भाग 2: काला टीला का रहस्य
Yogesh Kumar Maurya · Horror · 12 मिनट
- Writer
- Yogesh Kumar Maurya
- Story
- शावरा
- Chapter
- 2 of 5
- Category
- Horror
- Reading time
- 12 min
- Words
- 2272
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
भाग 2: काला टीला का रहस्य
रामसिंह का शव जब थाने पहुँचा, तो पूरे पुलिस महकमे में सन्नाटा पसर गया। सिपाही दबी ज़ुबान में बातें कर रहे थे, लेकिन विक्रांत के सामने कोई कुछ बोलने की हिम्मत नहीं कर रहा था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने में अभी वक्त था, लेकिन विक्रांत जानता था कि डॉक्टरों की रिपोर्ट भी उस छह उंगलियों के जलते हुए निशान और उलटे पैरों के रहस्यों का जवाब नहीं दे पाएगी।
दोपहर के दो बज रहे थे। विक्रांत अपने केबिन में बैठा रामसिंह की डायरी के पन्ने पलट रहा था। रामसिंह पिछले कुछ महीनों से 'काला टीला' गाँव के आसपास गश्त पर तैनात था। डायरी के आखिरी कुछ पन्नों पर अजीब-ओ-गरीब बातें लिखी थीं—
"12 जुलाई: आज फिर बीहड़ की तरफ से रोने की आवाजें आईं। गाँव के लोग कहते हैं कि जब तंत्र-साधना का समय आता है, तो रात में टीला लाल हो जाता है।"
"28 जुलाई: सरपंच का बेटा दो दिन से गायब है। पुलिस में कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई गई। लोग कहते हैं कि उसे 'शावरा' का बुलावा आया था।"
"5 अगस्त: मुझे लगता है कि कोई मेरा पीछा कर रहा है। रात को जीप के शीशे पर छः उंगलियों वाले हाथ की छाप मिलती है..."
विक्रांत ने डायरी बंद की और एक गहरी सांस ली। तभी केबिन के दरवाजे पर दस्तक हुई।
"सर," सिपाही रमेश ने अंदर आते हुए कहा। "गाँव के सरपंच शिवनाथ जी आए हैं। आपने बुलाया था।"
"उन्हें अंदर भेजो," विक्रांत ने कहा।
कुछ ही पलों में एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति अंदर दाखिल हुआ। उसके चेहरे पर झुर्रियाँ थीं, आँखें अंदर धँसी हुई थीं और उसके माथे पर त्रिपुंड का बड़ा सा तिलक लगा था। उसने रेशमी धोती-कुर्ता पहन रखा था और हाथ में चंदन की माला फेर रहा था।
"प्रणाम साहब," सरपंच ने भारी आवाज में कहा।
"बैठिए सरपंच जी," विक्रांत ने सामने रखी कुर्सी की तरफ इशारा किया। "मैं सीधे मुद्दे पर आता हूँ। आज सुबह हवलदार रामसिंह का शव मिला है। हत्या जिस तरीके से हुई है, वह साधारण नहीं है। गाँव में 'शावरा' नाम की क्या कहानी चल रही है?"
सरपंच के हाथ में चलती माला एक पल के लिए रुक गई। उसके चेहरे की रंगत उड़ी, लेकिन उसने तुरंत खुद पर काबू पा लिया।
"साहब, आप शहर से आए हैं। कानून और पढ़ाई-लिखाई पर भरोसा करते हैं," सरपंच ने शांत स्वर में कहा। "बीहड़ की अपनी एक दुनिया है। कुछ चीजें ऐसी हैं जिन्हें न छेड़ना ही बेहतर होता है।"
"मैं एक पुलिस अफसर हूँ, सरपंच जी!" विक्रांत ने मेज पर हाथ पटकते हुए कड़क आवाज में कहा। "मेरे एक जवान की निर्मम हत्या हुई है। मुझे किसी भूत-प्रेत की कहानी में उलझाने की कोशिश मत कीजिए। यह शावरा कौन है? और उस काले टीले का क्या इतिहास है?"
सरपंच ने एक लंबी सांस ली और खिड़की से बाहर बीहड़ की तरफ देखा। उसकी आँखों में एक गहरा खौफ उतर आया।
"शावरा कोई इंसान नहीं है साहब... और न ही कोई साधारण आत्मा," सरपंच ने फुसफुसाते हुए बोलना शुरू किया। "आज से लगभग तीन सौ साल पहले, यह बीहड़ राजा मानसिंह के साम्राज्य का हिस्सा था। उस वक्त काला टीला पर एक अघोरी तांत्रिक रहता था—भैरवनाथ। वह अमरता की तलाश में तंत्र-विद्या की सबसे नीच और खौफनाक शाखा 'शावरा विद्या' का अभ्यास करता था।"
विक्रांत ध्यान से सुन रहा था।
"शावरा विद्या क्या है?" विक्रांत ने पूछा।
"एक ऐसी साधना," सरपंच ने कहा, "जिसमें इंसान की बलि देकर उसकी आत्मा को एक तांत्रिक बंधन में बाँध दिया जाता है। अघोरी भैरवनाथ ने अष्टमी की रात गाँव की एक सौ एक कुँवारी लड़कियों और नौजात शिशुओं की बलि दी थी। कहते हैं, बलि की आखिरी रात गाँव वालों को जब इस दरिंदगी का पता चला, तो उन्होंने गुस्से में आकर मंदिर को घेर लिया। उन्होंने अघोरी भैरवनाथ को ज़िंदा जला दिया।"
सरपंच की आवाज काँपने लगी। "लेकिन मरते-मरते भैरवनाथ ने अपनी खून से सनी उंगलियों से उस टीले की मिट्टी पर अपना आखिरी तंत्र रच दिया। उसने अपनी जलती हुई देह और बलि चढ़ी आत्माओं के क्रोध को मिलाकर एक पिशाच-सत्ता को जन्म दिया—'शावरा'। उसने श्राप दिया कि हर तीस साल बाद, जब आषाढ़ की अमावस आएगी, शावरा जागेगी और अपने पूरे कुनबे के लिए बलि माँगेगी। जो कोई उसका नाम सुनेगा या उसके रास्ते में आएगा, उसका खून निचोड़ लिया जाएगा।"
"बकवास!" विक्रांत उठ खड़ा हुआ। "तीन सौ साल पुरानी अंधविश्वासी कहानी के नाम पर आप लोग मर्डर को छुपा रहे हैं? रामसिंह की छाती पर वह छह उंगलियों का पंजे का निशान किसका था?"
सरपंच की आँखें चौड़ी हो गईं। "छह उंगलियाँ? अघोरी भैरवनाथ के दाहिने हाथ में छह उंगलियाँ थीं साहब! वह कोई कहानी नहीं है। यदि उसके पंजे का निशान मिला है, तो इसका मतलब है कि शावरा की नींद टूट चुकी है। अमावस में अब सिर्फ तीन दिन बचे हैं... पूरा गाँव खत्म हो जाएगा!"
"कोई खत्म नहीं होगा," विक्रांत ने ठंडे स्वर में कहा। "मैं आज रात खुद काला टीला जाऊँगा।"
सरपंच झटके से अपनी जगह से खड़ा हो गया। उसने काँपते हाथों से विक्रांत का हाथ पकड़ लिया। "गलती मत कीजिए साहब! जो भी रात के वक्त काला टीला की तरफ गया है, वह कभी वापस नहीं आया। वहाँ पत्थरों से भी खून रिसता है!"
"हम देखेंगे कि वहाँ क्या रिसता है," विक्रांत ने अपना फैसला सुना दिया। "रमेश! गाड़ी निकालो।"
रात के नौ बज रहे थे। बीहड़ पर सन्नाटा छा चुका था।
विक्रांत ने अपने साथ तीन बहादुर सिपाहियों—रमेश, सुखदेव और जगतार को लिया था। सब के पास सर्विस राइफलें, भारी टॉर्च और वायरलेस सेट थे।
जीप जैसे-जैसे 'काला टीला' के रास्ते पर बढ़ रही थी, हवा में ठंडक और सड़ांध का असर बढ़ता जा रहा था। सड़क अब ख़त्म हो चुकी थी और केवल पत्थरों और झाड़ियों वाला कच्चा रास्ता बचा था। जीप के टायरों के नीचे पत्थरों के टूटने की भयानक आवाज आ रही थी।
"सर," पीछे बैठा सुखदेव बोला, "हवा में कुछ अजीब सी महक है। जैसे कपूर और सड़े हुए मांस को एक साथ जलाया गया हो।"
विक्रांत ने कोई जवाब नहीं दिया। उसका पूरा ध्यान सामने के रास्ते पर था। जीप की हेडलाइट्स की रोशनी में झाड़ियाँ अजीब आकार लेती दिख रही थीं।
अचानक, जीप के वायरलेस सेट से एक तेज चीख गूँजी—
शिशशश... बचाओ!... यह मुझे खींच रही है!... शिशशश...
विक्रांत ने तुरंत वायरलेस उठाया। "हेलो! कौन है? कंट्रोल रूम, क्या मेरी आवाज आ रही है?"
सामने से केवल डरावनी हँसी की आवाज आई—एक ऐसी हँसी जो औरत और पुरुष की मिली-जुली आवाज लग रही थी, और फिर वायरलेस खुद-ब-खुद बंद हो गया।
"सर, जीप आगे नहीं जा सकती," ड्राइविंग कर रहे रमेश ने गाड़ी रोकते हुए कहा। सामने रास्ता एक ढलान पर जाकर खत्म हो रहा था, जिसके आगे केवल घना जंगल और पत्थरों का एक विशाल टीला दिखाई दे रहा था।
काला टीला।
रात के अंधेरे में वह टीला किसी विशालकाय सोए हुए राक्षस जैसा लग रहा था। टीले के शिखर पर एक पुराने मंदिर के अवशेष दिख रहे थे, जो काले पत्थरों से बना था।
"सब अपनी टॉर्च चालू रखो और राइफलों का सेफ़्टी लॉक हटा लो," विक्रांत ने हुक्म दिया। "हम पैदल आगे बढ़ेंगे।"
चारों लोग जीप से नीचे उतरे। सन्नाटा इतना गहरा था कि उनके जूतों की आवाज भी गूँज रही थी। जंगल के अंदर चलते हुए विक्रांत ने गौर किया कि यहाँ न तो झींगुरों की आवाज थी और न ही किसी उल्लू की। कोई भी परिंदा या जानवर इस टीले के आसपास नहीं था।
जैसे ही उन्होंने टीले की चढ़ाई शुरू की, ज़मीन की बनावट बदलने लगी। मिट्टी का रंग काला था और उसमें से एक अजीब सा चिपचिपा लाल तरल पदार्थ रिसाव कर रहा था।
"सर... यह ज़मीन पसीज रही है," जगतार ने घबराकर टॉर्च की रोशनी नीचे डालते हुए कहा। "यह पानी नहीं है... यह खून है!"
"चुपचाप आगे बढ़ो!" विक्रांत ने उसे डांटा, हालाँकि खुद उसके माथे पर पसीने की बूँदें आ गई थीं।
वे धीरे-धीरे टीले के ऊपर बने मंदिर के अहाते में पहुँचे। मंदिर की दीवारें ढह चुकी थीं। दीवारों पर अजीब तंत्र-मंत्र के प्रतीक और छह उंगलियों वाले पंजों के निशान खुदे हुए थे। मंदिर के बीचों-बीच एक विशाल बलि-वेदी बनी थी, जिस पर सदियों पुराना सूखा खून जमा था।
तभी सुखदेव चिल्लाया, "सर! वहाँ देखो!"
विक्रांत ने अपनी टॉर्च की रोशनी उस दिशा में घुमाई जहाँ सुखदेव इशारा कर रहा था।
मंदिर के एक कोने में एक नवयुवक बाँधा हुआ था। उसके कपड़े फटे हुए थे और वह पूरी तरह से बेहोश था।
"यह तो सरपंच का गायब बेटा है!" रमेश ने पहचान लिया।
विक्रांत तुरंत दौड़कर उस युवक के पास पहुँचा और उसकी नब्ज जाँची। "यह ज़िंदा है! जल्दी करो, इसके बंधन खोलो!"
जैसे ही सिपाहियों ने उसे छुड़ाने के लिए रस्सियों को छुआ, पूरे मंदिर में एक जोरदार धमाका हुआ। मंदिर के चारों तरफ लगे सूखे बीहड़ के पेड़ों में अपने आप आग लग गई। नीली और लाल रंग की लपटें हवा में उठने लगीं।
हवा का तापमान अचानक शून्य से नीचे चला गया। सिपाहियों के मुँह से भाप निकलने लगी।
"विक्रांत..."
एक भारी, काँपती हुई आवाज पूरे मंदिर में गूँज उठी। यह आवाज किसी एक दिशा से नहीं आ रही थी; ऐसा लग रहा था जैसे ज़मीन के अंदर से और हवा की हर तरंग से यह शब्द निकल रहा हो।
"कौन है वहाँ? सामने आओ!" विक्रांत ने अपनी पिस्टल निकाल ली और चारों तरफ घुमाने लगा।
अचानक सुखदेव की चीख निकली।
विक्रांत ने पीछे मुड़कर देखा। सुखदेव हवा में तीन फीट ऊपर उठ चुका था। कोई अदृश्य ताकत उसका गला घोंट रही थी। उसके पैर हवा में तड़प रहे थे और उसकी आँखों की पुतलियाँ ऊपर की तरफ फिर गई थीं।
कड़क...
एक भयानक आवाज हुई और सुखदेव की गर्दन एक तरफ पूरी तरह मुड़ गई। उसकी राइफल हाथ से छूटकर नीचे गिरी और उसका बेजान शरीर ज़मीन पर आ गिरा।
"सुखदेव!" जगतार और रमेश पागलों की तरह गोली चलाने लगे।
धाँय! धाँय! धाँय!
गोलियाँ खाली हवा को चीरती हुई पत्थरों से टकराकर चिंगारियाँ पैदा कर रही थीं। वहाँ कोई निशाना साधने के लिए था ही नहीं।
तभी, बलि-वेदी के पीछे से एक साया बाहर निकला।
यह वही आकृति थी जिसे रामसिंह ने देखा था। उसकी मुड़ी हुई रीढ़, उलटे पैर और गाढ़े खून से सनी लाल-नीली आँखें। लेकिन इस बार उसके चारों ओर एक डरावनी लाल आभा चमक रही थी। उसके छह उंगलियों वाले हाथ में इंसानी रीढ़ की हड्डी का एक खंजर था, जिससे ताज़ा खून टपक रहा था।
"शावरा..." रमेश हकलाया और डर के मारे अपनी राइफल फेंककर पीछे की तरफ भागा।
लेकिन जैसे ही वह मंदिर के दरवाजे की तरफ बढ़ा, हवा में फैली नीली लपटें एक दीवार की तरह उसके सामने खड़ी हो गईं। रमेश उस आग से टकराया और भयानक चीख के साथ जलकर राख होने लगा। कुछ ही सेकंड में उसका केवल झुलसा हुआ कंकाल ज़मीन पर गिर पड़ा।
विक्रांत और जगतार अब अकेले बचे थे। सरपंच का बेहोश बेटा ज़मीन पर पड़ा था।
वह खौफनाक आकृति धीरे-धीरे विक्रांत की तरफ बढ़ने लगी। उसके उलटे पैरों के चलने की आवाज से पत्थर चटक रहे थे। सररर... घिससस...
"तुम कानून की बात करते थे न, दरोगा?" उस आकृति के विशाल खुले मुँह से आवाज आई। उसकी सड़ी हुई सांस विक्रांत के चेहरे से टकराई। "इस टीले पर केवल मेरा कानून चलता है। तीन सौ सालों से मुझे जिस खून की प्यास थी, आज वह पूरी होगी।"
विक्रांत का दिल इतनी जोर से धड़क रहा था कि उसे अपनी कनपटी पर नसों के फटने का अहसास हो रहा था। लेकिन उसने अपने हाथ से पिस्टल नहीं छोड़ी। उसने सीधे उस आकृति की सफेद आँखों में देखा।
"तुम जो भी पिशाच या छलावा हो," विक्रांत ने काँपती हुई लेकिन सख्त आवाज में कहा, "मैं तुमसे डरने वाला नहीं हूँ!"
विक्रांत ने पिस्टल का पूरा मैगज़ीन उस आकृति के सीने पर खाली कर दिया।
धाँय! धाँय! धाँय! धाँय!
हर गोली उस आकृति के शरीर के पार निकल गई, लेकिन उस पर कोई असर नहीं हुआ। वह हँसने लगी—एक ऐसी भयानक हँसी जिसने मंदिर की बची-कुची दीवारों को भी हिला दिया।
उसने अपना छह उंगलियों वाला हाथ उठाया और विक्रांत की तरफ बढ़ाया। विक्रांत को लगा जैसे उसके पूरे शरीर का खून जम गया हो। वह हिल भी नहीं पा रहा था।
शावरा की उंगलियाँ विक्रांत के चेहरे के बिल्कुल करीब पहुँच चुकी थीं। उसकी सड़ी हुई त्वचा का स्पर्श विक्रांत की गाल पर होने ही वाला था कि तभी...
सरपंच के बेटे की जेब से एक छोटी सी पुरानी तांबे की डिब्बी निकलकर ज़मीन पर गिर पड़ी और खुल गई।
डिब्बी के अंदर से एक अजीब सा पीला पाउडर बाहर बिखरा। जैसे ही शावरा का पैर उस पीले पाउडर से छुआ, उसके मुँह से एक भयानक चीख निकली—दर्द की चीख!
उसका पैर जलने लगा और उसमें से काला धुआँ निकलने लगा।
शावरा झटके से पीछे हटी। उसकी लाल-नीली आँखें गुस्से से उबलने लगीं।
"अधूरा... अभी बलि अधूरी है!" शावरा की आवाज गूँजी। "अमावस की रात को पूरा गाँव मेरा भोजन बनेगा!"
एक भयानक हवा का बवंडर उठा। कोहरा इतना घना हो गया कि हाथ को हाथ दिखाई देना बंद हो गया। जब दो मिनट बाद हवा शांत हुई और कोहरा थोड़ा छँटा, तो वह आकृति गायब हो चुकी थी।
नीली लपटें बुझ चुकी थीं।
मंदिर में केवल सुखदेव और रमेश के अवशेष पड़े थे, और ज़मीन पर पड़ा हुआ सरपंच का बेटा धीमी सांसें ले रहा था।
विक्रांत घुटनों के बल ज़मीन पर आ गिरा। उसकी पूरी वर्दी पसीने से भीग चुकी थी। आज उसने अपनी आँखों से उस खौफ को देखा था जिसे वह अब तक महज़ एक कहानी समझ रहा था।
उसने ज़मीन पर बिखरे उस पीले पाउडर की तरफ देखा। वह कोई साधारण राख नहीं थी—उसमें तंत्र-मंत्र के प्राचीन अक्षरों की गंध थी।
विक्रांत ने समझ लिया कि सरपंच ने उससे कुछ बहुत बड़ा रहस्य छिपाया है। सरपंच का बेटा इस टीले पर अकेला नहीं आया था, और वह तांबे की डिब्बी कोई आम चीज़ नहीं थी।
अमावस में अब सिर्फ दो दिन बचे थे।
विक्रांत ने काँपते हाथों से सरपंच के बेटे को अपने कंधे पर उठाया और जगतार को साथ लेकर नीचे जीप की तरफ भागा। उसे लग रहा था जैसे अँधेरे में से सैकड़ों आँखें उसे नीचे उतरते हुए देख रही हों।
कहानी अभी ख़त्म नहीं हुई थी; असली भयानक रात तो आषाढ़ की अमावस को आने वाली थी, जब शावरा का पूरा इतिहास और उसका भयानक रूप गाँव पर टूटने वाला था...