PretikaTantrik & Black Magicअघोरी

पहला भाग — चालीस रातों का सौदा

Pretika · Tantrik & Black Magic · 14 मिनट

Writer
Pretika
Story
अघोरी
Chapter
1 of 2
Category
Tantrik & Black Magic
Reading time
14 min
Words
2772
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

आगे बढ़ने से पहले एक बात बता दूँ। ये कहानी मुझ तक कैसे पहुँची — ये मैं तुम्हें कहानी के आख़िर में बताऊँगा। बस इतना समझ लो कि जिस इंसान की ये कहानी है, उसका नाम था — दीपक। दीपक वर्मा। और ये उन्हीं के शब्दों में, उन्हीं की ज़ुबानी, मैं तुम तक पहुँचा रहा हूँ।

तो चलो, चलते हैं आज से कोई सात-आठ साल पीछे… एक छोटे से क़स्बे में, जहाँ शहर की रौशनी अभी ठीक से पहुँची भी नहीं थी।

दीपक की उम्र यही कोई छब्बीस-सत्ताईस साल रही होगी। घर में बस तीन लोग थे — दीपक, उसकी बूढ़ी माँ, और दीपक के पिता। पिता जी शहर की एक मिल में काम करते थे। बहुत बड़ी कमाई नहीं थी, लेकिन घर की गाड़ी चल रही थी। हँसी-ख़ुशी नहीं, तो कम से कम इतना सुकून ज़रूर था कि रात को दो वक़्त की रोटी थी, और सिर पर एक छत थी।

फिर एक दिन… सब कुछ बदल गया।

पिता जी को अचानक सीने में दर्द उठा। अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टरों ने कहा — दिल का दौरा। इलाज लंबा चलेगा, और महँगा भी। दीपक के पास इतने पैसे कहाँ थे? उसने वही किया, जो हमारे यहाँ हर मजबूर आदमी करता है — गाँव के सबसे बड़े साहूकार, रघुवीर महाजन के पास गया।

रघुवीर महाजन… इस नाम से पूरे क़स्बे के लोग काँपते थे। पैसा तो वो दे देता था, लेकिन उसका ब्याज इंसान की हड्डियाँ तक निचोड़ लेता था। दीपक ने अपनी ज़मीन के काग़ज़ गिरवी रखे, और इलाज के लिए पैसे ले आया।

लेकिन क़िस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था।

तीन महीने अस्पताल में लड़ने के बाद, एक बरसात की रात, पिता जी चल बसे। दीपक के सिर से बाप का साया उठ गया, और उसके कंधों पर छूट गया एक ऐसा क़र्ज़, जो पहाड़ जैसा था।

अब घर में सिर्फ़ दो लोग बचे थे — दीपक और उसकी माँ। और माँ… बेटे के इस ग़म में, इस सदमे में, ख़ुद बिस्तर पकड़ बैठी। कभी बुख़ार, कभी कमज़ोरी। शरीर दिन-ब-दिन सूखता जा रहा था।

दीपक ने बहुत हाथ-पैर मारे। छोटी-मोटी नौकरियाँ कीं, दुकानों पर काम किया, दिन-रात मेहनत की। लेकिन जितना कमाता, उससे कहीं ज़्यादा तो महाजन का ब्याज खा जाता। और हर महीने की पहली तारीख़ को, रघुवीर महाजन अपने आदमियों के साथ दीपक के दरवाज़े पर आ खड़ा होता।

“पैसे कब दोगे, दीपक?” वो अपनी मूँछों पर हाथ फेरते हुए कहता। “ज़मीन तो पहले ही गिरवी है। अब तो बस एक ही चीज़ बची है तुम्हारे पास — ये घर। और अगर अगले महीने पैसे नहीं मिले, तो ये घर भी मेरा।”

दीपक के पास कोई जवाब नहीं होता। वो बस अपनी बीमार माँ की तरफ़ देखता, जो अंदर खाट पर पड़ी खाँस रही होती, और उसकी आँखें भर आतीं।

रात को जब पूरा क़स्बा सो जाता, दीपक अपने आँगन में अकेला बैठा, आसमान की तरफ़ देखता रहता। और मन ही मन ऊपरवाले से एक ही सवाल पूछता — ‘मैंने ऐसा क्या पाप किया था, जो तूने मुझे ये दिन दिखाया?’

लेकिन आसमान ख़ामोश रहता। हमेशा की तरह।

और यहीं से… इस कहानी का असली अँधेरा शुरू होता है।

एक शाम, दीपक क़स्बे के बाहर वाले चाय के ढाबे पर बैठा था। जेब में इतने भी पैसे नहीं थे कि एक कप चाय ठीक से पी सके। तभी वहाँ बैठे एक बूढ़े आदमी ने उसकी तरफ़ देखा। वो बूढ़ा अक्सर वहीं बैठा रहता था — मैला-कुचैला कुर्ता, सफ़ेद दाढ़ी, और आँखों में एक अजीब सी गहराई।

“बहुत परेशान लग रहे हो, बेटा,” बूढ़े ने कहा।

दीपक ने एक ठंडी साँस ली। “परेशानी ऐसी है, बाबा, कि अब तो लगता है ऊपरवाला भी मेरी नहीं सुनता।”

बूढ़ा कुछ देर चुप रहा। फिर धीरे से बोला — “ऊपरवाले की मत सुनवाओ, बेटा। कभी-कभी हमारी सुनने के लिए… कोई और भी होता है।”

दीपक ने चौंककर उसकी तरफ़ देखा। “कौन?”

बूढ़े ने अपनी आवाज़ धीमी कर ली, जैसे कोई राज़ बता रहा हो। “नदी के उस पार, श्मशान घाट के पीछे, एक अघोरी रहता है। लोग कहते हैं… वो जो माँगो, वो दे देता है। बड़े से बड़ा दुःख पल भर में दूर कर देता है। लेकिन…”

“लेकिन क्या, बाबा?”

बूढ़े ने दीपक की आँखों में सीधे देखा। “लेकिन जो एक बार उसके पास चला जाता है, बेटा… वो पहले जैसा कभी नहीं रहता।”

ये कहकर बूढ़ा उठा, और धीरे-धीरे अँधेरे में कहीं ग़ायब हो गया। दीपक वहीं बैठा रह गया — उन शब्दों के साथ, जो उसके दिमाग़ में किसी कील की तरह धँस चुके थे।

उस रात दीपक सो नहीं पाया। बूढ़े के वो शब्द बार-बार उसके कानों में गूँज रहे थे — ‘जो माँगो, वो दे देता है।’

एक तरफ़ उसकी बीमार माँ थी, जिसकी दवा के भी पैसे नहीं थे। दूसरी तरफ़ महाजन का क़र्ज़, जो हर दिन उसकी गर्दन पर फँदे की तरह कसता जा रहा था। और तीसरी तरफ़ थी वो चेतावनी — ‘वो पहले जैसा कभी नहीं रहता।’

तीन रातों तक दीपक इसी कशमकश में जलता रहा। और चौथी रात… उसने फ़ैसला कर लिया।

अमावस की रात थी। आसमान में एक भी तारा नहीं था, जैसे किसी ने पूरी दुनिया के ऊपर एक काली चादर तान दी हो। दीपक ने अपनी सोती हुई माँ के माथे पर हाथ रखा, और घर से निकल पड़ा।

क़स्बे से नदी तक का रास्ता क़रीब दो घंटे का था। जैसे-जैसे वो नदी के पास पहुँचता गया, हवा में एक अजीब सी बदबू घुलने लगी — जली हुई लकड़ी की, और… कुछ और की। नदी पार करके वो श्मशान घाट पहुँचा।

और जो उसने वहाँ देखा, उससे उसकी रूह काँप उठी।

चारों तरफ़ अँधेरा। बुझी हुई चिताओं से अभी भी हल्का-हल्का धुआँ उठ रहा था। इंसानी हड्डियों के टुकड़े यहाँ-वहाँ बिखरे पड़े थे। और उस सन्नाटे में सिर्फ़ एक आवाज़ थी — नदी के बहते पानी की, जो किसी के रोने जैसी लग रही थी।

घाट के सबसे पीछे, एक पुराने बरगद के पेड़ के नीचे, एक छोटी सी आग जल रही थी। और उस आग के सामने… वो बैठा था।

अघोरी।

उसका पूरा शरीर राख से पुता हुआ था। लंबी, उलझी हुई जटाएँ। गले में इंसानी खोपड़ियों की माला। और आँखें… लाल, जैसे उनमें ख़ुद कोई चिता जल रही हो। वो बिल्कुल हिल नहीं रहा था — किसी पत्थर की मूरत की तरह। दीपक के क़दम वहीं जम गए। उसका गला सूख गया। वो वापस भागना चाहता था, लेकिन उसके पैर जैसे ज़मीन में गड़ गए थे।

तभी, बिना पलटे, बिना हिले, उस अघोरी की भारी आवाज़ उस सन्नाटे को चीरती हुई गूँजी —

“आ गया, दीपक?”

दीपक की साँस अटक गई। उसने तो अभी अपना नाम बताया भी नहीं था। फिर इस अघोरी को उसका नाम कैसे पता?

“डर मत,” अघोरी ने कहा, और धीरे से पलटा। “जो यहाँ तक आ जाता है, मैं उसके बारे में सब जान जाता हूँ। तेरे मन का हर दुःख, तेरे दिल का हर ज़ख़्म… मैं देख सकता हूँ। बोल, क्या चाहिए तुझे?”

दीपक की आँखों से आँसू बहने लगे। महीनों से जो दर्द उसके सीने में दबा था, वो फूट पड़ा। “बाबा… मेरी माँ बीमार है। घर पर पहाड़ जैसा क़र्ज़ है। मैं दिन-रात मेहनत करता हूँ, फिर भी कुछ नहीं बचता। मुझे बस इतना चाहिए कि मेरा क़र्ज़ उतर जाए, और मेरी माँ ठीक हो जाए। बस इतना कर दो, बाबा। इसके बदले मैं जो कहोगे, करूँगा।”

अघोरी कुछ देर उसे घूरता रहा। फिर उसके होंठों पर एक टेढ़ी सी मुस्कान आई — एक ऐसी मुस्कान, जिसमें कोई गर्मजोशी नहीं थी।

“ठीक है,” वो बोला। “मैं तेरी मनोकामना पूरी करूँगा। लेकिन इसके लिए तुझे मेरी कुछ शर्तें माननी होंगी। और सुन ले, दीपक — ये शर्तें कोई मामूली शर्तें नहीं हैं। इन्हें तोड़ा, तो अंजाम… मौत से भी बदतर होगा।”

दीपक ने काँपते हुए सिर हिलाया।

अघोरी ने आग के पास से एक छोटी सी पोटली उठाई, और दीपक की तरफ़ बढ़ा दी। “इसमें दो चीज़ें हैं। एक — श्मशान की राख। और दूसरी — एक हड्डी। इंसान की उँगली की हड्डी।”

दीपक ने काँपते हाथों से वो पोटली पकड़ ली। उसे छूते ही, एक अजीब सी ठंडक उसके पूरे बदन में दौड़ गई।

“अब ध्यान से सुन,” अघोरी की आवाज़ गहरी हो गई। “पहली शर्त — ये राख, हर रात सोने से पहले, तू अपने घर की दहलीज़ पर लगाएगा। दरवाज़े के ठीक बाहर।”

“दूसरी शर्त — ये हड्डी, हमेशा अपने पास रखेगा। दिन हो या रात, इसे कभी ख़ुद से दूर मत करना। और सबसे ज़रूरी — इसे कभी पानी के पास, और कभी आग के पास मत ले जाना। जिस दिन इस हड्डी को आग छू गई… सब ख़त्म हो जाएगा।”

“और तीसरी शर्त…” — अघोरी यहाँ रुका, और उसकी लाल आँखें दीपक की आँखों में गड़ गईं — “…आज से चालीस रातों तक, हर रात, ठीक तीन बजकर तैंतीस मिनट पर, तेरे दरवाज़े पर दस्तक होगी। खट… खट… खट…”

“चाहे कुछ भी हो जाए, दीपक — तू वो दरवाज़ा नहीं खोलेगा। दस्तक का जवाब नहीं देगा। और सबसे बड़ी बात — तू उन दस्तकों को गिनेगा नहीं।”

“जिस रात तूने वो दस्तकें गिन लीं… उस रात ‘वो’ समझ जाएगा कि तू सुन रहा है। और फिर… फिर तुझे कोई नहीं बचा सकता। इकतालीसवीं रात, तेरी मनोकामना पूरी हो जाएगी। बस चालीस रातें, दीपक। चालीस रातें ख़ुद को रोक लेना।”

दीपक का पूरा शरीर पसीने से भीग चुका था। “ल-लेकिन बाबा… वो दस्तक कौन देगा? दरवाज़े के बाहर कौन होगा?”

अघोरी हँसा। एक ऐसी हँसी, जो उस पूरे श्मशान में गूँज गई।

“ये मत पूछ, दीपक,” वो बोला। “बस इतना याद रखना — दरवाज़ा मत खोलना, और गिनती मत करना। अब जा। तेरे पास वक़्त कम है।”

दीपक ने पोटली को अपने सीने से लगाया, और वहाँ से भागा। पीछे मुड़कर देखने की हिम्मत उसमें नहीं थी। लेकिन उसे ऐसा लगा… जैसे पूरे रास्ते, कोई चीज़ उसके पीछे-पीछे चल रही हो।

घर पहुँचते-पहुँचते सुबह होने को आई थी। दीपक ने वैसा ही किया, जैसा अघोरी ने कहा था। उसने पोटली में से थोड़ी सी राख निकाली, और घर की दहलीज़ पर, दरवाज़े के ठीक बाहर, एक लकीर खींच दी। हड्डी को उसने एक कपड़े में लपेटकर अपनी जेब में रख लिया।

पहला दिन आराम से गुज़र गया। लेकिन जैसे-जैसे रात होने लगी, दीपक के दिल की धड़कन तेज़ होती गई। उसने घड़ी की तरफ़ देखा। दस बजे… ग्यारह बजे… बारह बजे। माँ अंदर वाले कमरे में सो रही थी। दीपक बाहर वाले कमरे में, दरवाज़े के सामने, आँखें फाड़े बैठा था।

एक बजा… दो बजा… और फिर, धीरे-धीरे, घड़ी की सुई तीन बजकर तैंतीस मिनट पर पहुँची।

और तभी…

खट।

दीपक का दिल जैसे रुक गया।

खट… खट।

दरवाज़े पर दस्तक हो रही थी। धीमी, ठहरी हुई — जैसे कोई बहुत आराम से, बहुत इत्मीनान से दरवाज़ा खटखटा रहा हो। दीपक ने अपनी साँस रोक ली। उसने अपने दोनों हाथों से अपने कान बंद कर लिए, आँखें कसकर मींच लीं, और मन ही मन भगवान का नाम लेने लगा।

‘गिनती मत करना। गिनती मत करना, दीपक।’

दस्तकें चलती रहीं। पूरे… शायद दो मिनट तक। और फिर, अचानक, सब कुछ ख़ामोश हो गया। इतना ख़ामोश, कि दीपक को अपने ही दिल की धड़कन साफ़ सुनाई दे रही थी।

उसने हिम्मत करके दरवाज़े की झिरी से बाहर झाँका।

बाहर कोई नहीं था। सिर्फ़ खाली आँगन, और दहलीज़ पर खिंची हुई राख की वो लकीर — जो अब पहले से थोड़ी बिखरी हुई लग रही थी।

उस रात दीपक सो नहीं पाया। लेकिन उसने ख़ुद को समझाया — ‘बस चालीस रातें। सिर्फ़ चालीस रातें।’

और फिर, अगली सुबह… कुछ ऐसा हुआ, जिसकी दीपक ने कल्पना भी नहीं की थी।

सुबह-सुबह क़स्बे में एक ख़बर फैली। रघुवीर महाजन — वही साहूकार, जो दीपक की जान का दुश्मन बना हुआ था — रात को अपनी नींद में ही चल बसा। बिल्कुल ठीक-ठाक सोया था, और सुबह उठा ही नहीं। डॉक्टरों ने कहा — दिल का दौरा। लेकिन जो लोग उसकी लाश देखकर आए, वो कुछ और ही कह रहे थे। उन्होंने कहा — महाजन के चेहरे पर मरते वक़्त इतनी दहशत थी, जैसे उसने मरने से पहले कुछ ऐसा देख लिया हो, जो इंसानों को नहीं देखना चाहिए। और उसके गले पर… किसी के हाथों के काले निशान थे।

दीपक के पूरे बदन में झुरझुरी दौड़ गई।

महाजन के मरते ही, उसका पूरा कारोबार बिखर गया। उसके बेटे आपस में लड़ पड़े। और उस अफ़रा-तफ़री में, दीपक की गिरवी रखी ज़मीन के काग़ज़… कहीं खो गए। जो क़र्ज़ पहाड़ जैसा लग रहा था, वो पल भर में हवा हो गया। किसी को याद ही नहीं रहा कि दीपक पर कोई उधार भी था।

दीपक को समझ नहीं आ रहा था कि वो ख़ुश हो, या डर जाए। उसकी सबसे बड़ी मुसीबत ख़त्म हो चुकी थी। लेकिन किस क़ीमत पर?

उसने अपनी जेब में रखी उस हड्डी को छुआ। वो पहले से भी ज़्यादा ठंडी हो चुकी थी।

दिन बीतते गए। हर रात, ठीक तीन बजकर तैंतीस मिनट पर, वो दस्तक होती। और हर रात, दीपक अपने कान बंद करके, आँखें मींचकर, ख़ुद को रोके रखता — गिनती मत करना, गिनती मत करना।

और हर दस्तक के बाद, उसकी ज़िंदगी में कुछ न कुछ अच्छा होता।

एक दिन, उसके एक दूर के रिश्तेदार, जिनसे बरसों से कोई बात नहीं हुई थी, गुज़र गए। और वसीयत में उन्होंने अपनी सारी जायदाद… दीपक के नाम कर दी। दीपक को तो पता भी नहीं था कि उन रिश्तेदार को उसका नाम तक याद है।

रातों-रात दीपक के पास पैसा आ गया। इतना पैसा, जितना उसने अपनी पूरी ज़िंदगी में नहीं देखा था। उसने माँ के इलाज के लिए शहर के सबसे बड़े डॉक्टर बुलवाए। नई दवाइयाँ आईं। और धीरे-धीरे, माँ की तबीयत सुधरने लगी।

बाहर से देखने पर, दीपक की ज़िंदगी जन्नत बन चुकी थी। क़र्ज़ ख़त्म। पैसा भरपूर। माँ ठीक हो रही थी।

लेकिन अंदर से… दीपक हर रात थोड़ा-थोड़ा मरता जा रहा था।

क्योंकि वो दस्तकें अब बदलने लगी थीं।

शुरू में वो सिर्फ़ ‘खट-खट’ थी। लेकिन अब… अब उन दस्तकों के साथ कुछ और भी सुनाई देने लगा था।

एक रात, दस्तक के बीच, दीपक ने साफ़ सुना — कोई उसका नाम पुकार रहा था। “दीपक… दीपक… दरवाज़ा खोल।” वो आवाज़ फुसफुसाहट जैसी थी, ठीक दरवाज़े के उस पार से आ रही थी।

एक और रात, वो आवाज़ बदल गई। इस बार वो आवाज़… उसके मरे हुए पिता की थी। “बेटा, मैं हूँ। तेरा बाप। दरवाज़ा खोल, बेटा। बाहर बहुत ठंड है।” दीपक की आँखों से आँसू बहने लगे। उसका दिल चाह रहा था कि वो दौड़कर दरवाज़ा खोल दे। लेकिन उसके दिमाग़ में अघोरी के शब्द गूँज रहे थे — ‘दरवाज़ा मत खोलना।’

उसने अपने आँसू पोंछे, और ख़ुद को रोके रखा।

लेकिन हर गुज़रती रात के साथ, ख़ुद को रोकना मुश्किल होता जा रहा था। दीपक की नींद उड़ चुकी थी। उसकी आँखों के नीचे काले घेरे पड़ गए थे। वो दिन में भी चौंक-चौंक जाता। कभी-कभी तो उसे लगता, जैसे दिन के उजाले में भी, कहीं दूर से, बहुत धीमे-धीमे, कोई दरवाज़ा खटखटा रहा हो।

तीसवीं रात आते-आते, दीपक एक जीती-जागती लाश बन चुका था। शरीर था, लेकिन उसमें जान नहीं थी। बस दस रातें और बची थीं। सिर्फ़ दस।

और फिर आई… इकतीसवीं रात।

उस रात मौसम बहुत ख़राब था। बाहर तेज़ हवा चल रही थी, और रह-रहकर बिजली कड़क रही थी। दीपक हमेशा की तरह दरवाज़े के सामने बैठा था। घड़ी ने तीन बजकर तैंतीस मिनट का वक़्त दिखाया।

खट… खट… खट।

दस्तक शुरू हुई। दीपक ने अपने कान बंद किए। लेकिन तभी…

दरवाज़े के उस पार से एक आवाज़ आई, जिसने दीपक का ख़ून जमा दिया।

वो उसकी माँ की आवाज़ थी।

“दीपक! बेटा, दरवाज़ा खोल! मैं बाहर फँस गई हूँ! बहुत ठंड लग रही है बेटा, मुझे अंदर आने दे! दीपक!”

दीपक के होश उड़ गए। वो आवाज़ बिल्कुल उसकी माँ की थी — वही तड़प, वही दर्द। उसका पूरा जिस्म काँपने लगा। वो उठा, और दौड़कर अंदर वाले कमरे की तरफ़ भागा — ये देखने के लिए कि उसकी माँ अंदर है, या बाहर।

उसने कमरे में झाँका।

उसकी माँ… अंदर, अपनी खाट पर, गहरी नींद में सो रही थी। बिल्कुल सलामत।

दीपक की साँस अटक गई। फिर… बाहर वो कौन था, जो उसकी माँ की आवाज़ में उसे पुकार रहा था?

उसने वापस दरवाज़े की तरफ़ देखा। बाहर से अभी भी वो आवाज़ आ रही थी — “दीपक! दरवाज़ा खोल!” — लेकिन अब उस आवाज़ में एक अजीब सी खनक थी, जैसे कोई उसकी माँ की आवाज़ की नक़ल उतार रहा हो… और उसे नक़ल उतारने में मज़ा आ रहा हो।

दीपक वहीं फ़र्श पर बैठ गया, और अपने घुटनों में सिर छुपाकर रोने लगा। वो टूट चुका था। पूरी तरह।

और यहीं… उससे वो ग़लती हो गई, जिसकी उसे इजाज़त नहीं थी।

उस रात, इतने डर में, इतनी दहशत में, दीपक का दिमाग़ ख़ुद-ब-ख़ुद उन दस्तकों को गिनने लगा। वो रोकना चाहता था, लेकिन उसका दिमाग़ उसके क़ाबू में नहीं था।

एक… दो… तीन… चार…

‘नहीं! रुक जा, दीपक! गिनती मत कर!’

…पाँच… छह… सात…

उसने अपने आपको रोकने की पूरी कोशिश की, लेकिन जितना वो रोकता, उतना ही उसका दिमाग़ गिनता जाता।

…आठ… नौ… दस।

और जैसे ही उसने ‘दस’ गिना…

सब कुछ रुक गया।

हवा रुक गई। बिजली रुक गई। दस्तक रुक गई। पूरी दुनिया में एक अजीब सा, भारी सन्नाटा छा गया — इतना भारी, कि दीपक को अपने कानों में दर्द होने लगा।

और फिर, उस सन्नाटे में, एक आवाज़ आई।

लेकिन इस बार वो आवाज़… दरवाज़े के बाहर से नहीं आई।

वो आवाज़ आई… दीपक के ठीक पीछे से। कमरे के अंदर से।

एक धीमी, फुसफुसाती हुई आवाज़, जो सीधे उसके कान में बोली —

“तूने… गिन लिया।”

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