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तीन बिस्वा
Pretika · Real Experiences · 5 मिनट
- Writer
- Pretika
- Story
- खसरा नंबर ज़ीरो
- Chapter
- 2 of 10
- Category
- Real Experiences
- Reading time
- 5 min
- Words
- 876
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
सुबह मैंने अपने जरीबकश मंगल के साथ काम शुरू किया।
मंगल मेरे साथ बारह साल से था। मुझसे भी ज़्यादा अनुभवी, कुछ मामलों में। उसके हाथ में जरीब ऐसे चलती थी जैसे सपेरे के हाथ में बीन। उसके साथ मैंने एक स्थानीय लड़का भी रख लिया था — भोला। पंद्रह-सोलह साल का होगा, पटवारी का ही कोई दूर का रिश्तेदार, जिसे रोज़ी की ज़रूरत थी और जो रास्ते-खेत सब जानता था। तीन हम, और एक खसरा रजिस्टर।
पहला दिन ठीक रहा। दूसरा भी। हम पूरब के सिरे से शुरू हुए — खेत-दर-खेत, मेड़-दर-मेड़। नापते जाते, खसरा नंबर मिलाते जाते, रजिस्टर में दर्ज करते जाते। हर खेत का अपना नंबर — खसरा नंबर एक, दो, तीन, चार। हर नंबर के सामने माल��क का नाम, रक़बा, किस्म। ये काम जितना उबाऊ लगता है, उतना ही नशीला होता है, बाबू। एक नशा है इसमें। जब पूरा गाँव धीरे-धीरे आपके रजिस्टर में उतरता चला आता है — हर इंच, हर लकीर — तो लगता है जैसे आप उस गाँव को नए सिरे से जन्म दे रहे हों।
तीसरे दिन शाम को, जब मैं कोठरी में बैठकर हिसाब जोड़ रहा था, तो पहली बार वो हुआ।
मैंने उस दिन तक जितने खेत नापे थे, उनका जोड़ लगाया, और फिर उसे पुराने बंदोबस्त के आँकड़े से मिलाया। आपको बताऊँ, ये मिलान रोज़ नहीं होता, पर मैं पुरानी आदत का आदमी हूँ। मैं रोज़ अपना काम जाँचता हूँ।
जोड़ नहीं बैठा।
मेरी नाप में, उस दिन तक, तीन बिस्वा ज़मीन ज़्यादा थी।
अब आप कहेंगे, तीन बिस्वा क्या होते हैं! एक छोटे आँगन भर। पर बाबू, चकबंदी में तीन बिस्वा का फ़र्क़ ऐसा है जैसे डॉक्टर के हिसाब में एक धड़कन का फ़र्क़। हो ही नहीं सकता। अगर है, तो कहीं ग़लती है। मेरी ग़लती है।
मैंने मन को समझाया — पहला दिन है, इलाक़ा नया है, हो गई होगी कोई चूक। कल फिर से नापेंगे।
मैंने मंगल को आवाज़ दी। उसे बताया। मंगल थोड़ा हैरान हुआ, क्योंकि वो जानता था कि मेरे साथ बारह साल में ऐसा शायद ही कभी हुआ हो। पर उसने भी यही कहा — "मिल जाएगा, बाबू। कल दोबारा देख लेंगे।"
मैंने रजिस्टर बंद किया।
और जैसे ही मैंने रजिस्टर बंद किया, मेरी नज़र भोला पर पड़ी।
वो दरवाज़े के पास बैठा था। और वो हमारी बात सुन रहा था। और उसका चेहरा... उस पंद्रह साल के लड़के का चेहरा सफ़ेद पड़ गया था।
"क्या हुआ?" मैंने पूछा।
उसने कुछ नहीं कहा। बस उठा और चला गया।
अगले दिन हमने उन्हीं खेतों को दोबारा नापा। एक-एक खेत। बहुत ध्यान से। मंगल जरीब डालता, मैं ख़ुद कड़ियाँ गिनता।
जोड़ फिर नहीं बैठा।
पर इस बार बात और अजीब थी।
इस बार ज़्यादा तीन बिस्वा नहीं थे। इस बार... चार थे।
समझिए मेरी बात। मैंने उन्हीं खेतों को दोबारा नापा, जो कल नापे थे। ज़मीन तो वही थी। कल तीन बिस्वा ज़्यादा निकली थी, आज चार। मतलब रात-दिन में, उसी ज़मीन में, एक बिस्वा और बढ़ गया।
ज़मीन बढ़ती नहीं है, बाबू। ज़मीन कहीं से आती नहीं। ये मेरी पूरी ज़िंदगी का पहला सबक़ था — ज़मीन झूठ नहीं बोलती, और ज़मीन बढ़ती नहीं।
मैं उस पूरी रात सोया नहीं।
मैंने रजिस्टर के सामने बैठकर एक-एक खसरा नंबर पर उँगली रखकर हिसाब किया। बार-बार। और तभी मुझे एक बात समझ आई, जिसने मेरी रीढ़ में पहली बार एक ठंडी लकीर खींची।
फ़र्क़ हर खेत में बराबर नहीं फैला था।
ये जो ज़्यादा ज़मीन निकल रही थी, ये पूरे गाँव में बिखरी हुई नहीं थी। ये एक ही जगह से आ रही थी। एक ही दिशा से। पूरब-दक्खिन के कोने से। उस तरफ़ से, जहाँ बेलवा कलाँ ख़त्म होता था और बेलवा खुर्द शुरू होता था।
दोनों गाँवों के बीच की मेड़ से।
सुबह मैंने सबसे पहला काम ये किया कि मंगल और भोला को लेकर सीधा उसी मेड़ पर गया।
रास्ते में मैंने देखा कि भोला धीमा पड़ता जा रहा है। पहले वो आगे-आगे चलता था, रास्ता दिखाता था। आज वो पीछे रह गया था। और जब हम मेड़ के क़रीब पहुँचे, तो वो रुक गया।
"आगे नहीं चलूँगा, बाबू," उसने कहा।
मैं रुका। "क्यों?"
उसने मेड़ के उस पार की एक ज़मीन की तरफ़ इशारा किया। "उधर नहीं जाते।"
मैंने उधर देखा।
बेलवा कलाँ और बेलवा खुर्द के ठीक बीच में, मेड़ के उस पार, एक ज़मीन का टुकड़ा था। एक पट्टी। आयताकार, बहुत बड़ी नहीं — शायद एक बीघे से थोड़ी ज़्यादा। और बाक़ी सारे खेतों के बीच वो ऐसी दिखती थी जैसे... जैसे किसी ने हरे कपड़े पर एक भूरा दाग़ छोड़ दिया हो।
चारों तरफ़ खेत हरे थे। जाड़े की गेहूँ की फ़सल लहरा रही थी। और बीच में वो पट्टी — बंजर। सूखी। न कोई फ़सल, न घास, न कोई पेड़। बस सख़्त, फटी हुई मिट्टी, जैसे वहाँ सालों से एक बूँद पानी न गिरा हो। हालाँकि उसके चारों तरफ़ की ज़मीन गीली और हरी थी।
मैंने ग़ौर किया — किसी भी किसान ने अपना खेत उस पट्टी से सटाकर नहीं जोता था। हर खेत और उस पट्टी के बीच एक पतली-सी ख़ाली ज़मीन छोड़ी गई थी। जैसे कोई उससे एक हाथ की दूरी रखता हो। जैसे लोग उसे छूना न चाहते हों।
"ये किसका खेत है?" मैंने पूछा।
भोला चुप रहा।
"भोला। ये किसका खेत है?"
उसने धीरे से कहा, "किसी का नहीं।"
"किसी का नहीं? हर ज़मीन किसी न किसी की होती है। सरकार की होती है तो भी किसी की होती है। इसका खसरा नंबर क्या है?"
और तब भोला ने जो कहा, वो मैं ज़िंदगी भर नहीं भूलूँगा।
उसने कहा — "इसका कोई नंबर नहीं है, बाबू। ये नक़्शे में नहीं है।"