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भाग 4: राख से उठा साया
Yogesh Kumar Maurya · Tantrik & Black Magic · 10 मिनट
काला टीला पर खिली सुबह की पहली किरणें एक झूठी राहत लेकर आई थीं। अघोरी की छह उंगलियों वाली उँगली के भस्म होते ही शावरा का भयानक रूप गायब हो चुका था और सरपंच शिवनाथ की मौत के साथ ही गाँव पर मंडराता अमावस का तात्कालिक खतरा टल गया था। विक्रांत ने अमित को सुरक्षित पुलिस स्टेशन पहुँचाया और इलाज के लिए अस्पताल भिजवाया।
पूरे गाँव में यह खबर आग की तरह फैल गई कि दरोगा विक्रांत ने बीहड़ के तीन सौ साल पुराने पिशाच का अंत कर दिया है। लेकिन विक्रांत का मन शांत नहीं था। रात के उस भयावह मंज़र का एक-एक पल उसके दिमाग में घूम रहा था। शावरा के आख़िरी शब्द उसके कानों में बार-बार गूँज रहे थे—“तूने मुझे मिटा दिया... लेकिन बीहड़ का शाप कभी नहीं मरता!”
दोपहर के करीब तीन बज रहे थे। विक्रांत अपने केबिन में बैठा रामसिंह की डायरी और अघोरी की पांडुलिपि के पन्नों को दोबारा खंगाल रहा था। तभी थाने के बाहर एक पुरानी खटारा एम्बुलेंस आकर रुकी। जिला मुख्यालय से फॉरेंसिक टीम और मेडिकल अफसर डॉ. आर.के. वर्मा पहुँचे थे।
"नमस्ते विक्रांत जी," डॉ. वर्मा ने केबिन में दाखिल होते हुए दस्ताने उतारे। "मैंने रामसिंह और आपके दो सिपाहियों—सुखदेव और रमेश के अवशेषों की प्राथमिक जाँच पूरी कर ली है। रिपोर्ट बेहद अजीब और चौंकाने वाली है।"
विक्रांत ने उत्सुकता से पूछा, "क्या मिला रिपोर्ट में, डॉक्टर?"
डॉ. वर्मा ने अपनी ऐनक ठीक की और मेज पर एक फ़ाइल रखी। "सुखदेव की मौत गर्दन की हड्डी टूटने से हुई, लेकिन रमेश का शरीर... रमेश की हड्डियाँ अंदर से जलकर राख हो चुकी थीं, जबकि उसके कपड़े पूरी तरह सुरक्षित थे! यह किसी आम आग या रासायनिक हमले से संभव नहीं है। और रामसिंह का सीना... उसके सीने पर जो छह उंगलियों का निशान था, वहाँ की कोशिकाएँ (cells) म्यूटेट हो चुकी थीं, जैसे किसी अत्यधिक रेडिएशन या प्राचीन विषैले तत्व के संपर्क में आई हों।"
"और सरपंच शिवनाथ की मौत?" विक्रांत ने पूछा।
"शिवनाथ के फेफड़ों में पानी और काली राख भरी हुई मिली है," डॉ. वर्मा ने गंभीर स्वर में कहा। "लेकिन सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि उसके खून का नमूना जब हमने टेस्ट किया, तो उसमें इंसानी लाल रक्त कोशिकाएँ (RBCs) थीं ही नहीं। उसका खून जम चुका था और पूरी तरह से काला पड़ चुका था, जैसे वह महीनों पहले ही मर चुका हो!"
विक्रांत की रीढ़ में एक ठंडी सिहरन दौड़ गई। अगर शिवनाथ महीनों पहले ही मर चुका था, तो जो व्यक्ति इतने दिनों से गाँव का सरपंच बनकर घूम रहा था और जिसने कल रात तंत्र-पूजा की थी... वह कौन था?
शाम ढलने लगी थी। सूरज की लालिमा बीहड़ के जंगलों पर एक खूनी परत की तरह बिछ गई थी।
विक्रांत ने निर्णय लिया कि वह अमित से दोबारा पूछताछ करेगा। वह अस्पताल के उस कमरे में पहुँचा जहाँ अमित को रखा गया था। अमित अब पहले से बेहतर दिख रहा था, लेकिन उसकी आँखों की घबराहट पूरी तरह से दूर नहीं हुई थी।
"अमित," विक्रांत ने पास की कुर्सी पर बैठते हुए कहा। "तुम्हारे पिता... सरपंच शिवनाथ के बारे में मुझे कुछ बातें पता चली हैं। तुम मुझे सच-सच बताओ, तुम्हारे घर में क्या चल रहा था?"
अमित ने काँपते हाथों से चादर को भींच लिया। "साहब... मेरे पिता छह महीने पहले बीहड़ की गुफाओं में गए थे। वहाँ से लौटने के बाद वे पूरी तरह बदल गए थे। वे रात-रात भर जागकर कमरे में अकेले बुदबुदाते रहते थे। वे इंसानी खाना छोड़ चुके थे और सिर्फ कच्चा मांस खाते थे।"
"तुमने पुलिस को यह सब क्यों नहीं बताया?" विक्रांत ने पूछा।
"डर के मारे साहब!" अमित की आँखों से आँसू छलक पड़े। "उन्होंने मुझे धमकी दी थी कि अगर मैंने किसी से कुछ कहा, तो वे मेरी बलि चढ़ा देंगे। उन्होंने घर के तहखाने में एक तांत्रिक वेदी बना रखी थी। तीन दिन पहले, जब हवलदार रामसिंह की मौत हुई, मैंने अपने पिता को रात के अँधेरे में उस तहखाने से बाहर आते देखा था। उनके कपड़े खून से सने थे और उनके पीछे एक भयानक साया चल रहा था... वही साया जिसकी छह उंगलियाँ थीं!"
"तहखाना?" विक्रांत झटके से खड़ा हो गया। "तुम्हारे घर में कोई तहखाना है?"
"हाँ साहब," अमित ने फुसफुसाते हुए कहा। "गाँव की हवेली के नीचे एक गुप्त तहखाना है। वही अघोरी भैरवनाथ का असली अड्डा था। मेरे पिता रोज़ रात को वहीं जाकर शावरा के लिए तंत्र सिद्धियाँ करते थे।"
विक्रांत को समझ आ गया कि काला टीला का मंदिर तो केवल बलि देने का स्थान था, लेकिन शावरा की असली जड़ें और उसकी तंत्र-विद्या का केंद्र सरपंच की पुरानी हवेली का तहखाना था।
रात के आठ बज चुके थे।
विक्रांत ने सिपाही जगतार और दो अन्य सशस्त्र पुलिसकर्मियों को साथ लिया। वे सरकारी जीप से गाँव के मुहाने पर स्थित सरपंच की विशाल, जर्जर हवेली की ओर बढ़े। हवेली का मुख्य द्वार पुराना और लोहे का बना था, जिस पर जंग लगी हुई थी। चारों तरफ सन्नाटा था और हवेली के विशाल अहाते में पीपल के पुराने पेड़ भूतिया आकृतियों की तरह खड़े थे।
"सर," जगतार ने अपनी टॉर्च चालू करते हुए कहा। "गाँव का कोई भी इंसान इस हवेली के आसपास भटकने की हिम्मत नहीं करता। कहते हैं कि इस हवेली की दीवारों के अंदर से आज भी रोने की आवाजें आती हैं।"
"अंदर चलो," विक्रांत ने अपनी सर्विस रिवाल्वर निकालकर हाथ में ली। "आज हमें इस खेल का हमेशा के लिए अंत करना है।"
हवेली का मुख्य दरवाजा चरमराते हुए खुला। अंदर घोर अँधेरा था। दीवारों पर धूल और जाले जमे हुए थे। हवेली के मुख्य हॉल में पुराने ज़माने के फटे हुए चित्र टंगे थे।
विक्रांत टॉर्च की रोशनी फैलाते हुए आगे बढ़ा। हॉल के कोने में एक पुरानी लकड़ी की अलमारी रखी थी। अमित के बताए अनुसार, विक्रांत ने उस अलमारी को खिसकाया। अलमारी के पीछे एक लोहे का छोटा दरवाजा दिखाई दिया, जिससे नीचे की ओर जाने के लिए पत्थरों की सीढ़ियाँ बनी हुई थीं।
सीढ़ियों से नीचे उतरते ही सड़ांध की वही भयावह गंध फिर से हवा में तैरने लगी, जिसने विक्रांत का जी मिचला दिया। यह सड़ांध सड़ते हुए खून और जले हुए मांस की मिली-जुली महक थी।
सीढ़ियाँ ढलान पर नीचे जा रही थीं। लगभग पचास फीट नीचे उतरने के बाद वे एक विशालकाय भूमिगत तहखाने में पहुँचे।
तहखाने का नज़ारा देखकर सिपाहियों के हाथ से टॉर्च छूटते-छूटते बची।
तहखाने की दीवारें इंसानी खोपड़ियों और हड्डियों से चुनी गई थीं। बीचों-बीच एक विशाल तांत्रिक चक्र बना हुआ था, जिसमें सूख चुका खून जमा था। चक्र के चारों तरफ छह तांबे के दीपक रखे थे, जो बिना तेल और बाती के भी नीली लौ के साथ जल रहे थे!
और उस तांत्रिक चक्र के ठीक केंद्र में एक लकड़ी के बक्से पर एक पुरानी ग्रंथ/किताब रखी थी। वह किताब इंसानी चमड़ी से मढ़ी हुई थी और उस पर लाल रंग से वही छह उंगलियों का पंजा बना हुआ था।
"यह... यह अघोरी भैरवनाथ का 'शावरा ग्रंथ' है," विक्रांत ने फुसफुसाते हुए कहा।
"सर, यहाँ मत रुकिए! इसे जला दीजिए और चलिए यहाँ से!" जगतार ने घबराकर कहा।
विक्रांत धीरे-धीरे उस ग्रंथ की ओर बढ़ा। उसने जैसे ही ग्रंथ को छूने के लिए हाथ आगे बढ़ाया, अचानक नीली लौ वाले छहों दीपक एक साथ बुझ गए।
पूरे तहखाने में घुप अँधेरा छा गया।
"सर! टॉर्च बंद हो गई!" सिपाहियों के चिल्लाने की आवाज आई। टॉर्च का स्विच दबाने पर भी रोशनी नहीं जल रही थी।
तभी, तहखाने के पत्थरों से एक दबी हुई हँसी की आवाज गूँजने लगी। यह हँसी सरपंच शिवनाथ की नहीं थी, न ही वह शावरा की चीख थी। यह आवाज एक पुरुष की थी—एक अत्यंत प्राचीन और भारी आवाज!
"मूर्ख इंसान... तूने सोचा कि एक उँगली जला देने से तीन सौ साल का तंत्र मिट जाएगा?"
तहखाने की दीवारों से खून रिसने लगा। अँधेरे के बीच एक लाल रंग का विशालकाय साया प्रकट हुआ। वह साया शावरा का नहीं था, बल्कि एक लंबे अघोरी का था, जिसके सिर पर जटाएँ थीं और शरीर पर भस्म लगी हुई थी। उसकी दाहिनी हथेली में छह उंगलियाँ स्पष्ट चमक रही थीं।
यह खुद अघोरी भैरवनाथ की प्रेतात्मा थी!
"तुम... तुम तो तीन सौ साल पहले मर चुके थे!" विक्रांत ने अँधेरे में निशाना साधते हुए पिस्टल तानी।
"भैरवनाथ कभी नहीं मरता!" वह साया गरजा। "शावरा कोई पिशाच नहीं, मेरी अमरता की साधना का पहला रूप थी। तुमने उसकी देह नष्ट की है, लेकिन उसके मूल ग्रंथ को छूने का दुस्साहस किया है। अब इस तहखाने की मिट्टी तुम्हारा रक्त पिएगी!"
अचानक तहखाने की ज़मीन हिलने लगी। इंसानी हड्डियों की दीवारें टूटने लगीं और ज़मीन से अनगिनत कटे हुए हाथ बाहर निकलने लगे। उन हाथों ने सिपाहियों के पैर जकड़ लिए।
"बचाओ सर!" एक सिपाही की चीख गूँजी। एक कटे हुए हाथ ने उसकी गर्दन दबोच ली और उसे खींचकर ज़मीन के अंदर धँसाने लगा।
विक्रांत ने तुरंत अपनी जेब से वही तांबे की डिब्बी निकाली जिसमें बची हुई भस्म थी। उसने भस्म को हवा में उछाला और अपनी पिस्टल से ग्रंथ पर गोली चला दी—धाँय!
गोली लगते ही इंसानी चमड़ी से मढ़ा वह ग्रंथ जलने लगा।
अघोरी की आत्मा एक भयानक चीख के साथ तड़प उठी। "नहीं! मेरा ग्रंथ!"
ग्रंथ के जलते ही तहखाने का तापमान अत्यधिक बढ़ गया। नीली लपटें पूरे कमरे में फैल गईं। विक्रांत ने तड़पते हुए जगतार और दूसरे सिपाही को खींचा और सीढ़ियों की तरफ भागा।
"ऊपर चलो! जल्दी!" विक्रांत चिल्लाया।
वे बदहवास हालत में सीढ़ियाँ चढ़कर हवेली के हॉल में पहुँचे। उनके पीछे तहखाना एक बड़े धमाके के साथ ढह गया। ज़मीन धँसने लगी और सरपंच की पूरी पुरानी हवेली ताश के पत्तों की तरह ढहने लगी।
विक्रांत और उसके साथी किसी तरह हवेली का दरवाजा लांघकर बाहर अहाते में कूदे। उनके बाहर निकलते ही पूरी हवेली मलबे के ढेर में तब्दील हो गई। धूल और धुएँ का एक विशाल गुबार हवा में उठने लगा।
रात के बारह बज रहे थे।
विक्रांत ज़मीन पर पड़ा हाँफ रहा था। उसकी वर्दी जगह-जगह से फट चुकी थी और उसके शरीर पर कई चोटें आई थीं। जगतार और दूसरा सिपाही भी बुरी तरह सहमे हुए पास ही बैठे थे।
हवेली का मलबा जल रहा था, लेकिन वह भयानक लाल और नीली रोशनी अब पूरी तरह गायब हो चुकी थी। बीहड़ का सन्नाटा वापस लौट आया था।
विक्रांत धीरे-धीरे खड़ा हुआ। उसने अपनी जेब टटोली। उसकी जेब में रखा गंगाजल का छोटा सा बर्तन पूरी तरह से भाप बनकर उड़ चुका था।
अघोरी भैरवनाथ का 'शावरा ग्रंथ' भस्म हो चुका था। उसकी मूल साधना की जड़ें कट चुकी थीं। लेकिन जब विक्रांत ने जलती हुई हवेली के मलबे की तरफ देखा, तो उसे मलबे के ऊपर धुएँ के बीच छह उंगलियों के पंजे की एक धुँधली आकृति आसमान की तरफ उठती हुई दिखाई दी, जो धीरे-धीरे हवा में विलीन हो गई।
विक्रांत समझ गया कि बीहड़ का यह भयानक अध्याय आज रात समाप्त हो गया है। पिशाचिनी शावरा और उसे जन्म देने वाले अघोरी का अस्तित्व मिट चुका था, लेकिन इस लड़ाई ने बीहड़ की मिट्टी पर खौफ का जो निशान छोड़ा था, वह शायद पीढ़ियों तक मिट नहीं पाएगा।
उसने अपने सिपाहियों के कंधे पर हाथ रखा। "चलो, अब यह बीहड़ शांत है।"
जीप की हेडलाइट्स की पीली रोशनी इस बार बीहड़ के अँधेरे को चीरती हुई आगे बढ़ रही थी। कोहरा छँट चुका था, और दूर क्षितिज पर भोर की पहली सफेद किरण फूटने को तैयार थी।
क्रमश:
- Writer
- Yogesh Kumar Maurya
- Story
- शावरा
- Chapter
- 4 of 5
- Category
- Tantrik & Black Magic
- Reading time
- 10 min
- Words
- 1868
- Language
- Hindi (हिंदी)
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