Pretika › Real Experiences › खसरा नंबर ज़ीरो
आख़िरी हिसाब
Pretika · Real Experiences · 11 मिनट
- Writer
- Pretika
- Story
- खसरा नंबर ज़ीरो
- Chapter
- 10 of 10
- Category
- Real Experiences
- Reading time
- 11 min
- Words
- 2134
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
और फिर वो आते रहे, बाबू। एक के बाद एक।
एक मर्द आया। दुबला, ऊँचा। मैंने पूछा, "तुम्हारा नाम?" उसने कहा, "हरिया। हरिया कुम्हार। मैं... मैं बर्तन बनाता था।" सौ साल बाद, उसे ये बताना था कि वो कौन था। कि उसका भी एक काम था, एक हुनर था। मैंने लिखा — हरिया, कुम्हार। और वो शांत हो गया।
एक जवान औरत आई। उसकी गोद में एक बच्चा था — एक छोटा-सा, हड्डियों का ढाँचा, जो कभी रोया नहीं था। मैंने पूछा उसका नाम। उसने अपना बताया, और फिर अपने बच्चे की तरफ़ देखा, और काँपती आवाज़ में बोली, "और ये... इसका नाम रखने का मौक़ा नहीं मिला, बाबू। ये बहुत छोटा था। पर मैं इसे 'मुन्ना' कहती थी।" मैंने दोनों के नाम लिखे — माँ का, और मुन्ना का। और वो माँ, अपने बच्चे को सीने से लगाए, मुस्कुराते हुए, धुँधली हो गई।
एक छोटा लड़का आया, अकेला। शायद सात-आठ साल का। उसकी आँखें बड़ी-बड़ी थीं। मैंने उससे पूछा उसका नाम। और उसने मेरी तरफ़ देखा, और बहुत मासूमियत से कहा, "मुझे... मुझे नहीं पता, बाबू। मैं भूल गया।"
बाबू, उस पल मेरा दिल फट गया।
एक बच्चा, जो अपना ही नाम भूल गया था। क्योंकि सौ साल से किसी ने उसे पुकारा नहीं था।
मैंने उससे कहा — "कोई बात नहीं, बेटा।" और मैंने अपनी किताब में लिखा — एक लड़का, उम्र आठ बरस। नाम — याद नहीं। और मैंने उसके नीचे लिखा — पर ये था। ये यहाँ था।
और वो लड़का मुस्कुराया। और चला गया।
मैं लिखता रहा, बाबू। लिखता रहा।
रात गहराती गई। लालटेन का तेल कम होता गया, लौ छोटी होती गई। मेरा हाथ अकड़ गया, उँगलियाँ दर्द करने लगीं। मेरी कलम की स्याही ख़त्म होने को आई। पर कतार ख़त्म नहीं हो रही थी। एक के बाद एक, वो आते रहे, अपने नाम बताते रहे, और मैं लिखता रहा।
कुछ को अपने नाम मुश्किल से याद थे। कुछ अपने गाँव का नाम बताते थे — कोई दूर का गाँव, जो शायद आज नक़्शे पर भी नहीं होगा। कुछ बस अपना नाम बोलकर, राहत की एक साँस लेकर, चले जाते। और हर नाम के साथ, मेरे चारों तरफ़ का अँधेरा थोड़ा हल्का होता जाता। वो कतार थोड़ी छोटी होती जाती।
और बाबू, बीच-बीच में मैं रुककर अपनी किताब के उस पन्ने को देखता — जहाँ मेरा अपना नाम लिखा जा रहा था। और मैंने देखा कि एक अजीब बात हो रही थी।
मेरा नाम — वो आगे नहीं बढ़ रहा था।
बल्कि वो... हल्का पड़ रहा था। धुँधला हो रहा था। जैसे जैसे मैं उन लोगों को गिनता जा रहा था, मेरा अपना नाम मिटता जा रहा था। क्योंकि वो ज़मीन — उसे आख़िरकार वो मिल रहा था जो वो सौ साल से चाहती थी। उसे मालिक नहीं चाहिए था। उसे गिनती चाहिए थी। और जैसे-जैसे गिनती पूरी होती जा रही थी, उस ज़मीन की मुझ पर पकड़ ढीली होती जा रही थी।
मैंने और तेज़ी से लिखना शुरू किया।
और तभी, मैंने उसे देखा।
गिरधारी।
वो अब भी वहीं था, कतार से थोड़ा हटकर, अपनी जंग खाई जरीब के साथ। पर वो अब नाप नहीं रहा था। वो रुक गया था। और वो मुझे देख रहा था — मुझे लिखते हुए, उन लोगों को गिनते हुए।
बाबू, सौ साल। सौ साल से वो आदमी इन लोगों को गिनने की कोशिश कर रहा था। पर अकेला, मरने के बाद, बिना किताब के, बिना कलम के — वो कभी नहीं कर पाया। और अब वो देख रहा था कि वो काम हो रहा है। वो काम, जिसके लिए वो सौ साल से तड़प रहा था।
मैंने अपनी कलम रखी। और मैं उसकी तरफ़ चला।
मैं उसके सामने खड़ा हुआ। उन खोखली आँखों के सामने, उस पपड़ी पड़े चेहरे के सामने। और मैंने अपनी किताब खोली।
"गिरधारी," मैंने कहा।
उसकी आँखों में कुछ हिला।
"तुम भी तो गिने नहीं गए, भाई," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ भर्रा गई। "तुम भी सौ साल से यहीं हो। किसी ने तुम्हें भी नहीं लिखा।"
और मैंने अपनी किताब में, उन सब नामों के साथ, एक और नाम लिखा।
गिरधारी। अमीन।
और बाबू — उस आदमी के हाथ से, सौ साल बाद, वो जंग खाई जरीब छूट गई। वो ज़मीन पर गिरी, एक आख़िरी 'खट' की आवाज़ के साथ। और वो आवाज़, बाबू — वो उस पूरी कहानी की आख़िरी 'खट' थी। उसके बाद वो आवाज़ मैंने कभी नहीं सुनी।
गिरधारी ने मेरी तरफ़ देखा। और उसके सूखे होंठों पर एक मुस्कान आई। और उसने सिर झुकाया — एक अमीन का, दूसरे अमीन को सलाम। और वो धुँधला होकर, हवा में घुल गया।
आख़िरकार आज़ाद।
मैं वापस अपनी जगह गया, और मैंने गिनती पूरी की।
आख़िरी नाम जब मैंने लिखा, तब क्षितिज पर पहली रोशनी फूट रही थी।
और उस रोशनी में, बाबू, वो सब — वो सैकड़ों लोग — एक साथ, शांति से, धुँधले होने लगे। उस आती हुई सुबह में घुलने लगे। पर इस बार वो डर से नहीं भाग रहे थे। इस बार वो आराम से जा रहे थे। जैसे सौ साल की एक थकी हुई रात आख़िरकार ख़त्म हो रही हो। और जाते-जाते, मुझे लगा, एक आवाज़ — सैकड़ों आवाज़ें, एक साथ, बहुत धीमे — एक लंबी, राहत भरी साँस छोड़ रही हों।
और फिर वो चले गए। सब।
और वो ठंड — वो जो उस पट्टी के नीचे से सौ साल से उठती थी — वो चली गई।
मैं अकेला रह गया, उस पट्टी के बीचों-बीच, अपनी खुली किताब के साथ, जिसमें अब सैकड़ों नाम भरे थे। मेरे बाप की जरीब मेरे पास पड़ी थी। और लालटेन बुझ चुकी थी — पर अब रोशनी की ज़रूरत नहीं थी। सुबह हो चुकी थी।
मैंने अपनी किताब के उस पन्ने को देखा। मेरा अपना नाम।
वो जा चुका था।
मिट चुका था, पूरी तरह। जैसे वहाँ कभी लिखा ही न गया हो। मैं आज़ाद था।
मुझे सुबह सुखई लाल ने पाया। मैं पट्टी के बीच में बैठा था, अपनी किताब को सीने से लगाए।
उसने मेरी तरफ़ देखा, फिर पट्टी की तरफ़। और बाबू — पहली बार, उस पट्टी की मिट्टी पर ओस थी। उस सूखी, फटी, बंजर मिट्टी पर, सुबह की ओस चमक रही थी। जैसे ज़मीन सौ साल बाद पहली बार रोई हो। या शायद पहली बार, चैन से सोई हो।
मैं वहाँ से उठा, और चला आया। मेरे बाप की जरीब मेरे हाथ में थी।
और बाबू, मैं आपको सच बताऊँ — उसके बाद मैं वो आदमी नहीं रहा।
मैंने बेलवा की चकबंदी पूरी की। पर उस पट्टी को मैंने नापकर, उसका रक़बा गाँव के कुल में नहीं जोड़ा। मैंने उसे वैसा ही छोड़ दिया, जैसा वो थी — किसी की नहीं। बेनाप। पर इस बार किसी डर से नहीं। इस बार इज़्ज़त से। क्योंकि अब मैं जानता था वहाँ कौन सोया है।
और मैंने... मैंने फिर कभी किसी और गाँव की नाप नहीं की, बाबू।
मैं बेलवा में ही रुक गया।
अब आप सोच रहे होंगे — ये कहानी मैं किसे सुना रहा हूँ?
मैं आपको बताता हूँ।
वो बात को बहुत साल बीत गए। सुखई लाल चल बसा। फूलमती दादी चल बसीं। मेरे बाल सफ़ेद हो गए, मेरी कमर झुक गई, मेरे हाथ काँपने लगे — ठीक वैसे, जैसे कभी सुखई लाल के काँपते थे।
मैं अब बेलवा का सबसे बूढ़ा आदमी हूँ।
और कल शाम, मेरे पास एक नौजवान आया।
एक नया लड़का। शहर से। उसके हाथ में एक नई, चमचमाती मशीन थी — आजकल जरीब से नहीं, मशीन से नापते हैं। उसके गले में सरकारी पट्टा था। वो चकबंदी का नया अमीन था। सरकार ने बेलवा की ज़मीन फिर से नापने का हुक्म दिया था — पुराने रिकॉर्ड कहीं खो गए हैं, कोई आग लग गई थी दफ़्तर में, और अब सब दोबारा होगा।
वो परेशान था। वो मेरे पास इसलिए आया, क्योंकि मैं गाँव का सबसे बूढ़ा आदमी था, और शायद कुछ जानता होऊँ।
"बाबा," उसने कहा, अपना सिर खुजाते हुए, "एक अजीब बात है। पूरे गाँव की नाप कर ली मैंने। पर हिसाब नहीं बैठ रहा।"
मेरा दिल एक पल को रुक गया।
"क्या हुआ?" मैंने पूछा।
"पूरे गाँव की ज़मीन," उसने कहा, "तीन बिस्वा ज़्यादा निकल रही है। ऐसा तो होता ही नहीं, बाबा। मशीन भी वही कह रही है। तीन बिस्वा ज़्यादा।"
मैंने आँखें मूँद लीं।
तीन बिस्वा।
फिर से।
देखिए, बाबू।
मैंने उन लोगों को गिन दिया था। छप्पनिया अकाल के वो भूखे, बेसहारा लोग — मैंने उन्हें आज़ाद कर दिया था। वो पट्टी सालों तक शांत रही।
पर मैं एक बात नहीं समझा था। एक बात, जो मुझे इन सालों में, इस पट्टी के पास रहते हुए, धीरे-धीरे समझ आई।
वो पट्टी कभी ख़ाली नहीं रहती।
क्योंकि ये दुनिया, बाबू — ये कभी "कोई नहीं" बनाना बंद नहीं करती। हर साल, हर ज़माने में, कोई न कोई आता है, जिसे दुनिया भूल जाती है। जिसका कोई नाम काग़ज़ पर नहीं चढ़ता। जिसे कोई गिनता नहीं। कभी कोई मज़दूर, जो किसी शहर में, किसी सड़क के किनारे मर जाता है, और जिसका नाम कोई नहीं जानता। कभी कोई, जो किसी रेल के नीचे आ जाता है, और जिसकी लाश को कोई लेने नहीं आता। कभी कोई बच्चा, जो किसी झुग्गी में पैदा होता है और मर जाता है, और जिसका जन्म, जिसकी मौत — कहीं दर्ज ही नहीं होती।
और वो सब, बाबू — वो सब कहीं न कहीं इकट्ठा होते हैं।
और बेलवा की उस पट्टी के नीचे, वो जगह है। वो जगह जो किसी की नहीं है। जहाँ "कोई नहीं" लोग आकर इंतज़ार करते हैं। एक ऐसे आदमी का, जिसके पास किताब हो, कलम हो। जो उन्हें गिन सके।
ये तीन बिस्वा, जो आज फिर ज़्यादा निकल रहे हैं — ये नई ज़मीन नहीं है, बाबू।
ये नए लोग हैं।
जो आ गए हैं। गिने जाने के लिए।
मैंने आँखें खोलीं, और उस नौजवान अमीन की तरफ़ देखा।
वो मुझे ऐसे देख रहा था जैसे मैं सठिया गया कोई बूढ़ा हूँ। उसकी आँखों में वही चीज़ थी जो कभी मेरी आँखों में थी — वो घमंड, वो यक़ीन कि दुनिया में बस वही सच है जो आँखों से दिखता है।
"बाबा?" उसने कहा। "मैं क्या करूँ इस तीन बिस्वा का?"
मैंने उससे वो सब बताना चाहा। पूरी कहानी। जो मैंने आपको सुनाई।
पर मैं रुक गया।
क्योंकि मुझे पता था, बाबू, कि वो मेरी बात नहीं मानेगा। ठीक वैसे, जैसे मैंने कभी सुखई लाल की बात नहीं मानी थी।
फिर भी, मैंने कोशिश की। मैंने उससे कहा — "बेटा। उस पट्टी को, जो दोनों गाँवों के बीच है — उसे मत नापना। उसे छोड़ देना। और अगर..." मैंने उसकी आँखों में देखा। "और अगर तुझसे रहा न जाए, अगर तू उसे नाप ही ले — तो जब रात को कुछ अजीब हो, तो डरकर भागना मत। और किसी का नाम मत लिखना। बस... उन्हें गिन लेना। समझे? उन्हें बस गिने जाना है।"
वो नौजवान कुछ देर मुझे देखता रहा। और फिर वो हँस पड़ा। एक हल्की, अदब वाली हँसी — जैसे एक बूढ़े की बात पर हँसता है।
"बाबा, आप भी," उसने कहा, उठते हुए। "ज़मीन भला कोई गिनी जाना चाहती है? भूत-प्रेत। मैं तो पढ़ा-लिखा आदमी हूँ। ज़मीन झूठ नहीं बोलती — कहीं नाप में ही ग़लती होगी। मैं कल सुबह दोबारा नाप दूँगा। उस पट्टी समेत। सब हिसाब बैठ जाएगा।"
और वो चला गया। अपनी चमकती मशीन के साथ। उस तरफ़, जहाँ उसका डेरा था। जहाँ से उस पट्टी की तरफ़ का रास्ता जाता था।
मैं अपने दरवाज़े पर खड़ा रहा, और उसे जाते देखता रहा।
और मेरे अंदर, बाबू, एक भारी पत्थर बैठ गया।
क्योंकि मैं जानता हूँ कि कल क्या होगा। वो उस पट्टी को नापेगा। और परसों सुबह, वो अपनी किताब खोलेगा — और उसमें एक एंट्री होगी जो उसने लिखी नहीं। खसरा नंबर ज़ीरो। और उसका अपना नाम, धीरे-धीरे, एक-एक अक्षर पूरा होता हुआ।
और फिर वो भी मेरे पास दौड़ा आएगा। डरा हुआ। और तब... तब शायद वो मेरी बात सुने।
मैं बूढ़ा हो गया हूँ, बाबू। मेरे हाथ काँपते हैं। मैं अब उस पट्टी पर रोज़ नहीं जा पाता, जैसे पहले जाता था — उन्हें गिनने, उन्हें आज़ाद करने। मुझे किसी को ये काम सौंपना है। किसी को, जो मेरे बाद आए। जो किताब उठाए, कलम उठाए, और उन भूले हुए लोगों को गिनता रहे। हमेशा। क्योंकि ये काम कभी ख़त्म नहीं होता।
शायद वो नौजवान ही हो। शायद कोई और।
पर अभी, आज की रात —
आज की रात तीन लोग, उस पट्टी के नीचे, इंतज़ार कर रहे हैं। तीन नए लोग, जिन्हें दुनिया ने भुला दिया। और वो अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे हैं। अपने नाम का इंतज़ार।
और जब तक वो नौजवान समझेगा — या जब तक कोई और आएगा — तब तक उन्हें कोई न कोई गिनेगा।
इसलिए मैं अब, इस बूढ़ी उम्र में, अपनी लालटेन उठा रहा हूँ। और अपने बाप की वो पुरानी पीतल की जरीब। और अपनी वही लाल कपड़े में बँधी किताब।
और मैं एक बार और, उस पट्टी की तरफ़ चल रहा हूँ। उन तीन लोगों को गिनने।
और बाबू — आख़िर में, बस एक बात।
आज जब आप ये सुनकर सोने जाएँ, और कभी किसी ऐसी ज़मीन के पास से गुज़रें जो किसी की नहीं है — कोई बंजर पट्टी, कोई ख़ाली कोना, कोई ऐसी जगह जिसे लोग छूते नहीं, जिससे कतराते हैं —
तो एक पल रुककर सोचिएगा।
उस मिट्टी के नीचे कौन सोया है। और क्या किसी ने उसे कभी गिना था।
क्योंकि हर गाँव में, हर शहर में, ऐसी एक जगह होती है। एक खसरा नंबर ज़ीरो। जहाँ वो लोग इंतज़ार करते हैं, जिन्हें दुनिया ने गिनना भूल गया।
और हर ऐसी जगह...
एक अमीन का इंतज़ार करती है।
खट... खट... खट...