Pretika › Real Experiences › खसरा नंबर ज़ीरो
जो नापेगा, वो भरेगा
Pretika · Real Experiences · 10 मिनट
- Writer
- Pretika
- Story
- खसरा नंबर ज़ीरो
- Chapter
- 3 of 10
- Category
- Real Experiences
- Reading time
- 10 min
- Words
- 1922
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
मैं हँसा।
मुझे माफ़ करना, पर मैं उस वक़्त हँसा। क्योंकि एक चकबंदी अमीन के लिए ये बात उतनी ही बेतुकी है जितनी किसी डॉक्टर से ये कहना कि एक आदमी बिना दिल के ज़िंदा है।
हर ज़मीन नक़्शे में होती है। ये पूरे काम की बुनियाद है। पूरे हिंदुस्तान की ज़मीन का एक-एक टुकड़ा कहीं न कहीं दर्ज है — किसी खसरे में, किसी खतौनी में, किसी शजरे में। अंग्रेज़ों ने जब बंदोबस्त किया था, तो एक-एक इंच नापा था। आज़ादी के बाद भी नापा गया। ज़मीन का "नक़्शे में न होना" — ऐसा होता ही नहीं।
"भोला," मैंने हँसते हुए कहा, "नक़्शे में हर ज़मीन होती है। बस इसका नंबर तुझे नहीं पता होगा। चल, मैं अभी बताता हूँ।"
मैंने मंगल को इशारा किया। हम मेड़ पार करके उस ख़ाली ज़मीन की तरफ़ बढ़े। भोला मेड़ पर ही खड़ा रहा। मैंने मुड़कर देखा — वो हमें ऐसे देख रहा था जैसे हम किसी आग में जा रहे हों।
जैसे ही मेरा पैर उस पट्टी की मिट्टी पर पड़ा, मुझे एक चीज़ महसूस हुई।
ठंड।
अब जाड़े का मौसम था, हर तरफ़ ठंड थी। पर ये अलग ठंड थी। ये नीचे से आ रही थी। ज़मीन से। जैसे उस पट्टी के नीचे, मिट्टी के नीचे, कोई ऐसी जगह हो जहाँ कभी सूरज न पहुँचा हो। मेरे पैरों के तलवे ठंडे पड़ने लगे। मंगल ने भी एक पल को क़दम रोका — मैंने देखा, उसके चेहरे पर भी कुछ था। पर हम दोनों कुछ बोले नहीं। शायद दोनों को शर्म थी कि एक बंजर खेत से डर लगे।
मैंने जरीब निकाली।
"चल मंगल। नापते हैं। अभी पता चल जाएगा इसका रक़बा, इसका नंबर सब।"
मंगल ने जरीब का एक सिरा थामा और एक कोने पर खड़ा हो गया। मैंने दूसरा सिरा थामा और चलना शुरू किया, कड़ियाँ गिनते हुए — एक, दो, तीन...।
और यहीं पर, बाबू, उस गाँव ने मुझसे पहली बार बात की।
जरीब पूरी पड़ गई। एक छोर से दूसरे छोर तक, पूरी जरीब। मैंने हिसाब लगाया। ये पट्टी जितनी दिख रही थी, उससे... बड़ी थी।
मैंने सोचा, नज़र का धोखा है। ख़ाली ज़मीन छोटी लगती है। फिर से नापते हैं।
मैंने मंगल को रुकने को कहा और दोबारा शुरू किया। उसी कोने से। उसी सीध में।
इस बार जरीब और आगे गई। पहली बार से और आगे।
मैं रुका। मेरी साँस तेज़ हो गई थी। मैंने पीछे मुड़कर देखा — मंगल वहीं खड़ा था, उसी कोने पर, जरीब का सिरा थामे। और मेरे और उसके बीच की दूरी... बढ़ गई थी। मैं उतने ही क़दम चला था, उतनी ही कड़ियाँ गिनी थीं — पर मैं उससे और दूर खड़ा था।
"मंगल!" मैंने आवाज़ दी। "तू हिला तो नहीं?"
मंगल ने सिर हिलाया। उसका चेहरा डरा हुआ था। "नहीं बाबू। मैं यहीं हूँ। हिला नहीं।"
मैंने जरीब समेटी। हाथ काँप रहे थे। मैंने उन्हें रोकने की कोशिश की। मैं एक चकबंदी अमीन था, तीस साल का तजुर्बा था मुझे, मैं इस तरह नहीं काँप सकता था।
"बस," मैंने ख़ुद से कहा। "धूप तेज़ है, थकान है। आज बस। कल फिर।"
पर ये झूठ था। न धूप तेज़ थी, न इतनी थकान थी।
सच ये था कि मैं डर गया था। और मैं ये मानना नहीं चाहता था।
हम मेड़ की तरफ़ लौटे। भोला अब भी वहीं खड़ा था। और जब मैं उसके पास पहुँचा, तो उसने एक अजीब बात कही। उसने मेरी तरफ़ नहीं देखा। उसने उस पट्टी की तरफ़ देखा, मेरे पीछे, और धीरे से बोला —
"अब उसने आपको देख लिया, बाबू।"
उस शाम मैं सीधा सुखई लाल के पास गया।
वो अपने आँगन में चारपाई पर बैठा था, एक कटोरी में तंबाकू मल रहा था। मुझे देखकर उसके हाथ रुक गए। और मुझे लगा — वो जानता था कि मैं ये बात पूछने आऊँगा। वो शायद तीन दिन से इसी का इंतज़ार कर रहा था।
"सुखई लाल," मैंने कहा, और चारपाई पर उसके सामने बैठ गया। "बेलवा कलाँ और खुर्द के बीच जो ख़ाली पट्टी है — बंजर ज़मीन — उसका खसरा नंबर क्या है?"
सुखई लाल ने तंबाकू नीचे रख दी। उसने अपनी पुरानी, धुँधली आँखों से मुझे देखा। और बहुत देर तक कुछ नहीं बोला।
"बाबू," आख़िर में उसने कहा, "आप उस पट्टी को छोड़ दीजिए।"
"छोड़ दूँ? कैसे छोड़ दूँ? मैं चकबंदी अमीन हूँ। पूरे गाँव की नाप मेरे ज़िम्मे है। एक-एक इंच मुझे दर्ज करना है। मैं एक बीघा ज़मीन कैसे छोड़ दूँ?"
उसने एक लंबी साँस ली। फिर उठा, अंदर गया, और थोड़ी देर बाद एक चीज़ लेकर आया।
वो था पुराना बंदोबस्त का रिकॉर्ड। बहुत पुराना। काग़ज़ पीले पड़ चुके थे, किनारे से गल रहे थे, और उन पर लिखी इबारत इतनी पुरानी थी कि पढ़ने में मुश्किल होती थी। ये वही मिसल थी जो अंग्रेज़ों के ज़माने में, या उसके भी पहले के किसी बंदोबस्त में तैयार हुई होगी।
उसने उसे मेरे सामने रखा और एक पन्ना खोला।
"देखिए, बाबू," उसने काँपती उँगली से इशारा किया। "खसरा नंबर देखिए।"
मैंने देखा।
ये बेलवा के खसरों की फ़ेहरिस्त थी। और नंबर सिलसिलेवार चल रहे थे — खसरा नंबर इक्कीस, बाईस, तेईस। हर नंबर के सामने रक़बा, किस्म, मालिक का नाम।
और बीच में, खसरा नंबर तेईस और चौबीस के बीच में... एक लकीर थी।
एक मोटी, काली लकीर। किसी ने वहाँ एक पूरी एंट्री पर कलम फेर दी थी। काटा था। उस कटी हुई लकीर के नीचे जो लिखा था, वो धुँधला था, पर मैं अब भी कुछ हर्फ़ पढ़ सकता था। और जो मैं पढ़ पाया, उससे मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
कटी हुई एंट्री में, "किस्म" वाले ख़ाने में, एक शब्द लिखा था जो मैंने अपनी पूरी सरकारी ज़िंदगी में किसी खसरे में नहीं देखा था।
लिखा था — "बेनाप।"
और रक़बा वाला ख़ाना ख़ाली था।
और मालिक वाला ख़ाना भी ख़ाली था।
बस एक चीज़ लिखी थी, हाशिए पर, बहुत बारीक हर्फ़ों में, जैसे किसी ने डरते-डरते लिखा हो। मैंने अपनी आँखें उस पर गड़ाईं। और जब मैंने उसे पढ़ा, तो आँगन की वो शाम की हवा अचानक रुक-सी गई।
हाशिए पर लिखा था —
"नापना मना है। जो नापेगा, वो भरेगा।"
मैंने सुखई लाल की तरफ़ देखा।
"ये क्या है?" मेरी आवाज़ भारी हो गई थी। "बेनाप का मतलब होता है ज़मीन जो नापी नहीं गई। पर हर ज़मीन नापी जाती है। और ये — 'जो नापेगा वो भरेगा' — ये किसने लिखा? इसका क्या मतलब?"
सुखई लाल ने रिकॉर्ड बंद कर दिया। उसने उसे ऐसे सीने से लगा लिया जैसे वो कोई जानवर हो जिसे वो खुला नहीं छोड़ना चाहता।
"बाबू," उसने कहा, और उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि मुझे झुककर सुनना पड़ा, "ये ज़मीन मेरे बाप के ज़माने से नहीं नापी गई। और मेरे बाप के बाप के ज़माने से भी नहीं। जब अंग्रेज़ बंदोबस्त करने आए थे, तब के एक अमीन ने इसे नापने की ज़िद की थी। उस अमीन का नाम मेरे दादा बताते थे।"
वो रुका।
"उस अमीन का नाम था — गिरधारी।"
"तो?"
"तो... गिरधारी ने इसे नापा, बाबू। पूरा नापा। नंबर भी दे दिया। खतौनी में चढ़ाने ही वाला था।" सुखई लाल की आँखें कहीं दूर देख रही थीं, जैसे वो कोई ऐसी चीज़ देख रहा हो जो वहाँ थी ही नहीं। "और उसके तीसरे दिन, गिरधारी इसी पट्टी पर मरा पाया गया, बाबू। बीच पट्टी में। आँखें खुली थीं। मुँह खुला था। जैसे कुछ देखकर मरा हो। और उसके हाथ में जरीब थी।"
"दिल का दौरा पड़ा होगा," मैंने कहा। पर मेरी आवाज़ में अब वो यक़ीन नहीं था।
"उसके बाद जो अमीन आया," सुखई लाल बोलता रहा, जैसे उसने मेरी बात सुनी ही न हो, "उसने इसे नापने से मना कर दिया। उसने मिसल में ये एंट्री काट दी। और हाशिए पर ये लिख दिया, ताकि उसके बाद आने वाला कोई बेवक़ूफ़ इसे फिर न नापे। तब से, बाबू, बेलवा में चकबंदी कभी पूरी नहीं हुई। हर बार कोई न कोई बहाना। कोई अमीन बीमार पड़ गया, किसी का तबादला हो गया, एक बार तो दफ़्तर में आग लग गई और सब काग़ज़ जल गए। बेलवा की नाप कभी मुकम्मल नहीं हुई।"
मैं चुप था।
"और आप जानते हैं ये क्यों होता है?" उसने मेरी आँखों में देखा। "क्योंकि ये पट्टी नापी जाना नहीं चाहती, बाबू। ये किसी की नहीं है। इसे किसी का बनना नहीं है। और जो आदमी इसे किसी का बनाने की कोशिश करता है — इसे नंबर देने की, मालिक देने की — उसे ये अपना बना लेती है।"
रात गहरा रही थी। सुखई लाल के आँगन में एक ढिबरी जल रही थी, और उसकी लौ काँप रही थी, हालाँकि हवा बिल्कुल नहीं थी।
"मेरी मानिए, बाबू," उसने आख़िर में कहा, और पहली बार उसकी आवाज़ में मिन्नत थी। "पूरे गाँव की नाप कीजिए। बस उस पट्टी को छोड़ दीजिए। रजिस्टर में इतना-सा फ़र्क़ रह जाएगा — दो-चार बिस्वा का। कौन देखता है? ऊपर वाले अफ़सर को क्या मतलब? आप उस फ़र्क़ को छुपा दीजिए। बेलवा की नाप पूरी कर दीजिए, और चले जाइए। इस पट्टी को मत छेड़िए।"
अब आप सोचिए, बाबू। आप मेरी जगह होते तो क्या करते?
एक बूढ़ा पटवारी एक बंजर खेत के बारे में डरावनी कहानी सुना रहा है। सौ साल पुरानी मौत की बात कर रहा है। और मुझसे कह रहा है कि मैं अपना काम — अपना ईमान — बेच दूँ। मुझसे, जिसने तीस साल में कभी एक बिस्वा का घपला नहीं किया, वो कह रहा है कि मैं जान-बूझकर ग़लत नाप दर्ज करूँ। एक पूरी ज़मीन को छुपा दूँ। उसे कभी नापूँ ही नहीं।
मेरी पूरी ज़िंदगी का उसूल यही था — ज़मीन झूठ नहीं बोलती।
और अब, ज़िंदगी में पहली बार, कोई मुझसे कह रहा था कि मैं ज़मीन से झूठ बुलवाऊँ।
मेरे अंदर दो आदमी लड़ रहे थे, बाबू। एक वो अमीन जो डर गया था — जिसने उस पट्टी की ठंडी मिट्टी पर पैर रखा था, जिसकी जरीब बढ़ती चली गई थी, जिसने सुखई लाल की आँखों में सच देखा था। वो आदमी कह रहा था — मान जा। छोड़ दे। निकल जा यहाँ से।
और दूसरा आदमी — वो घमंडी अमीन, वो तीस साल का तजुर्बा, वो आदमी जिसके लिए नाप एक इबादत थी — वो कह रहा था — ये सब बकवास है। ये अंधविश्वास है। एक पढ़ा-लिखा सरकारी आदमी होकर तू एक बंजर खेत से डर जाएगा? तू मिसल में एक झूठी एंट्री छोड़ देगा, सिर्फ़ इसलिए कि एक बूढ़े ने तुझे डरा दिया? तेरे बाप की जरीब तेरे हाथ में है, और तू भागेगा?
मैंने उस रात फ़ैसला कर लिया।
मैं उस पट्टी को नापूँगा। पूरा। और मैं उसे नंबर दूँगा। और मैं ये साबित करूँगा कि ज़मीन सिर्फ़ ज़मीन है, और मौत सिर्फ़ इत्तेफ़ाक़।
मैंने सुखई लाल से कुछ नहीं कहा। बस उठा और अपनी कोठरी में आ गया।
और जब मैं लेटा, तो वो आवाज़ फिर आई।
खट... खट... खट...।
पर इस बार वो दूर नहीं थी।
इस बार वो मेरी कोठरी के ठीक बाहर थी।
मैं उठ बैठा। मेरा दिल ज़ोर से धड़क रहा था। मैंने दरवाज़े की तरफ़ देखा। बाहर अँधेरा था, जाड़े की काली रात। और उस अँधेरे में, मेरी कोठरी के ठीक बाहर, कोई लोहे की कोई चीज़ ज़मीन पर रख रहा था। फिर उठा रहा था। फिर थोड़ा आगे रखकर, फिर उठा रहा था।
खट... खट... खट...।
जैसे कोई नाप रहा हो।
जैसे कोई, अँधेरे में, मेरी कोठरी के बाहर की ज़मीन को — जरीब से नाप रहा हो।
मैंने हिम्मत करके आवाज़ दी। "कौन है?"
आवाज़ रुक गई।
पूरी तरह।
और उस पूरी ख़ामोशी में, मुझे एक चीज़ सुनाई दी जो मैं चाहता हूँ कि आप कभी न सुनें, बाबू। मेरी कोठरी के दरवाज़े के उस पार, बिल्कुल पास से, किसी ने बहुत धीमे — फुसफुसाते हुए — एक सवाल पूछा।
एक ऐसा सवाल जो एक अमीन रोज़ पूछता है। जो मैंने ख़ुद हज़ारों बार पूछा था, हर गाँव में, हर खेत पर। वही सवाल, उसी लहजे में, पर एक ऐसी आवाज़ में जो किसी ज़िंदा इंसान की नहीं थी —
"इस ज़मीन का खसरा नंबर क्या है, बाबू?"
मैंने उस रात सुबह तक दिया जलाए रखा। और दरवाज़ा नहीं खोला।
पर मैं जानता था।
मैं जानता था कि सुबह होते ही मैं अपनी जरीब उठाऊँगा, और उस पट्टी पर जाऊँगा।
क्योंकि अब बात नाप की नहीं रह गई थी।
अब उसने मुझे बुला लिया था।