PretikaReal Experiencesखसरा नंबर ज़ीरो

कतार

Pretika · Real Experiences · 7 मिनट

Writer
Pretika
Story
खसरा नंबर ज़ीरो
Chapter
5 of 10
Category
Real Experiences
Reading time
7 min
Words
1301
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

उस शाम मंगल ने अपना सामान बाँध लिया।

"बाबू," उसने कहा, और उसकी आँखें लाल थीं, "मैं बारह साल से आपके साथ हूँ। आपने कभी मुझसे कुछ नहीं माँगा, मैंने कभी आपसे कुछ नहीं माँगा। आज पहली बार हाथ जोड़ता हूँ।" उसने सच में हाथ जोड़ दिए। "ये गाँव छोड़ दीजिए। ये नाप छोड़ दीजिए। मैं जा रहा हूँ। और मैं चाहता हूँ कि आप भी मेरे साथ चलें।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। मेरा सबसे पुराना साथी। जिसके हाथ में जरीब ऐसे चलती थी जैसे सपेरे के हाथ में बीन। जो मुझसे ज़्यादा अनुभवी था। वो डर गया था। और उसका डर बेवक़ूफ़ी नहीं था — मैंने आज ख़ुद वो सब देखा था।

और फिर भी।

और फिर भी, बाबू, मेरे अंदर वो घमंडी अमीन बोल पड़ा। वो आदमी जिसके लिए तीस साल की कमाई हुई इज़्ज़त एक बंजर खेत से बड़ी थी। उसने कहा — अगर तू आज भागा, तो तू ज़िंदगी भर भागता रहेगा। तू फिर कभी किसी गाँव की नाप पूरी नहीं कर पाएगा, क्योंकि हर बार तुझे बेलवा याद आएगा। तू वो अमीन बन जाएगा जो एक खेत से हार गया था।

"तू जा, मंगल," मैंने धीरे से कहा। "तेरा हिसाब मैं भिजवा दूँगा। तू जा।"

"और आप?"

"मैं एक बार और कोशिश करूँगा।"

मंगल की आँखों में जो देखा, बाबू, वो मैं भूल नहीं पाता। वो ऐसे देख रहा था जैसे किसी मरने वाले को देख रहा हो। उसने एक बार और कुछ कहना चाहा, फिर चुप हो गया। उसने अपनी पोटली उठाई, और चलते-चलते, दरवाज़े पर रुककर, बिना मुड़े, इतना ही कहा —

"बाबू, उस आवाज़ का जवाब मत दीजिएगा। जो रात में पूछती है — नंबर क्या है। आप जवाब मत दीजिएगा। और... कोई नाम मत लिखिएगा।"

और वो चला गया।

मैं उसकी इस आख़िरी बात का मतलब उस वक़्त नहीं समझा।

बाद में समझा। बहुत देर से।

उस रात मैं अकेला था।

भोला जा चुका था। मंगल जा चुका था। पूरे गाँव में, उस अँधेरे में, मैं और सुखई लाल — बस हम दो ही जागते थे, शायद। और मैं जानता था कि सुखई लाल भी सो नहीं रहा होगा। वो भी अँधेरे में बैठा होगा, और इंतज़ार कर रहा होगा। उस बात का, जो होने वाली थी।

रात गहराई।

और वो आवाज़ आई।

खट... खट... खट...।

पर इस बार वो अकेली नहीं थी। इस बार... बहुत सारी थीं। मेरी कोठरी के चारों तरफ़। दसियों जरीबें। सैकड़ों। जैसे एक पूरा गाँव, अँधेरे में, मेरे घर के चारों ओर की ज़मीन नाप रहा हो। खट-खट-खट-खट, हर तरफ़ से, एक लय में।

और फिर वो फुसफुसाहट।

"बाबू... नाप पूरी करो... बाबू..."

मैं आपको सच बताऊँ — मैंने उस पल हार मान ली। पर डर से नहीं। एक अजीब-सी चीज़ से। एक खिंचाव से। जैसे कोई मेरे सीने में हाथ डालकर मुझे बाहर खींच रहा हो। मेरे पैर अपने आप उठे। मैंने अपने बाप की पीतल की जरीब उठाई — जो मैं शाम को पट्टी से वापस ले आया था — और अपना लाल कपड़े में बँधा खसरा रजिस्टर, और एक लालटेन।

और मैं दरवाज़ा खोलकर बाहर निकल गया।

बाहर सुखई लाल अपने दरवाज़े पर खड़ा था। अँधेरे में, बस एक साया। उसने मुझे रोका नहीं। उसने मुझे जाते देखा। और जब मैं उसके पास से गुज़रा, तो उसने बहुत धीमे, टूटी हुई आवाज़ में बस इतना कहा —

"लौट आना, बाबू।"

जैसे उसे पता हो कि शायद मैं न लौटूँ।

मैं अँधेरे में उस पट्टी की तरफ़ चला।

पूरा गाँव सो रहा था। और जैसे-जैसे मैं उस मेड़ के क़रीब पहुँचता गया, बाबू, गाँव की आवाज़ें एक-एक करके मरती गईं।

पहले एक कुत्ता भौंक रहा था, दूर कहीं — फिर वो बीच में ही चुप हो गया, जैसे किसी ने उसका गला दबा दिया हो। फिर हवा रुक गई। बिल्कुल। पत्ते हिलना बंद हो गए। फिर झींगुरों की आवाज़ बंद हुई। और आख़िर में, मेरी लालटेन की लौ — जो हवा में काँप रही थी — वो सीधी हो गई। बिल्कुल सीधी, और स्थिर। जैसे दुनिया में हवा नाम की कोई चीज़ बची ही न हो।

और एक ख़ामोशी छा गई। ऐसी ख़ामोशी, बाबू, जिसमें मुझे अपने ख़ून के बहने की आवाज़ सुनाई देने लगी। अपने दिल की धड़कन। बस।

मैं मेड़ पर पहुँचा।

और मैंने पट्टी पर पैर रखा।

जैसे ही मेरा पैर उस ठंडी मिट्टी पर पड़ा, मेरी लालटेन की लौ छोटी हो गई। एकदम छोटी, एक बिंदी भर। जैसे उस पट्टी का अँधेरा रोशनी को निगल रहा हो, पी रहा हो। मैं मुश्किल से अपने आगे चार क़दम देख पा रहा था।

मैंने पीछे मुड़कर देखा।

गाँव की रोशनी ग़ायब थी।

जिन दो-चार घरों में दिये जल रहे थे, वो दिखने बंद हो गए थे। पीछे, जहाँ गाँव होना चाहिए था, वहाँ बस... और पट्टी थी। फटी हुई, सूखी मिट्टी, अँधेरे में दूर तक फैली हुई। मेड़ ग़ायब थी। गाँव ग़ायब था। मैं चारों तरफ़ से उस पट्टी से घिरा था, जैसे वो खुल गई हो, फैल गई हो, और मुझे अपने अंदर ले लिया हो।

मेरे अंदर का अमीन, वो आख़िरी समझदार आवाज़, फुसफुसाई — नाप ले, जल्दी। नंबर दे। और निकल जा।

मैंने जरीब ज़मीन में गाड़ी। मैंने रजिस्टर खोला, लालटेन की मद्धम रोशनी में। और मैंने नापना शुरू किया।

और तभी, उस छोटी-सी रोशनी के किनारे पर, अँधेरे में, मुझे कुछ दिखा।

कुछ आकृतियाँ।

मैंने सोचा — झाड़ियाँ। मिट्टी के ढेले। हाँ, ढेले होंगे। मैं उन्हें गिनता गया, जैसे नाप के दौरान आदमी आसपास की चीज़ें गिनता रहता है। एक ढेला, दो, तीन, चार...।

पर वो एक सीध में थे।

बराबर दूरी पर। कतार में। और हर एक... खड़ा था।

मेरी आँखें अँधेरे में धीरे-धीरे अभ्यस्त हुईं। और जो मैंने ढेले समझा था, वो ढेले नहीं थे, बाबू।

वो लोग थे।

खड़े हुए। चुपचाप। मेरी तरफ़ मुँह किए। एक नहीं, दो नहीं — दर्जनों। और उनके पीछे और, और उनके पीछे और — कतार-दर-कतार, अँधेरे में दूर तक फैले हुए। दुबले-पतले। फटे-पुराने कपड़ों में। हड्डियों के ढाँचे। औरतें, मर्द, बूढ़े, और... छोटे-छोटे बच्चे। सब खड़े। सब चुप। कोई हिल नहीं रहा था। कोई बोल नहीं रहा था।

बस... इंतज़ार कर रहे थे।

मेरे हाथ से जरीब छूट गई।

मैं हिल नहीं पा रहा था। मेरी साँस गले में अटक गई थी। मैं बस उन सैकड़ों चुप, इंतज़ार करती आँखों को देखता रहा, जो मुझे देख रही थीं।

और तभी, उनमें से सबसे आगे खड़ी एक आकृति — एक बूढ़ी औरत, इतनी दुबली कि उसका चेहरा बस खाल और हड्डी था — उसने एक क़दम आगे बढ़ाया। मेरी लालटेन की रोशनी में। और मैंने उसका चेहरा देखा।

उसमें ग़ुस्सा नहीं था, बाबू। नफ़रत नहीं थी। बदले की कोई आग नहीं थी।

उसमें सिर्फ़... उम्मीद थी। और एक अथाह, सदियों पुरानी थकान।

उसने अपने काँपते, सूखे हाथ मेरी तरफ़ बढ़ाए — हथेलियाँ ऊपर, जैसे कोई किसी खिड़की पर, किसी दफ़्तर के काउंटर पर, अपनी बारी की भीख माँगता हो। और उसने बहुत धीमे, बहुत नरमी से कहा —

"बाबू... आप आ गए।"

उसकी आवाज़ काँप रही थी, जैसे वो बरसों से ये कहना चाहती हो।

"अब हमें भी गिन लीजिए, बाबू।"

और उसके पीछे, उस पूरी कतार में, एक सरसराहट फैल गई। सैकड़ों आवाज़ें, धीमी, एक-दूसरे पर चढ़ती हुई, फुसफुसाती हुई —

"हमें गिनिए... हमारा नंबर... हमारा नाम लिखो, बाबू... हम भी तो हैं... हमें भी गिनो..."

और सबने अपने हाथ बढ़ा दिए। हथेलियाँ ऊपर। सैकड़ों हाथ। उस अँधेरे में, मेरी तरफ़।

और तब, बाबू, मुझे समझ आया।

ये लोग मुझे मारने नहीं आए थे।

ये लोग गिने जाने के लिए आए थे।

ये वो लोग थे जिन्हें किसी ने कभी गिना ही नहीं था। जिनका नाम कभी किसी काग़ज़ पर नहीं चढ़ा। जिनका कोई खसरा नहीं था, कोई खतौनी नहीं थी, कोई नंबर नहीं था। जो इस दुनिया में आए, और जिए, और मर गए — और किसी रजिस्टर में, किसी रिकॉर्ड में, कहीं भी, उनका कोई निशान नहीं बचा। जैसे वो कभी थे ही नहीं।

और वो बरसों से, शायद सौ साल से, इस पट्टी पर खड़े थे। एक कतार में। एक अमीन के इंतज़ार में। किसी ऐसे के इंतज़ार में, जो आए, और उन्हें एक नंबर दे। एक नाम दे। उन्हें किताब में चढ़ा दे। उन्हें... फिर से होने का हक़ दे दे।

और मैं आ गया था।

मेरी आँखों से आँसू बहने लगे, बाबू। मुझे नहीं पता क्यों। डर से, या उस अथाह दुख से जो उन सैकड़ों चुप चेहरों में था।

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