Pretika › Real Experiences › खसरा नंबर ज़ीरो
जो गिना नहीं गया
Pretika · Real Experiences · 10 मिनट
- Writer
- Pretika
- Story
- खसरा नंबर ज़ीरो
- Chapter
- 8 of 10
- Category
- Real Experiences
- Reading time
- 10 min
- Words
- 1836
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
कमरे में ख़ामोशी छा गई।
"हम क्या करते?" दादी की आवाज़ काँप उठी, जैसे वो आज भी, सौ साल बाद, ख़ुद को समझाने की कोशिश कर रही हों। "हमारे पास अपने बच्चों के लिए नहीं था। हम ख़ुद मर रहे थे। मेरे बाप ने दरवाज़ा बंद कर दिया। पूरे गाँव ने दरवाज़े बंद कर लिए। हमने उन भूखों को, उन मरते हुए बच्चों को, अपने घरों से भगा दिया।"
"पर वो कहाँ जाते, बेटा? उनके पास जाने को कोई जगह नहीं थी। वो वापस उस सड़क पर नहीं जा सकते थे, जहाँ से आए थे — वहाँ सिर्फ़ मौत थी। और हमारे गाँव में कोई उन्हें घुसने नहीं देता था।"
"तो वो वहाँ चले गए। उस एक जगह, जहाँ से उन्हें कोई नहीं भगा सकता था। क्योंकि वो जगह किसी की नहीं थी।"
मेरी रीढ़ में एक ठंडी लकीर दौड़ गई।
"बेलवा कलाँ और बेलवा खुर्द के बीच की वो पट्टी," दादी ने कहा। "वो बंजर ज़मीन, जिस पर दोनों गाँव झगड़ते थे, पर जिसे कोई अपना नहीं कहता था। वो उस पर जाकर बैठ गए। पूरा क़ाफ़िला। क्योंकि वही एक जगह थी जो न कलाँ की थी, न खुर्द की। और इसलिए वहाँ से उन्हें भगाने वाला कोई नहीं था।"
"वो वहीं बैठे रहे, बेटा। दिन। फिर रात। हम अपने बंद दरवाज़ों के पीछे से सुनते थे। बच्चों के रोने की आवाज़, जो धीरे-धीरे कमज़ोर पड़ती जाती थी। और फिर..."
दादी की आवाज़ टूट गई।
"और फिर एक रात, आवाज़ें बंद हो गईं।"
"सुबह कोई बाहर नहीं निकला। दो दिन कोई बाहर नहीं निकला। तीसरे दिन, गाँव के मर्दों ने अपने मुँह पर कपड़े बाँधे — क्योंकि अकाल के बाद बीमारी आती है, हैज़ा — और वो उस पट्टी पर गए।"
"वहाँ कोई ज़िंदा नहीं था, बेटा। एक भी नहीं। पूरा क़ाफ़िला। सब मर चुके थे। भूख से, बीमारी से, ठंड से। माँएँ अपने बच्चों को सीने से चिपकाए हुए मरी थीं। बूढ़े बैठे-बैठे मरे थे।"
"और गाँव के मर्दों ने उन सबको वहीं, उसी पट्टी में, एक गड्ढे में डाल दिया। एक साथ। सबको। और ऊपर से मिट्टी डाल दी। और लौट आए। और फिर..."
दादी ने एक लंबी, काँपती साँस ली।
"और फिर किसी ने उस बारे में कभी बात नहीं की। कभी नहीं, बेटा। सौ साल हो गए। किसी ने उन लोगों का ज़िक्र नहीं किया। जैसे वो कभी आए ही न थे। जैसे वो कभी थे ही नहीं।"
मैं काफ़ी देर कुछ बोल न सका।
फिर मैंने पूछा — और मेरी आवाज़ बहुत धीमी थी — "वो कितने लोग थे, दादी?"
और तब फूलमती दादी ने वो बात कही, बाबू, जिसने मुझे इस पूरी कहानी का असली डर समझाया। उसका असली दुख।
"पता नहीं, बेटा," उन्होंने कहा।
"पता नहीं?"
"किसी ने गिनती नहीं की।" उनकी अंधी आँखें मेरी तरफ़ थीं। "किसने गिनती की होती, बेटा? कौन गिनता? वो किसी के नहीं थे। उनका कोई गाँव नहीं था, कोई नाम नहीं था जो कोई जानता हो, कोई ज़मीन नहीं थी। वो इस दुनिया में आए, और मर गए — और किसी ने उन्हें गिना तक नहीं। कितने मर्द थे, कितनी औरतें, कितने बच्चे — किसी को नहीं पता। आज तक नहीं।"
"सोच, बेटा।" वो आगे झुकीं, और उनकी आवाज़ में एक अजीब-सी तड़प थी। "हमारे गाँव में जब कोई मरता है, तो उसका नाम याद रहता है। पटवारी की किताब में लिखा जाता है कि उसकी ज़मीन अब किसकी होगी। उसके बच्चे उसका श्राद्ध करते हैं। उसकी एक... एक निशानी रह जाती है। दुनिया को पता रहता है कि वो था। कि वो जिया।"
"पर उन लोगों का कुछ नहीं रहा। न नाम, न ज़मीन, न औलाद जो उन्हें याद रखे, न किसी किताब में एक लकीर। कुछ नहीं। जैसे वो कभी इस दुनिया में आए ही नहीं। जैसे ईश्वर ने भी उन्हें गिनना भूल गया।"
"और बस यही, बेटा।" उन्होंने अपने काँपते हाथ जोड़ लिए। "यही एक चीज़ है जो वो अब चाहते हैं। बदला नहीं। ख़ून नहीं। वो किसी को मारना नहीं चाहते। वो बस... गिने जाना चाहते हैं। वो चाहते हैं कि कोई आए, और किसी किताब में लिख दे कि वो थे। कि वो इस दुनिया में आए थे। कि उनका भी कोई हिसाब था।"
"सौ साल से वो उस पट्टी के नीचे इंतज़ार कर रहे हैं। एक ऐसे आदमी का, जिसके पास वो किताब हो। वो कलम हो। वो उन्हें गिन सके।"
बूढ़ी ने अपना अंधा चेहरा मेरी तरफ़ किया।
"और तू वो आदमी है, बेटा।"
मैं समझ नहीं पा रहा था कि क्या कहूँ।
"पर गिरधारी?" मैंने आख़िर में पूछा। "वो भी तो अमीन था। वो भी तो उन्हें गिनने आया था। उसके साथ क्या हुआ?"
सुखई लाल, जो अब तक दरवाज़े पर चुपचाप खड़ा था, उसने पहली बार मुँह खोला।
"गिरधारी ने ग़लती की, बाबू," उसने कहा। "वो भी आपकी तरह सोचता था — कि ये बस ज़मीन है, इसे नाप दो, इसका मालिक तय कर दो। उसने उस पट्टी को नापा, और उसे नंबर देकर, उसका मालिक तय करना चाहा। पर इस ज़मीन को मालिक नहीं चाहिए, बाबू। और जब गिरधारी ने ज़बरदस्ती इसे एक मालिक देना चाहा — तो ज़मीन ने मालिक चुन लिया।"
"गिरधारी को।"
"उसका नाम लिखा गया, उसी की किताब में, उसी की लिखावट में — जैसे आपका लिखा जा रहा है। और जब वो नाम पूरा हुआ — गिरधारी उस पट्टी का मालिक बन गया। और मालिक अपनी ज़मीन छोड़कर कहाँ जाएगा? वो वहीं रह गया, बाबू। हमेशा के लिए। उसी पट्टी को नापता हुआ। एक नाप, जो कभी पूरी नहीं होती। क्योंकि वो असल में उन लोगों को गिनने की कोशिश कर रहा है — पर अकेला, मरने के बाद, बिना किताब के, बिना कलम के — वो उन्हें गिन नहीं पाता। और इसलिए वो रुक नहीं पाता।"
मैंने वो आधा नाम याद किया। मेरा अपना नाम। चार अक्षर बचे थे। चार रातें।
"तो जब मेरा नाम पूरा होगा," मैंने धीरे से कहा, "मैं भी गिरधारी बन जाऊँगा। मैं भी वहीं रह जाऊँगा।"
"हाँ, बाबू।"
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए। मेरा गला सूख गया।
"कोई रास्ता नहीं है?" मैंने पूछा। "मैं भाग जाऊँ? गाँव छोड़ दूँ? दूर चला जाऊँ?"
सुखई लाल ने सिर हिलाया। "वो नाम आपकी किताब में है, बाबू। और किताब आपके साथ जाएगी। आप जहाँ जाएँगे, नाम वहीं पूरा होगा। दूरी से कुछ नहीं होगा।"
"तो फिर कोई रास्ता ही नहीं?"
और तब सुखई लाल चुप हो गया। और उस चुप्पी में, मुझे समझ आया कि कोई रास्ता था। एक ऐसा रास्ता, जिसे कहते हुए उसकी ज़बान नहीं उठ रही थी।
"बोल," मैंने कहा। "कोई रास्ता है। बता।"
सुखई लाल ने नज़रें झुका लीं।
"एक रास्ता है, बाबू," उसने बहुत धीमे कहा। "ये बात भी मेरे उस्ताद ने बताई थी, और कहा था कि किसी को मत बताना। पर..." उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में एक भयानक करुणा थी। "उस ज़मीन को बस एक मालिक चाहिए। उसे फ़र्क़ नहीं पड़ता कौन। अभी आपका नाम लिखा जा रहा है — क्योंकि आपने उसे नापा। पर अगर... अगर वो नाम पूरा होने से पहले, आप ख़ुद, अपने हाथ से, मालिक के ख़ाने में किसी और का नाम लिख दें — किसी ज़िंदा इंसान का नाम — तो वो इंसान उस पट्टी का मालिक बन जाएगा।"
"और मैं?" मैं फुसफुसाया।
"और आप छूट जाएँगे, बाबू।"
कमरे में एक भयानक सन्नाटा छा गया।
मैं समझ गया था। वो जो रास्ता था — वो ये था कि मैं किसी और को अपनी जगह उस नरक में धकेल दूँ। किसी ज़िंदा इंसान का नाम लिख दूँ, और उसे गिरधारी बना दूँ, ताकि मैं बच जाऊँ।
अपनी जान बचाऊँ — किसी और की जान देकर।
मैं उस रात कोठरी में अकेला बैठा था। मेरे सामने वो रजिस्टर खुला था।
और मेरा नाम — तीन अक्षर बचे थे अब। एक रात और बीत गई थी।
तीन रातें।
बाबू, मैं आपको एक बात बताता हूँ, और मुझे आज भी इसे कहते हुए शर्म आती है। पर मैं ये कहानी सच्चाई के साथ सुना रहा हूँ, इसलिए ये भी बताऊँगा।
उस रात, उस खुले रजिस्टर के सामने बैठे-बैठे, मेरे हाथ में कलम थी — एक नई कलम, क्योंकि पुरानी मैंने उस पट्टी में फेंक दी थी। और मेरे मन में नाम आने लगे।
मंगल का नाम। मेरा सबसे पुराना साथी। जो अभी भी कहीं ज़िंदा था, सुरक्षित, मुझसे दूर। बस उसका नाम लिख दूँ...
भोला का नाम। वो पंद्रह साल का लड़का, जिसके घरवाले उसे रात के अँधेरे में यहाँ से ले गए थे। बस उसका नाम...
और बाबू — मेरा हाथ काँपा। और कलम काग़ज़ की तरफ़ बढ़ी।
मैं रुक गया।
मैंने कलम को मेज़ पर पटक दिया, और अपने दोनों हाथों में अपना सिर पकड़ लिया। मेरी आँखों से आँसू बह रहे थे। क्योंकि मैंने उस पल अपने अंदर के उस आदमी को देख लिया था — वो आदमी जो अपनी जान बचाने के लिए एक पंद्रह साल के बच्चे को मौत से भी बदतर चीज़ में धकेल सकता था। और वो आदमी मैं था।
मैं सारी रात रोता रहा, बाबू। और सोचता रहा।
मैं ये नहीं कर सकता था। मैं किसी मंगल को, किसी भोला को, किसी अनजान को — किसी को भी अपनी जगह नहीं भेज सकता था। चाहे मैं ख़ुद गिरधारी बन जाऊँ। चाहे मैं हमेशा के लिए उस पट्टी का हो जाऊँ।
पर अगर मैं किसी का नाम नहीं लिखूँगा — तो दो रात बाद, मेरा अपना नाम पूरा हो जाएगा। और मैं ख़त्म हो जाऊँगा।
मैं फँस चुका था, बाबू। पूरी तरह। एक तरफ़ कुआँ, दूसरी तरफ़ खाई।
और तभी, उस घुप अँधेरे में, रोते-रोते, मुझे फूलमती दादी की एक बात याद आई। एक बात, जो उन्होंने बताते-बताते कही थी, और जिस पर मैंने उस वक़्त ध्यान नहीं दिया था।
उन्होंने कहा था — "इस ज़मीन को मालिक नहीं चाहिए। ये बस गिने जाना चाहती है। ये चाहती है कि कोई आए, और किताब में लिख दे कि वो थे।"
गिरधारी ने ज़मीन को मालिक देने की कोशिश की थी — और मारा गया।
पर ज़मीन मालिक माँग ही नहीं रही थी।
वो कुछ और माँग रही थी।
और मैं... मैं एक अमीन था। मेरे पास वो किताब थी। मेरे पास वो कलम थी।
मेरे पास वो एक चीज़ थी, जो उन सौ साल से इंतज़ार करते लोगों को चाहिए थी। जो गिरधारी के पास भी कभी नहीं थी, क्योंकि वो ज़िंदा रहते कभी ये समझ ही नहीं पाया।
मैं उन्हें गिन सकता था।
अगली शाम, जब सूरज ढलने लगा, और आसमान लाल से काला होने लगा, मैंने अपना खसरा रजिस्टर उठाया। और एक नई कलम। और एक लालटेन।
सुखई लाल ने मुझे जाते देखा। उसकी आँखों में सवाल था, और डर था।
"बाबू," उसने कहा, "आप फिर वहाँ जा रहे हैं? रात में? आप... आप किसी का नाम लिखने जा रहे हैं?"
मैं रुका। मैंने उसकी तरफ़ देखा। और मैंने सच कहा — क्योंकि मुझे ख़ुद नहीं पता था कि जो मैं करने जा रहा था, वो काम करेगा या नहीं। शायद मैं वहीं मर जाता। शायद मैं भी गिरधारी बन जाता। पर ये एकमात्र रास्ता था जो मेरे ईमान से मेल खाता था।
"नहीं, सुखई लाल," मैंने कहा। "मैं किसी का नाम लिखने नहीं जा रहा।"
"तो फिर?"
मैंने अपने हाथ में पकड़े उस रजिस्टर को देखा। उस लाल कपड़े को। और मेरे अंदर का अमीन — वो जो तीस साल से एक ही बात मानता था, कि हर इंसान, हर चीज़, गिने जाने का हक़ रखती है — वो आख़िरकार जाग गया था। पूरी तरह।
"मैं अपना काम करने जा रहा हूँ," मैंने कहा।
और मैं अँधेरे में, उस पट्टी की तरफ़ चल पड़ा। उस आख़िरी रात की तरफ़। उस इकलौती चीज़ के साथ, जो मेरे पास बची थी।
मेरी किताब। मेरी कलम।
और एक हिसाब, जो सौ साल से अधूरा पड़ा था।