ले आता हूँ, लकड़ी ले आता हूँ, ट्रैक्टर का इंतज़ाम..."
उसने मेरा हाथ पकड़ लिया।
उसके हाथ की खाल कागज़ जैसी थी और उसकी पकड़ लोहे जैसी।
"नहीं समझे तुम। नई आग से काम नहीं चलेगा।"
"मतलब?"
"वो कुंड सात सौ साल एक ही आग से जला है, बाबू। एक ही आग। जो पहले दिन जली थी, वही चलती रही — एक लकड़ी से दूसरी, एक दिन से दूसरे दिन, एक पीढ़ी से दूसरी। वो आग माचिस से नहीं जली थी और माचिस से दोबारा नहीं जलेगी।"
मुझे समझ आया। और समझ आते ही मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
"आपकी आग..."
"मेरी आग उसी की औलाद है।" बाबा ने अपनी छोटी सी लौ की तरफ़ देखा। "मेरे गुरु ने बुझने से पहले उसमें से एक अंगारा निकालकर मुझे दिया था। मिट्टी के बर्तन में। मैं उसे यहाँ लाया। चवालीस साल से मैंने उसे ज़िंदा रखा है।"
वो एक बालिश्त की लौ।
दुनिया की आख़िरी बची हुई अखंड आग।
"तो हमें इसे वहाँ ले जाना है।"
"हाथ में," बाबा ने कहा। "बर्तन में। पैदल। दो किलोमीटर। और रास्ते में इसे ज़मीन पर नहीं रखा जा सकता — एक बार भी नहीं। जिस पल ये ज़मीन छू गई, ये आम आग हो जाएगी।"
मैंने उस सूखे मैदान की तरफ़ देखा।
दो किलोमीटर फटी हुई मिट्टी। रात में।
और उस मिट्टी के नीचे वो चीज़, जो चवालीस साल से जाग रही थी।
"कब?" मैंने पूछा।
बाबा ने आसमान की तरफ़ देखा।
"आज रात।"
नौ — दो किलोमीटर
हम रात के ग्यारह बजे निकले।
बाबा आगे। हाथ में मिट्टी का बर्तन — छोटा, चौड़े मुँह वाला, और उसके अंदर वो अंगारा जिसे उसने अपनी आग में से निकाला था। उसने उसके ऊपर गोबर के उपले का टुकड़ा रखा था ताकि हवा से बुझे नहीं।
मैं पीछे। पीठ पर एक बोरा जिसमें सूखी लकड़ी थी, कंधे पर एक और बोरा, हाथ में टॉर्च।
बंधे से उतरते ही मुझे पहली बात समझ आई — वो मैदान रात में और भी बड़ा हो जाता है।
दिन में उसकी सीमाएँ दिखती हैं। रात में नहीं। रात में वो सिर्फ़ एक काली, फटी हुई सतह है जो टॉर्च की रोशनी के दायरे से बाहर हर तरफ़ फैलती चली जाती है।
और चुप्पी।
बुंदेलखंड की रात में झींगुर बोलते हैं। कुत्ते भौंकते हैं। कहीं न कहीं कोई आवाज़ होती है।
उस मैदान में कुछ नहीं था। हमारे जूतों की आवाज़ इतनी साफ़ थी कि मुझे अपनी ही चाल से डर लग रहा था।
पहला किलोमीटर बिना कुछ हुए निकल गया।
फिर हवा बदली।
पहले तो मुझे लगा कि हवा चली है। मगर नहीं — हवा नहीं चली थी। हवा गर्म हो गई थी। जैसे किसी ने बहुत बड़ा दरवाज़ा खोल दिया हो और उसके पीछे भट्ठी हो।
और वो बास आई।
बाबा रुक गया।
"आ गया," उसने कहा।
मैंने टॉर्च घुमाई।
मैं आपको बताने की कोशिश करूँगा कि मैंने क्या देखा। मगर मैं पहले ही माफ़ी माँग लेता हूँ, क्योंकि हमारी भाषा में उसके लिए शब्द नहीं हैं। हमारी भाषा उन चीज़ों के लिए बनी है जो एक होती हैं। वो एक नहीं था।
क़रीब सौ फ़ीट दूर, हमारे बाईं तरफ़, एक चीज़ खड़ी थी।
वो एक झोंपड़ी जितनी बड़ी थी। शायद उससे भी बड़ी।
और वो हिल रही थी — मगर एक चीज़ की तरह नहीं। भीड़ की तरह। जैसे बहुत सारे लोग एक-दूसरे से चिपके हुए हों और सब अलग-अलग दिशा में जाने की कोशिश कर रहे हों।
टॉर्च की रोशनी में मुझे टुकड़े दिखे।
एक चेहरा — आधा चेहरा — जो एक कंधे की जगह पर लगा हुआ था। एक हाथ जो कोहनी पर ख़त्म हो जाता था और वहाँ से राख झर रही थी, लगातार, जैसे टूटी हुई बोरी से अनाज। एक पसलियों का पिंजरा जिसके अंदर कोयले सुलग रहे थे — मैं उन्हें साँस के साथ चमकते-मद्धम होते देख सकता था।
और सब कुछ आधा जला हुआ था। हर चीज़। हर टुकड़ा। एक तरफ़ काला, एक तरफ़ सफ़ेद।
उसने कोई आवाज़ नहीं की — चिल्लाया नहीं, दहाड़ा नहीं।
उसने वो आवाज़ की जो गीली लकड़ी आग में करती है।
छन्न। पट। छन्न।
और उस आवाज़ के नीचे, बहुत नीचे, सैकड़ों मुँह एक साथ फुसफुसा रहे थे।
एक ही लफ़्ज़।
"जला दो।"
"जला दो।"
"जला दो।"
बाबा ने बिना पीछे देखे कहा — और उसकी आवाज़ में डर नहीं था, सिर्फ़ हुक्म था:
"चलते रहो। जवाब मत देना। नाम मत लेना। मुड़कर मत देखना।"
हम चलते रहे।
वो हमारे साथ-साथ चलने लगा। पचास फ़ीट दूर, बाईं तरफ़। हमारी रफ़्तार से। जब हम तेज़ हुए, वो तेज़ हुआ। जब बाबा हाँफकर धीमा हुआ, वो धीमा हुआ।
वो हमें रोक नहीं रहा था।
वो हमारे साथ आ रहा था।
और तब मुझे वो बात समझ आई जो आज तक मेरे लिए इस पूरी कहानी की सबसे दुखद बात है।
वो हमें मारने नहीं आया था।
वो आग के पीछे आ रहा था।
वो चवालीस साल से इंतज़ार कर रहा था कि कोई उसे ठीक से जला दे।
डेढ़ किलोमीटर पर बाबा गिरा।
उसका पैर एक दरार में गया और वो घुटनों पर आ गया — मगर हाथ ऊपर रहा। बर्तन ऊपर रहा। एक इंच नहीं झुका।
मैं उसे उठाने झुका।
और तभी वो चीज़ हम पर आई।
मैं नहीं बता सकता वो कैसे आई। एक पल वो पचास फ़ीट दूर थी, अगले पल हवा इतनी गर्म थी कि मेरी आँखों का पानी सूख गया और मेरी पलकें चिपक गईं।
उसने मुझे नहीं छुआ।
उसने बाबा को छुआ।
मैंने देखा — मैं आज भी देखता हूँ, हर रात, अगर आँख बंद करूँ तो — मैंने देखा कि बाबा के दाएँ पैर की खाल पिंडली से ऊपर की तरफ़ काली होने लगी। जैसे कोई काग़ज़ जल रहा हो और आग नीचे से ऊपर चढ़ रही हो।
बाबा उठ खड़ा हुआ।
वो चीख़ा नहीं।
वो अस्सी साल का आदमी, अपनी जलती हुई टाँग पर, दो क़दम आगे बढ़ा — और बर्तन सीधा रखा।
तीन क़दम।
चार।
फिर वो रुका और उसने मेरी तरफ़ मुड़कर बर्तन बढ़ा दिया।
मैंने उसका चेहरा देखा। दाईं आँख जा चुकी थी। दाईं तरफ़ की जटाएँ जलकर सिकुड़ चुकी थीं।
और उसकी बाईं आँख बिल्कुल साफ़ थी, और उसमें आँसू नहीं थे।
उसने कहा:
"ले जा।"
मैंने बर्तन ले लिया।
उसने कहा — और ये उसके आख़िरी शब्द थे:
"मत रुकना। मत देखना। मत गिराना।"
और फिर वो बूढ़ा ज़मीन पर बैठ गया।
उस चीज़ के बीचोंबीच। पालथी मारकर। जैसे चवालीस साल पहले उसका गुरु पानी के सामने बैठा था।
मैं भागा।
पाँच सौ मीटर। मेरी पीठ पर लकड़ी का बोरा था और मेरे हाथ में एक मिट्टी का बर्तन था जिसमें एक अंगारा था, और मैं उसे इस तरह पकड़े हुए भाग रहा था जैसे कोई नवजात बच्चे को पकड़ता है।
पीछे से आवाज़ आ रही थी।
पहले बाबा की आवाज़ — वो कुछ पढ़ रहा था, ऊँची आवाज़ में, लगातार, बिना रुके।
फिर वो हिसिंग बढ़ी। छन्न-छन्न-छन्न, तेज़, तेज़, तेज़ — और वो आवाज़ जो पहले फुसफुसाहट थी, वो अब चीख़ बन गई थी। सैकड़ों मुँह, एक साथ।
और फिर बाबा की आवाज़ बंद हो गई।
और मैंने मुड़कर नहीं देखा।
ग्यारह साल हो गए। मैं आज भी सोचता हूँ — क्या मुझे मुड़कर देखना चाहिए था? एक बार? आख़िरी बार?
फिर मुझे उसके शब्द याद आते हैं और मैं समझ जाता हूँ कि उसने मुझे वो बात इसीलिए कही थी। ताकि मैं ये सवाल कभी अपने आप से न पूछूँ।
वो जानता था कि वो वापस नहीं आ रहा। और उसने मुझे उस बोझ से बचा लिया।
दस — अखंड
मैं चबूतरे पर चढ़ा।
मैं कुंड में उतरा।
मैंने बोरा खोला और सूखी लकड़ी डाली — जल्दी में, बेतरतीब, जैसे आती थी वैसे।
और फिर मैंने बर्तन उल्टा किया।
वो अंगारा — छोटा सा, अंगूठे के नाख़ून जितना, चवालीस साल पुराना — लकड़ी पर गिरा।
एक पल कुछ नहीं हुआ।
और फिर पूरा कुंड एक साथ जल उठा।
एक साथ। हर लकड़ी। जैसे किसी ने पेट्रोल डाला हो — मगर धुआँ नहीं था। बिल्कुल धुआँ नहीं था। और लौ का रंग —
लौ का रंग सफ़ेद था। बीच में हल्का नीला। मैंने ज़िंदगी में उस रंग की आग न पहले देखी है, न बाद में।
आग दस फ़ीट ऊँची उठी और मैं पीछे गिर पड़ा।
और मैदान चुप हो गया।
बिल्कुल चुप। जैसे किसी ने स्विच दबा दिया हो। हिसिंग बंद। चीख़ बंद। हवा की गर्मी ख़त्म।
मैं चबूतरे के किनारे पर रेंगकर गया और मैंने नीचे देखा।
कुछ नहीं था।
सिर्फ़ फटी हुई मिट्टी, और चाँद की रोशनी, और डेढ़ किलोमीटर दूर — बहुत छोटा सा — एक ढेर।
मैं सुबह होने का इंतज़ार करता रहा। मैं जा नहीं सकता था। आग को अकेला नहीं छोड़ सकता था। मैं वहीं बैठा रहा, लकड़ी डालता रहा।
सूरज निकलने के एक घंटे बाद बारिश शुरू हुई।
उस साल की पहली बारिश। दो जुलाई। पंद्रह दिन पहले।
बहुत तेज़ बारिश। मैं भीग गया, बोरा भीग गया, चबूतरे पर पानी बहने लगा।
आग नहीं बुझी।
मैं आपको बता रहा हूँ और मुझे ख़ुद पता है कि ये कैसा लगता है — मगर मैं वहाँ बैठा था और मैंने अपनी आँखों से देखा। बारिश उस कुंड के चारों तरफ़ गिर रही थी, एक गोल घेरे में, और घेरे के अंदर एक बूँद नहीं आ रही थी।
मैं बहुत देर तक हँसता रहा। फिर बहुत देर तक रोता रहा।
ग्यारह — आज
मैंने नौकरी छोड़ दी।
इस्तीफ़ा भेजा, क्वार्टर ख़ाली किया, और बाबा की झोंपड़ी में आकर रहने लगा। लोगों ने बहुत कहा। माँ-बाप एक साल तक नाराज़ रहे। दोस्तों ने डिप्रेशन बताया, एक ने साइकैट्रिस्ट का नंबर दिया।
मैंने किसी को कुछ नहीं समझाया।
रौनी बाँध में पानी अगले साल वापस आ गया। अच्छी बारिश हुई, जलस्तर चढ़ा, और वो पूरा मैदान फिर से पानी के नीचे चला गया।
सिवाय एक जगह के।
पानी उस चबूतरे से तीस फ़ीट पहले आकर रुक गया।
ग्यारह साल हो गए। जलस्तर हर साल ऊपर-नीचे होता है — कभी कम, कभी ज़्यादा, दो साल तो बाँध ओवरफ़्लो हुआ।
पानी उस लकीर को कभी नहीं लाँघा।
सिंचाई विभाग वाले इसे "लोकल टोपोग्राफ़िकल एनोमली" कहते हैं। एक बार एक जूनियर इंजीनियर आया था नाप करने — मेरी ही जगह पर, मेरी ही उम्र का। उसने तीन दिन कोशिश की और चौथे दिन चला गया। जाते वक़्त उसने मुझसे कुछ नहीं पूछा।
मैं वहीं हूँ।
मेरी शादी हो गई। मेरी पत्नी को सब पता है — मैंने उसे शादी से पहले बता दिया था, और उसने सिर्फ़ इतना पूछा था, "आग को रोज़ लकड़ी चाहिए?" मैंने कहा "हाँ।" उसने कहा "ठीक है।"
मेरा बेटा नौ साल का है। शहर में पढ़ता है, छुट्टियों में आता है।
उसे लकड़ी डालना आता है। उसे पता है कि गीली लकड़ी नीचे नहीं, किनारे पर रखनी है ताकि पहले सूखे। उसे पता है कि रात को सोने से पहले तीन मोटे कुंदे डालने हैं, बग़ल-बग़ल, ताकि सुबह तक चलें।
मैंने उसे कभी कहानी नहीं सुनाई। कभी नहीं। मुझे उम्मीद है कि उसे कभी ज़रूरत न पड़े।
आख़िरी बात।
कभी-कभी — साल में दो-तीन बार, हमेशा बहुत रात को, जब आग नीची होती है और मैं ऊँघ रहा होता हूँ —
राख में से एक आवाज़ आती है।
बहुत धीमी। लगभग प्यार भरी। जैसे कोई थका हुआ आदमी बहुत दूर से पुकार रहा हो।
एक ही लफ़्ज़।
"जला दो।"
मैं जवाब नहीं देता।
चवालीस साल उस बूढ़े ने जवाब नहीं दिया। सात सौ साल उसके पुरखों ने जवाब नहीं दिया।
मगर मैं जानता हूँ कि किसी न किसी दिन, कोई न कोई, इस राख के पास बैठा होगा और उसे वो आवाज़ सुनाई देगी — और उसे लगेगा कि ये तो बेचारी सी आवाज़ है, ये तो सिर्फ़ मदद माँग रही है, इसमें क्या हर्ज है अगर मैं बस एक बार...
और वो जवाब दे देगा।
और उस दिन ये कहानी दोबारा शुरू हो जाएगी।
बस उस दिन इसे सुनाने वाला कोई नहीं होगा।