Pretika › Real Experiences › खसरा नंबर ज़ीरो
रजिस्टर में एक नाम
Pretika · Real Experiences · 7 मिनट
- Writer
- Pretika
- Story
- खसरा नंबर ज़ीरो
- Chapter
- 6 of 10
- Category
- Real Experiences
- Reading time
- 7 min
- Words
- 1382
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
और तभी मैंने उसे देखा।
उस कतार में, बहुत पीछे, एक आकृति खड़ी नहीं थी। वो हिल रही थी। आगे-पीछे, आगे-पीछे, एक ही ढर्रे पर। और उसके हाथ में कुछ था।
एक जरीब।
एक पुरानी, जंग खाई जरीब। और वो आदमी — पुराने ज़माने के कपड़े पहने, धोती और एक फटा कुर्ता — वो नाप रहा था। एक लकीर, जो कभी ख़त्म नहीं होती थी। वो चलता, कड़ियाँ गिनता, फिर तीली गाड़ता, फिर आगे बढ़ता, फिर रुकता, फिर शुरू से। बार-बार। बिना थके। बिना रुके।
मेरी लालटेन की रोशनी उस पर पड़ी।
वो रुका।
और उसने अपना चेहरा मेरी तरफ़ घुमाया।
उसकी आँखें, बाबू — उसकी आँखों में कुछ नहीं था। बस दो खोखले गड्ढे। और उसका चेहरा सूखा हुआ, पपड़ी पड़ा, जैसे उसी पट्टी की फटी मिट्टी से बना हो।
मैं जानता था वो कौन था।
"गिरधारी," मेरे मुँह से निकला। बस एक फुसफुसाहट।
वो अमीन, जो सौ साल पहले इस पट्टी को नापने आया था। जिसे इसका नंबर देना था। जो तीसरे दिन यहीं, बीच पट्टी में, खुली आँखों और खुले मुँह के साथ, हाथ में जरीब लिए मरा पाया गया था।
उसके सूखे होंठ हिले। और एक आवाज़ निकली — हवा जैसी, सूखे पत्तों जैसी, मिट्टी के नीचे से आती हुई।
"नाप पूरी नहीं होती, बाबू..."
उसने कहा।
"मैंने भी सोचा था... हो जाएगी।"
और उसने अपना चेहरा वापस घुमा लिया। और फिर से नापने लगा। उसी लकीर को, जो कभी ख़त्म नहीं होती।
बाबू, उस पल मेरा ख़ून जम गया।
क्योंकि मैं देख रहा था कि मेरे साथ क्या होने वाला है। वो आदमी, सौ साल से, इस पट्टी को नाप रहा था — और नाप कभी पूरी नहीं होती थी। वो इसी पट्टी का हो गया था। उन्हीं की कतार का। और अब, मेरे आने से पहले, वही इकलौता था जो उन सबको गिनने की कोशिश कर रहा था — और हार रहा था।
मैं पलटा। और मैं भागा।
मैंने जरीब वहीं छोड़ दी — मेरे बाप की जरीब — और रजिस्टर सीने से चिपकाए, मैं अँधेरे में भागा। जिस तरफ़ मुझे लगा कि मेड़ है, गाँव है।
पर वहाँ मेड़ नहीं थी।
बस और पट्टी थी। और वो कतारें। मैं जिस तरफ़ भागता, वहीं वो खड़े मिलते — चुप, इंतज़ार करते, हाथ बढ़ाते। वो मेरे पीछे नहीं दौड़े, बाबू। उन्हें दौड़ने की ज़रूरत नहीं थी। वो बस अपने चेहरे मेरी तरफ़ घुमाते जाते, जिधर मैं भागता, और उनकी फुसफुसाहट मेरे साथ-साथ बढ़ती जाती —
"रुको, बाबू... हमें गिने बिना मत जाओ... हमें भी तो गिनना पड़ेगा न... एक नंबर... बस एक नंबर, बाबू..."
मैं भागता रहा। फेफड़े फटने लगे। लालटेन की लौ और छोटी होती गई, मरने को आई। और मेड़ नहीं आई। गाँव नहीं आया। बस अँधेरा, और सूखी मिट्टी, और वो सैकड़ों इंतज़ार करते चेहरे।
और तभी, मेरे थके दिमाग़ में, मेरे अंदर का अमीन — वो जो हर हाल में हिसाब का रास्ता ढूँढता है — उसने मुझे एक बात बताई। एक ऐसी बात जो मुझे किसी ने बताई नहीं थी, पर जो मैं उस पल अचानक जान गया, जैसे वो ज्ञान उस मिट्टी से ही मेरे अंदर रिस आया हो।
ये पट्टी मुझे जाने नहीं देगी। ये नाप कभी पूरी नहीं होगी। ये कतार कभी ख़त्म नहीं होगी।
जब तक इस पट्टी को एक मालिक न मिल जाए।
एक नाम। खतौनी में। एक ज़िंदा आदमी का नाम, जो इस पट्टी का मालिक बन जाए। तब ये पट्टी "बस" जाएगी — किसी की हो जाएगी, गिन ली जाएगी, किताब में चढ़ जाएगी। और तब ये मुझे छोड़ देगी।
ये मुर्दे अपना नंबर चाहते थे।
पर ये ज़मीन — ये ज़मीन अपना मालिक चाहती थी।
और जो मालिक इसके नाम चढ़ जाएगा... वो इसका हो जाएगा। हमेशा के लिए। गिरधारी की तरह।
मेरा हाथ, बाबू — मेरा अपना हाथ — रजिस्टर की तरफ़ बढ़ने लगा। अपने आप। मेरे अंदर का अमीन फुसफुसा रहा था — एक नाम लिख दे। मालिक के ख़ाने में एक नाम भर दे। और सब ख़त्म हो जाएगा। तू छूट जाएगा।
पर किसका नाम?
अगर अपना लिखूँ — तो मैं गिरधारी बन जाऊँगा।
और तभी, उस घनघोर अँधेरे के उस पार, क्षितिज पर, एक चीज़ दिखी।
एक पतली, धूसर लकीर।
सुबह।
पहली रोशनी।
और जैसे ही वो लकीर फैली, बाबू, वो सरसराहट मद्धम पड़ने लगी। वो कतारें — वो धुँधली होने लगीं, पीछे हटने लगीं, उस आती हुई रोशनी से सिमटने लगीं।
मैंने वो आख़िरी मौक़ा पहचाना। मेरे एक हाथ में रजिस्टर था, और दूसरे हाथ में कलम। और मेरा हाथ मालिक के ख़ाने पर पहुँच चुका था, कलम काग़ज़ को छूने ही वाली थी।
मैंने कलम फेंक दी।
अँधेरे में, दूर। मैंने उसे फेंक दिया। मैंने नाम नहीं लिखा।
और मैं अंधाधुंध दौड़ा, उस धूसर रोशनी की तरफ़।
और इस बार — मेड़ आई।
मेरा पैर मेड़ से टकराया, और मैं औंधे मुँह गिरा — पट्टी से बाहर, उस पार की गीली, ओस से भीगी, ज़िंदा घास पर। और मैं वहीं पड़ा रहा, हाँफता हुआ, काँपता हुआ, उस ठंडी ज़मीन से चिपका हुआ, जैसे कोई डूबता हुआ किनारे से चिपकता है।
मुझे सुबह के पूरे उजाले में सुखई लाल और कुछ गाँव वालों ने पाया।
मैं मेड़ के किनारे पड़ा था, बेहोश-सा। सुखई लाल मेरे ऊपर झुका था, और उसके चेहरे पर — मैंने बाद में समझा — राहत थी। वो राहत जो किसी को तब होती है जब उसे डर था कि वो किसी की लाश पाएगा, और उसने उसे ज़िंदा पा लिया।
मैंने उठकर पट्टी की तरफ़ देखा।
खाली थी।
सुबह की धूप में, बस एक बंजर खेत। फटी हुई, सूखी, भूरी मिट्टी। न कोई कतार, न कोई इंसान, न कोई आवाज़। जैसे रात कुछ हुआ ही न हो।
बस बीच में, उस पट्टी के ठीक बीचों-बीच, एक चीज़ चमक रही थी।
मेरे बाप की पीतल की जरीब। वहीं पड़ी, जहाँ मैंने उसे छोड़ा था।
मैंने सुखई लाल से कहा कि कोई उसे उठा लाए।
किसी ने नहीं उठाई।
वो जरीब आज भी, शायद, उसी पट्टी में पड़ी होगी। गिरधारी की तरह। उस ज़मीन की हो गई होगी।
मुझे कोठरी में लाया गया। मैं काँप रहा था, बुख़ार चढ़ आया था। और जैसे ही थोड़ा होश सँभला, मेरे अंदर का अमीन — वो ज़िद्दी, घमंडी आदमी — उसने मुझसे कहा कि ये सब एक भ्रम था। रात भर की नींद न लेने का, थकान का, डर का भ्रम। कोई कतार नहीं थी। कोई मुर्दे नहीं थे। मैं एक पढ़ा-लिखा सरकारी आदमी हूँ। मैंने एक बुरा सपना देखा।
और इस बात को साबित करने के लिए, मुझे अपनी इस दुनिया का एक सबूत चाहिए था। कुछ ठोस। कुछ असली।
मैंने अपना लाल कपड़े में बँधा खसरा रजिस्टर उठाया। मेरा सबसे भरोसेमंद साथी। काग़ज़, स्याही, नंबर, हिसाब — मेरी असली, समझदार, ठोस दुनिया।
मैंने उसे खोला।
और मेरा ख़ून जम गया।
उस रजिस्टर में, उस आख़िरी पन्ने पर जहाँ मैंने बेलवा के खसरे चढ़ाए थे — वहाँ एक नई एंट्री थी।
एक लकीर, जो मैंने नहीं लिखी थी।
और वो लिखावट, बाबू — वो मेरी थी। मेरी अपनी लिखावट। पर मुझे क़सम है, मैंने उसे लिखा नहीं था। मुझे कोई याद नहीं थी।
लिखा था — खसरा नंबर...
और नंबर के ख़ाने में, बाबू, जो लिखा था, वो किसी अमीन ने कभी नहीं लिखा होगा। क्योंकि खसरे के नंबर एक से शुरू होते हैं। एक, दो, तीन। ज़ीरो से नहीं। कभी नहीं।
पर वहाँ, उस ख़ाने में, लिखा था — ०।
ज़ीरो।
किस्म के ख़ाने में लिखा था — बेनाप।
रक़बे के ख़ाने में, जो हमेशा से ख़ाली था — अब एक आँकड़ा था। एक नाप। पूरी।
और मालिक के ख़ाने में —
एक नाम लिखना शुरू हुआ था।
स्याही अभी गीली थी।
पर नाम पूरा नहीं था। बस शुरू का हिस्सा। पहला अक्षर, और फिर लकीर जैसे बीच में रुक गई हो, जैसे कलम उठा ली गई हो। आधा नाम। गीली स्याही में।
और मैंने उस आधे नाम के पहले अक्षर को पहचाना।
वो मेरे अपने नाम का पहला अक्षर था।
मेरे हाथ काँप उठे। मैंने जल्दी से पन्ने पलटे, उस जगह जहाँ मैं बेलवा का कुल जोड़ रखता था — वो फ़र्क़, वो तीन-चार बिस्वा ज़्यादा ज़मीन, जो कभी हिसाब में नहीं बैठती थी, जिसने मुझे इस पूरी मुसीबत में डाला था।
मैंने जोड़ देखा।
फ़र्क़ ख़त्म हो चुका था।
हिसाब बैठ गया था। बेलवा का कुल रक़बा अब पूरा था। एकदम सही। रत्ती भर का फ़र्क़ नहीं।
जैसे वो छूटी हुई ज़मीन — वो बंजर पट्टी — आख़िरकार रजिस्टर में चढ़ गई हो।
जैसे किसी को आख़िरकार गिन लिया गया हो।
तीस साल से मेरा एक ही उसूल था, बाबू। ज़मीन झूठ नहीं बोलती।
और उस सुबह, पहली बार, मेरी किताब सच बोल रही थी। हिसाब सच में पूरा था।
और वो सच, बाबू — वो सच मुझे किसी भी झूठ से ज़्यादा डरा रहा था।
क्योंकि अब सवाल बस एक था।
वो आधा नाम, जो मेरी अपनी लिखावट में, गीली स्याही में, खसरा नंबर ज़ीरो के मालिक के ख़ाने में लिखा जा रहा था —
उसे पूरा कौन कर रहा था?