PretikaTantrik & Black Magicरक्त भैरवी: अघोर तांत्रिक और चौसठ योगिनी का अभिशाप

भाग 11: 64 शिवलिंगों का चक्रव्यूह-युद्ध, कुल-देवी की रक्षा और सोमवती अमावस्या का महा-अभिषेक

Piyashi Atma · Tantrik & Black Magic · 11 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
रक्त भैरवी: अघोर तांत्रिक और चौसठ योगिनी का अभिशाप
Chapter
11 of 15
Category
Tantrik & Black Magic
Reading time
11 min
Words
2091
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

हवा में सौ फीट ऊंचे मितावली के उस वृत्ताकार, खुले मंदिर का वातावरण किसी साक्षात प्रलयंकारी युद्धभूमि में बदल चुका था।
घड़ी की सुइयां काल की गति से भाग रही थीं—रात के 11:35 PM।
सोमवती अमावस्या की वह भयानक मध्यरात्रि आने में अब केवल पच्चीस मिनट शेष थे।
प्रांगण की गोलाकार परिधि में बने उन 64 कमरों के फर्श को फाड़कर बाहर निकले वे चौंसठ भारी, काले पाषाण-शिवलिंग हवा में पांच फीट ऊपर तैरते हुए एक विशाल, दैत्याकार चक्की के पाटों की तरह अत्यंत तीव्र गति से घूमने लगे थे।
कड़कड़ाssssहट! सननन!
प्रत्येक शिवलिंग का वजन कम से कम चार सौ से पांच सौ किलो था। उनके आपस में टकराने से आकाशीय बिजली जैसी भयानक धातुई गूंज निकल रही थी—कड़ाक... तड़ाक!—जिससे मंदिर के पत्थर के खंभे थरथरा रहे थे। उन तैरते हुए शिवलिंगों की काली पाषाण-सतह से गहरे बैंगनी और रक्त-लाल रंग की विषैली लपटें निकल रही थीं। वे लपटें हवा को इतना गर्म कर रही थीं कि मंदिर के प्रांगण का तापमान अस्सी डिग्री सेल्सियस पार कर चुका था।
रुद्र उस घूमते हुए खूनी चक्रव्यूह के बिल्कुल केंद्र में अकेला खड़ा था।
उसके सीने से बंधी परदादा पंडित विद्याधर शास्त्री की वह प्राचीन चमड़े की डायरी अब पन्नों से बाहर निकलने वाली नीली लपटों से दहक रही थी। उसकी बाईं मुट्ठी में वह तांबे का पवित्र कलश था, जिसके भीतर काशी के मणिकर्णिका की महाकाल-भस्म और शुद्ध गंगाजल का मिश्रण भरा हुआ था, और दाहिने हाथ में था अष्टधातु का वह जलता हुआ 'काल-भैरव खड्ग'।
"हाहाहाहा! देख रुद्र... यह है 64 कमरों का 'काल-शिवलिंग चक्रव्यूह'!"
हवा में पंद्रह फीट ऊपर तैरते उस कापालिक तंत्रेश्वर की सींगों वाली प्रेत-आत्मा का अट्टहास पूरे चंबल के बीहड़ों को कंपा रहा था। उसकी 64 जलती हुई खोपड़ियों की माला से काले धुएं के बवंडर छूट रहे थे।
"इन 64 पाषाण-स्तंभों के बीच तेरी एक-एक हड्डी का चूरा बन जाएगा! और जब तक तू यहाँ मरेगा... तेरी वह कुल-देवी इस खौलते हवन-कुंड में समाकर मेरी विजय का तिलक करेगी!"
रुद्र ने हवन-कुंड के ऊपर नजर डाली।
हवन-कुंड के ठीक ऊपर, काले लोहे की वह जलती हुई जंजीर अब लाल होकर पिघलने की कगार पर पहुंच चुकी थी।
उस जंजीर से बंधी रुद्र के कुल की 200 साल पुरानी अष्टधातु की सिद्ध 'मां रक्त-दंतिका भैरवी' की मूर्ति लपटों से घिर चुकी थी। मूर्ति के नीचे चंबल की कब्रों से निकाली गई हड्डियों और काले तेल का हवन-कुंड किसी भूखे अजगर की तरह मुंह खोले बैठा था। जंजीर की कड़ियां एक-एक करके चटक रही थीं—चर्रर्र... कटकट!
रुद्र ने अपनी घड़ी देखी—11:42 PM।
केवल अठारह मिनट!
यदि वह पहले केंद्रीय शिवलिंग का अभिषेक करने जाता, तो जंजीर टूटकर कुल-देवी की मूर्ति उस अशुद्ध हवन-कुंड में समा जाती, जिससे रुद्र का पूरा कुल और उसकी आत्मिक शक्ति एक ही पल में भस्म हो जाती। और यदि वह मूर्ति बचाने जाता, तो वे 64 घूमते हुए पाषाण-शिवलिंग उसे हवा में ही कुचलकर रख देते।
रुद्र ने अपने जीवन के सबसे बड़े और आत्मघाती निर्णय का संकल्प लिया।
"हे महाकाल... हे कुल-देवी! यदि मेरे रक्त में सत्य और तप का एक भी अंश शेष है, तो इस चक्रव्यूह को चीरने की शक्ति दो!"
रुद्र ने अपनी रीढ़ की हड्डी सीधी की। उसने अपने कंठ से अघोर पंथ के सबसे गुप्त, वर्जित 'वायु-स्तंभन और भैरव-गति मंत्र' का मानसिक घोष किया:
"ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं ॐ फट्!"
मंत्र की पूर्णाहुति के साथ ही रुद्र के दोनों पैरों में किसी दिव्य अश्व जैसी गति आ गई।
उसने अपने सामने घूम रहे दो विशाल पाषाण-शिवलिंगों के बीच के उस संकरे, दो फीट के अंतराल को देखा।
सननन!
जैसे ही दो शिवलिंग एक-दूसरे के करीब आकर टकराने वाले थे, रुद्र ने अपनी पूरी जान लगाकर हवा में एक अविश्वसनीय, छह फीट ऊंची छलांग लगा दी!
उसने हवा में कलाबाजी खाते हुए अपने दाहिने बूट को उस घूमते हुए भारी शिवलिंग की सपाट सतह पर पटका। उस पाषाण-सतह से नीली चिंगारियां छूटीं। रुद्र ने उस गति का उपयोग करते हुए दूसरे शिवलिंग के ऊपर छलांग लगाई और अपने दोनों हाथों से उस काल-भैरव खड्ग को हवा में एक चक्र की तरह घुमा दिया!
छनन्नन! कड़ाssssक!
खड्ग की अष्टधातु की धार सीधे उन सूक्ष्म, अदृश्य काली तांत्रिक डोरियों (Astral Cords) से टकराई, जिनके माध्यम से हवा में तैरता तंत्रेश्वर उन 64 शिवलिंगों को कठपुतलियों की तरह नचा रहा था।
तीन तांत्रिक डोरियां एक ही झटके में कट गईं।
डोरियां कटते ही तीन विशाल पाषाण-शिवलिंग अपनी आसुरी गति खो बैठे। वे हवा से गिरकर सीधे प्रांगण के फर्श पर गिरे और भयानक धमाके के साथ पत्थरों में धंसकर शांत हो गए।
चक्रव्यूह में एक क्षण के लिए एक संकरा रास्ता खुल गया।
रुद्र ने उस एक सेकंड को नहीं गंवाया।
उसने हवा से नीचे उतरते ही सीधे उस खौलते हुए, पचास फीट चौड़े हवन-कुंड की ओर दौड़ लगा दी।
कटकटाssssहट!
ठीक उसी समय, हवन-कुंड के ऊपर लटकी उस लोहे की जंजीर की अंतिम कड़ी टूट गई!
कुल-देवी की वह 200 साल पुरानी अष्टधातु की पावन मूर्ति हवा से छूटकर सीधे नीचे उस जलती हुई आग, हड्डियों और काले तेल के कुंड की ओर गिरने लगी।
"मां!" रुद्र अपने फटे हुए गले से चीख पड़ा।
उसने अपने जीवन, अपने शरीर और अपनी सुरक्षा की सारी चिंताएं त्याग दीं। उसने हवन-कुंड की जलती हुई मुंडेर से सीधे उस खौलते हुए आग के गड्ढे के ऊपर हवा में छलांग लगा दी!
हवा में तैरते हुए...
रुद्र का दाहिना हाथ आगे बढ़ा। उसने मूर्ति के कुंड में गिरने से महज दो इंच पहले, उस जलती हुई, लाल-तप्त अष्टधातु की मूर्ति को अपनी उंगलियों में मजबूती से जकड़ लिया!
सड़ssss!
असहनीय ताप ने रुद्र की हथेली की त्वचा को झुलसा दिया। लेकिन रुद्र ने अपनी उंगलियां ढीली नहीं कीं। उसने अपने पूरे शरीर को मोड़ते हुए उस मूर्ति को अपनी छाती के भीतर, अपने दिल के पास दबा लिया और हवा में झूलते हुए हवन-कुंड के उस पार के पत्थरों पर जा गिरा!
धड़ाम!
रुद्र पत्थरों पर लुढ़का। उसकी जैकेट जल रही थी, लेकिन उसकी छाती के भीतर वह कुल-देवी की मूर्ति पूरी तरह सुरक्षित और अक्षुण्ण थी।
"न... नहीं! मेरी आहुति!"
हवा में तैरते तंत्रेश्वर का वह 15 फीट ऊंचा प्रेत-स्वरूप असीम क्रोध से पागल हो गया। उसकी आंखों से निकलती हुई लाल लपटें आकाश को छूने लगीं।
"तूने मेरी कुल-बलि छीन ली रुद्र... तो अब तू स्वयं मेरे इस त्रिशूल की भेंट चढ़ेगा!"
तंत्रेश्वर ने अपने दोनों विशाल, अमूर्त काले हाथों को ऊपर उठाया।
आसमान के काले बादलों से एक भयानक, खूनी लाल रंग की आकाशीय बिजली कड़की। तंत्रेश्वर ने उस पूरी आकाशीय बिजली और पाताल के काले धुएं को अपने काले लोहे के त्रिशूल में समेट लिया और सीधे नीचे बैठे रुद्र के सीने की ओर उस महा-विनाशकारी अस्त्र को झोंक दिया!
बूमssss!
वह आकाशीय तांत्रिक प्रहार किसी उल्कापिंड की तरह नीचे उतरा।
रुद्र ने अपनी कुल-देवी की मूर्ति को अपनी पीठ के पीछे सुरक्षित किया और अपने बाएं हाथ में पकड़े उस तांबे के कलश को अपने सीने के सामने ढाल की तरह खड़ा कर दिया।
कड़ाssssक!
बिजली का वह भयानक प्रहार सीधे उस तांबे के कलश से टकराया।
उस टक्कर का प्रभाव इतना भीषण था कि रुद्र का बायां हाथ सुन्न हो गया, उसकी बांह की हड्डी में हेयरलाइन फ्रैक्चर आ गया और वह दस फीट दूर छिटककर सीधे उस केंद्रीय मंडप—'एकत्तरसो महादेव' के मुख्य गर्भगृह की सीढ़ियों पर जा गिरा। उसके मुंह से खून का एक बड़ा फव्वारा छूटा।
रुद्र ने कांपती पलकों से अपनी कलाई की घड़ी देखी।
स्क्रीन पर लाल अंक चमक रहे थे—11:55:20 PM!
सोमवती अमावस्या के चरम संहार में केवल चार मिनट और चालीस सेकंड बाकी थे!
प्रांगण में बचे हुए इकसठ पाषाण-शिवलिंग अब और अधिक तेज गति से घूमते हुए सीधे केंद्रीय मंडप की सीढ़ियों की ओर बढ़ रहे थे ताकि रुद्र को उन पत्थरों के बीच पीसकर उसका नामो-निशान मिटा दें।
तंत्रेश्वर की प्रेत-आत्मा हवा में नीचे उतर रही थी, उसके पंजे रुद्र की खोपड़ी को मसलने के लिए तैयार थे।
"कबीर... रुद्र... उठ!" रुद्र के अंतर्मन में उसके परदादा पंडित विद्याधर शास्त्री और अघोरी बालकनाथ की संयुक्त वाणी गूंज उठी। "यह अंतिम प्रहर है! यदि अब तू गिरा, तो यह सृष्टि गिरेगी... उठ रुद्र!"
रुद्र ने अपने दोनों पैरों को सीढ़ियों के पत्थरों में जमाया।
उसकी दोनों आंखों में मृत्यु का सारा संशय मिट चुका था; वहां केवल साक्षात महाकाल का अदम्य, कालजयी तेज नाच रहा था।
वह लड़खड़ाते हुए उठा। उसने अपनी छाती से उस कुल-देवी 'मां रक्त-दंतिका भैरवी' की पवित्र अष्टधातु की मूर्ति को निकाला और उसे उस केंद्रीय काले कसौटी पत्थर के 'एकत्तरसो महा-शिवलिंग' के आधार पर आदरपूर्वक स्थापित कर दिया।
फिर, उसने अपने हाथ में पकड़े उस तांबे के कलश को उठाया।
कलश के भीतर वह काशी की महाकाल-भस्म और शुद्ध गंगाजल का दिव्य अमृत भरा हुआ था।
रुद्र ने अपने काल-भैरव खड्ग की धार से अपनी दाहिनी कलाई की मुख्य नस पर एक गहरा चीरा लगा दिया।
छपाक!
पवित्र, 200 साल पुराने शास्त्रीय वंश का ताजा, शुद्ध लाल रक्त उस कलश के भीतर गिर पड़ा। रक्त, भस्म और गंगाजल का वह त्रिवेणी संगम एक दिव्य, स्वर्णिम द्रव में बदल गया।
रुद्र ने अपनी कलाई की घड़ी देखी—11:59:00 PM!
केवल साठ सेकंड!
"हर हर महादेव! ॐ नमो महाकालाय... पाताल-संहारकाय... विश्व-कल्याणाय स्वाहा!"
रुद्र ने अपने दोनों हाथों से उस कलश को उठाया और अपनी संपूर्ण आत्मा, संपूर्ण भक्ति और संपूर्ण संकल्प को झोंकते हुए उस पवित्र मिश्रण को सीधे उस केंद्रीय 'एकत्तरसो महा-शिवलिंग' के मस्तक पर उड़ेल दिया!
छनन्नन... भभकssss!
जैसे ही वह महाकाल-भस्म और गंगाजल उस कसौटी पत्थर के शिवलिंग पर गिरा, एक ऐसा महा-विस्मयकारी, अलौकिक आध्यात्मिक विस्फोट हुआ जिसने उस पूरे मितावली के 100 फीट ऊंचे टीले को हिलाकर रख दिया।
केंद्रीय शिवलिंग के त्रिनेत्र से शुद्ध, अंधा कर देने वाली श्वेत, स्वर्णिम और नीली दिव्य ज्वालाओं का एक ऐसा गगनचुंबी प्रकाश-स्तंभ फूटा जो उस वृत्ताकार मंदिर के खुले आकाश को चीरता हुआ सीधे अंतरिक्ष की गहराइयों तक चला गया!
उस दिव्य प्रकाश के स्पर्श होते ही पूरे मंदिर में एक शांत, गूंजता हुआ महा-नाद फैल गया:
ॐॐॐॐॐॐ...
वह प्रकाश किसी अमृत-जल की तरह उस पूरे वृत्ताकार प्रांगण में फैल गया।
धड़ाम! धड़ाम! धड़ाम!
हवा में पागलों की तरह घूमते हुए वे सभी इकसठ पाषाण-शिवलिंग उस दिव्य प्रकाश के छूते ही एक ही सेकंड में अपनी सारी आसुरी गति खो बैठे।
वे सभी शिवलिंग हवा से नीचे उतरे और किसी आज्ञाकारी सेवक की तरह अपने-अपने मूल चौंसठ कमरों की पीठिकाओं पर जाकर शांत, शीतल और पवित्र होकर स्थापित हो गए!
हवन-कुंड की वह काली, सड़ी हुई आग एक ही पल में बुझ गई और उसकी जगह कपूर, चंदन और ताजे चमेली के फूलों की अलौकिक सुगंध पूरे मितावली के अंचल में फैल गई।
और उस प्रकाश-स्तंभ के बीच में...
हवा में तैरता हुआ वह 15 फीट ऊंचा कापालिक शैतान—तंत्रेश्वर की वह अमर प्रेत-चेतना—उस असहनीय, पवित्र महाकाल-तेज में घिरकर तड़पने लगी!
"आaaaaah! यह प्रकाश... यह मुझे जला रहा है! महाकाल... मुझे छोड़ दो!"
तंत्रेश्वर की वह काली काया धूप में रखे बर्फ के टुकड़े की तरह पिघलने लगी। उसकी 64 खोपड़ियों की माला जलकर राख हो गई। उसकी काली प्रेत-चेतना के टुकड़े-टुकड़े होकर उस स्वर्णिम प्रकाश में भस्म होने लगे।
उसकी अमरता का अहंकार, उसका 186 साल का काला जादू और उसका नरबलि चक्र उस एक 'महाकाल-अभिषेक' के आगे धूल में मिल चुका था।
रुद्र शिवलिंग के सामने हाथ जोड़कर घुटनों के बल बैठा था। उसकी आंखों से कृतज्ञता के शांत आंसू बह रहे थे।
घड़ी की सुइयों ने ठीक बारह बजाए—12:00:00 AM (मध्यरात्रि)!
सोमवती अमावस्या का वह काल-मुहूर्त बीत चुका था। मितावली का वह 64 कमरों वाला तांत्रिक चक्रव्यूह हमेशा-हमेशा के लिए पाताल के बंधनों से मुक्त होकर एक परम पावन तीर्थ में बदल चुका था।
लेकिन ठीक उसी समय... जब तंत्रेश्वर की उस जलती हुई प्रेत-आत्मा का अंतिम काला कण उस प्रकाश में विलीन होने वाला था...
चंबल के बीहड़ों की गहरी, अंधी खाइयों के भीतर से एक ऐसी अत्यंत प्राचीन, भारी और डरावनी आवाज गूंज उठी जिसने रुद्र के रीढ़ की हड्डी के खून को एक बार फिर जमा दिया।
वह आवाज तंत्रेश्वर की नहीं थी।
वह आवाज किसी ऐसे महा-असुर की थी जो तंत्रेश्वर से भी हजार गुना अधिक प्राचीन और शक्तिशाली था:
"तंत्रेश्वर तो केवल हमारी भूख का एक मोहरा था, रुद्र प्रताप सिंह..."
उस आवाज के साथ ही, केंद्रीय शिवलिंग के ठीक नीचे की जमीन में एक बाल जैसी बारीक, गहरी दरार पड़ी।
उस दरार के भीतर से एक भयानक, अदृश्य आकर्षण खिंचा और उसने तंत्रेश्वर की उस तड़पती हुई आत्मा के अंतिम काले बीज को अपने भीतर खींच लिया!
वह आवाज कबीर/रुद्र के मस्तिष्क में किसी बज्र की तरह गूंजी:
"चौसठ योगिनियों का असली, अंतिम महा-श्मशान पीठ तो अभी अछूता है... आ... महाकाल की मूल नगरी... 'उज्जैन के चक्रतीर्थ और विक्रांत भैरव' के उस अंतिम श्मशान में आ! जहाँ 25 भागों के इस महा-युद्ध का अंतिम रक्त-निर्णय होगा!"
दरार बंद हो गई।
चारों तरफ गहरा, दिव्य सन्नाटा छा गया।
चंबल के आकाश पर पहली बार पूर्णिमा जैसा शांत, शीतल सवेरा होने की पूर्व-सूचना मिल रही थी।
रुद्र ने गहरी सांस ली। उसने केंद्रीय शिवलिंग पर अपना माथा टेका और अपनी कुल-देवी की मूर्ति को अपने सीने से लगा लिया।
युद्ध का दूसरा पड़ाव समाप्त हो चुका था... लेकिन उस प्राचीन आवाज ने यह स्पष्ट कर दिया था कि काले जादू का यह महा-चक्रव्यूह अब अपने अंतिम, परम और सबसे भयानक गढ़—'उज्जैन महाकाल' की ओर बढ़ रहा था!
(कहानी जारी है...)
अगले भाग का संकेत:
भाग 12: उज्जैन की शिप्रा नदी का रहस्य, विक्रांत भैरव का महा-श्मशान और पाताल के अंतिम चक्र का जागरण।

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