PretikaTantrik & Black Magicअघोरी

दूसरा भाग — ज़ंजीर टूट गई

Pretika · Tantrik & Black Magic · 11 मिनट

Writer
Pretika
Story
अघोरी
Chapter
2 of 2
Category
Tantrik & Black Magic
Reading time
11 min
Words
2126
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

दीपक पलटा।

कमरे में कोई नहीं था। लेकिन हवा में एक बदबू फैल चुकी थी — वही बदबू, जो उसने श्मशान घाट पर सूँघी थी। जली हुई लाश की बदबू।

उस रात के बाद, सब कुछ बदल गया।

दस्तकें अब सिर्फ़ रात को तीन बजकर तैंतीस मिनट पर नहीं होती थीं। अब वो कभी भी होने लगीं — दिन में, दोपहर में, शाम को। और अब वो सिर्फ़ दरवाज़े पर नहीं होतीं — कभी दीवारों पर, कभी छत पर, कभी दीपक के बिस्तर के ठीक नीचे से। और उस हड्डी की ठंडक अब इतनी बढ़ गई थी कि दीपक की जेब में जहाँ वो रखी थी, वहाँ की चमड़ी नीली पड़ने लगी थी।

दीपक समझ गया कि कुछ बहुत ग़लत हो चुका है। और अब उसके पास सिर्फ़ एक ही रास्ता था — वापस उस अघोरी के पास जाना।

अगली अमावस की रात, दीपक फिर उसी श्मशान घाट पर पहुँचा। अघोरी वहीं, उसी बरगद के नीचे, उसी आग के सामने बैठा था। जैसे वो कभी वहाँ से हिला ही न हो।

“बाबा!” दीपक चीख़ा। “मैंने गिन लिया, बाबा! मुझसे ग़लती हो गई! अब वो मेरा पीछा नहीं छोड़ रहा! मुझे बचा लो, बाबा!”

अघोरी ने धीरे से सिर उठाया। उसके चेहरे पर कोई हैरानी नहीं थी। बस वही टेढ़ी मुस्कान।

“मुझे पता था, दीपक,” वो बोला। “मुझे पहले से पता था कि तू गिन लेगा। सब गिन लेते हैं। आज तक कोई नहीं बचा।”

दीपक की आँखें फैल गईं। “क्या मतलब है तुम्हारा?”

अघोरी ने एक लंबी साँस ली। और फिर, उसने वो सच बताया, जिसे सुनकर दीपक के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

“दीपक, मैंने तेरी कोई मनोकामना पूरी नहीं की। ये मेरे बस की बात ही नहीं है। तेरा साहूकार, तेरी जायदाद, तेरी माँ का ठीक होना — ये सब ‘उसने’ किया। वो चीज़, जो तेरे दरवाज़े पर दस्तक देती थी।”

“वो कोई मामूली आत्मा नहीं है, दीपक। वो एक बहुत पुरानी, बहुत भूखी चीज़ है — सदियों से इस श्मशान में क़ैद। और उसे बाहर की दुनिया में आने के लिए… एक इंसान चाहिए। एक ऐसा इंसान, जो इतना मजबूर हो, इतना टूटा हुआ हो, कि वो ख़ुद चलकर उसके पास आ जाए।”

“वो हड्डी, जो मैंने तुझे दी थी — वो किसी और इंसान की उँगली की हड्डी है। तुझसे पहले, जो इंसान इस श्मशान में आया था… उसकी।”

“‘वो’ तेरे आस-पास के सब लोगों को इसलिए ख़त्म कर रहा था, ताकि तू अकेला पड़ जाए। तेरा क़र्ज़ ख़त्म हुआ — साहूकार मरा। तुझे पैसा मिला — रिश्तेदार मरा। ये तोहफ़े नहीं थे, दीपक। ये तो बस तेरे इर्द-गिर्द से हर उस चीज़ को हटाया जा रहा था, जो तुझे इस दुनिया से बाँधे रखती थी। ताकि आख़िर में, जब वो तुझे ले जाए, तो तेरे लिए रोने वाला भी कोई न बचे।”

“और जिस पल तूने वो दस्तकें गिनीं — उस पल तूने उसे बुला लिया, दीपक। तूने उसे इजाज़त दे दी — अंदर आने की।”

दीपक का पूरा शरीर पत्थर हो गया। “ल-लेकिन तुम… तुम कौन हो, बाबा? तुम ये सब क्यों करते हो?”

अघोरी की आँखों में पहली बार कुछ बदला। एक अजीब सी उदासी।

“मैं?” वो हँसा, लेकिन उस हँसी में दर्द था। “मैं भी कभी तेरे जैसा ही था, दीपक। सालों पहले, मैं भी इसी तरह — टूटा हुआ, मजबूर — इस श्मशान में आया था। मैंने भी दस्तकें गिनी थीं। और जब ‘वो’ मुझे लेने आया… तो मैंने ख़ुद को बचाने के लिए एक सौदा किया।”

“‘उसने’ मुझसे कहा — ‘अगर तू आज़ाद होना चाहता है, तो तुझे अपनी जगह किसी और को लाना होगा। किसी और मजबूर इंसान को, जो ख़ुद चलकर मेरे पास आए। जिस दिन वो अगला इंसान गिनती करेगा, तू आज़ाद हो जाएगा। लेकिन तब तक… तुझे यहीं, इस श्मशान में, मेरा पहरेदार बनकर रहना होगा।’”

“तो मैं यहीं हूँ, दीपक। सालों से। एक के बाद एक मजबूर इंसान को यहाँ बुलाता हूँ। उन्हें वो हड्डी देता हूँ। और इंतज़ार करता हूँ… कि वो गिनती करें, और मेरी आज़ादी का रास्ता खुले।”

“लेकिन आज तक कोई आज़ाद नहीं हुआ। क्योंकि जैसे ही एक इंसान गिनती करता है, और ‘वो’ उसे अपने क़ब्ज़े में लेता है — वो इंसान मरता नहीं है, दीपक। वो… मेरी जगह ले लेता है। और मैं? मैं आज़ाद होने के बजाय, और गहरे अँधेरे में धकेल दिया जाता हूँ।”

दीपक को अब पूरी बात समझ आ रही थी। और ये समझ, मौत से भी ज़्यादा डरावनी थी।

“तो अब…?” उसने काँपते हुए पूछा। “अब मेरा क्या होगा, बाबा?”

अघोरी उठ खड़ा हुआ। “अब तेरे पास दो ही रास्ते हैं, दीपक। पहला — तू भी वही कर, जो मैंने किया। किसी और मजबूर इंसान को ढूँढ़, उसे यहाँ ला, और उसे अपनी जगह क़ुर्बान कर दे। तब शायद तू बच जाए।”

“और दूसरा रास्ता…” अघोरी रुका।

“दूसरा रास्ता क्या है, बाबा?” दीपक ने पूछा।

अघोरी ने दीपक की आँखों में देखा। “दूसरा रास्ता… मौत है। लेकिन ऐसी मौत, जिसमें तेरी आत्मा हमेशा-हमेशा के लिए ‘उसकी’ ग़ुलाम बन जाएगी।”

दीपक घर लौट आया। लेकिन अब वो घर, घर नहीं रहा था। वो एक क़ैदख़ाना बन चुका था, जिसमें वो और ‘वो’ — दोनों बंद थे।

अघोरी ने उसे एक रास्ता दिखाया था — किसी और मजबूर इंसान को अपनी जगह क़ुर्बान करने का। और दीपक जानता था कि वो ये कैसे कर सकता है। उसके क़स्बे में ऐसे कई लोग थे, जो ग़रीबी और मजबूरी में डूबे हुए थे। वो किसी एक को बहका सकता था। उसे उस अघोरी के पास भेज सकता था। और ख़ुद को बचा सकता था।

लेकिन…

जब भी दीपक ऐसा सोचता, उसे उन लोगों के चेहरे याद आते। उसे अपनी माँ की बीमारी याद आती, अपने पिता की मौत याद आती, अपनी वो रातें याद आतीं, जब वो आँगन में बैठकर रोता था। और वो सोचता — ‘क्या मैं किसी और इंसान को भी उसी नरक में धकेल दूँ, जिससे मैं ख़ुद गुज़रा हूँ? क्या मैं किसी और की ज़िंदगी बर्बाद करके अपनी जान बचाऊँ?’

नहीं। दीपक ये नहीं कर सकता था। चाहे उसकी जान ही क्यों न चली जाए, वो किसी बेगुनाह को इस अँधेरे में नहीं धकेल सकता था।

तो अब उसके पास सिर्फ़ एक ही रास्ता बचा था। और वो रास्ता, अघोरी ने उसे नहीं बताया था — वो रास्ता, दीपक ने ख़ुद ढूँढ़ा था।

अघोरी ने कहा था — ‘इस हड्डी को कभी आग के पास मत ले जाना। जिस दिन इसे आग छू गई, सब ख़त्म हो जाएगा।’

दीपक ने सोचा — ‘अगर इस हड्डी को आग छूने से सब ख़त्म हो जाता है, तो शायद… शायद यही एक तरीक़ा है इस चीज़ को हमेशा के लिए ख़त्म करने का। अगर मैं इस हड्डी को जला दूँ, तो हो सकता है ये सिलसिला ही ख़त्म हो जाए। ये चीज़ भी ख़त्म हो जाए, और मैं भी आज़ाद हो जाऊँ।’

ये एक जुआ था। एक ऐसा जुआ, जिसमें दीपक की जान दाँव पर लगी थी। लेकिन अब उसके पास खोने के लिए कुछ नहीं बचा था।

अगली अमावस की रात। दीपक ने अपनी सोती हुई माँ के माथे को चूमा। शायद आख़िरी बार। और वो निकल पड़ा — उसी श्मशान घाट की तरफ़।

घाट पर पहुँचकर उसने देखा — अघोरी वहाँ नहीं था। बरगद के नीचे वाली वो आग बुझ चुकी थी। बस उसकी राख बची थी, अभी भी हल्की गर्म।

दीपक ने अपनी जेब से वो हड्डी निकाली। उसे हाथ में लेते ही, हवा में वो जानी-पहचानी बदबू फैल गई। और चारों तरफ़ से, अनगिनत आवाज़ें आने लगीं — फुसफुसाहटें, चीख़ें, दस्तकें। जैसे उस श्मशान में क़ैद हर आत्मा एक साथ जाग उठी हो। हवा तेज़ हो गई। और दीपक को साफ़ महसूस हुआ — ‘वो’ उसके ठीक पीछे खड़ा है।

“दीपक…” वो फुसफुसाती आवाज़ फिर उसके कान में गूँजी। “ये मत कर, दीपक। ये हड्डी मत जला। वरना…”

पहली बार, ‘वो’ चीज़ डरी हुई लग रही थी।

और उसी पल दीपक को यक़ीन हो गया कि वो सही रास्ते पर है।

उसने पूरी ताक़त लगाई, और वो हड्डी उठाकर, उस बुझती हुई चिता की गर्म राख में, बची हुई आग की चिंगारियों पर फेंक दी।

एक पल के लिए कुछ नहीं हुआ।

और फिर…

राख में से एक तेज़ लपट उठी। नीली लपट। और उस लपट के साथ, एक ऐसी चीख़ गूँजी, जो इस दुनिया की नहीं थी। इतनी ऊँची, इतनी डरावनी, कि दीपक के कानों से ख़ून बहने लगा। पूरी ज़मीन काँप उठी। बरगद का पेड़ जड़ से हिल गया। और वो नीली लपट… आसमान की तरफ़ उठती चली गई।

फिर, अचानक…

सब कुछ शांत हो गया।

लपट बुझ गई। हवा रुक गई। आवाज़ें बंद हो गईं। और वो बदबू… वो भी ग़ायब हो गई।

दीपक हाँफते हुए वहीं गिर पड़ा। कुछ देर वो बस ज़मीन पर पड़ा रहा। फिर उसने धीरे से महसूस किया — उसकी जेब की वो ठंडक चली गई थी। उसके सीने पर से जैसे कोई पहाड़ हट गया था।

उसे यक़ीन हो गया — सब ख़त्म हो गया। वो जीत गया था। उसने उस चीज़ को हरा दिया था।

आँसुओं और हँसी के बीच, दीपक उठा, और घर की तरफ़ चल पड़ा। इस बार, पीछे कोई नहीं चल रहा था।

घर पहुँचकर दीपक की ज़िंदगी में एक अजीब सा सुकून आ गया।

उसकी माँ पूरी तरह ठीक हो चुकी थी। घर में पैसा था। कोई क़र्ज़ नहीं था। और सबसे बड़ी बात — रात को तीन बजकर तैंतीस मिनट पर, अब कोई दस्तक नहीं होती थी।

एक हफ़्ता गुज़रा। दीपक चैन की नींद सोया। फिर दूसरा हफ़्ता। सब कुछ ठीक था। दीपक को लगने लगा कि वो सचमुच उस बुरे सपने से बाहर आ चुका है।

लेकिन…

तुम्हें याद है, दोस्तों? अघोरी ने एक बात कही थी। उसने कहा था — ‘जिस दिन इस हड्डी को आग छू गई, सब ख़त्म हो जाएगा।’

दीपक ने समझा था कि ‘सब ख़त्म हो जाएगा’ का मतलब है — वो चीज़ ख़त्म हो जाएगी।

लेकिन उसका मतलब वो नहीं था।

उस हड्डी में, वो चीज़ क़ैद नहीं थी, दोस्तों। वो हड्डी तो बस एक ज़ंजीर थी — एक ऐसी ज़ंजीर, जो उस चीज़ को उस इंसान से ‘बाँधे’ रखती थी, और उसे कुछ हद तक क़ाबू में रखती थी। चालीस रातों का नियम, दस्तक का नियम, गिनती का नियम — ये सब उस हड्डी की वजह से थे। ये सब उस चीज़ की ‘शर्तें’ थीं।

और दीपक ने उस हड्डी को जलाकर… वो ज़ंजीर तोड़ दी थी।

अब कोई हड्डी नहीं थी। कोई नियम नहीं था। कोई शर्त नहीं थी। कोई चालीस रातों की सीमा नहीं थी।

अब वो चीज़ आज़ाद थी। और वो सीधे… दीपक से बँध चुकी थी। हमेशा-हमेशा के लिए।

बाईसवें दिन की रात। दीपक अपने बिस्तर पर सो रहा था। तभी उसकी आँख खुली। कमरे में एक अजीब सी ठंडक थी। उसने घड़ी की तरफ़ देखा।

तीन बजकर तैंतीस मिनट।

और तभी…

खट।

दीपक का पूरा शरीर बर्फ़ हो गया।

खट… खट।

लेकिन इस बार, वो दस्तक दरवाज़े पर नहीं थी।

वो दस्तक… उसके बिस्तर के ठीक नीचे से आ रही थी।

उस रात के बाद, दीपक की ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल गई। अब कोई नियम नहीं था, जो उसे बचा सके। अब कोई दरवाज़ा नहीं था, जिसे बंद रखकर वो सुरक्षित रह सके। वो चीज़ अब हर वक़्त उसके साथ थी — उसके कमरे में, उसकी परछाई में, उसकी साँसों में।

दीपक ने वो घर छोड़ दिया। अपनी माँ को एक रिश्तेदार के पास भेज दिया, ये कहकर कि वो कुछ दिन के लिए बाहर जा रहा है। क्योंकि वो नहीं चाहता था कि ‘वो’ चीज़ उसकी माँ तक भी पहुँचे।

और फिर, दीपक ग़ायब हो गया। क़स्बे से, दुनिया से, हर किसी की ज़िंदगी से।

अब तुम पूछोगे — ये कहानी मुझ तक कैसे पहुँची?

तो सुनो।

आज से कुछ साल पहले की बात है। मैं एक रात, अपने काम के सिलसिले में, एक अनजान शहर से गुज़र रहा था। रास्ते में एक नदी पड़ी, और नदी के किनारे एक पुराना श्मशान घाट। मेरी गाड़ी वहीं ख़राब हो गई।

रात के उसी सन्नाटे में, मैंने देखा — घाट के एक कोने में, एक बरगद के पेड़ के नीचे, एक छोटी सी आग जल रही थी। और उस आग के सामने, राख से पुता हुआ, लंबी जटाओं वाला एक अघोरी बैठा था।

मैं डरते-डरते उसके पास गया — बस ये पूछने, कि आस-पास कोई मदद मिल सकती है क्या। उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें बहुत थकी हुई थीं, बहुत उदास। जैसे उन आँखों ने सदियों का बोझ ढोया हो।

उसने मुझसे कुछ नहीं माँगा। बस मुझे अपने पास बैठाया, और ये पूरी कहानी सुनाई — दीपक की कहानी। अपनी कहानी।

हाँ, दोस्तों। वो अघोरी… वो कोई और नहीं, दीपक ही था। वही दीपक, जिसने किसी बेगुनाह को अपनी जगह क़ुर्बान करने से इनकार कर दिया था। लेकिन उस हड्डी को जलाकर, वो ख़ुद उस चीज़ का पहरेदार बन गया — ठीक वैसे ही, जैसे उससे पहले वाला अघोरी बना था। अब वो हमेशा के लिए उसी श्मशान में क़ैद है — अगले किसी मजबूर इंसान का इंतज़ार करता हुआ।

कहानी ख़त्म करके, उसने मेरी तरफ़ एक छोटी सी पोटली बढ़ाई।

“ये तुम्हारे लिए है,” उसने कहा।

मैंने घबराकर मना कर दिया। मैंने वो पोटली नहीं ली, दोस्तों। मैं उठा, और बिना पीछे मुड़े, वहाँ से भाग निकला।

लेकिन जाते-जाते, उसने एक आख़िरी बात कही। वो बात, जो आज तक मेरे कानों में गूँजती है।

उसने कहा — “तुमने पोटली नहीं ली, कोई बात नहीं। लेकिन ये कहानी तो तुमने सुन ली। और जो ये कहानी सुन लेता है… उसका पता, अब ‘उसे’ मिल चुका है।”

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