PretikaReal Experiencesखसरा नंबर ज़ीरो

छप्पनिया अकाल

Pretika · Real Experiences · 6 मिनट

Writer
Pretika
Story
खसरा नंबर ज़ीरो
Chapter
7 of 10
Category
Real Experiences
Reading time
6 min
Words
1149
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

तीन दिन मैं बुख़ार में पड़ा रहा।

और उन तीन दिनों में, मैंने एक चीज़ देखी जिसने मेरी बची-खुची हिम्मत भी तोड़ दी।

वो नाम बढ़ रहा था।

पहली सुबह — सिर्फ़ एक अक्षर था, और एक अधूरी लकीर। दूसरी सुबह — मैंने रजिस्टर खोला, और लकीर थोड़ी और आगे बढ़ चुकी थी। एक और अक्षर जुड़ गया था। तीसरी सुबह — और आगे।

समझिए मेरी बात, बाबू। मैंने वो रजिस्टर रात को अपने लाल कपड़े में बाँधकर, अपने सिरहाने रख दिया था। मैं उसे छूता नहीं था। रात भर वो वहीं, बँधा हुआ, मेरे सिरहाने पड़ा रहता था। और सुबह जब मैं खोलता — तो नाम एक अक्षर और आगे बढ़ चुका होता। मेरी ही लिखावट में। गीली स्याही में।

कोई रात के अँधेरे में मेरा नाम लिख रहा था। एक-एक अक्षर। धीरे-धीरे।

मैंने रोकने की कोशिश की। दूसरे दिन मैंने उस एंट्री को कलम से काटना चाहा — पूरी ताक़त से लकीरें खींचीं उस पर। अगली सुबह, बाबू, वो कटी हुई लकीरें ग़ायब थीं। और नाम एक अक्षर और आगे बढ़ चुका था।

मैंने वो पन्ना फाड़ना चाहा। मैंने उसे पकड़ा, खींचा — पर वो फटा नहीं। जैसे वो काग़ज़ नहीं, चमड़ा हो। मेरी उँगलियाँ फिसल गईं।

मैंने तय किया कि मैं पूरा रजिस्टर ही जला दूँगा।

मैंने दिया जलाया, रजिस्टर उसके पास ले गया। और जैसे ही लौ काग़ज़ के पास पहुँची — दिया बुझ गया। हवा नहीं थी, बाबू। बिल्कुल हवा नहीं थी। पर दिया बुझ गया।

मैंने हार मान ली।

और फिर मैं बस बैठकर देखता रहा। हर सुबह। मेरा नाम, एक अक्षर और पूरा होता हुआ। और मैंने जो बचे हुए अक्षर गिने — जो अभी लिखे जाने थे — तो मेरा कलेजा बैठ गया।

चार अक्षर बचे थे।

चार रातें।

मेरे पास चार रातें थीं, बाबू। और फिर वो नाम पूरा हो जाने वाला था।

चौथे दिन मैं उठा, और सीधा सुखई लाल के पास गया।

मैंने उसके सामने वो रजिस्टर खोलकर रख दिया। उस आधे नाम पर उँगली रखी।

"सुखई लाल," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ काँप रही थी, "ये क्या है? ये मेरा नाम क्यों लिख रहा है? और जब ये पूरा हो जाएगा — तो क्या होगा?"

सुखई लाल ने उस रजिस्टर को देखा। और बूढ़े का चेहरा राख हो गया। उसने आँखें मूँद लीं, जैसे कोई दुख उसके सीने में उतर गया हो।

"मैंने मना किया था, बाबू," उसने धीरे से कहा। "मैंने हाथ जोड़े थे।"

"अब क्या होगा, ये बता।"

उसने आँखें खोलीं। "जब ये नाम पूरा हो जाएगा," उसने कहा, "तब आप उस ज़मीन के मालिक हो जाएँगे। खसरा नंबर ज़ीरो के मालिक। और फिर..." वो रुका। "फिर आप वहाँ के हो जाएँगे, बाबू। गिरधारी की तरह। आप उस पट्टी को छोड़ नहीं पाएँगे। आप वहीं रह जाएँगे। हमेशा।"

मैं चुप रहा। कमरे में बस मेरी साँस की आवाज़ थी।

"पर मैं नहीं समझा," मैंने आख़िर में कहा। "वो ज़मीन — वो ऐसा क्यों करती है? वो मुर्दे — वो कौन हैं? ये सब है क्या, सुखई लाल? तू मुझे पूरा सच बता। मेरे पास सिर्फ़ चार रातें हैं।"

सुखई लाल बहुत देर तक चुप रहा। फिर उसने कहा —

"मुझे सब नहीं पता, बाबू। मुझे बस उतना पता है जितना एक पटवारी को पता होना चाहिए — कि उसे मत नापो, मत छेड़ो। ये बात मेरे उस्ताद ने मुझे बताई थी, और उन्हें उनके उस्ताद ने। पर पूरी बात... पूरी बात इस गाँव में सिर्फ़ एक इंसान जानता है।"

"कौन?"

"फूलमती दादी।" उसने कहा। "बेलवा खुर्द में, सबसे आख़िरी घर। वो इस गाँव की सबसे बूढ़ी हैं, बाबू। इतनी बूढ़ी कि किसी को उनकी सही उम्र नहीं पता। कहते हैं... कहते हैं उन्होंने वो सब अपनी आँखों से देखा है। जब वो छोटी बच्ची थीं।"

"देखा है? क्या देखा है?"

सुखई लाल उठ खड़ा हुआ। "वो ख़ुद बताएँगी, बाबू। मैं आपको ले चलता हूँ। पर एक बात — उनके सामने उस पट्टी का नाम मत लीजिएगा। और जो वो बताएँ, उसे ध्यान से सुनिएगा। क्योंकि अब वही आपको बचा सकती हैं — या कोई नहीं।"

फूलमती दादी का घर गाँव के बिल्कुल आख़िर में था। कच्ची मिट्टी का, पुराना, अकेला। जैसे बाक़ी गाँव ने उससे थोड़ी दूरी बना ली हो।

अंदर अँधेरा था, और धुएँ की गंध। और उस अँधेरे के एक कोने में, एक चारपाई पर, फूलमती दादी बैठी थीं।

बाबू, मैंने अपनी ज़िंदगी में इतना बूढ़ा इंसान नहीं देखा। वो इतनी दुबली थीं कि बस हड्डियों पर खाल लिपटी थी। उनकी आँखों पर सफ़ेद मोतियाबिंद की परत थी — वो अंधी थीं। उनके हाथ लगातार काँप रहे थे। वो किसी सूखे पत्ते जैसी लग रही थीं, जो हवा के एक झोंके से बिखर जाएगा।

जैसे ही मैं अंदर गया, इससे पहले कि मैं कुछ बोलूँ, उन्होंने अपना अंधा चेहरा मेरी तरफ़ घुमाया।

और उन्होंने कहा — "तू वो अमीन है।"

मैं ठिठक गया।

"तूने उसे नाप दिया," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ ख़र-ख़र करती थी, जैसे पुरानी चक्की। "है ना? तूने उस पट्टी को नाप दिया। और अब वो तेरा नाम लिख रही है।"

"आपको कैसे पता?" मैं फुसफुसाया।

बूढ़ी हँसी। एक सूखी, दर्द भरी हँसी। "क्योंकि तेरे पैरों की आहट में वो ठंड है, बेटा। उस पट्टी की ठंड। जब भी कोई उस पर पैर रखता है, वो ठंड उसके साथ चिपक जाती है। और जाती नहीं।"

मैं उनके सामने ज़मीन पर बैठ गया। "दादी," मैंने कहा, "मुझे बताइए। वो जगह क्या है? वो लोग कौन हैं?"

फूलमती दादी ने एक लंबी साँस ली। और फिर उन्होंने बताना शुरू किया। और जैसे-जैसे वो बोलती गईं, बाबू, उस अँधेरे कमरे में मुझे लगा जैसे कोई और भी सुन रहा हो। जैसे दीवारें सुन रही हों।

"मैं छोटी थी, बेटा," उन्होंने कहा। "इतनी छोटी कि घुटनों तक भी न आती थी। पर कुछ चीज़ें इंसान भूलता नहीं। चाहे जितना चाहे।"

"वो छप्पनिया अकाल का साल था।"

मैंने वो नाम सुना था। हम सबने सुना है, बाबू। वो भयानक अकाल, जब आसमान ने दो साल पानी नहीं दिया। जब कुएँ सूख गए, फ़सलें राख हो गईं, और मिट्टी फटकर ऐसी हो गई जैसे... जैसे वो पट्टी। पूरे हिंदुस्तान में लाखों लोग भूख से मरे थे। वो सिर्फ़ इतिहास की किताब का एक पन्ना है, हमारे लिए। एक नाम। छप्पनिया।

पर फूलमती दादी के लिए वो किताब का पन्ना नहीं था। वो उनकी याद थी।

"लोग पहले खेत का बचा-खुचा खाते थे," वो बोलती रहीं। "फिर पेड़ के पत्ते। फिर पेड़ की छाल। फिर... फिर कुछ नहीं बचा, बेटा। हमारे अपने गाँव में लोग मर रहे थे। और ऐसे में, एक दिन, सड़क पर वो लोग आए।"

"कौन लोग?"

"बाहर के लोग। दूर के किसी इलाक़े से, जहाँ अकाल और भी बुरा था। एक पूरा क़ाफ़िला। मर्द, औरतें, बूढ़े, बच्चे। पर वो इंसान नहीं लगते थे, बेटा।" उनकी काँपती आवाज़ और धीमी हो गई। "वो चलती हुई लाशें लगती थीं। हड्डियों के ढाँचे, जिन पर खाल लटक रही थी। आँखें अंदर धँसी हुई। पेट पीठ से चिपके हुए। और गोद में बच्चे — जो रोते भी नहीं थे। रोने की ताक़त नहीं थी उनमें।"

"वो अपना गाँव छोड़कर आए थे। इस उम्मीद में कि शायद कहीं रोटी मिल जाए। कहीं पनाह मिल जाए। वो हमारे गाँव पहुँचे, बेलवा। और उन्होंने हाथ फैलाए।"

दादी रुकीं। उनके अंधे चेहरे पर कुछ ऐसा था जो मैं कभी नहीं भूलूँगा। शर्म। सौ साल पुरानी शर्म।

"और हमने उन्हें भगा दिया, बेटा।"

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