Pretika › Real Experiences › नूर
झरोखे वाली
Pretika · Real Experiences · 5 मिनट
- Writer
- Pretika
- Story
- नूर
- Chapter
- 2 of 5
- Category
- Real Experiences
- Reading time
- 5 min
- Words
- 845
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
अरमान दबे पाँव अपने कमरे से बाहर निकला।
बाहर, खुले आँगन में, आधे चाँद की धुँधली रौशनी फैली हुई थी। हवा बिल्कुल थमी हुई थी, और वो गीत अब और भी साफ़, और भी क़रीब सुनाई दे रहा था। अरमान ने धीरे से अपनी गर्दन उठाई, और ऊपर की मंज़िल के उस सबसे बड़े झरोखे की ओर देखा — और वहीं, उसी पल, उसकी साँसें जैसे थम गईं।
उस झरोखे में, चाँद की रौशनी में नहाई हुई, एक औरत खड़ी थी।
वो कोई ऐसी-वैसी औरत नहीं थी। ऐसी ख़ूबसूरती अरमान ने अपनी पूरी ज़िंदगी में न देखी थी, न कभी सपने में सोची थी। उसने पुराने ज़माने का, गहरे लाल रंग का एक गरारा पहना हुआ था, जिस पर सुनहरे तारों का काम झिलमिला रहा था। उसके लंबे, घुँघराले, काले बाल उसकी कमर तक झूल रहे थे। उसकी कलाइयों में काँच की चूड़ियाँ थीं, और उसकी आँखें — उसकी वो काली, गहरी, बेइंतहा गहरी आँखें — सीधे अरमान को देख रही थीं।
और उन आँखों में, उस पल, अरमान को एक ऐसा सन्नाटा दिखा, जो सदियों पुराना था। एक ऐसी तन्हाई, एक ऐसा इंतज़ार, जो शायद किसी इंसान के हिस्से में आ ही नहीं सकता था।
वो औरत मुस्कुराई। एक हल्की-सी, उदास-सी मुस्कान। और फिर, उसने अपना हाथ उठाकर बहुत ही नफ़ासत से, बहुत ही धीरे से, अरमान को इशारा किया — पास आने का।
अरमान के बदन में एक झुरझुरी दौड़ गई। उसका दिमाग़ चीख़-चीख़कर उसे वापस लौट जाने को कह रहा था, रामदीन की चेतावनी उसके कानों में गूँज रही थी — पर उसके पैर... उसके पैर जैसे उसके बस में ही नहीं थे। वो एक क़दम आगे बढ़ा।
और तभी, जैसे किसी ने हवा बुझा दी हो, वो औरत झरोखे से ओझल हो गई। गीत बंद हो गया। हवेली पर फिर वही गहरा, भारी सन्नाटा छा गया। अरमान कुछ देर वहीं, उस ख़ाली झरोखे को ताकता खड़ा रहा, अपने ही दिल की धड़कनों को सुनता हुआ — और फिर, जैसे किसी गहरी नींद से जागा हो, वो काँपता हुआ अपने कमरे में लौट आया, और सुबह होने तक करवटें बदलता रहा।
❖ ❖ ❖
अगली पूरी सुबह अरमान का मन स्कूल में बिल्कुल नहीं लगा।
बच्चों को पढ़ाते हुए भी, बार-बार उसकी आँखों के सामने वही चेहरा घूम जाता — वही गहरी आँखें, वही उदास मुस्कान, वही पास बुलाता हुआ हाथ। उसने ख़ुद को समझाने की बहुत कोशिश की कि वो बस एक सपना था, थकान का असर था, या शायद उसकी अपनी ही तन्हाई ने उसे एक हसीन धोखा दिखाया था। पर उसके दिल का एक कोना जानता था — वो सपना नहीं था।
शाम को घर लौटते वक़्त, उसने हलीम चाचा की पान की दुकान पर रुककर, बहुत संभलकर, नूर महल के बारे में पूछा। हलीम चाचा का चेहरा फ़ौरन गंभीर हो गया।
"तूने कुछ देखा, बेटा?" उन्होंने सीधे पूछा, और अरमान के चेहरे का रंग उड़ गया।
फिर हलीम चाचा ने उसे वो कहानी सुनाई, जो नसीराबाद का हर बूढ़ा जानता था, पर ज़बान पर लाने से डरता था। बहुत-बहुत साल पहले, अंग्रेज़ों के ज़माने में, इस हवेली में एक नवाब रहता था। और उस नवाब को इश्क़ हो गया था एक बेहद ख़ूबसूरत तवायफ़ से — जिसका नाम था नूर। पूरा इलाक़ा नूर की ख़ूबसूरती और उसकी आवाज़ का दीवाना था।
पर ये इश्क़ नवाब के घरवालों को मंज़ूर नहीं था। एक रात, जब नवाब किसी काम से शहर गया हुआ था, तो उसके अपने ही लोगों ने नूर को इसी हवेली की ऊपर वाली मंज़िल के एक कमरे में बंद कर दिया, और... और उस कमरे में आग लगा दी। कहते हैं, उस रात नूर की चीख़ें और उसका वो आख़िरी गीत, मीलों दूर तक सुनाई दिया था। वो जलती रही, और गाती रही, और इंतज़ार करती रही — कि शायद उसका नवाब आकर उसे बचा ले। पर नवाब नहीं आया।
"और उसके बाद?" अरमान ने सूखे गले से पूछा।
"और उसके बाद," हलीम चाचा बोले, "नूर मर गई। पर वो हवेली से गई नहीं, बेटा। कहते हैं, उसका इश्क़, उसका इंतज़ार, उसकी वो जलन — सब वहीं, उसी राख में, किसी आग के शोले की तरह ज़िंदा रह गया। अब वो कोई औरत नहीं रही, बेटा... अब वो कुछ और है। आग से बनी कोई चीज़। और जो भी नौजवान उस झरोखे की ओर देखता है, जो भी उसकी आवाज़ का जवाब देता है... वो कभी वापस नहीं लौटता। बरसों में कई लड़के उस हवेली में गए हैं। आज तक किसी की लाश तक नहीं मिली।"
अरमान उस रात बहुत देर तक अपने कमरे की चारपाई पर बैठा सोचता रहा। उसका दिमाग़ कहता था — भाग जा, अभी, इसी वक़्त। पर उसका दिल... उसका दिल बार-बार उसी झरोखे की ओर खिंच रहा था, उन्हीं उदास आँखों की ओर। और तभी, रात के उसी पहर में, फिर वही मद्धम, मीठी आवाज़ हवा में तैरने लगी।
पर इस बार अरमान भागा नहीं। इस बार वो डरा भी नहीं। इस बार, जैसे किसी गहरी समझ ने उसे थाम लिया हो, वो उठा, अपने कमरे से बाहर आया, और सीधे उस झरोखे की ओर देखा, जहाँ वो फिर से खड़ी थी। और इस बार, अरमान ने जवाब दिया।
"कौन हो तुम?" उसने हवा में, उस ख़ामोशी में, धीरे से पूछा।
और उस औरत की मुस्कान कुछ और गहरी हो गई।