PretikaHorrorशावरा

भाग 1: काला टीला का अभिशाप

Yogesh Kumar Maurya · Horror · 12 मिनट

Writer
Yogesh Kumar Maurya
Story
शावरा
Chapter
1 of 5
Category
Horror
Reading time
12 min
Words
2273
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

भाग 1: काला टीला का अभिशाप
​रात के बारह बज रहे थे। चंबल के बीहड़ों को चीरती हुई वो सुनसान पक्की सड़क जैसे किसी वीरान दुनिया का रास्ता लग रही थी। चारों तरफ घना, जहरीला कोहरा फैला हुआ था—इतना गहरा कि जीप की हेडलाइट्स की पीली रोशनी भी कुछ फीट आगे जाकर धुंध में घुटकर दम तोड़ देती थी। हवलदार रामसिंह ने जीप के स्टीयरिंग व्हील पर अपनी पकड़ मजबूत की। उसकी हथेलियों से ठंडा पसीना निकलकर लेदर कवर पर फिसल रहा था।
​रामसिंह पुलिस विभाग में बीते बीस सालों से सेवा में था। उसने डकैतों के खौफनाक एनकाउंटर देखे थे, बीहड़ की रातों की कड़कड़ाती ठंड झेली थी, लेकिन आज रात का सन्नाटा कुछ अलग ही था। यह खामोशी खाली नहीं थी; इसमें एक अजीब सा भारीपन था, जैसे हवा खुद किसी खौफ से दबी जा रही हो।
​रेडियो पर केवल गर्जन (static noise) की आवाज आ रही थी—शिशशश... खड़-खड़-खड़... उसने खींचकर रेडियो बंद कर दिया। तभी उसकी पुरानी सरकारी महिंद्रा जीप ने झटका खाया।
​भक-भक... खड़-खड़-खड़!
​इंजन ने अंतिम सांस ली और जीप झटके के साथ रुक गई। हेडलाइट्स एक बार झपकीं और फिर अंधेरे में विलीन हो गईं। चारों तरफ एक ऐसा स्याह अंधेरा छा गया जो आँखें फाड़कर देखने पर भी कुछ नहीं दिखाता था।
​"धत् तेरे की!" रामसिंह ने गाल पर हाथ मारते हुए बोनट पर हाथ पटका। उसने जीप का चाबी घुमाई—क्लिक, क्लिक। बैटरी पूरी तरह से मर चुकी थी।
​जीप से बाहर निकलते ही कड़कड़ाती ठंड ने उसके जिस्म को सुइयों की तरह चुभाया। उसने अपनी भारी-भरकम टॉर्च निकाली और उसे चालू किया। टॉर्च की पतली बीम कोहरे में एक सफेद रास्ता बनाने लगी। उसने चारों तरफ नजर दौड़ाई। सड़क के दोनों ओर बबूल के कांटेदार, सूखे और विकृत पेड़ खड़े थे, जिनकी नंगी डालियाँ अंधेरे में किसी कंकाल की उंगलियों जैसी लग रही थीं।
​तभी, सूखी पत्तियों पर किसी के चलने की सरसराहट हुई।
​छन... छन... सर-सर...
​रामसिंह एकदम स्थिर हो गया। उसकी उंगलियाँ अपने आप उसकी कमर पर बंधी 'वेब्ली स्कॉट' रिवॉल्वर के होल्स्टर पर चली गईं। "कौन है वहाँ?" उसने कड़क आवाज में पूछा। लेकिन उसकी अपनी ही आवाज कोहरे में विलीन होकर एक भारी गूंज के साथ वापस लौटी।
​कोई जवाब नहीं आया। केवल हवा का रुख बदला।
​अचानक, बीहड़ के पेड़ों के बीच से एक ऐसी बदबू उठी कि रामसिंह का जी मिचलाने लगा। यह बदबू किसी आम सड़े हुए जानवर की नहीं थी; यह ऐसी सड़ांध थी जैसे सौ साल पुरानी कब्र को उधेड़कर अंदर बंद पानी और सड़ते मांस को बाहर बहा दिया गया हो।
​रामसिंह ने रूमाल निकालकर अपने मुंह पर लपेटा और टॉर्च की बीम को सामने सड़क की ओर घुमाया।
​सड़क के ठीक बीचों-बीच, लगभग पचास कदम की दूरी पर, एक आकृति खड़ी थी।
​कोहरा उस आकृति के चारों ओर इस तरह घूम रहा था जैसे वह कोई जीता-जागता इंसान न होकर खुद इस अंधेरे का हिस्सा हो। रामसिंह ने टॉर्च का प्रकाश उसकी तरफ केंद्रित किया।
​वह एक स्त्री की देह थी, लेकिन उसकी कद-काठी किसी सामान्य इंसान जैसी नहीं थी। उसकी पीठ इतनी मुड़ी हुई थी कि उसकी रीढ़ की हड्डी कपड़ों के बाहर से साफ दिखाई दे रही थी—जैसे किसी ने उसकी रीढ़ को बीच में से तोड़कर मोड़ दिया हो। उसके बाल घुटनों से भी नीचे तक लटक रहे थे, सूखे, उलझे हुए और कीचड़ से सने हुए।
​लेकिन सबसे भयावह बात उसके पैर थे।
​उसके दोनों पैर पूरी तरह पीछे की तरफ घूमे हुए थे। एड़ियाँ आगे थीं और उंगलियाँ पीछे। उसकी पैर की लंबी, काली, सड़ी हुई नसों से भरा पंजा सड़क के डामर को कुरेद रहा था।
​रामसिंह का दिल इतनी जोर से धड़कने लगा कि उसे लगा उसकी पसलियाँ टूट जाएंगी। बीस साल की नौकरी का सारा रोब और निडरता उस एक पल में वाष्प बनकर उड़ गई।
​"पी-पीछे हटो!" रामसिंह की आवाज कांप गई। उसने अपनी सर्विस रिवॉल्वर निकाली और दोनों हाथों से थामकर उस आकृति पर तान दी। "मैं आखिरी बार चेतावनी दे रहा हूँ, रामसिंह नाम है मेरा! आगे बढ़े तो गोली मार दूँगा!"
​वह आकृति नहीं रुकी। उसने चलना शुरू किया—या यूँ कहें कि वह घिसटने लगी। उसके उलटे पैर जब सड़क पर पड़ते, तो सूखी पत्तियों और कंकड़ों के पिसने की आवाज आती। सररर... घिससस...
​हर कदम के साथ सड़ांध बढ़ती जा रही थी। रामसिंह की आंखों में जलन होने लगी और उसके कानों में एक अजीब सी सीटी बजने लगी—एक ऐसी ध्वनि जो दिमाग की नसों को फाड़ने लगती है।
​"रुक जा!" रामसिंह ने ट्रिगर दबा दिया।
​धाँय!
​गोली की गूँज ने पूरे बीहड़ को हिलाकर रख दिया। बंदूक की नाली से निकला बारूद का धुआँ कोहरे में घुल गया। गोली सीधे उस आकृति के सीने में लगी होनी चाहिए थी, लेकिन वह आकृति टस से मस नहीं हुई। उसके शरीर से न कोई खून निकला, न ही उसने कोई दर्द का अहसास जताया।
​अब वह आकृति केवल दस कदम दूर थी।
​तभी उस आकृति ने अपना सिर पीछे की तरफ झुकाया। उसके बिखरे बालों के बीच से उसका चेहरा सामने आया।
​रामसिंह की चीख उसके गले में ही अटक कर रह गई।
​उस आकृति का चेहरा मांस रहित था—सूखी, काली पड़ती चमड़ी हड्डियों से चिपकी हुई थी। उसकी आँखें नहीं थीं; आँखों के गड्डों में सिर्फ सफेदी और खालीपन था, जिसमें से काला, गाढ़ा तरल पदार्थ बहकर उसकी ठोड़ी पर गिर रहा था।
​और फिर, उसने अपना मुँह खोला।
​उसका जबड़ा किसी अजगर की तरह नीचे की तरफ खिसकता ही चला गया। इंसान का मुँह इतना बड़ा कभी नहीं खुल सकता था। उसके मुँह के अंदर कोई जीभ नहीं थी, सिर्फ अनगिनत छोटे-छोटे कीड़े कुलबुला रहे थे।
​उसके भयानक खुले मुँह के अंदर से एक ऐसी चीख निकली जो किसी एक गले की आवाज नहीं थी। ऐसा लगा जैसे हज़ारों औरतों और बच्चों की चीखें एक साथ मिलकर हवा में गूँज रही हों। उस चीख की तरंगों से सड़क के किनारे की झाड़ियों में आग की तरह कंपन पैदा हुआ।
​और उस चीख के भयानक शोर के बीच, एक नाम गूँज उठा:
​"शा-व-रा..."
​जैसे ही वह नाम रामसिंह के कानों में पड़ा, उसके सिर के अंदर भयानक दर्द का विस्फोट हुआ। उसे लगा जैसे किसी ने उसके दिमाग में उबलता हुआ सीसा उड़ेल दिया हो। उसकी आँखों के सामने रोशनी धुँधली होने लगी। उसकी आँखों के कोरों से और कानों के छेदों से खून की पतली धार बहकर उसकी वर्दी पर गिरने लगी।
​रामसिंह के हाथ से रिवॉल्वर छूटकर सड़क पर गिर गई। वह अपने घुटनों के बल डामर पर आ गिरा। उसकी चेतना धीरे-धीरे खत्म हो रही थी, लेकिन उसके दिमाग में भयानक दृश्य छपने लगे—
​उसने देखा एक विशालकाय काला टीला, जिसके ऊपर एक प्राचीन, आधा टूटा हुआ मंदिर था। उस मंदिर के फर्श पर हज़ारों इंसानी खोपड़ियाँ रखी थीं, और एक बलि-वेदी पर कटा हुआ खून से लथपथ हाथ तड़प रहा था। उस हाथ में छह उंगलियाँ थीं।
​"शावरा..." वह आकृति अब रामसिंह के बिल्कुल सामने खड़ी थी। उसने अपना सड़ा हुआ, छह उंगलियों वाला हाथ उठाया और रामसिंह के चेहरे के करीब लाई।
​रामसिंह ने अपनी आखिरी सांस खींचते हुए ऊपर देखा। उस आकृति की सफेद आँखों में उसे अपनी ही मौत की छवि दिखाई दी।
​"बचाओ..." रामसिंह के मुँह से केवल एक फुसफुसाहट निकली।
​अगले ही क्षण, उस आकृति ने रामसिंह की छाती पर अपना छह उंगलियों वाला पंजा रख दिया। रामसिंह के शरीर में एक भयानक कंपन हुआ, उसकी आँखें पूरी तरह ऊपर की ओर उलट गईं, और उसकी आत्मा उस बीहड़ के काले सन्नाटे में खींच ली गई।
​सुबह के छह बज रहे थे।
​सूर्य की किरणें बीहड़ के कोहरे को फाड़ने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन वातावरण में अभी भी एक अजीब सा पीलापन और भारीपन बना हुआ था।
​काला टीला गाँव के मुहाने पर बनी पुलिस चौकी के बाहर इंस्पेक्टर विक्रांत अपनी सरकारी जीप से उतरा। विक्रांत एक कड़क, युवा और लॉजिक पर यकीन करने वाला पुलिस अफसर था। शहर से तबादला होकर इस बीहड़ के इलाके में आना उसके लिए किसी सजा से कम नहीं था। यहाँ के लोग अंधविश्वासी थे, और पुलिस महकमा भी पुराने ढर्रे पर चलता था।
​"सर!" एक सिपाही दौड़ता हुआ आया। उसका चेहरा पीला पड़ा हुआ था और उसके हाथ काँप रहे थे।
​"क्या हुआ, रमेश? इतना घबराए हुए क्यों हो?" विक्रांत ने अपना चश्मा उतारते हुए पूछा।
​"सर... हवलदार रामसिंह जी... उनकी जीप मिली है। बीहड़ वाले मोड़ पर।"
​"तो? जीप खराब हो गई होगी। इतनी सी बात पर तुम्हारे चेहरे का रंग क्यों उड़ा हुआ है?"
​"सर... आप खुद चलकर देख लीजिए। मामला... मामला बहुत खराब है।" रमेश की आवाज में खौफ साफ छलक रहा था।
​विक्रांत ने कोई बहस नहीं की। वह तुरंत अपनी जीप में बैठा और सिपाही को साथ लेकर बीहड़ वाले मोड़ की तरफ बढ़ गया।
​पाँच मिनट में वे घटनास्थल पर पहुँच गए। वहाँ पहले से ही तीन-चार सिपाही खड़े थे, लेकिन कोई भी जीप के करीब जाने की हिम्मत नहीं कर रहा था।
​विक्रांत जीप से उतरा और आगे बढ़ा। सामने रामसिंह की महिंद्रा जीप खड़ी थी। जीप का ड्राइवर साइड का दरवाजा खुला हुआ था।
​और सामने का नजारा देखकर विक्रांत का कड़ा स्वभाव भी एक पल के लिए काँप उठा।
​हवलदार रामसिंह जीप के बोनट के पास ज़मीन पर पड़ा हुआ था। उसकी देह पूरी तरह एंठी हुई थी, जैसे उसे बहुत तेज बिजली का झटका लगा हो। उसकी आँखें पूरी तरह खुली थीं और ऊपर की ओर मुड़ी हुई थीं, जिनमें केवल सफेदी दिख रही थी। उसके कानों, नाक और आँखों से सूखा हुआ खून जमा हुआ था।
​लेकिन सबसे भयावह बात रामसिंह का शरीर नहीं था।
​रामसिंह की छाती की वर्दी फटी हुई थी। उसकी नंगे सीने की हड्डी पूरी तरह से अंदर धँसी हुई थी, जैसे किसी विशालकाय भारी चीज़ ने उस पर प्रहार किया हो। और उस धँसे हुए सीने पर काले खून से एक निशान बना हुआ था—एक पंजे का निशान, जिसमें पाँच नहीं, बल्कि छह उंगलियाँ थीं।
​"यह क्या बकवास है?" विक्रांत ने आगे बढ़कर रामसिंह की नब्ज जाँची। शरीर बर्फ की तरह ठंडा पड़ चुका था और अकड़ गया था। "मेडिकल टीम को फोन क्यों नहीं किया अभी तक?"
​"सर... यहाँ बीहड़ में नेटवर्क नहीं आता," रमेश ने काँपते हुए कहा। "और सर... यह काम किसी इंसान का नहीं है। यह... यह 'शावरा' का काम है।"
​विक्रांत ने मुड़कर रमेश को घूरकर देखा। "शावरा? यह क्या फालतू नाम ले रहे हो? कोई जंगली जानवर होगा या किसी डकैत गिरोह का काम है।"
​"नहीं सर!" पास ही खड़ा एक बुजुर्ग डाकिया, जो गाँव का ही रहने वाला था, आगे आया। उसने अपने हाथ जोड़ रखे थे। "साहब, यह डकैत का काम नहीं है। डकैत गोली मारते हैं, लूटते हैं। डकैत किसी का खून निचोड़कर उसके सीने पर छह उंगलियों का पंजा नहीं छापते। यह शावरा का ही अभिशाप है। काला टीला में जब-जब रात को कोहरा गहराता है, शावरा जागती है!"
​"बस करो तुम लोग!" विक्रांत चिल्लाया। "एक पुलिस अफसर की हत्या हुई है और तुम लोग यहाँ भूत-प्रेत की कहानियाँ गढ़ रहे हो? मुझे सबूत चाहिए!"
​विक्रांत ने जमीन पर पड़ी रामसिंह की सर्विस रिवॉल्वर उठाई। रिवाल्वर का एक चैंबर खाली था।
​'रामसिंह ने गोली चलाई थी,' विक्रांत ने मन ही मन सोचा। 'उसने किसी पर हमला किया था। लेकिन गोली का खोखा कहाँ है? और अगर गोली लगी, तो हमलावर का खून कहाँ है?'
​विक्रांत ने टॉर्च जलाकर ज़मीन का मुआयना करना शुरू किया। ज़मीन पर रामसिंह के जूतों के निशान थे। लेकिन रामसिंह के जूतों के निशानों के ठीक सामने कुछ ऐसे निशान थे जिन्हें देखकर विक्रांत के होश उड़ गए।
​वे किसी नंगे पैर के निशान थे। लेकिन वे निशान सामान्य नहीं थे।
​पैर का अंगूठा पीछे की तरफ था और एड़ी आगे की तरफ। और वे निशान ज़मीन पर छपे नहीं थे, बल्कि ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने डामर की पक्की सड़क को जलाकर या पिघलाकर वे निशान बनाए हों।
​विक्रांत ने अपना हाथ उन पैरों के निशानों के करीब ले जाने की कोशिश की। अभी उसका हाथ निशान से दो इंच दूर ही था कि उसे भयानक गर्मी का अहसास हुआ, जैसे नीचे कोई दहकता हुआ कोयला रखा हो।
​"यह... यह कैसे मुमकिन है?" विक्रांत के मुँह से अनजाने में निकला।
​तभी जीप के बोनट पर विक्रांत की नज़र पड़ी।
​महिंद्रा जीप के लोहे के बोनट पर ताज़ा खून से कुछ लिखा हुआ था। खून अभी भी पूरी तरह सूखा नहीं था, उसमें से पतली-पतली भाप निकल रही थी।
​विक्रांत ने ध्यान से देखा। देवनागरी लिपि में बहुत ही विकृत तरीके से लिखा गया था:
​"अगला नंबर तेरा है, दरोगा..."
​और उस लिखे हुए के ठीक नीचे, वही छह उंगलियों वाला पंजे का निशान बना हुआ था।
​विक्रांत का दिमाग चकरा गया। वह एक पढ़ा-लिखा, विज्ञान पर भरोसा करने वाला इंसान था। उसने अपनी जिंदगी में कभी इन सब बातों पर यकीन नहीं किया था। लेकिन अपनी आँखों के सामने मौजूद इन सबूतों को वह कैसे नकारता? रामसिंह की मौत, उलटे पैरों के निशान, लोहे पर जलते हुए खून का निशान...
​"सर..." रमेश ने दबी ज़ुबान में कहा। "यहाँ से चलिए। सूरज ढलने से पहले हमें यह देह यहाँ से हटानी होगी। अगर रात यहाँ हो गई, तो हममें से कोई ज़िंदा वापस नहीं जाएगा।"
​विक्रांत ने एक गहरी सांस ली। उसने अपना चश्मा साफ किया और फिर से पहना। उसकी आँखों में डर की जगह अब एक अजीब सी जिद्द ने ले ली थी।
​"जीप में डालो बॉडी को," विक्रांत ने सख्त लहजे में हुक्म दिया। "और गाँव के सरपंच को खबर करो। मुझे 'काला टीला' का पूरा इतिहास जानना है। आज रात ही।"
​सिपाहियों ने डरते-डरते रामसिंह के शव को उठाया और जीप के पीछे रखा।
​विक्रांत वहीं खड़ा रहा और दूर बीहड़ की पहाड़ियों की तरफ देखने लगा। दूर, घने जंगलों के बीच, एक ऊँचे टीले पर एक पुराने मंदिर का शिखर धुंध में दिखाई दे रहा था। वह 'काला टीला' था।
​हवा का एक झोंका आया। उस हवा में विक्रांत को फिर से वही सड़ी हुई लाश जैसी बदबू महसूस हुई। और कान के बहुत करीब, जैसे कोई बिल्कुल पीछे खड़ा होकर फुसफुसा रहा हो, एक आवाज गूँजी:
​"शावरा..."
​विक्रांत ने झटके से पीछे मुड़कर देखा।
​पीछे कोई नहीं था। केवल सूखा बबूल का पेड़ था, जिसकी एक डाल हवा में इस तरह हिल रही थी जैसे कोई उसे अपनी तरफ बुला रहा हो।
​अभिशाप की शुरुआत हो चुकी थी, और विक्रांत इस भयानक दलदल में बहुत गहरे उतरने वाला था...
क्रमश:

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