Pretika › Real Experiences › खसरा नंबर ज़ीरो
मिट्टी के नीचे
Pretika · Real Experiences · 7 मिनट
- Writer
- Pretika
- Story
- खसरा नंबर ज़ीरो
- Chapter
- 4 of 10
- Category
- Real Experiences
- Reading time
- 7 min
- Words
- 1204
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
सुबह जब मैं कोठरी से निकला, तो सबसे पहले मैंने भोला को ढूँढा।
वो नहीं था।
मैंने सुखई लाल से पूछा। बूढ़े ने नज़रें झुका लीं। "रात में उसके मामा आए थे, बाबू," उसने धीरे से कहा। "उसे अपने साथ ले गए। दूसरे गाँव। कह रहे थे, लड़के की तबीयत ठीक नहीं।"
"रात में? इतनी रात में कौन किसी को ले जाता है?"
सुखई लाल ने जवाब नहीं दिया। उसे जवाब देने की ज़रूरत नहीं थी। हम दोनों जानते थे कि भोला की तबीयत ठीक थी। भोला डर गया था। और उसके घरवाले उससे भी ज़्यादा डर गए थे। उन्होंने अपने लड़के को रात के अँधेरे में बेलवा से निकाल दिया था, इससे पहले कि वो उस पट्टी के और क़रीब आ जाए।
समझदार लोग थे।
काश मैं भी उतना समझदार होता।
मंगल मेरी तरफ़ देख रहा था। उसने मेरा चेहरा देखा — रात भर के जगे हुए, धँसी हुई आँखें, सूखे होंठ — और उसके माथे पर बल पड़ गए। "बाबू, तबीयत ठीक है? रात सोए नहीं क्या?"
"नींद नहीं आई," मैंने कहा। ये झूठ नहीं था। "मंगल, जरीब उठा। आज हम वो पट्टी नापेंगे।"
मंगल कुछ पल चुप रहा। फिर बोला, "बाबू, पटवारी कह रहा था—"
"पटवारी जो कह रहा था वो उसका डर है," मैंने उसकी बात काट दी। मेरी आवाज़ ज़रूरत से ज़्यादा सख़्त थी, और मुझे ख़ुद इसका एहसास था। मैं किसको समझा रहा था — मंगल को, या ख़ुद को? "हम सरकारी आदमी हैं। हम भूत-प्रेत की बातों पर काम नहीं रोकते। एक बंजर खेत है। मैं उसे नापूँगा, उसका नंबर दूँगा, और बेलवा की चकबंदी पूरी करके यहाँ से निकलूँगा। बस।"
"और रात वाली बात?" मंगल ने धीरे से पूछा। उसने सुन लिया था, शायद। या भाँप लिया था। "वो आवाज़ जो रात भर आती रही?"
मैं चुप हो गया।
"मैंने भी सुनी, बाबू," उसने कहा। "खट... खट... खट। पूरी रात। मैंने सोचा कोई किसान खेत में काम कर रहा है। पर सुबह मैंने देखा — रात कोई खेत में नहीं था।"
मैं उसकी आँखों में देखता रहा। और पहली बार, बारह साल में, मैंने अपने सबसे भरोसेमंद आदमी से झूठ बोला।
"हवा होगी," मैंने कहा। "चल, देर हो रही है।"
दिन का उजाला था। तेज़, साफ़, जाड़े का सुनहरा उजाला। सूरज सिर पर चढ़ रहा था।
और मैं आपको बताऊँ, बाबू — दिन के उजाले में आदमी कितना बहादुर हो जाता है। रात को जो डर उसे चूहे की तरह कँपाता है, दिन में वही डर एक बेवक़ूफ़ी लगने लगता है। मैं उस पट्टी की तरफ़ ऐसे बढ़ा जैसे मैं कोई जंग जीतने जा रहा हूँ। मेरे हाथ में मेरे बाप की पीतल की जरीब थी, धूप में चमकती हुई। मेरे पीछे मंगल था। और मेरे मन में एक ही बात थी — भूत दिन के उजाले में नहीं आते।
मैंने मेड़ पार की। और जैसे ही मेरा पैर उस पट्टी की मिट्टी पर पड़ा —
वो ठंड फिर आई।
नीचे से। ज़मीन से। धूप ऊपर थी, सिर जला रही थी, पर पैरों के नीचे की मिट्टी ऐसी ठंडी थी जैसे किसी कुएँ की तह। मैंने मंगल की तरफ़ देखा। उसने भी महसूस किया था। पर हम दोनों कुछ नहीं बोले।
"चल," मैंने कहा। "उत्तर-पश्चिम वाले कोने से शुरू करते हैं। तू सिरा पकड़।"
मंगल कोने पर खड़ा हो गया, जरीब का एक छोर थामे। मैंने दूसरा छोर लिया और सीध में चलना शुरू किया, कड़ियाँ गिनते हुए।
एक। दो। तीन। चार।
जरीब पूरी पड़ गई। मैंने मंगल को आवाज़ दी, उसने सिरा खींचा, मैंने एक तीली गाड़ी निशान के लिए, और हम आगे बढ़े। फिर से। एक। दो। तीन।
और तभी मैंने महसूस किया कि कुछ ठीक नहीं है।
ये पट्टी, बाबू — दूर से देखने में एक बीघे से ज़रा ही बड़ी थी। एक छोटा खेत। आधे घंटे में नप जाना चाहिए था। पर मैं चलता जा रहा था, चलता जा रहा था, और सामने वाला कोना — जो पास ही था, जो मैं अपनी आँखों से देख सकता था — वो पास नहीं आ रहा था।
मैं रुका। साँस फूल रही थी। मैंने पीछे मुड़कर देखा।
और मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
मंगल बहुत दूर था।
बहुत, बहुत दूर। इतना छोटा कि बस एक काली बिंदी लग रहा था, उस कोने पर, जरीब का सिरा थामे। हालाँकि मैंने बस... कितनी कड़ियाँ चली थीं? पाँच? छह? एक छोटे खेत में आदमी इतना दूर कैसे जा सकता है?
मैंने नीचे देखा, अपनी जरीब पर। और फिर मैंने वो देखा जिसने मेरे हाथ-पाँव ठंडे कर दिए।
मेरे पैरों के निशान। मिट्टी में। मेरे जूतों के निशान।
और उनके बिल्कुल बराबर, साथ-साथ चलते हुए — दूसरे निशान।
नंगे पैरों के निशान।
कई पैर। छोटे, बड़े। मेरे साथ-साथ चले थे, मेरी ही दिशा में। जैसे जब मैं नाप रहा था, तब कोई — कई लोग — मेरे साथ-साथ चल रहे थे। ठीक मेरे पीछे। और मैंने उन्हें देखा नहीं था।
"मंगल!" मैंने चीख कर आवाज़ दी।
जवाब नहीं आया।
"मंगल!"
मैं वापस उसकी तरफ़ दौड़ा। और जब मैं उसके पास पहुँचा, तो वो वहीं खड़ा था — पर जैसे पत्थर का बन गया हो। जरीब का सिरा अब भी उसके हाथ में था, पर उसकी आँखें ज़मीन पर गड़ी थीं, उस फटी हुई, सूखी मिट्टी पर। और उसके होंठ हिल रहे थे। बहुत धीरे। जैसे वो कुछ गिन रहा हो।
"मंगल," मैंने उसका कंधा पकड़कर हिलाया। "क्या हुआ?"
वो काँप उठा, जैसे नींद से जागा हो। उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में आँसू थे।
"बाबू," उसने फुसफुसाते हुए कहा, "नीचे... ज़मीन के नीचे..."
"क्या नीचे?"
"कोई गिन रहा है, बाबू।" उसकी आवाज़ काँप रही थी। "मिट्टी के नीचे से आवाज़ आ रही है। बहुत सारे लोग। साथ में गिन रहे हैं। एक... दो... तीन... चार... और रुकते नहीं। बस गिनते जा रहे हैं। जैसे... जैसे किसी का इंतज़ार कर रहे हों।"
और तभी एक हवा का झोंका आया। ठंडी हवा। और उस हवा में, बाबू — मैंने भी सुना।
बहुत धीमी। बहुत दूर, और बहुत पास, एक साथ। मिट्टी के नीचे से, या मेरे अपने कानों के अंदर से, पता नहीं। पर मैंने सुना।
एक... दो... तीन...
बहुत सारी आवाज़ें। फुसफुसाहट में। गिनती।
मंगल ने जरीब का सिरा छोड़ दिया।
वो ज़मीन पर गिरी, और मंगल पलटा और मेड़ की तरफ़ दौड़ा। ऐसे, जैसे उसके पीछे आग लगी हो। मैं अवाक खड़ा रह गया। उसने मेड़ पार की, उस पार की हरी घास पर पहुँचा, और तब रुककर पीछे मुड़ा। उसका चेहरा सफ़ेद था, और वो हाँफ रहा था।
"बाहर आ जाइए, बाबू!" उसने चिल्लाकर कहा। "इसे छोड़ दीजिए! ये किसी की नहीं है! इसे छोड़ दीजिए!"
मैं वहीं खड़ा था। पट्टी के बीच में। मेरे चारों तरफ़ सूखी, फटी मिट्टी। और मेरे पैरों के पास, मिट्टी में, मेरे बाप की जरीब पड़ी थी।
और तभी मेरी नज़र आसमान पर पड़ी।
सूरज।
मैं जब इस पट्टी में आया था, तब सुबह के दस बजे थे। सूरज पूरब में था, सिर्फ़ चढ़ रहा था। मैंने मुश्किल से... आधा घंटा? पौन घंटा यहाँ बिताया होगा।
पर सूरज अब सिर के ऊपर से बहुत आगे निकल चुका था। पश्चिम की तरफ़ ढल रहा था।
दोपहर बीत चुकी थी।
घंटे, बाबू। कई घंटे। जो मुझे आधे घंटे जैसे लगे थे, वो कई घंटे थे। मैं इस पट्टी में, इस एक बीघे की पट्टी में, आधा दिन बिता चुका था — और मुझे पता ही नहीं चला।
मैंने जरीब उठाई। हाथ काँप रहे थे। और मैं मेड़ की तरफ़ चला — तेज़, और तेज़, फिर लगभग दौड़ते हुए। और मेड़ पार करके जब मैं उस पार की गीली, ज़िंदा घास पर पहुँचा, तो मेरी टाँगें जवाब दे गईं और मैं वहीं बैठ गया।
मंगल मेरे पास आया। उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा। और बहुत देर तक हम दोनों कुछ नहीं बोले।