PretikaPsychological Horrorग्यारह मिनट

ग्यारह मिनट

Pretika · Psychological Horror · 9 मिनट

Writer
Pretika
Story
ग्यारह मिनट
Chapter
Single story
Category
Psychological Horror
Reading time
9 min
Words
1651
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

मैं शुरू में ही एक बात साफ़ कर दूँ — मैं भूत-प्रेत में विश्वास नहीं करती थी, और मैं आज भी पूरी तरह विश्वास नहीं करती। मैं software engineer हूँ, मुझे चीज़ें साबित चाहिए होती हैं, और मैं आपको ये पूरी कहानी उसी तरह सुनाऊँगी जैसे मैंने इसे जिया — हर क़दम पर एक logical explanation ढूँढते हुए।

दिक़्क़त सिर्फ़ ये है कि आख़िर में मेरे पास explanation ख़त्म हो गए, और वो चीज़ ख़त्म नहीं हुई।

2022 में मैंने पुणे में अपना पहला अकेला flat लिया। इससे पहले मैं तीन लड़कियों के साथ shared flat में रहती थी और मुझे अपनी जगह चाहिए थी। वाकड़ इलाक़े की एक society में मुझे 1BHK मिल गया — सातवीं मंज़िल, flat number 702, बड़ी बालकनी, अच्छी हवा, और सबसे बड़ी बात, बहुत शांत।

पहली अजीब चीज़ जो मैंने notice की, वो इतनी छोटी थी कि मुझे उसे notice करने में डेढ़ महीना लग गया।

मेरी दीवार घड़ी पीछे चल रही थी।

मैंने shifting के बाद अपने पुराने कमरे वाली दीवार घड़ी नई दीवार पर टाँग दी थी, और एक सुबह मुझे लगा कि वो थोड़ी slow है। मैंने उसे फ़ोन से मिलाकर सही कर दिया।

अगली सुबह वो फिर slow थी।

मैंने cell बदल दी। नई battery। फिर भी slow।

और फिर मैंने वो किया जो शायद कोई और नहीं करता — मैंने एक हफ़्ते तक रोज़ सुबह उठकर, अपने फ़ोन के सामने घड़ी रखकर, फ़र्क़ note किया।

ग्यारह मिनट।

हर सुबह। ठीक ग्यारह मिनट। न दस, न बारह।

अब आप सोचिए। एक घड़ी अगर ख़राब हो, तो वो एक दिन आठ मिनट पीछे होगी, अगले दिन सोलह, फिर चौबीस — क्योंकि वो लगातार slow चल रही है। लेकिन मेरी घड़ी हर सुबह ठीक ग्यारह मिनट पीछे थी, चाहे मैंने उसे रात को कितने भी बजे सही किया हो।

मतलब वो slow नहीं चल रही थी। वो रात में कहीं ग्यारह मिनट के लिए रुक जाती थी।

मैंने ये बात अपने एक colleague को बताई और वो हँस पड़ा और उसने कहा कि नई घड़ी ले लो। मैंने ले ली। नई घड़ी भी ग्यारह मिनट पीछे हो गई।

फिर दूसरी चीज़ शुरू हुई, और ये मैं आपको ठीक-ठीक नहीं समझा पाऊँगी।

रात में मेरा कमरा छोटा लगने लगा।

मैं जानती हूँ ये बेवक़ूफ़ी लगती है। दीवारें अपनी जगह थीं, सामान अपनी जगह था, कुछ नहीं बदला था। लेकिन रात के क़रीब साढ़े तीन बजे — जब भी मेरी नींद खुलती — मुझे साफ़ लगता कि छत नीची है, कि हवा भारी है, कि कमरे में कुछ और भी है जो जगह घेर रहा है।

और मेरे कमरे की गंध बदल जाती थी। दिन में मेरे कमरे से room freshener की गंध आती थी। रात के उन कुछ मिनटों में वहाँ मिट्टी के तेल की गंध आती थी। kerosene. वो गंध जो मैंने आख़िरी बार अपनी नानी के गाँव में सूँघी थी, बीस साल पहले।

तो मैंने camera लगा दिया।

एक छोटा सा wifi camera, अठारह सौ रुपये का, TV की shelf पर, बिस्तर की तरफ़ मुँह करके, motion detection on.

पहले तीन दिन कुछ नहीं।

चौथे दिन सुबह मैंने app खोला और मुझे रात की timeline में एक गड्ढा दिखा।

3:33 से 3:44 तक कुछ नहीं था। कोई recording नहीं, कोई motion नहीं, कुछ नहीं। camera उन ग्यारह मिनट में offline था।

मैंने router का log check किया — वो record रखता है कि कौन सा device कब जुड़ा और कब हटा।

device disconnected: 03:33.

device reconnected: 03:44.

अगली रात, वही। उससे अगली रात, वही।

मैंने camera बदला, नया लिया, अलग company का — वही। मैंने router बदला — वही। मैंने camera को wifi से हटाकर अपने फ़ोन के hotspot पर डाला, और फ़ोन को तकिये के नीचे रखा — और फिर भी, 3:33 पर वो कट गया।

तब मैंने वो किया जो मुझे शुरू में ही करना चाहिए था।

मैंने अपना पुराना फ़ोन निकाला, पूरा charge किया, aeroplane mode on किया — कोई internet नहीं, कोई network नहीं, कुछ नहीं — video recording चालू की, और उसे अलमारी में कपड़ों के बीच रख दिया, इस तरह कि उसका lens अलमारी की जाली से बाहर देख रहा हो।

अगली सुबह मैंने वो recording खोली और 3:33 पर पहुँची।

अब मैं वो बताने जा रही हूँ जो मैंने देखा, और मैं इसे बिल्कुल वैसे ही बताऊँगी जैसे मैंने देखा, बिना कुछ जोड़े।

3:33 पर screen एक सेकंड के लिए काली हुई, जैसे camera ने focus दोबारा किया हो।

और फिर वहाँ मेरा कमरा था।

वही दीवारें। वही खिड़की। वही कोने में plaster की वो दरार जो मैंने shifting के दिन देखी थी और जिसकी शिकायत मैंने owner से की थी।

लेकिन उसमें मेरा कुछ भी नहीं था।

मेरा बिस्तर नहीं था। मेरी TV नहीं थी। मेरा AC नहीं था। मेरे परदे नहीं थे।

उसकी जगह — एक steel की अलमारी थी, पुरानी, जिस पर हरे रंग की पेंट की एक पट्टी थी। एक लोहे की चारपाई थी। छत से एक तार लटक रहा था जिसके सिरे पर एक पीला बल्ब जल रहा था। और दीवार पर एक calendar था, और मैं ये नहीं देख पाई कि उस पर कौन सा साल लिखा था, क्योंकि camera की quality इतनी नहीं थी।

और मेरा कमरा उस recording में ख़ाली नहीं था।

बल्ब जल रहा था।

मतलब कोई वहाँ रहता था।

अगली रात मैंने फिर वही किया, और उस रात recording में एक औरत थी।

वो फ़र्श पर उकड़ूँ बैठी थी और कपड़े से फ़र्श पोंछ रही थी। धीरे-धीरे, इत्मीनान से, जैसे कोई सोने से पहले आख़िरी काम निपटाता है। उसने camera की तरफ़ एक बार भी नहीं देखा।

और audio में सिर्फ़ एक ही आवाज़ थी — गीले कपड़े के फ़र्श पर घिसने की आवाज़।

तीसरी रात एक आदमी था। वो चारपाई पर बैठा था, अलमारी की तरफ़ मुँह करके, बिना हिले। लगभग नौ मिनट। और आठवें मिनट के आसपास उसने अपना सर बहुत हल्का सा हिलाया, जैसे किसी ने उसे कुछ कहा हो।

अब मैंने वो recording अपने एक दोस्त को दिखाई। उसका नाम मैं नहीं लूँगी, लेकिन वो video forensics का काम करता है — मतलब वो लोग जो पता लगाते हैं कि कोई video असली है या edited।

उसने दो दिन लगाए। और फिर उसने मुझे फ़ोन किया और उसकी आवाज़ अजीब थी।

उसने कहा — "ऋतिका, ये cut नहीं है। timestamp continuous है, एक frame नहीं टूटा। और lens पर जो धूल के दो धब्बे हैं, वो पूरी recording में एक ही जगह हैं — पहले भी, बीच में भी, बाद में भी। मतलब camera हिला नहीं, बदला नहीं।"

और फिर उसने वो कहा जिसने मेरा दिमाग़ रोक दिया।

उसने कहा — "और दीवार की वो दरार, वो हूबहू वैसी की वैसी है। same angle, same shape. ये तुम्हारा ही कमरा है।"

मैंने पूछा — "तो फिर उसमें मेरा सामान क्यों नहीं है?"

और उसने कहा — "मुझे नहीं पता। और ऋतिका, मैं ये file अपने पास नहीं रखना चाहता।"

अब वो रात, जिसके बाद मैंने वो घर छोड़ दिया।

मैंने तय किया कि मैं जागूँगी।

मैंने शाम सात बजे से coffee पीनी शुरू की, सारी light जलाकर रखी, और मैं ढाई बजे तक बिस्तर पर बैठकर फ़ोन चलाती रही।

3:32 पर मैं पूरी तरह जागी हुई थी।

3:33 पर तीन चीज़ें एक साथ हुईं।

पहली — मेरे फ़ोन की screen काली हो गई। बंद नहीं हुई, काली हो गई। छूने पर कुछ नहीं।

दूसरी — AC की आवाज़ बंद हो गई। एकदम। जैसे किसी ने कान में रुई ठूँस दी हो।

और तीसरी — रोशनी बदल गई। मेरे कमरे की सफ़ेद LED रोशनी पीली हो गई, और वो कमज़ोर हो गई, और वो ऊपर से नहीं, बीच से आने लगी।

और मैं बिस्तर पर नहीं थी।

मैं फ़र्श पर खड़ी थी।

मैं चीख़ी नहीं, और मुझे आज तक हैरानी है कि मैं चीख़ी क्यों नहीं। मैं बस खड़ी रही और देखती रही।

मेरे सामने वो steel की अलमारी थी। मैंने अपना हाथ बढ़ाया और उसे छुआ। वो ठंडी थी और उसकी सतह खुरदरी थी, और जहाँ पेंट उखड़ी थी वहाँ जंग लगी हुई थी, और मेरी उँगलियों पर उसका भूरा निशान लग गया।

मेरी बालकनी वाली जगह पर दीवार थी। और जहाँ मेरी रसोई का दरवाज़ा होना चाहिए था, वहाँ भी एक दरवाज़ा था, लेकिन वो लकड़ी का था और उस पर परदा लटका था।

और चारपाई पर वो आदमी बैठा था।

और अब मैं आपको वो बताऊँगी जिसने मुझे तोड़ दिया — और ये वो हिस्सा नहीं है जिसकी आप उम्मीद कर रहे हैं।

उसने मुड़कर मुझे देखा।

और वो डरा नहीं।

वो बिल्कुल नहीं डरा। उसके चेहरे पर हैरानी तक नहीं थी। उसके चेहरे पर सिर्फ़ थकान थी, और झुँझलाहट — बिल्कुल वैसी झुँझलाहट जैसी आपके चेहरे पर आती है जब रात को कोई गली का कुत्ता आपके दरवाज़े के बाहर फिर भौंकने लगे।

उसने परदे वाले दरवाज़े की तरफ़ देखा और मराठी में कहा — "परत आली।"

मतलब — फिर आ गई।

और परदे के पीछे से एक औरत की आवाज़ आई, वही औरत जो फ़र्श पोंछती थी, और उसने कहा — "बोलू नको."

मतलब — इससे बात मत कर।

और तभी परदे के नीचे से मुझे दो छोटे पैर दिखे।

एक बच्चा।

और उस पूरे कमरे में सिर्फ़ वो एक था जो मुझसे डरा। वो परदे के पीछे से आधा झाँका, उसने मुझे देखा, और वो अपनी माँ की टाँगों के पीछे छुप गया।

मैं उस कमरे में भूत नहीं देख रही थी।

मैं उस कमरे की भूत थी।

3:44 पर रोशनी सफ़ेद हो गई, AC की आवाज़ वापस आ गई, मेरा फ़ोन ज़िंदा हो गया।

मैं अपने बिस्तर के पास फ़र्श पर बैठी थी।

और मेरी दाईं हथेली पर जंग का भूरा निशान लगा हुआ था। मैंने उसे फ़ोन से photo खींची, और वो photo आज भी मेरे पास है, और वही चौबीस सेकंड की clip भी।

मैंने चार दिन के अंदर वो flat छोड़ दिया। मैंने deposit छोड़ दिया, notice period का पूरा पैसा भरा, और मैं बानेर shift हो गई।

camera मैं वहीं छोड़ आई। मैंने उसे उतारा तक नहीं।

अब आख़िरी बात, और यही वजह है कि मैं आज भी ठीक नहीं हूँ।

दो महीने कुछ नहीं हुआ। बिल्कुल कुछ नहीं। मैं सोने लगी थी, मेरा वज़न वापस आ गया था, मैंने अपने भाई को सब बता भी दिया था और हम दोनों उस पर हँस भी लिए थे।

और फिर एक सुबह मैंने नई दीवार घड़ी की तरफ़ देखा।

ग्यारह मिनट।

मैंने उसे सही कर दिया।

अगली सुबह — ग्यारह मिनट।

मेरे नए flat में कोई camera नहीं है। और मैं लगाऊँगी भी नहीं।

क्योंकि जब तक मैं देखती नहीं, तब तक मैं ये मान सकती हूँ कि वो कमरा वहीं रह गया।

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