PretikaReal Experiencesनूर

वो रात · और जो आख़िर में मैंने देखा

Pretika · Real Experiences · 8 मिनट

Writer
Pretika
Story
नूर
Chapter
5 of 5
Category
Real Experiences
Reading time
8 min
Words
1504
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

अमावस की वो रात आख़िरकार आ ही गई।

आसमान में चाँद का नामोनिशान नहीं था — बस एक गाढ़ा, स्याह, अंतहीन अँधेरा। हवा में एक अजीब-सी बेचैनी थी, जैसे पूरी क़ायनात अपनी साँसें रोककर किसी भयानक चीज़ का इंतज़ार कर रही हो। और उस रात, क़स्बे के सारे मर्द — हाथों में जलती हुई मशालें, फरसे और लाठियाँ लिए — आमिल की अगुवाई में, नूर महल की ओर बढ़ चले। उनके चेहरों पर बरसों का जमा हुआ डर और गुस्सा, दोनों एक साथ धधक रहे थे।

वो मंज़र किसी पुराने मनहूस ख़्वाब जैसा था — सैकड़ों जलती मशालें, अँधेरी सड़क पर बढ़ती हुई, ठीक वैसे ही, जैसे सदियों पहले एक भीड़ इसी हवेली की ओर बढ़ी होगी, उस रात, जब नूर को ज़िंदा जलाया गया था। इतिहास, एक भयानक चक्र की तरह, ख़ुद को फिर से दोहरा रहा था।

अरमान उस वक़्त हवेली के आँगन में था। उसने भीड़ को आते देखा, मशालों की रौशनी को क़रीब आते देखा, और उसका ख़ून जम गया। आमिल आँगन के बीचों-बीच पहुँचा, उसने ज़मीन पर एक बड़ा-सा घेरा खींचा, उसमें अजीब-से निशान बनाए, और एक ऊँची, डरावनी आवाज़ में अपने मंत्र पढ़ने शुरू कर दिए। उसके मंत्रों के साथ ही, पूरी हवेली काँपने लगी, हवा गरम होने लगी, और ऊपर वाले झरोखे से लाल-नारंगी रौशनी फूटने लगी।

"नूर!" अरमान चीख़ा, और हवेली के अंदर की ओर भागा।

वो दौड़ता हुआ ऊपर की मंज़िल पर पहुँचा — उसी कमरे में, जहाँ सदियों पहले नूर को जलाया गया था। और वहाँ उसने नूर को देखा। वो दर्द से तड़प रही थी। आमिल के मंत्र किसी अनदेखी ज़ंजीर की तरह उसे जकड़ रहे थे, उसे खींच रहे थे, उसे उस अनंत आग की ओर घसीट रहे थे, जिससे वो बनी थी। उसका ख़ूबसूरत चेहरा अब आग के शोलों में बदल रहा था, और फिर वापस इंसानी रूप में आ रहा था।

"अरमान!" वो चीख़ी, "भाग जा यहाँ से! आमिल मुझे हमेशा के लिए ख़त्म कर देगा! पर तू बच जाएगा! जा, जल्दी जा!"

"नहीं!" अरमान रोते हुए उसकी ओर लपका, "मैं तुझे यूँ मिटने नहीं दूँगा! मेरी रूह ले ले, नूर! अभी! इसी वक़्त! ख़ुद को बचा ले! ये मेरी आख़िरी गुज़ारिश है तुझसे — मेरी मोहब्बत की क़सम, मेरी जान ले ले!"

नीचे आमिल के मंत्र अपने चरम पर थे। पूरा कमरा आग की लपटों से भरने लगा था। नूर के पास अब बस कुछ ही पल बचे थे — एक भयानक फ़ैसले के लिए। या तो अरमान की रूह निगलकर ख़ुद को आमिल की क़ैद से बचा ले, या फिर...

❖ ❖ ❖

नूर ने अरमान की ओर देखा।

उसकी आग में जलती हुई आँखों में, उस आख़िरी पल में, सिर्फ़ और सिर्फ़ मोहब्बत थी। उसने अपने दोनों ठंडे हाथ अरमान के गालों पर रखे, उसके माथे को चूमा, और बहुत धीरे से, बहुत प्यार से कहा —

"मेरी पूरी ज़िंदगी, सदियों का वो लंबा, अकेला, अंधेरा इंतज़ार — सब बस इसीलिए था, ताकि एक दिन मैं तुझसे मिल सकूँ, अरमान। और तुझे पाकर मैंने जान लिया कि मोहब्बत क्या होती है। अब मैं और किसी की रूह लेकर नहीं जीना चाहती। ख़ास तौर पर तेरी रूह लेकर तो हरगिज़ नहीं। तू जी, मेरे लिए। और मुझे एक वादा कर — मुझे याद रखना।"

और फिर, उसी पल, नूर ने आमिल की उस अनदेखी ज़ंजीर के ख़िलाफ़ अपनी सारी ताक़त लगा दी — पर भागने के लिए नहीं। उसने अपनी सारी रूह, अपनी सारी आग, अपना पूरा वजूद समेटकर, अरमान को एक ज़ोरदार धक्का दिया — उस कमरे से बाहर, सीढ़ियों की ओर। और ख़ुद, उस आग के बीचों-बीच खड़ी रह गई।

"भाग, अरमान!" उसकी आख़िरी चीख़ पूरी हवेली में गूँज उठी।

अरमान लुढ़कता हुआ सीढ़ियों से नीचे गिरा। उसने पलटकर ऊपर देखा — और उसने देखा कि नूर आग के एक विशाल, चमकते हुए शोले में बदल रही है। पर इस बार वो चीख़ नहीं रही थी, इस बार वो तड़प नहीं रही थी। इस बार, उसके जलते हुए चेहरे पर एक गहरा, मुकम्मल सुकून था — एक ऐसा सुकून, जो सदियों के इंतज़ार के बाद, आख़िरकार किसी को सच्ची मोहब्बत मिलने पर ही आता है।

और फिर, एक तेज़ रौशनी का धमाका हुआ। पूरी हवेली एक पल के लिए दिन की तरह रौशन हो गई। आमिल के मंत्र बीच में ही कट गए, उसकी मशाल बुझ गई, और एक भयानक चीख़ के साथ, नूर — आग की वो सदियों पुरानी रूह — हमेशा के लिए, राख और रौशनी बनकर, हवा में बिखर गई।

और फिर... गहरा सन्नाटा। नूर महल पर एक ऐसी ख़ामोशी छा गई, जो उस हवेली ने सदियों से नहीं देखी थी। हवा की वो अजीब ठंडक चली गई। राख की वो गंध मिट गई। आमिल ने ऐलान किया कि हवेली की लानत ख़त्म हो गई, जिन्न आज़ाद हो गया, और भीड़ अपनी बुझती मशालों के साथ वापस लौट गई।

और आँगन के बीचों-बीच, राख के एक ढेर के पास, घुटनों के बल बैठा था अरमान — ज़िंदा, सलामत, बचा हुआ। पर उसकी आँखें ख़ाली थीं। क्योंकि उस रात, नूर ने उसकी जान तो बचा ली थी... पर अपने साथ, उस आग में, अरमान के जीने की वजह भी ले गई थी।

❖ ❖ ❖

...ये कहानी यहीं ख़त्म हो जाती, अगर मैंने इसे किसी किताब में पढ़ा होता।

पर मैंने तो आपको पहले ही बताया था — ये कहानी मुझे एक बूढ़े आदमी ने सुनाई थी। एक ढलती हुई शाम, उसी टूटी-फूटी नूर महल के बरामदे में बैठकर। मैं उस इलाक़े में किसी काम से गया था, और रास्ता भटककर उस वीरान हवेली तक पहुँच गया था। वहीं, एक टूटी कुर्सी पर बैठा था वो बूढ़ा आदमी — झुर्रियों से भरा चेहरा, सफ़ेद बाल, और आँखों में एक ऐसी गहरी उदासी, जो मैंने ज़िंदगी में पहले कभी नहीं देखी थी।

उसने मुझे ये पूरी कहानी सुनाई — नूर की, अरमान की, उस आमिल की, उस आख़िरी रात की। उसकी आवाज़ में इतना दर्द था, इतनी सच्चाई थी, कि मेरे रोंगटे खड़े हो गए। और जब कहानी ख़त्म हुई, तब तक रात गहरा चुकी थी, और मेरे जाने का वक़्त हो गया था।

मैंने उठते हुए, बहुत हमदर्दी से उससे पूछा, "बाबा, आपको ये सारी बातें इतनी बारीकी से कैसे मालूम हैं? आप उस अरमान को जानते थे? वो... वो अब कहाँ है? क्या वो ज़िंदा है?"

बूढ़े ने अँधेरे में मेरी ओर देखा, और बहुत धीरे से, बहुत थकी हुई आवाज़ में मुस्कुराया। "उस रात के बाद," उसने कहा, "अरमान कभी नसीराबाद से नहीं गया, बेटा। वो नूर के दिए हुए उस आख़िरी वादे के साथ, इसी हवेली में रुक गया — उसे याद रखने के लिए। उसने शादी नहीं की, उसने कुछ नहीं किया। वो बस हर रात, उस झरोखे के नीचे बैठता है, और उसका इंतज़ार करता है। इस उम्मीद में, कि शायद किसी रात, वो आग की वो रूह, फिर से लौट आए।"

उसकी बात सुनकर मेरी आँखें भर आईं। मैंने उसका शुक्रिया अदा किया, और भारी क़दमों से बरामदे की सीढ़ियाँ उतरने लगा। पर अभी मैं कुछ ही क़दम चला था, कि अचानक मेरे मन में एक सवाल कौंधा। मैं रुका, और पलटकर उस बूढ़े से एक आख़िरी बात पूछने के लिए मुड़ा —

...पर उस कुर्सी पर कोई नहीं था।

कुर्सी ख़ाली थी।

और न सिर्फ़ ख़ाली थी — उस पर बरसों की, इतनी मोटी धूल जमी हुई थी, मानो उस कुर्सी पर पिछले तीस-चालीस साल से कोई बैठा ही न हो। उस धूल पर कहीं किसी के बैठने का, कोई एक भी निशान नहीं था।

मेरे हाथ-पैर ठंडे पड़ गए। मैं डरते-डरते वापस उस बरामदे में गया। और वहाँ, उस कुर्सी के पास, दीवार पर टंगी हुई एक पुरानी, अधजली, धुँधली-सी तस्वीर पर मेरी नज़र पड़ी। वो एक नौजवान की तस्वीर थी — हँसता हुआ, चमकती आँखों वाला, उम्मीदों से भरा एक नौजवान। और उस तस्वीर के नीचे, धुँधले अक्षरों में लिखा था —

"अरमान। 1995 — 1995।"

दो हज़ार साल नहीं। एक ही साल। जन्म और मौत — दोनों, एक ही साल। उस आख़िरी अमावस की रात।

उस पल मुझ पर वो सच्चाई उतरी, जिसने मेरी रूह तक काँप दी। आमिल ग़लत नहीं था। और नूर भी झूठ नहीं बोल रही थी। दोनों सच थे। उस आख़िरी रात, नूर ने अरमान की जान बचाई भी थी... और उसकी रूह ले भी ली थी। क्योंकि सच्ची मोहब्बत किसी को पूरी तरह जाने नहीं देती। उसने अरमान को मरने से बचाया — पर उसे अपने साथ, उसी हवेली में, उसी इंतज़ार में बाँध लिया। न पूरी तरह ज़िंदा, न पूरी तरह मुर्दा।

वो बूढ़ा आदमी, जो मुझे ये कहानी सुना रहा था — वो कोई और नहीं था। वो ख़ुद अरमान था। तीस साल पहले उसी अमावस की रात मर चुका अरमान, जो आज भी, हर रात, उस झरोखे के नीचे बैठकर, अपनी नूर का इंतज़ार करता है — और मुझ जैसे किसी भटके हुए मुसाफ़िर को रोककर, अपनी कहानी सुनाता है... ताकि उसकी नूर को कोई और भी याद रखे।

मैं उस रात कैसे वहाँ से भागा, मुझे आज भी ठीक से याद नहीं। पर इतना याद है — जब मैं हवेली के दरवाज़े से बाहर निकल रहा था, तब हवा में, बहुत दूर से, बहुत मद्धम-सी, एक औरत के गाने की आवाज़ आई। वही गीत — न किसी भाषा का, न किसी ज़माने का।

और उस आवाज़ के साथ-साथ, एक नौजवान की हँसी भी घुली हुई थी। एक ऐसी हँसी, जो सदियों के इंतज़ार के बाद, आख़िरकार, मुकम्मल हो गई थी।

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