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रात वाली सिस्टर
Pretika · Ghost Stories · 10 मिनट
- Writer
- Pretika
- Story
- रात वाली सिस्टर
- Chapter
- Single story
- Category
- Ghost Stories
- Reading time
- 10 min
- Words
- 1885
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
मैंने GNM किया है — nursing का तीन साल का course, जिसके बाद आप staff nurse बन जाते हैं — और 2017 में मेरी posting गोरखपुर के एक सरकारी अस्पताल में हो गई। जो लोग सरकारी अस्पताल में रात को नहीं रुके, उन्हें मैं एक बात बता दूँ — रात के दो बजे का सरकारी अस्पताल इस दुनिया की सबसे अजीब जगह होती है, क्योंकि वहाँ न कभी पूरा अंधेरा होता है और न कभी पूरी रोशनी।
एक-दो tube light हमेशा जलती रहती हैं जो टिमटिमाती हैं और जिनमें से एक हल्की सी "टिक-टिक" आती रहती है। फ़र्श पर तीमारदार — मतलब मरीज़ के साथ आए घरवाले — अपनी चादरें बिछाकर सोए रहते हैं, और आपको चलते वक़्त उनके पैर बचाकर चलना पड़ता है। हर तरफ़ phenyl की गंध होती है, और उस phenyl की गंध के नीचे एक और गंध होती है जिसे मैं आपको शब्दों में नहीं समझा सकती, लेकिन हर nurse जानती है कि वो क्या है।
मेरी posting हुई थी ward number 7 में। female ward। छब्बीस बेड, दो कतारों में तेरह-तेरह, और हर बेड के नीचे-बग़ल में किसी न किसी का परिवार पड़ा हुआ।
और वहीं मेरी मुलाक़ात कुसुम सिस्टर से हुई।
अब मैं आपसे request करूँगी कि आगे की बातें ध्यान से सुनिएगा, क्योंकि इस कहानी में जो सबसे डरावना हिस्सा है, वो चीख़-चिल्लाहट वाला नहीं है। वो बहुत शांत है।
कुसुम सिस्टर हमारे ward की senior nurse थीं। सिर्फ़ रात की duty करती थीं। उम्र क़रीब चालीस, लंबी चोटी, हल्के हरे रंग की पुरानी साड़ी वाली uniform, और हाथ में हमेशा एक steel की trolley। वो कम बोलती थीं, चाय नहीं पीती थीं, कभी बैठती नहीं थीं, और उन्हें सब जानते थे। हर nurse, हर ward boy, हर सफ़ाई वाली, हर doctor — सबने कभी न कभी उनके साथ काम किया था।
मुझे भी उन्होंने बहुत कुछ सिखाया। cannula कैसे लगाना है, बुज़ुर्ग मरीज़ की नस कहाँ मिलती है, तीमारदार को कैसे शांत करना है।
और छह महीने बाद मुझे एक चीज़ दिखनी शुरू हुई।
जिस-जिस रात कुसुम सिस्टर duty पर होती थीं, उस रात हमारे ward में कोई न कोई मर जाता था।
अब आप कहेंगे कि सरकारी अस्पताल है, वहाँ रोज़ लोग मरते हैं। सही बात है। लेकिन ward number 7 medicine का general female ward था, कोई ICU नहीं था। यहाँ महीने में दो-तीन मौतें होती थीं, बस। और कुसुम सिस्टर महीने में आठ-दस रातें आती थीं।
और उन आठ-दस रातों में से हर एक रात, कोई न कोई।
मैंने अपनी diary में लिखना शुरू किया। सात महीने। सैंतालीस रातें। सैंतालीस मौतें। एक भी नहीं छूटी।
और फिर मुझे उनका "round" दिखा।
रात क़रीब तीन बजे कुसुम सिस्टर अपनी trolley लेकर पूरे ward का एक चक्कर लगाती थीं। और वो किसी मरीज़ को छूती नहीं थीं, कोई दवा नहीं देती थीं, कोई file नहीं देखती थीं।
वो बस किसी एक बेड के पास रुकती थीं, और उस बेड के पायताने — मतलब पैरों की तरफ़ — जो चादर लटकी होती थी, उसे ठीक कर देती थीं। बस इतना। दोनों हाथों से चादर सीधी की, और आगे बढ़ गईं।
एक बेड। हर रात, सिर्फ़ एक बेड।
और मैंने आठ रात तक इसे note किया, और आठों बार वो चादर ठीक करने के बाद, सुबह होने से पहले उस बेड से एक लाश उठी।
नौवीं रात मैंने कोशिश की।
उस रात कुसुम सिस्टर ने bed number 19 की चादर ठीक की। उस बेड पर एक अधेड़ औरत थीं, बुख़ार और कमज़ोरी के साथ भर्ती, हालत बिल्कुल ठीक थी, दो दिन में छुट्टी होने वाली थी।
मैं सीधे उनके बेटे के पास गई, जो नीचे फ़र्श पर सो रहा था, मैंने उसे जगाया और मैंने कहा — "भैया, आप अपनी माँ को अभी shift करा लो, किसी private में ले जाओ, अभी।"
उसने आँखें मलते हुए मुझसे पूछा — "सिस्टर, क्या हो गया? अभी तो doctor साहब बोले थे ठीक हैं।"
और मैं उसे क्या बताती।
मैंने बहुत ज़ोर डाला। मैंने कहा कि यहाँ infection फैला है, कहीं और ले जाओ। और आधे घंटे बाद वो लड़का सचमुच अपनी माँ को लेकर निकल गया, ambulance बुलाकर, रात के पौने चार बजे।
और वो औरत ज़िंदा है। वो आज भी ज़िंदा है।
उस रात मरा वो लड़का।
ambulance में। रास्ते में। उन्नीस साल का था। कुछ नहीं हुआ था उसे — न चोट, न बीमारी, न कोई हादसा। ambulance वाले ने बताया कि वो अपनी माँ का हाथ पकड़े बैठा था और फिर एक तरफ़ को झुक गया।
उस रात मुझे समझ आया कि मैं सात महीने से ग़लत चीज़ गिन रही थी।
कुसुम सिस्टर मरीज़ों को नहीं ले जा रही थीं।
वो बेड की चादर छूती थीं — और उस बेड के साथ जो इंसान होता था, जो नीचे ज़मीन पर सोता था, जो रोज़ खाना लाता था, जो दवा की पर्ची लेकर भागता था — वो जाता था।
तीमारदार।
और अब आप ये समझिए कि ये बात इतने सालों तक किसी को पता क्यों नहीं चली। क्योंकि सरकारी अस्पताल में तीमारदार की मौत, मौत नहीं मानी जाती। वो हमारा मरीज़ नहीं होता, उसका कोई record नहीं होता, उसकी कोई file नहीं होती। कोई आदमी अस्पताल के बरामदे में सोते-सोते ठंडा हो जाए तो लोग कहते हैं — बेचारा दस दिन से सोया नहीं था, थक गया था, दिल का दौरा पड़ गया होगा। और उसे उसी दिन उठाकर, उसी दिन जला दिया जाता है।
मैंने पीछे जाकर हिसाब लगाया। मैंने पुराने रजिस्टर देखे, मैंने ward boys से पूछा, मैंने वो पर्चियाँ देखीं जो emergency में "brought dead" वालों के लिए बनती हैं।
तीन साल में इकतीस।
इकतीस तीमारदार। सारे ward number 7 के। सारे रात के। सारे तीन से पाँच बजे के बीच।
और सबकी उम्र अलग-अलग — कोई पैंसठ का, कोई उन्नीस का, कोई सत्ताईस साल की औरत जो अपनी सास के साथ आई थी।
अब मैं दूसरे हिस्से पर आती हूँ, और ये पहले वाले से भी बुरा है।
मैं duty roster लेकर गई। वो कागज़ जिस पर लिखा होता है कि कौन सी nurse किस रात duty पर है।
कुसुम सिस्टर का नाम उसमें नहीं था।
किसी भी महीने के roster में नहीं था।
मैं office गई, मैंने staff list माँगी। पूरे अस्पताल में कुसुम नाम की कोई nurse नहीं थी। कभी नहीं थी। न permanent, न contract, न कहीं।
और फिर मैंने वो किया जो मुझे नहीं करना चाहिए था।
मैंने अपनी एक साथी nurse से — शालिनी से — बहुत आराम से पूछा कि कुसुम सिस्टर दिखती कैसी हैं, बस ऐसे ही, बातों-बातों में।
शालिनी ने कहा — "अरे वही, नाटी सी, गोरी, ठोड़ी पर तिल वाली।"
मैंने जिस औरत को दो साल से देखा था, वो लंबी थी, साँवली थी, और उसकी लंबी चोटी थी।
मैंने ward boy से पूछा। उसने कहा — "बुढ़िया वाली सिस्टर? सफ़ेद बाल वाली?"
मैंने एक doctor से पूछा, जो वहाँ आठ साल से थे। उन्होंने बिना सिर उठाए कहा — "कुसुम सिस्टर को कौन नहीं जानता।" और जब मैंने पूछा कि वो दिखती कैसी हैं, तो वो एक पल के लिए रुके, और फिर उन्होंने कहा — "अरे... सामान्य सी हैं, क्या पूछ रही हो।"
उस अस्पताल में सब उन्हें जानते थे। सबने उनके साथ काम किया था। सबको उनकी कोई न कोई बात याद थी।
और कोई दो लोग उनका एक जैसा चेहरा नहीं बता पा रहे थे।
आख़िर में मैं रीता दीदी के पास गई। रीता दीदी हमारी matron थीं, तीस साल की नौकरी, दो साल में retire होने वाली थीं, और वो अकेली इंसान थीं जिनसे मैं ये सब कह सकती थी।
मैंने उन्हें सब बताया। diary, तारीख़ें, इकतीस, roster, चेहरे।
रीता दीदी ने मेरी बात पूरी सुनी, चाय ख़त्म की, और फिर उन्होंने बस इतना कहा —
"अंकिता, तू उससे बचने की कोशिश मत कर। तू सिर्फ़ उसके सामने मत पड़।"
मैंने पूछा — "दीदी, आप जानती हैं ना? आप कब से जानती हैं?"
और उन्होंने कहा — "जिस साल मेरी नौकरी लगी थी, उस साल एक सिस्टर थी हमारे साथ, वो भी यही सब लिख रही थी। कागज़ पर। तारीख़ें, नाम, सब।"
मैंने पूछा — "वो कहाँ हैं अब?"
रीता दीदी ने कहा — "पता नहीं।" और फिर उन्होंने कप उठाया और चली गईं।
अब आख़िरी हिस्सा।
नवंबर 2019 में मेरी माँ गोरखपुर आईं। दो हफ़्ते के लिए। मैं उन्हें दो साल से बुला रही थी और आख़िरकार वो आ गईं।
उस दिन मेरी double duty थी और मेरे hostel की चाबी मेरे पास थी, इसलिए माँ शाम को अस्पताल आ गईं और बाहर वाले बरामदे में बैठ गईं, ये सोचकर कि मैं दस बजे free हो जाऊँगी तो साथ चलेंगे।
मैं free नहीं हुई। रात के डेढ़ बज गए। माँ वहीं बैठी रहीं।
और रात क़रीब पौने तीन बजे, जब मैं दवा की trolley लेकर corridor से गुज़र रही थी, कुसुम सिस्टर सामने से आईं।
और उन्होंने मुझे रोका नहीं, कुछ बोला नहीं, बस मेरे पास से गुज़रते हुए — बिल्कुल वैसे जैसे कोई बड़ी अपनी छोटी बहन का दुपट्टा ठीक कर देती है — मेरे कंधे पर से मेरा दुपट्टा उठाकर सीधा कर दिया।
दोनों हाथों से।
और आगे बढ़ गईं।
मैं वहीं खड़ी रह गई। मेरे हाथ से trolley छूट गई और सारी शीशियाँ फ़र्श पर बिखर गईं और मुझे उनकी आवाज़ तक नहीं सुनाई दी।
मुझे पता था इसका क्या मतलब है।
मैं भागी। मैं बरामदे में गई, मैंने माँ को उठाया, मैंने उनसे कुछ नहीं कहा, मैंने उनका बैग उठाया और मैं उन्हें खींचते हुए gate तक ले गई। वो पूछती रहीं कि क्या हुआ, तबीयत ठीक है, कोई लड़ाई हो गई क्या।
मैंने एक auto रोका, उसमें उन्हें बिठाया, driver को स्टेशन का पता दिया, उसे पाँच सौ रुपये दिए, और मैंने माँ से कहा — "आप पहली गाड़ी से घर चली जाइए, मैं बाद में बताऊँगी।"
और माँ चली गईं।
और मेरी माँ आज ज़िंदा हैं। वो आज भी ज़िंदा हैं। मैं उनसे रोज़ बात करती हूँ।
उस रात मैं सुबह छह बजे hostel पहुँची।
और मेरे कमरे में, बग़ल वाले बिस्तर पर, नीलम पड़ी थी।
नीलम मेरी roommate थी। मेरे ही batch की, तेईस साल की, बलिया से। हम दोनों तीन साल से एक कमरे में थे। उसने उस रात मेरे लिए खाना ढककर रखा था — मैंने बाद में देखा, प्लेट पर एक कटोरी उलटी रखी थी, वो हमेशा ऐसे ही रखती थी।
post-mortem में लिखा आया — cardiac arrest, cause undetermined.
तेईस साल।
मैं आपको एक बात बताती हूँ जो मैंने आज तक किसी से नहीं कही, अपने पति से भी नहीं।
मुझे उस रात पता था।
मुझे जिस पल मेरा दुपट्टा सीधा हुआ, उसी पल पता चल गया था कि आज रात मेरे सबसे पास जो सोएगा, वो नहीं उठेगा। मैंने माँ को भेजा, और मुझे मालूम था कि मैं hostel जा रही हूँ, और मुझे मालूम था कि नीलम वहाँ है।
मैंने उसे फ़ोन नहीं किया। मैंने उसे जगाया नहीं। मैंने उसे बाहर नहीं भेजा।
मैंने सिर्फ़ अपनी माँ को बचाया।
मैंने 2020 में वो अस्पताल छोड़ दिया। मैं आज एक private hospital के ICU में हूँ, मेरी शादी हो चुकी है, और बाहर से मेरी ज़िंदगी बिल्कुल ठीक दिखती है।
पिछले साल, night duty पर, एक senior nurse मेरे पास आई और उसने मुझसे एक patient shift कराने में मदद माँगी। मैंने उसे पहले कभी नहीं देखा था। मैंने उसके साथ पूरा काम किया, हमने आधे घंटे बात की, उसने मुझे अपने बच्चों के बारे में बताया।
और सुबह जब मैंने अपनी colleague से पूछा कि वो कौन थी, तो उसने कहा कि रात में हमारे साथ कोई senior नहीं थी।
मैंने उसका चेहरा देखा था। मैं आपको बता नहीं सकती कि वो कैसी दिखती थी।
मुझे याद ही नहीं रहता।
और आख़िरी बात। आजकल मैं और मेरे पति अलग-अलग कमरों में सोते हैं। उन्हें लगता है हमारे बीच कुछ चल रहा है, और वो नाराज़ रहते हैं, और मैं उन्हें कुछ नहीं बता सकती।
मैं उन्हें कैसे बताऊँ कि मैं ये सिर्फ़ इसलिए कर रही हूँ कि जिस रात मेरा दुपट्टा दोबारा सीधा हो, उस रात मेरे सबसे पास कोई न हो।