PretikaReal Experiencesनूर

वो जो बस से उतरा था

Pretika · Real Experiences · 7 मिनट

Writer
Pretika
Story
नूर
Chapter
1 of 5
Category
Real Experiences
Reading time
7 min
Words
1255
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

कुछ कहानियाँ किताबों के पन्नों से नहीं उठतीं। कुछ कहानियाँ हमें एक ढलती हुई शाम, किसी टूटी हुई हवेली के सुनसान बरामदे में, एक अजनबी की थकी हुई आवाज़ में मिलती हैं — और फिर उम्र भर, हर तन्हा रात में, हमारा पीछा करती हैं।

ये कहानी मुझे एक बूढ़े आदमी ने सुनाई थी। उसकी झुर्रियों से भरी आँखों में एक ऐसी गहरी उदासी थी, जो मैंने ज़िंदगी में पहले कभी नहीं देखी थी। और जब तक कहानी ख़त्म हुई, तब तक रात गहरा चुकी थी — और मेरे रोंगटे खड़े हो चुके थे।

एक छोटी-सी गुज़ारिश है — इसे अकेले पढ़िएगा। क्योंकि कुछ आवाज़ें भीड़ में नहीं, तन्हाई में ही ठीक से सुनाई देती हैं।

ये कहानी है — नूर की।

❖ ❖ ❖

उस साल बारिश बहुत देर से आई थी।

जून का आख़िरी हफ़्ता था, और नसीराबाद नाम का वो छोटा-सा क़स्बा — जो न ठीक से शहर था, न पूरी तरह गाँव, बस दोनों के बीच कहीं अटका हुआ एक भूला हुआ नाम था — गर्मी से इस तरह तप रहा था, जैसे किसी ने आसमान के नीचे लोहे का एक बड़ा-सा तवा रखकर उसके नीचे आग जला दी हो। पीपल के बूढ़े पेड़ की पत्तियाँ तक हिलना भूल चुकी थीं, और दोपहर के तीन बजे पूरी बाज़ार ऐसी सुनसान पड़ी रहती थी, जैसे किसी जादूगर ने अपनी छड़ी घुमाकर सारे क़स्बे को एक गहरी, बेहोश-सी नींद में सुला दिया हो।

इसी क़स्बे में, एक उमस-भरी, बोझिल शाम को, रोडवेज़ की एक खटारा-सी नीली बस आकर रुकी, और उसमें से धूल से सने हुए, थके हुए कुछ मुसाफ़िरों के बीच एक नौजवान उतरा। उसका नाम था — अरमान।

उम्र यही कोई तेईस-चौबीस साल। कंधे पर एक मैला-सा झोला, हाथ में एक पुरानी, कोनों से घिसी हुई अटैची, बालों में सफ़र की धूल, और आँखों में वो ख़ास तरह की थकान, जो सिर्फ़ बस के लंबे सफ़र की नहीं थी — बल्कि उस गहरे अकेलेपन की थी, जो अपने शहर, अपने घर, अपनी माँ के हाथ की रोटी से दूर, किसी अनजान जगह पहली नौकरी करने जा रहे हर नौजवान के सीने में, एक भारी पत्थर की तरह बैठा होता है।

अरमान को नसीराबाद के सरकारी स्कूल में मास्टर की नौकरी मिली थी। महीने के बारह सौ रुपए, और रहने के लिए एक अदद कमरा — बस इतनी-सी ज़रूरत थी उसकी। पर इस छोटे-से क़स्बे में, जहाँ हर घर एक-दूसरे का हालचाल सुबह की पहली चाय के साथ ही जान लेता था, एक अकेले, बाहरी नौजवान को किराए पर कमरा देना कोई आसान बात नहीं थी।

दो दिन तक अरमान गली-गली भटकता रहा। कभी कोई दरवाज़ा उसके मुँह पर बंद हो जाता, कभी कोई बुज़ुर्ग ऊपर से नीचे तक उसे घूरकर सिर हिला देता। आख़िरकार, बाज़ार के कोने पर बैठे पान वाले हलीम चाचा ने, अपने पीले पड़ चुके दाँतों के बीच से पान की पीक थूकते हुए, उसे एक रास्ता सुझाया।

"बेटा," हलीम चाचा बोले, उनकी आवाज़ में एक अजीब-सी हिचकिचाहट थी, "क़स्बे के उस सिरे पर एक पुरानी हवेली है — नूर महल। बहुत सालों से ख़ाली पड़ी है। उसके पिछवाड़े नौकरों के रहने का एक कमरा है, अलग से। मालिक तो कब का शहर जा बसा, बस एक बूढ़ा चौकीदार है रामदीन, वही देखभाल करता है। किराया भी न के बराबर लेगा वो... पर..."

"पर क्या, चाचा?" अरमान ने पूछा।

हलीम चाचा कुछ पल चुप रहे। फिर उन्होंने नज़रें चुराते हुए, धीमी आवाज़ में कहा, "बस ये कि... उस हवेली में कोई रहता नहीं, बेटा। वहाँ रात को न जाने का रिवाज़ है यहाँ। तुम नए हो, बाहरी हो, इसलिए कह रहा हूँ — कोई और जगह मिल जाए तो वही ठीक है।"

अरमान हँस पड़ा। उसकी जेब में उस वक़्त कुल जमा सत्ताईस रुपए थे, और पेट में दो दिन की भूख। उस उम्र में, उस हालत में, भूत-प्रेत और रिवाज़ों की बातें उसे बस बूढ़ों के डराने वाले क़िस्से लगते थे। "चाचा," उसने कहा, "जिस आदमी के पास खाने को रोटी और सोने को छत न हो, उसे भूतों से नहीं, भूख से डर लगता है। आप बस रास्ता बता दीजिए।"

और इस तरह, उस उमस-भरी शाम को, सूरज के ढलते-ढलते, अरमान अपनी पुरानी अटैची घसीटता हुआ, नसीराबाद के उस आख़िरी सिरे की ओर चल पड़ा — जहाँ बस्ती ख़त्म होती थी, और जहाँ से शुरू होती थी एक लंबी, सुनसान सड़क, जिसके आख़िर में, आम के एक घने, अँधेरे बाग़ के पीछे... खड़ी थी नूर महल।

❖ ❖ ❖

नूर महल को पहली बार देखकर अरमान कुछ पल के लिए वहीं ठहर गया।

डूबते सूरज की आख़िरी, ख़ून-सी लाल रौशनी में वो हवेली किसी विशालकाय, सोते हुए जानवर की तरह लग रही थी। तीन मंज़िला इमारत, जिसके मेहराब अब जगह-जगह से टूट चुके थे, जिसकी दीवारों पर बरसों की काई और बेलें इस तरह लिपटी हुई थीं, जैसे वक़्त ने उसे अपने हरे, ठंडे हाथों में जकड़ लिया हो। ऊपर की मंज़िल पर बने झरोखे किसी अंधे इंसान की खुली आँखों की तरह, ख़ाली और स्याह, सड़क की ओर ताक रहे थे।

और हवा... हवा में एक अजीब-सी ठंडक थी। पूरे क़स्बे में जहाँ गर्मी से दम घुट रहा था, वहीं नूर महल के पास आते ही, अरमान को लगा जैसे कोई गीला, ठंडा कपड़ा उसके चेहरे से छू गया हो। आम के बाग़ से एक भीनी-सी, मीठी ख़ुशबू आ रही थी — पर उस ख़ुशबू में कहीं गहरे, बहुत गहरे, मिट्टी और राख की एक हल्की-सी गंध भी घुली हुई थी।

चौकीदार रामदीन एक झुका हुआ, कमज़ोर-सा बूढ़ा था, जिसकी आँखों में बरसों का डर जम चुका था। अरमान को देखकर वो पहले तो घबराया, फिर जब अरमान ने कमरे की बात की, तो उसने काँपते हाथों से उसे रोका।

"बेटा, यहाँ मत रुक। ये जगह ठीक नहीं है। यहाँ... यहाँ कोई और भी रहता है।"

"कौन रहता है, बाबा?" अरमान ने हल्के मज़ाक़ के लहजे में पूछा।

रामदीन ने धीरे से ऊपर की मंज़िल के उस सबसे बड़े झरोखे की ओर देखा, और फिर फ़ौरन अपनी नज़रें झुका लीं, जैसे ऊपर देखना भी गुनाह हो। "जो रहता है, उसका नाम लेना ठीक नहीं," वो फुसफुसाया। "बस इतना याद रख — रात को कभी ऊपर की मंज़िल पर मत जाना। और अगर रात में... अगर कभी कोई आवाज़ सुनाई दे, कोई बुलाए, कोई गाए... तो आँखें बंद कर लेना, और जवाब मत देना। कभी जवाब मत देना।"

अरमान ने उस बूढ़े की बात को बूढ़े दिमाग़ का वहम समझकर हँस दिया, और कुछ ही देर में, हवेली के पिछवाड़े के उस छोटे-से, सीलन-भरे कमरे में अपना सामान रख दिया। एक चारपाई, एक लालटेन, एक टूटी-सी मेज़ — बस इतनी-सी थी उसकी नई दुनिया। उसने अपनी अटैची से एक छोटा-सा ट्रांज़िस्टर निकाला, उसका काँटा घुमाया, और विविध भारती पर बजते किसी पुराने गाने की मद्धम आवाज़ ने उस सुनसान कमरे में पहली बार ज़िंदगी की एक हल्की-सी आहट भर दी।

उस रात, थका हुआ अरमान बहुत जल्दी सो गया। पर रात के किसी पहर में, जब लालटेन की लौ बुझ चुकी थी और चारों ओर एक गाढ़ा, मख़मली अँधेरा छाया था — उसकी नींद अचानक टूट गई।

कहीं दूर से, बहुत मद्धम, बहुत मीठी आवाज़ में... कोई औरत गा रही थी। ऐसा गीत, जो उसने ज़िंदगी में पहले कभी नहीं सुना था — न किसी भाषा का, न किसी ज़माने का। वो आवाज़ हवा में तैरती हुई, उसके कमरे की दीवारों को चीरती हुई, सीधे उसके सीने में उतर रही थी। और वो आवाज़ आ रही थी — ऊपर की मंज़िल से।

अरमान को रामदीन की बात याद आई — जवाब मत देना। पर उस आवाज़ में कुछ ऐसा था, कोई ऐसी कशिश थी, जिसने उसके बदन के रोएँ खड़े कर दिए। वो उठकर बैठ गया। उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। और फिर, जैसे किसी अनदेखी डोर ने उसे खींचा हो, उसके क़दम अपने-आप कमरे के दरवाज़े की ओर बढ़ गए।

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