भाग 5: अंतिम सांस और बीहड़ का सन्नाटा (अंतिम भाग)
Yogesh Kumar Maurya · Horror · 8 मिनट
- Writer
- Yogesh Kumar Maurya
- Story
- शावरा
- Chapter
- 5 of 5
- Category
- Horror
- Reading time
- 8 min
- Words
- 1459
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
हवेली का मलबा शांत हो चुका था। बीहड़ के आसमान में छाया हुआ घना, काला कोहरा भी सुबह की ठंडी हवा के साथ छँटने लगा था। विक्रांत अपनी जीप के बोनट से टेक लगाए खड़ा था। उसका पूरा शरीर बुरी तरह थक चुका था, वर्दी खून और मिट्टी से सनी थी, लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब सी तसल्ली थी। अघोरी भैरवनाथ का वह खौफनाक 'शावरा ग्रंथ' अब पूरी तरह जलकर राख हो चुका था।
जगतार ने काँपते हाथों से सिगरेट जलाई और विक्रांत की तरफ बढ़ाई। "सर... क्या सच में सब ख़त्म हो गया? क्या अब शावरा या वह अघोरी कभी वापस नहीं आएंगे?"
विक्रांत ने सिगरेट का एक लंबा कस लिया और धुएँ को हवा में उड़ाते हुए बीहड़ की पहाड़ियों को देखा। "तंत्र की जड़ उसकी विद्या और अघोरी की कटी हुई उँगली में थी, जगतार। ग्रंथ भस्म हो चुका है और उँगली गंगाजल में जलकर स्वाहा हो गई। अब यहाँ सिर्फ एक आम जंगल बचा है... और उस खौफनाक अतीत की यादें।"
दोनों सिपाहियों को साथ लेकर विक्रांत जीप में बैठा और थाने की ओर चल पड़ा। रास्ते में गाँव के मुहाने पर लोग अपने-अपने घरों के दरवाजों से झाँक रहे थे। रात भर जो चीखें और धमाके पूरे गाँव में गूँजे थे, उन्होंने हर इंसान को सहमा दिया था। लेकिन जब उन्होंने देखा कि दरोगा विक्रांत और उसके साथी ज़िंदा लौट आए हैं, तो गाँव वालों के चेहरों पर राहत की एक लहर दौड़ गई।
थाने पहुँचते ही विक्रांत ने सबसे पहले जिला पुलिस मुख्यालय को फोन मिलाया। उसने पूरी घटना की एक विस्तृत, लेकिन कानून के दायरे में आने वाली रिपोर्ट दी—जिसमें उसने सरपंच शिवनाथ और उसके गिरोह द्वारा अवैध गतिविधियों, आपराधिक साजिशों और पुलिसकर्मियों पर किए गए जानलेवा हमले का ब्यौरा दिया। तंत्र और पिशाच वाली बातों को उसने कागजी रिपोर्ट से दूर ही रखा, क्योंकि वह जानता था कि कानून की फाइलों में 'शावरा' के लिए कोई जगह नहीं थी।
दोपहर के एक बज रहे थे।
अस्पताल से खबर आई कि अमित की हालत अब पूरी तरह स्थिर है। विक्रांत उससे मिलने अस्पताल पहुँचा। अमित बेड पर बैठा खिड़की से बाहर देख रहा था। उसके चेहरे पर अब वह डरावना पीलापन नहीं था, हालाँकि उसके आँखों के नीचे के काले घेरे बता रहे थे कि बीती रातों के खौफ को भूलने में उसे अभी लंबा वक्त लगेगा।
"कैसी तबियत है अब?" विक्रांत ने पास आकर पूछा।
अमित ने मुड़कर देखा और विक्रांत को देखते ही उसके चेहरे पर सम्मान और कृतज्ञता के भाव आ गए। "साहब... आपने मुझे और इस पूरे गाँव को उस नर्क से बचा लिया। अगर आप कल रात उस ग्रंथ को न जलाते, तो आज इस गाँव में कोई ज़िंदा नहीं बचता।"
"तुम्हारे पिता का रास्ता गलत था, अमित," विक्रांत ने शांत स्वर में कहा। "लेकिन तुमने उस तांबे की डिब्बी से मेरी जान बचाई। अगर तुम वह डिब्बी न छोड़ते, तो शावरा का अंत कभी नहीं हो पाता।"
अमित की आँखों में आँसू आ गए। "साहब, मेरे पिता अघोरी के तंत्र के वश में थे। लेकिन मरते-मरते उन्होंने मुझे बताया था कि उस ग्रंथ के भस्म होने के बाद भी एक आखिरी रस्म बाकी रह जाती है..."
विक्रांत का माथा ठनका। "कैसी रस्म?"
"अघोरी की राख," अमित ने फुसफुसाते हुए कहा। "हवेली के मलबे के नीचे जो राख बची है, अगर उसे गंगा में प्रवाहित न किया गया, तो आषाढ़ की अगली अमावस को वह राख फिर से बीहड़ की मिट्टी में मिलकर किसी नए तांत्रिक को जन्म दे सकती है। वह तंत्र की नकारात्मक ऊर्जा है, साहब... उसे पवित्र जल में विसर्जित करना ही होगा।"
विक्रांत ने पल भर विचार किया। वह कोई जोखिम नहीं लेना चाहता था। इस बीहड़ में अब खौफ का एक तिनका भी बाकी नहीं रहना चाहिए था।
"ठीक है," विक्रांत ने कहा। "मैं आज ही उस राख को समेटकर इलाहाबाद (प्रयागराज) जाकर गंगा में विसर्जित करूँगा।"
शाम के चार बजे विक्रांत, सिपाही जगतार और दो अन्य पुलिसकर्मियों को लेकर ढही हुई हवेली के मलबे पर पहुँचा। सूर्य की सुनहरी किरणें मलबे पर पड़ रही थीं।
विक्रांत ने मलबे के बीच से उस स्थान को खोजा जहाँ अघोरी का ग्रंथ जला था। वहाँ काली, गाढ़ी राख का एक ढेर पड़ा था। अजीब बात यह थी कि आसपास की मिट्टी ठंडी थी, लेकिन वह राख अभी भी हल्की गुनगुनी थी।
विक्रांत ने एक पीतल के कलश में उस पूरी राख को इकट्ठा किया। जैसे ही आखिरी मुट्ठी राख कलश में गई, बीहड़ में अचानक बह रही तेज हवा एकदम थम गई। ऐसा लगा जैसे जंगल की बची-कुची बेचैनी भी उस कलश में बंद हो गई हो।
कलश का मुँह लाल कपड़े और पवित्र धागे से बाँधने के बाद विक्रांत ने उसे अपनी सरकारी गाड़ी में रखा।
"जगतार," विक्रांत ने कहा। "मैं खुद अपनी गाड़ी से प्रयागराज जा रहा हूँ। थाने का प्रभार तुम्हारे पास है। जब तक मैं वापस न आऊँ, बीहड़ में कोई गश्त रात के वक्त अकेले नहीं होगी।"
"जी सर," जगतार ने सैल्यूट करते हुए कहा। "आप बेफिक्र होकर जाइए। अब इस गाँव की हवा में खौफ नहीं है।"
प्रयागराज की यात्रा लगभग आठ घंटे की थी।
विक्रांत अपनी जीप में अकेला था। बगल की सीट पर वह पीतल का कलश रखा हुआ था। रात के लगभग ग्यारह बजे वह राष्ट्रीय राजमार्ग पर आगे बढ़ रहा था। सड़क के दोनों ओर दूर-दूर तक फैले खेत और सन्नाटा था।
जीप की हेडलाइट्स की रोशनी में रास्ता साफ दिखाई दे रहा था। विक्रांत का मन अब पूरी तरह हल्का महसूस कर रहा था। उसने जीप का एफएम रेडियो चालू किया। इस बार रेडियो पर कोई भयानक शोर या गर्जन नहीं था, बल्कि एक शांत, मधुर शास्त्रीय संगीत बज रहा था।
रात के एक बजे विक्रांत प्रयागराज के संगम तट पर पहुँचा।
गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का वह पवित्र संगम स्थल रात के सन्नाटे में बेहद दिव्य लग रहा था। घाट पर कुछ नाविक और साधु-संत विश्राम कर रहे थे। जल की कल-कल बहती ध्वनि मन को एक असीम शांति दे रही थी।
विक्रांत ने जीप से कलश उठाया और नंगे पैर नाव के पास पहुँचा। उसने एक नाविक को संगम के बीचों-बीच चलने को कहा।
नाव धीरे-धीरे पवित्र जल को चीरती हुई आगे बढ़ने लगी। चारों तरफ शीतल हवा बह रही थी। जब नाव संगम के बिल्कुल मध्य में पहुँची, तो विक्रांत ने कलश का मुँह खोला।
उसने अपने दोनों हाथों में कलश को उठाया, अपनी आँखें बंद कीं और हवलदार रामसिंह, सिपाही रमेश, सुखदेव और उन सभी मासूमों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की जो इस भयानक तंत्र का शिकार बने थे।
"हे माँ गंगे," विक्रांत ने मन ही मन कहा, "इस बीहड़ के अंतिम अभिशाप को अपनी पवित्र धारा में समेट लो और इस धरती को सदा के लिए शांति दो।"
विक्रांत ने धीरे-धीरे वह काली राख बहते जल में प्रवाहित कर दी।
जैसे ही राख गंगा के जल से मिली, जल की सतह पर एक हल्की सी नीली चमक उठी और फिर हमेशा के लिए शांत हो गई। राख पानी की गहरी धाराओं में विलीन हो गई।
कलश पूरी तरह खाली हो चुका था। विक्रांत ने उस खाली कलश को भी जल में प्रवाहित कर दिया।
हवा का एक सुखद झोंका आया, जिसने विक्रांत के चेहरे को छुआ। इस बार उस हवा में सड़े हुए मांस या कपूर की सड़ांध नहीं थी—उसमें केवल ताजे जल और चंदन की खुशबू थी।
तीन दिन बाद।
काला टीला गाँव में सूरज की चमकदार किरणें बिखरी हुई थीं। जो गाँव कभी रात ढलते ही श्मशान जैसा सन्नाटा ओढ़ लेता था, आज वहाँ बच्चों के खेलने की आवाजें आ रही थीं। बीहड़ के मोड़ पर जहाँ हवलदार रामसिंह की जीप बंद हुई थी, वहाँ गाँव वालों ने मिलकर एक छोटा सा मंदिर बनवा दिया था, ताकि भटकती आत्माओं को शांति मिले।
विक्रांत थाने के बाहर बनी बेंच पर बैठा चाय पी रहा था। उसके चेहरे पर अब थकान नहीं, बल्कि एक रक्षक का सुकून था।
सिपाही जगतार ने आकर एक नई फाइल मेज पर रखी। "सर, जिला मुख्यालय से आपकी पदोन्नति (promotion) और तबादले के कागजात आ गए हैं। आपको वापस शहर के मुख्य थाने में तैनात किया गया है।"
विक्रांत ने फाइलों को देखा और मुस्कुराया। "शहर तो चला जाऊँगा जगतार, लेकिन यह बीहड़ और 'काला टीला' मुझे ज़िंदगी भर याद रहेंगे।"
"हम भी आपको कभी नहीं भूलेंगे साहब," जगतार की आँखें भर आईं। "आपने इस गाँव को एक नई ज़िंदगी दी है।"
विक्रांत अपनी जीप में बैठा। उसने एक आखिरी बार बीहड़ की उन ऊँची पहाड़ियों की तरफ देखा। दूर बना वह काला टीला अब किसी पिशाच जैसा नहीं, बल्कि एक सामान्य पहाड़ की तरह धूप में चमक रहा था।
उसने जीप स्टार्ट की। इस बार इंजन बिना किसी रुकावट के एक ही बार में गूँज उठा।
जीप बीहड़ की पक्की सड़क पर आगे बढ़ने लगी। विक्रांत ने लुकिंग ग्लास में देखा—गाँव के लोग हाथ हिलाकर उसे विदाई दे रहे थे।
काला टीला का अभिशाप, शावरा पिशाचिनी की चीखें और अघोरी भैरवनाथ का खौफनाक तंत्र... सब कुछ अब इतिहास का हिस्सा बन चुके थे। बीहड़ की मिट्टी पर अब केवल एक बात दर्ज थी—सत्य और साहस की जीत।
(शावरा हॉरर कहानी का यह संपूर्ण और अंतिम भाग यहाँ पूर्णतः समाप्त होता है।)