PretikaReal Experiencesखसरा नंबर ज़ीरो

ज़मीन झूठ नहीं बोलती

Pretika · Real Experiences · 6 मिनट

Writer
Pretika
Story
खसरा नंबर ज़ीरो
Chapter
1 of 10
Category
Real Experiences
Reading time
6 min
Words
1146
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

ज़मीन झूठ नहीं बोलती।

ये सबसे पहली बात है जो इस पेशे में आदमी सीखता है। और अगर ठीक से सीख ले, तो शायद आख़िरी भी यही होती है।

आदमी झूठ बोलता है। काग़ज़ झूठ बोलते हैं। पटवारी की खतौनी में दर्ज नाम झूठ बोलते हैं, रजिस्ट्री के पुर्ज़े झूठ बोलते हैं, और कचहरी में खड़ा गवाह तो ख़ैर झूठ बोलने के लिए ही खड़ा होता है। मैंने तीस साल इसी दुनिया में काटे हैं — मेड़ों के झगड़े, बँटवारे के मुक़दमे, भाई का भाई के गले पर हँसिया रख देना, सिर्फ़ इसलिए कि नक़्शे में एक लकीर इधर से उधर हो जाए। इस सारे झूठ के बीच एक ही चीज़ थी जिस पर मैं आँख मूँदकर भरोसा करता था।

ज़मीन।

आप उसे नापिए। वो जितनी है, उतनी निकलेगी। न एक बिस्वा कम, न एक बिस्वा ज़्यादा। जरीब की कड़ियाँ गिनिए, करम भर लीजिए, हिसाब जोड़िए — और जवाब हमेशा वही आएगा जो ज़मीन ने तय कर रखा है। पूरे गाँव की नाप जब बैठती है, तो रत्ती भर का फ़र्क़ नहीं रहता। यही इस काम की इज़्ज़त है, बाबू। और यही इसका सुकून।

तीस साल मैंने यही समझा।

और फिर मैं बेलवा गया।

आज जो बात मैं आपको सुनाने जा रहा हूँ, उसे सुनकर शायद आप हँसें। शायद कहें — बूढ़ा सठिया गया है। मैं बुरा नहीं मानूँगा। तीस साल पहले अगर कोई मुझे ये सुनाता, तो मैं भी यही कहता। पर एक गुज़ारिश है। आज रात, जब आप ये सुनकर अपने घर की छत पर जाएँ, या खेत की मेड़ पर, या किसी ख़ाली पड़ी ज़मीन के पास से गुज़रें — तो एक बार रुककर सोचिएगा।

कि जिस ज़मीन पर आप खड़े हैं, वो किसके नाम दर्ज है।

और जो दर्ज नहीं है... वो किसके नाम है।

मेरा नाम बताने से कोई फ़ायदा नहीं। गाँव वाले मुझे बस "अमीन साहब" कहते थे, या "बाबू।" और इस कहानी में मेरा नाम सबसे कम ज़रूरी चीज़ है। ज़रूरी ये है कि मैं चकबंदी का अमीन था। आप समझ रहे हैं न चकबंदी क्या होती है?

जब किसी गाँव की ज़मीन सालों में टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर जाती है — किसी के दस खेत दस कोनों में, किसी की ज़मीन के बीच में किसी और का रास्ता, किसी की मेड़ किसी के आँगन में — तब सरकार पूरे गाँव की ज़मीन दोबारा नापती है। एक-एक इंच। फिर सबको एक जगह, ठीक से, बराबर बाँट देती है। इसे चकबंदी कहते हैं। और इसमें जो आदमी ज़मीन नापता है, उसे चकबंदी अमीन कहते हैं।

मैं वही था।

ये जो काम है न, ये भगवान का काम है, और शैतान का भी। क्योंकि इसमें आपके हाथ में जरीब होती है, और जरीब के एक झटके से किसी ग़रीब का आधा खेत किसी ज़मींदार के चक में जा सकता है। मैंने ज़िंदगी में बहुत अमीन देखे जो इसी झटके के दाम लेते थे। मैं नहीं लेता था। ये घमंड नहीं, सच बता रहा हूँ। मेरे लिए नाप एक इबादत थी। मैं जब किसी गाँव में जाता, तो दो चीज़ें साथ रखता — एक मेरी पीतल की पुरानी जरीब, जो मेरे बाप की थी, और एक लाल कपड़े में बँधा मेरा खसरा रजिस्टर। बाक़ी सब बदलता रहा, ये दोनों मेरे साथ रहे।

उस साल जाड़े की शुरुआत थी, जब मेरा तबादला बेलवा हुआ।

बेलवा दो गाँव थे, असल में। बेलवा कलाँ और बेलवा खुर्द। बड़ा बेलवा और छोटा बेलवा। एक ही नाम के दो गाँव, एक ही मेड़ से जुड़े हुए, जैसे एक ही पेट से जने दो भाई — पर आपस में ऐसे लड़ते जैसे जनम के दुश्मन हों। पूरब का इलाक़ा था, जहाँ सड़क ख़त्म होती थी और कच्चा रास्ता शुरू होता था, और कच्चे रास्ते के बाद बस खेत थे — दूर तक, हरे और पीले, और बीच-बीच में पीपल और महुए के बूढ़े पेड़, जो वहाँ तब से खड़े थे जब शायद किसी ने उस गाँव का नाम भी न रखा था।

मैं जब वहाँ पहुँचा, तो शाम ढल रही थी।

मैं आपको सच बताऊँ — पहली नज़र में बेलवा में कुछ भी अजीब नहीं था। और मैं चाहता हूँ कि आप ये बात ध्यान से समझें, क्योंकि यही इस कहानी की सबसे डरावनी बात है। कोई टूटी हवेली नहीं थी। कोई सूखा कुआँ नहीं था जिसके पास जाने से लोग डरते हों। कोई वीरान शमशान नहीं था। बेलवा एक बिल्कुल आम गाँव था। हैंडपंप पर औरतें पानी भर रही थीं और आपस में हँस रही थीं। एक प्राइमरी स्कूल था जिसकी दीवार पर नीले रंग से गिनती लिखी थी। चौराहे पर एक चाय की दुकान थी, जहाँ एक रेडियो बज रहा था और कुछ बूढ़े बैठे बीड़ी पी रहे थे। बच्चे एक टूटे साइकिल के पहिये को डंडे से धकेलते हुए दौड़ रहे थे।

ज़िंदगी थी वहाँ। पूरी ज़िंदगी।

बस... एक चीज़ थी।

जब मेरी जीप उस चौराहे से गुज़री, तो वो सारे बूढ़े जो बीड़ी पी रहे थे, एक पल के लिए चुप हो गए। और मुझे देखने लगे। ऐसे नहीं जैसे गाँव में कोई अजनबी आता है तो देखते हैं — उत्सुकता से। ऐसे, जैसे... जैसे वो जानते हों कि मैं क्यों आया हूँ। और जैसे उन्हें इस बात का अफ़सोस हो।

मैंने उस वक़्त इस पर ध्यान नहीं दिया। शाम थी, मैं थका हुआ था, और बूढ़े लोग वैसे भी ऐसे ही देखते हैं। मैंने सोच लिया कि मन का वहम है।

काश। काश मैंने उसी वक़्त जीप मोड़ ली होती।

मेरे रुकने का इंतज़ाम पटवारी के घर के पास एक कोठरी में था। और पटवारी का नाम था सुखई लाल।

सुखई लाल बूढ़ा हो चला था। रिटायरमेंट में बस एकाध साल बचा होगा। दुबला, झुका हुआ, सफ़ेद बाल, और आँखें ऐसी जैसे उन्होंने इस गाँव में बहुत कुछ देखा हो और किसी को कुछ बताया न हो। उसके हाथ काँपते थे — मैंने सोचा बुढ़ापा है। बाद में समझ आया, बुढ़ापा अकेली वजह नहीं थी।

जब मैं पहुँचा, तो वो दरवाज़े पर ही खड़ा था, जैसे मेरा इंतज़ार कर रहा हो। उसने हाथ जोड़े, "राम-राम बाबू। आ गए?"

"राम-राम। हाँ, आ गया," मैंने कहा। "कल से नाप शुरू कर देंगे। पुराना बंदोबस्त, खसरा, खतौनी, शजरा — सब तैयार रखना।"

उसने सिर हिलाया। पर मैंने देखा कि सुनते ही उसके चेहरे पर एक चीज़ आई और चली गई। बहुत हल्की-सी। जैसे किसी ने उसके सीने पर हाथ रख दिया हो।

"सब तैयार है, बाबू," उसने धीरे से कहा। "पुराना सब रखा है। बस... ।"

"बस क्या?"

वो कुछ कहते-कहते रुक गया। फिर बोला, "कुछ नहीं। थके होंगे। खाना लगवाता हूँ।"

मैंने तब इस "बस" पर भी ध्यान नहीं दिया।

रात को खाना खाकर मैं अपनी कोठरी में लेटा। बाहर जाड़े की चुप्पी थी। दूर कहीं एक कुत्ता रोया, फिर चुप हो गया। और उस चुप्पी में मुझे एक आवाज़ सुनाई दी, जिस पर तब मैंने ग़ौर नहीं किया, पर जो आगे चलकर मेरे सपनों में बार-बार आने वाली थी।

एक धीमी, लगातार आवाज़। खट... खट... खट...।

जैसे दूर कहीं कोई लोहे की कोई चीज़ ज़मीन पर रख रहा हो। फिर उठा रहा हो। फिर रख रहा हो।

मैंने सोचा, कोई किसान होगा, रात में खेत में पानी लगा रहा होगा, कुछ ठोक-पीट रहा होगा। करवट ली और सो गया।

मुझे क्या पता था कि उस वक़्त खेतों में कोई नहीं था।

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