भाग 3: अघोरी की वसीयत और भयानक अमावस
Yogesh Kumar Maurya · Horror · 10 मिनट
- Writer
- Yogesh Kumar Maurya
- Story
- शावरा
- Chapter
- 3 of 5
- Category
- Horror
- Reading time
- 10 min
- Words
- 1830
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
भाग 3: अघोरी की वसीयत और भयानक अमावस
काला टीला की उस भयावह रात के बाद गाँव में सन्नाटा पसरा हुआ था। सूर्य की किरणें तो उगी थीं, लेकिन उनकी गर्मी बीहड़ के भारी और ठंडे माहौल को कम नहीं कर पा रही थी। थाने के अहाते में सिपाही सुखदेव और रमेश के अवशेष रखे थे। हर सिपाही के चेहरे पर मौत का खौफ साफ दिखाई दे रहा था।
विक्रांत अपने कमरे में बैठा हुआ उस तांबे की डिब्बी को देख रहा था, जो उसे मंदिर की बलि-वेदी से मिली थी। डिब्बी पर प्राचीन ब्राह्मी या तंत्र-लिपि में कुछ शब्द उकेरे गए थे। उसके अंदर बचा हुआ पीला पाउडर किसी खास जड़ी-बूटी और भस्म का मिश्रण लग रहा था।
"सर," सिपाही जगतार ने काँपती हुई आवाज में कमरे में कदम रखा। "सरपंच का बेटा होश में आ गया है। लेकिन वह कुछ बोल नहीं पा रहा है... बस थर-थर काँप रहा है और दीवार पर छह उंगलियों के निशान बना रहा है।"
विक्रांत तुरंत उठा। "चल मेरे साथ।"
वे अस्पताल के कमरे में पहुँचे, जहाँ सरपंच का बेटा 'अमित' बेड पर पड़ा हुआ था। उसकी आँखें लाल थीं और वह लगातार फुसफुसा रहा था, "वह आ रही है... अमावस को कोई नहीं बचेगा..."
विक्रांत ने अमित के कंधों को थामकर हिलाया। "अमित! मेरी बात सुनो! तुम्हारे पास वह तांबे की डिब्बी कहाँ से आई? उस डिब्बी में क्या है? शावरा का अंत कैसे हो सकता है?"
अमित ने तड़पकर विक्रांत का हाथ पकड़ा। उसकी उंगलियों की पकड़ में अजीब सा खिंचाव था। "मेरे पिता... मेरे पिता झूठ बोल रहे हैं साहब! वे अघोरी भैरवनाथ के खानदान के हैं!"
विक्रांत के पैर तले ज़मीन खिसक गई। "क्या?"
"हाँ!" अमित की आँखों से आँसू बहने लगे। "तीन सौ साल पहले गाँव वालों ने भैरवनाथ को ज़िंदा नहीं जलाया था... बल्कि मेरे परदादा ने अघोरी भैरवनाथ से सौदा किया था। उन्होंने अपनी गद्दी और धन-दौलत बचाने के लिए गाँव की निर्दोष लड़कियों की बलि में भैरवनाथ की मदद की थी। शावरा कोई बाहरी पिशाच नहीं है... शावरा मेरे ही खानदान की दी हुई बलि की नफरत और भैरवनाथ के तंत्र का मिला-जुला शाप है!"
तभी कमरे का दरवाजा खटाक से खुला। सरपंच शिवनाथ बाहर खड़ा था। उसके हाथ में एक भारी पीतल की छड़ी थी और उसकी आँखों में अजीब सी दरिंदगी चमक रही थी।
"तुमने बहुत बोल दिया अमित," सरपंच की आवाज में अब वह पहले वाली लाचारी नहीं थी। उसमें एक अजीब सा भारीपन था।
"शिवनाथ जी," विक्रांत ने पिस्टल निकालते हुए कहा। "तुम्हारी यह गंदी सच्चाई अब सामने आ चुकी है। तुमने पुलिस और गाँव वालों से इतना बड़ा सच छिपाया?"
सरपंच हँसने लगा—वह हँसी ठीक वैसी ही थी जैसी कल रात मंदिर में गूँजी थी। "छुपाया? साहब, यह सच छुपाने के लिए नहीं, बल्कि इस बीहड़ पर राज करने के लिए था! हर तीस साल में जब शावरा जागती है, तो उसे एक पुलिस अफसर या बाहरी रक्षक की बलि चाहिए होती है ताकि उसका तंत्र अमर रहे। रामसिंह पहला था... और तुम आख़िरी हो!"
इससे पहले कि विक्रांत ट्रिगर दबाता, सरपंच ने अपनी छड़ी ज़मीन पर पटकी।
धम्म!
कमरे की खिड़कियों के काँच एक साथ फूट गए। एक भयानक ठंडी हवा का बवंडर कमरे के अंदर घुसा। हवा में गाढ़ा, पीला धुआँ भर गया जो सीधे गले में जलन पैदा कर रहा था। विक्रांत और जगतार खाँसने लगे। उनकी आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा।
विक्रांत ने धुंध के बीच देखा कि सरपंच अमित को खींचते हुए बाहर ले जा रहा था। विक्रांत ने गोली चलाई—धाँय!—लेकिन गोली दीवार में जा धँसी। उसकी चेतना धीरे-धीरे खत्म हो रही थी।
जब विक्रांत की आँखें खुलीं, तो दोपहर ढल चुकी थी। उसका सिर बुरी तरह दर्द कर रहा था। सिपाही जगतार ज़मीन पर बेहोश पड़ा था, लेकिन ज़िंदा था। अस्पताल का पूरा स्टाफ गायब हो चुका था।
"अमावस..." विक्रांत के दिमाग में केवल एक ही शब्द गूँज रहा था। आज रात आषाढ़ की अमावस थी।
विक्रांत ने उठकर अपने कपड़े ठीक किए। वह जानता था कि अब कानून या पुलिस की राइफलें उसका बचाव नहीं कर सकती थीं। उसे उस तांबे की डिब्बी और पीले पाउडर का रहस्य जानना था।
वह थाने के पीछे बनी पुरानी लाइब्रेरी में गया, जहाँ बीहड़ के प्राचीन इतिहास और मुकदमों की पुरानी फाइलें रखी थीं। धूल से अटी फाइलों को खंगालते हुए उसे एक बहुत पुरानी, हाथ से लिखी हुई हस्तलिपि मिली। यह 'भैरव तंत्र की काट' नाम की एक पुरानी पांडुलिपि थी।
विक्रांत ने पन्ने पलटे। उसमें लिखा था:
“शावरा पिशाच को कोई अस्त्र या गोली नहीं मार सकती। शावरा का जीवन उस तांत्रिक वेदी के नीचे दबी हुई ‘अघोरी की छटी उँगली’ में बसा है। भैरवनाथ की मृत्यु के समय उसकी दाहिनी हथेली की छटी उँगली काटकर एक तांबे के कलश में बंद कर दी गई थी। जो कोई भी अमावस की रात, तंत्र-पूजा पूरी होने से पहले, उस उँगली को 'गंगाजल और भस्म' में डुबोकर जला देगा, शावरा का अस्तित्व सदा के लिए भस्म हो जाएगा। परंतु सावधान... उस कलश को छूते ही साधक को अपने सबसे खौफनाक दुःस्वप्न का सामना करना होगा।”
विक्रांत को बात समझ में आ गई। वह तांबे की डिब्बी उसी कलश का हिस्सा या उसकी रक्षात्मक भस्म थी। सरपंच अमित की बलि देकर आज रात तंत्र पूरा करने वाला था ताकि शावरा की शक्ति उसे और उसके खानदान को अमर बना दे।
विक्रांत ने अपनी पिस्टल लोड की, साथ में एक बोतल पवित्र जल (गंगाजल) और उस तांबे की डिब्बी की भस्म ली।
"जगतार!" विक्रांत ने होश में आए जगतार को हिलाया। "गाँव वालों को इकट्ठा करो और उन्हें कहो कि आज रात कोई भी अपने घर से बाहर न निकले। दरवाजों पर हल्दी और नीम के पत्ते बाँध लें।"
"और आप कहाँ जा रहे हैं सर?" जगतार ने रोते हुए पूछा।
"मैं उस अघोरी की उँगली जलाने जा रहा हूँ," विक्रांत ने दृढ़ संकल्प के साथ कहा।
रात के ग्यारह बज रहे थे। आकाश में एक भी तारा नहीं था। अमावस की काली रात ने पूरे बीहड़ को अपनी छाती से लगा रखा था।
विक्रांत अकेले ही काला टीला की चढ़ाई चढ़ रहा था। इस बार माहौल और भी भयावह था। पेड़ों की डालियाँ आपस में टकराकर ऐसी आवाजें निकाल रही थीं जैसे सैकड़ों आत्माएँ एक साथ रो रही हों। रास्ते के पत्थरों से सचमुच गाढ़ा, लाल खून रिस रहा था।
जैसे ही विक्रांत मंदिर के अहाते में पहुँचा, उसे सामने का खौफनाक नजारा दिखा।
बलि-वेदी के चारों तरफ छह बड़े-बड़े कुंड जल रहे थे, जिनमें से नीली और लाल लपटें निकल रही थीं। बीच में अमित एक लकड़ी के तख्ते से बँधा हुआ था। सरपंच शिवनाथ गेरुए वस्त्र पहने, हाथ में नरमुंडों की माला लिए, भयानक मंत्रों का जाप कर रहा था।
“ॐ ह्रीं शावरा पिशाचिनी, श्मशान वासिनी, रक्त पिपासु... फट् स्वाहा!”
हर मंत्र के साथ हवा में कंपन बढ़ रहा था। बलि-वेदी के ऊपर कोहरे का एक विशालकाय बवंडर घूम रहा था। उस बवंडर के बीच में शावरा का भयानक चेहरा स्पष्ट दिखाई दे रहा था। उसकी आँखें कधकते अंगारों जैसी लाल थीं, और उसके मुँह से लार की जगह खून टपक रहा था।
"विक्रांत!" सरपंच ने घूमकर देखा और जोर से हँसा। "तुम आ गए! शावरा को तुम्हारी ही बलि का इंतज़ार था!"
"खेल खत्म शिवनाथ!" विक्रांत ने आगे बढ़ते हुए कहा।
"कभी नहीं!" सरपंच ने अपनी छड़ी हवा में लहराई।
अचानक बलि-वेदी के नीचे की ज़मीन फटने लगी। सड़े हुए हाथों का एक पूरा झुंड ज़मीन के अंदर से बाहर निकला। वे कंकाल और लाशें थीं जो तंत्र के प्रभाव से जाग उठी थीं। वे घिसटते हुए विक्रांत की तरफ बढ़ने लगे।
विक्रांत ने अपनी पिस्टल निकाली और सामने आने वाली लाशों के सिर में गोलियाँ मारीं। धाँय! धाँय! धाँय!
लेकिन वे रुकने वाली नहीं थीं। एक सड़ी हुई लाश ने विक्रांत का पैर पकड़ लिया और उसे ज़मीन पर गिरा दिया। विक्रांत ने अपनी पूरी ताकत लगाकर अपनी लात से उसका चेहरा कुचल दिया।
शावरा की चीख पूरे बीहड़ में गूँजी। वह बवंडर से बाहर निकली और सीधे विक्रांत की तरफ झपटी।
उसके उलटे पैर हवा को चीर रहे थे और उसके छह उंगलियों वाले हाथ के नाखून लंबे और तीखे हो चुके थे। उसने विक्रांत का गला दबोच लिया।
विक्रांत का दम घुटने लगा। उसकी आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा। शावरा का भयानक, बिना पुतली वाला चेहरा उसके सामने था। उसकी सड़ी हुई सांस से विक्रांत की चमड़ी जलने लगी थी।
'मुझे... मुझे उस उँगली तक पहुँचना होगा...' विक्रांत ने मन ही मन सोचा।
विक्रांत ने अपनी जेब से तांबे की डिब्बी में रखी भस्म निकाली और सीधे शावरा के मुँह पर फेंक दी।
छिरररर!
शावरा के मुँह से आग की लपटें निकलने लगीं। उसने तड़पकर विक्रांत को छोड़ दिया और पीछे हटकर चीखने लगी।
विक्रांत ने एक पल भी बर्बाद नहीं किया। वह घिसटते हुए बलि-वेदी की तरफ भागा। बलि-वेदी के ठीक नीचे एक छोटा सा आला (कटर) बना हुआ था। विक्रांत ने अपना हाथ उस आले में डाल दिया।
उसके हाथ को किसी बहुत ठंडी और जहरीली चीज का अहसास हुआ। उसके पूरे शरीर में एक भयानक दर्द की लहर दौड़ गई—उसे लगा जैसे हज़ारों बिच्छू एक साथ उसके जिस्म में डंक मार रहे हों। उसके सामने उसके जीवन के सबसे भयानक डर तैरने लगे। उसे अपनी ही मौत दिखाई देने लगी।
"नहीं! यह छलावा है!" विक्रांत चिल्लाया।
उसने अपनी पूरी ताकत लगाकर आले के अंदर रखी चीज़ को बाहर खींच लिया।
वह एक छोटा सा तांबे का कलश था। विक्रांत ने कलश का ढक्कन झटके से खोला। अंदर काले खून में तैरती हुई एक कटी हुई, छह उंगलियों वाली हथेली की उँगली रखी थी, जो अभी भी तड़प रही थी!
"नहीं! उसे मत छूना!" सरपंच पागलों की तरह खंजर लेकर विक्रांत की तरफ दौड़ा।
विक्रांत ने तुरंत अपनी जेब से गंगाजल की बोतल निकाली और पूरी बोतल उस कलश के अंदर उड़ेल दी। फिर उसने अपनी माचिस निकाली और तीली जलाकर कलश के अंदर फेंक दी।
भ्राममम!
कलश के अंदर से एक नीली आग का विस्फोट हुआ। वह कटी हुई उँगली जलकर राख होने लगी।
जैसे ही वह उँगली जली, शावरा का शरीर हवा में ऐंठने लगा। उसकी चीख इतनी भयानक थी कि आसपास के सारे पेड़ उखड़कर गिरने लगे। उसके शरीर से भयानक काला धुआँ निकलने लगा और उसकी चमड़ी पघलने लगी।
"अविश्वासी दरोगा... तूने मुझे मिटा दिया... लेकिन बीहड़ का शाप कभी नहीं मरता!" शावरा की आखिरी दर्दनाक चीख गूँजी।
अगले ही पल, शावरा का पूरा वजूद एक जोर के धमाके के साथ राख के गुबार में तब्दील हो गया।
शावरा के मिटते ही, सरपंच शिवनाथ का शरीर भी बुरी तरह तड़पने लगा। उसकी आँखों से खून बहने लगा और वह बलि-वेदी के पास ही गिरकर ढेर हो गया।
बलि-वेदी के कुंडों की आग बुझ गई। बीहड़ का भयानक कोहरा धीरे-धीरे छँटने लगा।
आकाश में अमावस का अँधेरा अभी भी था, लेकिन हवा में फैली वह भयानक सड़ांध और खौफ अब गायब हो चुका था। बीहड़ में पहली बार एक शांत, प्राकृतिक हवा बहने लगी।
विक्रांत हाँफते हुए ज़मीन पर बैठ गया। उसका शरीर जख्मों से भरा हुआ था, लेकिन उसने अमित के बंधन खोल दिए थे। अमित ज़िंदा था।
सुबह की पहली किरण जब 'काला टीला' पर पड़ी, तो वह भयानक मंदिर केवल पत्थरों का एक मामूली ढेर लग रहा था।
विक्रांत ने अमित को संभाला और नीचे जीप की तरफ बढ़ने लगा। उसने एक बार मुड़कर उस टीले की तरफ देखा।
काले टीले का अभिशाप शांत हो चुका था... लेकिन विक्रांत जानता था कि बीहड़ के गहरे राज़ कभी पूरी तरह से ख़त्म नहीं होते। कुछ खौफ केवल सो जाते हैं, अगले आषाढ़ का इंतज़ार करने के लिए।
क्रमश: