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आगे वाली सीट
Pretika · Real Experiences · 9 मिनट
- Writer
- Pretika
- Story
- आगे वाली सीट
- Chapter
- Single story
- Category
- Real Experiences
- Reading time
- 9 min
- Words
- 1625
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
मैं गरिमा हूँ, मैं झाँसी से हूँ, और पिछले चार साल से गुरुग्राम में हूँ। 2021 में मैंने यहाँ एक process join किया — रात की shift, साढ़े नौ बजे रात से साढ़े छह बजे सुबह तक — और मैंने आज तक अपनी माँ को नहीं बताया कि shift रात की है, क्योंकि अगर उन्हें पता चल जाता तो वो उसी हफ़्ते मुझे वापस बुला लेतीं, और मुझे यहाँ रुकना था।
अब मैं आपको एक चीज़ समझाती हूँ, क्योंकि पूरी कहानी इसी पर टिकी है।
गुरुग्राम, नोएडा, Bangalore — जहाँ भी रात की shift वाली companies हैं, वहाँ एक rule होता है कि किसी लड़की को cab का "last drop" नहीं बनाया जाएगा। last drop मतलब वो इंसान जिसे सबसे आख़िर में उतारा जाता है, जिसके बाद गाड़ी में सिर्फ़ वो और driver बचते हैं। और अगर मजबूरी में किसी लड़की का last drop करना ही पड़े, तो गाड़ी में एक marshal बैठाया जाता है — marshal मतलब एक security guard, जो आगे वाली सीट पर बैठता है और तब तक नहीं हटता जब तक वो लड़की अपने घर के अंदर नहीं चली जाती।
मेरा घर सेक्टर 57 की तरफ़ था और मैं ही अपने route की आख़िरी थी, इसलिए हर रात मेरे साथ एक marshal होता था।
वो हरे रंग की uniform पहनता था, सर्दियों में काली monkey cap, और वो कभी नहीं बोलता था — एक शब्द नहीं, चार साल में एक शब्द नहीं। मैं सच बताऊँ तो मुझे आज तक उसकी शक्ल याद नहीं है, क्योंकि उसने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा; मुझे बस उसके सर का पिछला हिस्सा याद है और rear view mirror में कभी-कभार उसके जबड़े का एक हिस्सा। और सबसे अजीब बात ये है कि मुझे ये चार साल तक अजीब लगा ही नहीं — एक इंसान रोज़ चालीस मिनट मेरे आगे बैठता रहा और मैंने कभी उसका चेहरा देखने की कोशिश तक नहीं की।
पहले ही हफ़्ते में सोनू भैया ने मुझे तीन बातें बोली थीं। सोनू भैया हमारे regular driver थे, आगरा के, बहुत सीधे आदमी। उस वक़्त मुझे लगा था कि गाँव-देहात वाली बात कर रहे हैं और मैं हँस दी थी।
पहली बात — आगे वाली सीट को घूरना मत।
दूसरी — जो उस सीट पर बैठा है, उससे कभी बात मत करना।
और तीसरी — वो हमेशा तुम्हारे बाद उतरेगा, तुमसे पहले नहीं।
मैंने मज़ाक़ में पूछा था — "भैया, अगर कर लूँ तो?" और उन्होंने steering पकड़े-पकड़े सिर्फ़ इतना कहा था — "मैडम, मत करिएगा।"
फिर आठ महीने बिल्कुल सामान्य गुज़र गए, और इन आठ महीनों में मुझे सिर्फ़ दो चीज़ें दिखीं जो अजीब थीं।
पहली — उस uniform के कंधे हमेशा गीले होते थे। मई की बयालीस degree गर्मी में भी, बंद शीशों और चलते AC के बीच भी, ऐसे जैसे बंदा अभी-अभी बारिश से भीगकर आया हो।
और दूसरी — vendor के जितने भी drivers रात में अकेले गाड़ी लेकर निकलते थे, वो सब आगे वाली सीट पर कुछ न कुछ रख देते थे। कोई अपना बैग रख देता, कोई helmet, कोई अपनी चादर की गठरी बनाकर रख देता। मैंने एक बार एक driver से पूछा कि ये कौन सा टोटका है, और उसने बहुत सहज होकर, बिना किसी डर के, ऐसे कहा जैसे मौसम की बात कर रहा हो — "मैडम, रात में सीट ख़ाली नहीं छोड़नी चाहिए।"
मैंने उस बात को भी मज़ाक़ में लिया।
अब वो रात।
जनवरी थी, कोहरा इतना कि गाड़ी की रोशनी दो मीटर से आगे जा ही नहीं रही थी, और मैं उस रात इतनी थकी हुई थी कि मुझे आज भी याद नहीं कि गाड़ी कब चली और कब मेरा stop आ गया। सोनू भैया ने गाड़ी रोकी, मैंने दरवाज़ा खोला, और उतरते-उतरते, बिल्कुल आदत से, बिना एक सेकंड सोचे, मेरे मुँह से निकल गया —
"थैंक यू भैया, गुड नाइट।"
ये पूरी कहानी का सबसे ज़रूरी हिस्सा है, इसलिए मैं इसे धीरे-धीरे बता रही हूँ।
मैंने ये सोनू भैया से नहीं कहा था।
मैं ये किसी से नहीं कह रही थी। मैं आधी नींद में थी, और मेरे मुँह से एक आदत निकल गई थी जो उस बंद गाड़ी की हवा में यूँ ही तैरती रह गई, बिना किसी पते के।
और उसी पल में — पहली बार, चार साल में पहली बार — आगे वाली सीट पर बैठे उस आदमी ने अपनी गर्दन घुमाई।
पूरी नहीं। बस इतनी सी। इतनी कि मुझे उसके कान के पीछे की हड्डी दिख जाए।
मैंने दरवाज़ा बंद किया और अंदर भाग गई।
अगली सुबह ग्यारह बजे transport group में message आया कि सोनू भैया नहीं रहे। मेरे drop के लगभग चालीस मिनट बाद, उसी stretch पर, कोहरे में एक खड़े ट्रक में पीछे से जा घुसे थे।
मैं उनके घर गई, उनकी पत्नी से मिली, उनके दोनों बच्चों को देखा, और तीन दिन तक ख़ुद को यही समझाती रही कि कोहरा था, थकान थी, रात की driving थी, और इसका मुझसे कोई लेना-देना नहीं है।
फिर मार्च आया।
मार्च में मेरे route पर एक नई लड़की जुड़ी — नेहा, सेक्टर 56 में उतरती थी, हरियाणा की, इतनी बातूनी कि गाड़ी में बैठते ही बोलना शुरू कर देती थी और उतरते वक़्त तक बोलती रहती थी। और मैं उसे जवाब देती थी, क्योंकि आप किसी के साथ चालीस मिनट एक गाड़ी में बैठकर चुप तो नहीं रह सकते।
नेहा नौ दिन मेरे साथ आई।
दसवें दिन वो नहीं आई। ग्यारहवें दिन भी नहीं। और बारहवें दिन office में पता चला कि वो अपने कमरे में मिली थी, सुबह, दरवाज़ा अंदर से बंद था, उसकी उम्र तेईस साल थी, उसे कोई बीमारी नहीं थी, और post-mortem में कुछ नहीं निकला।
उस दिन मेरे अंदर जो हुआ, वो मैं शब्दों में नहीं रख सकती। क्योंकि मैंने उन नौ दिनों में उससे सैकड़ों बार बात की थी — और हर एक बार उस गाड़ी के अंदर।
अब मैंने वही किया जो कोई भी पढ़ी-लिखी लड़की करती। मैं vendor के office गई और मैंने अपने route की marshal detail माँगी।
वहाँ जो manager बैठे थे, ओमप्रकाश जी, बुज़ुर्ग आदमी, तीस साल से इसी लाइन में — उन्होंने पहले अपने register में मेरा route देखा, फिर system में, और फिर मुझसे कहा — "मैडम, आपके route पर marshal assign है ही नहीं। कभी था ही नहीं। record में आपके route की कोई female last drop है ही नहीं।"
मैंने कहा — "मेरे साथ चार साल से रोज़ एक आदमी बैठकर आता है।"
और उन्होंने मुझे पागल नहीं कहा। वो हँसे तक नहीं। उन्होंने अपनी कुर्सी थोड़ी पीछे खिसकाई, चश्मा उतारा, और मुझसे सिर्फ़ एक सवाल पूछा —
"मैडम... आपने उससे बात की?"
मैंने कहा — "एक बार।"
उन्होंने कहा — "और?"
और मैंने कहा — "और एक लड़की थी, जिससे मैं उस गाड़ी में रोज़ बात करती थी।"
वो बहुत देर तक चुप रहे। इतनी देर कि मुझे table की घड़ी की टिक-टिक सुनाई देने लगी। फिर उन्होंने दराज़ से एक पुराना register निकाला, उसे खोला नहीं, बस उस पर हाथ रखा, और कहा —
"मैडम, आप नौकरी मत छोड़िएगा।"
मैंने पूछा — "क्यों?"
और फिर उन्होंने जो बताया, वो मैं आपको वैसे ही सुना रही हूँ जैसे उन्होंने बताया था।
मुझसे पहले उस route पर एक और लड़की थी। नाम उन्होंने नहीं बताया। उसके साथ भी यही हुआ था — उसने भी एक दिन बात कर ली थी, और उसके बाद उसके आसपास से लोग जाने लगे थे। और डरकर उसने नौकरी छोड़ दी, गुरुग्राम छोड़ दिया, और अपने घर वापस चली गई।
नौकरी छोड़ने के पहले महीने में उसके घर में तीन मौतें हुईं।
ओमप्रकाश जी ने कहा — "मैडम, वो सीट ख़ाली नहीं रहती। कोई न कोई बैठता है। और जब तक आप उस गाड़ी में हो, चुपचाप, आपके आसपास कुछ नहीं होता। वो हिसाब बराबर मानता है। जिस दिन आप उठकर चली जाओगी, हिसाब बिगड़ जाएगा। और वो हिसाब आपसे नहीं, आपके आसपास वालों से पूरा होगा।"
मैंने पूछा — "वो है कौन?"
और उन्होंने चश्मा वापस लगाते हुए बस इतना कहा — "मैडम, ये मत पूछिए। तीस साल से मैं इसी लाइन में हूँ और मैंने आज तक ये सवाल नहीं पूछा। और शायद इसीलिए मैं तीस साल से इसी लाइन में हूँ।"
मैंने उनकी बात नहीं मानी।
अगले महीने मैंने दो हफ़्ते की छुट्टी ले ली। मैंने सोचा दो हफ़्ते में क्या हो जाएगा, मैं बस देख लेती हूँ, हो सकता है ये सब मेरे दिमाग़ का वहम हो और मैं बेवजह अपनी ज़िंदगी बर्बाद कर रही हूँ।
नौवें दिन मेरी flatmate का भाई — बाईस साल का लड़का, जो कुछ दिनों के लिए हमारे यहाँ रहने आया था, जिसे मैंने दो बार अपने हाथ का खाना खिलाया था — रात को छत पर सिगरेट पीने गया और सुबह नीचे पड़ा मिला।
तेरहवें दिन हमारी society का guard, जिसे मैं रोज़ "नमस्ते अंकल" कहती थी, अपनी चौकी में बैठे-बैठे चला गया। साठ साल का था। लोगों ने कहा उम्र हो गई थी।
चौदहवें दिन सुबह मैं office गई और मैंने अपनी बची हुई छुट्टी cancel करा दी।
अब मैं आपको बताती हूँ कि मेरी ज़िंदगी आज कैसी है।
दो साल हो गए हैं। मैं आज भी उसी shift में हूँ, उसी गाड़ी में, उसी सीट पर। मुझे एक promotion offer हुआ था जिसमें day shift थी, और मैंने वो मना कर दिया, और मेरे manager को आज तक समझ नहीं आया कि क्यों। मेरे घर वालों को लगता है कि मैं ज़िद्दी हो गई हूँ। मेरी शादी की बात दो बार टूट चुकी है क्योंकि हर लड़का यही पूछता है कि रात की नौकरी क्यों नहीं छोड़ रहीं, और मेरे पास कोई जवाब नहीं होता।
मैं गाड़ी में बैठती हूँ, seat belt लगाती हूँ, खिड़की से बाहर देखती हूँ, और चालीस मिनट तक एक शब्द नहीं बोलती। किसी से नहीं। चाहे कोई कितनी भी बार पूछे, चाहे कोई बुरा मान जाए, चाहे लोग मुझे घमंडी समझें।
और आगे वाली सीट पर वो आज भी बैठता है, और उसके कंधे आज भी गीले होते हैं, और मैं उस तरफ़ आज भी नहीं देखती।
आख़िरी बात। मेरी माँ अब मुझसे शिकायत करती हैं कि मैं पहले जैसी बात नहीं करती, कि मैं फ़ोन पर सिर्फ़ "हाँ, ठीक हूँ" बोलकर रख देती हूँ, कि मैं बदल गई हूँ।
मैं उन्हें कैसे बताऊँ कि जब-जब वो फ़ोन करती हैं, तब-तब मैं गाड़ी में होती हूँ।