Pretika › Real Experiences › खसरा नंबर ज़ीरो
मैं तुम्हें गिनने आया हूँ
Pretika · Real Experiences · 3 मिनट
- Writer
- Pretika
- Story
- खसरा नंबर ज़ीरो
- Chapter
- 9 of 10
- Category
- Real Experiences
- Reading time
- 3 min
- Words
- 498
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
सूरज ढल चुका था जब मैं उस मेड़ पर पहुँचा।
इस बार मैं भागकर नहीं आया था। इस बार मैं डरते-डरते, चोरी से नहीं आया था। इस बार मैं अपने पैरों पर, अपनी मर्ज़ी से आया था। एक हाथ में लालटेन, दूसरे में मेरा लाल कपड़े में बँधा खसरा रजिस्टर और एक कलम।
मैंने पट्टी पर पैर रखा।
और वो ठंड फिर नीचे से चढ़ी। पर इस बार मैं रुका नहीं। मैं अँधेरे में आगे बढ़ता गया। और जैसे ही मैं आगे बढ़ा, गाँव की रोशनी मेरे पीछे बुझती गई, आवाज़ें मरती गईं, और वो घनघोर सन्नाटा छा गया — वही, जिसमें मुझे अपनी धड़कन सुनाई देती थी।
मैं चलता रहा, उस पट्टी के बीचों-बीच की तरफ़।
और वहाँ, अँधेरे में, मुझे एक चीज़ चमकती दिखी।
मेरे बाप की पीतल की जरीब। वहीं पड़ी थी, जहाँ मैंने उसे फेंका था।
मैंने झुककर उसे उठाया। उसे अपनी हथेली में महसूस किया — ठंडी, भारी, जानी-पहचानी। मेरे बाप का हाथ इसी पर पड़ता था। उनके बाप का भी। तीन पीढ़ियों ने इसी से ज़मीन नापी थी। और आज, उसी जरीब के साथ, मैं वो नापने आया था जो किसी ने कभी नहीं नापा।
मैंने लालटेन ज़मीन पर रखी। और मैंने सिर उठाया।
वो वहाँ थे।
मेरे चारों तरफ़। अँधेरे में। कतार-दर-कतार, दूर तक फैले हुए। दुबले, फटेहाल, चुप। औरतें, मर्द, बूढ़े, बच्चे। सैकड़ों आँखें, मुझ पर टिकी हुईं।
इस बार मैं भागा नहीं।
मैंने अपना रजिस्टर खोला। उसे लालटेन की रोशनी में रखा। मैंने कलम उठाई। और मेरी आवाज़ काँप रही थी, पर मैंने ज़ोर से, उन सबसे कहा —
"मैं अमीन हूँ।"
मेरी आवाज़ उस सन्नाटे में गूँजी।
"मैं तुम्हें गिनने आया हूँ।"
एक पल को कुछ नहीं हुआ।
और फिर, उस पूरी कतार में, एक हरकत हुई। एक सिहरन। जैसे सौ साल से रुकी हुई हवा अचानक चलने लगी हो।
और सबसे आगे खड़ी वो बूढ़ी औरत — वही, जो पहली रात मेरे पास आई थी, खाल और हड्डी का चेहरा — उसने एक क़दम आगे बढ़ाया। लालटेन की रोशनी में।
मैंने काँपते हाथ से कलम पकड़ी। और मैंने उससे वो पूछा, जो एक अमीन हर इंसान से पूछता है, जब वो उसका नाम किताब में चढ़ाता है। वो साधारण-सा सवाल, जो उस रात सबसे बड़ा सवाल बन गया।
"तुम्हारा नाम क्या है?"
बूढ़ी औरत के सूखे होंठ काँपे। और बाबू — उसे एक पल लगा। एक पूरा पल। जैसे वो अपना नाम याद करने की कोशिश कर रही हो। सौ साल हो गए थे न, उसका नाम किसी ने पुकारा नहीं था। सौ साल से वो "कोई नहीं" थी। और अब कोई उसका नाम पूछ रहा था।
और फिर, बहुत धीरे, बहुत प्यार से, जैसे कोई बहुत क़ीमती चीज़ संभालकर रख रहा हो, उसने कहा —
"धनिया।"
मेरी आँखों से आँसू बह निकले।
मैंने अपनी किताब में, उस खसरा नंबर ज़ीरो के नीचे, पहला नाम लिखा।
धनिया।
और जैसे ही मैंने वो नाम लिखा, बाबू — वो बूढ़ी औरत मुस्कुराई। सौ साल में पहली बार। और एक हल्की-सी रोशनी, एक राहत, उसके चेहरे पर फैल गई। और वो... वो धुँधली होने लगी। शांत होकर। जैसे कोई थका हुआ इंसान आख़िरकार सो रहा हो।
वो चली गई।
और उसके पीछे की कतार आगे बढ़ गई। एक क़दम।