Pretika › Real Experiences › नूर
आमिल
Pretika · Real Experiences · 5 मिनट
- Writer
- Pretika
- Story
- नूर
- Chapter
- 4 of 5
- Category
- Real Experiences
- Reading time
- 5 min
- Words
- 893
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
नसीराबाद से किसी चीज़ का छुपना मुश्किल था।
बहुत जल्द, पूरे क़स्बे में ये बात आग की तरह फैल गई कि नया मास्टर, वो बाहरी लड़का, नूर महल में रहता है — और रातों को वहाँ कुछ अजीब-सी रौशनियाँ दिखती हैं, अजीब-सी आवाज़ें आती हैं। अरमान का सूखता हुआ, पीला पड़ता हुआ चेहरा देखकर लोग और भी डर गए। वो ठीक वैसा ही दिख रहा था, जैसे बरसों पहले वो लड़के दिखने लगे थे, उस हवेली में जाने से पहले।
क़स्बे के कुछ बुज़ुर्ग, हलीम चाचा और रामदीन के साथ, एक दिन शहर गए, और वहाँ से एक आमिल को बुला लाए — एक ऐसा आदमी, जो काले इल्म का जानकार था, जो जिन्नों को क़ैद करने और भगाने का दावा करता था। आमिल लंबा, दुबला-पतला आदमी था, जिसकी आँखें गिद्ध की तरह तेज़ थीं, और जिसके गले में काले धागों और ताबीज़ों की कई लड़ियाँ झूल रही थीं।
आमिल ने नूर महल का चक्कर लगाया, मिट्टी सूँघी, हवा को महसूस किया, और फिर उसका चेहरा गंभीर हो गया। "यहाँ एक बहुत पुरानी, बहुत ताक़तवर रूह है," उसने भारी आवाज़ में कहा। "आग की रूह। और ये रूह आने वाली अमावस की रात अपने पूरे ज़ोर पर होगी। उसी रात इसे क़ैद किया जा सकता है — हमेशा के लिए। उससे पहले एक भी दिन का इंतज़ार ख़तरनाक है।"
जब अरमान ने ये सुना, तो उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। अमावस की रात — वही रात, जिससे पहले नूर ने उसे भाग जाने को कहा था। अब उसे नूर की हर बात, हर चेतावनी का मतलब समझ आने लगा। वो आमिल के पास गया, उसके पैर पकड़े, गिड़गिड़ाया — "उसे कुछ मत करो। वो किसी का बुरा नहीं करती। वो... वो मुझसे मोहब्बत करती है।"
आमिल ने अरमान को घृणा से देखा, और हँसा। "मूर्ख," वो बोला, "वो तुझसे मोहब्बत नहीं करती। वो तुझे खा रही है, धीरे-धीरे, रोज़ रात। उस रूह का ये पुराना खेल है। पहले इश्क़ का जाल बुनती है, फिर इंसान की रूह को निगल जाती है। तेरे जैसे कितने लड़के इस जाल में फँसकर इस हवेली की मिट्टी में मिल चुके हैं। हम उस रात तुझे और इस पूरे क़स्बे को, दोनों को इस लानत से आज़ाद कर देंगे।"
अरमान का दिमाग़ फटने को था। एक तरफ़ आमिल की ये भयानक बात, और दूसरी तरफ़ नूर की वो उदास, मोहब्बत-भरी आँखें। वो किस पर भरोसा करे? वो रात, जब वो नूर से मिला, तो उसका चेहरा आँसुओं से भीगा हुआ था।
"नूर, सच बता मुझे," वो काँपते हुए बोला, "आमिल जो कह रहा है, क्या वो सच है? क्या तू मुझे... खा रही है?"
नूर बहुत देर तक चुप रही। और फिर, जो उसने बताया, उसने अरमान की रूह तक हिला दी।
❖ ❖ ❖
"सुन, अरमान," नूर की आवाज़ काँप रही थी, और पहली बार, उसकी उन सदियों पुरानी आँखों से आँसू बहने लगे — और जहाँ-जहाँ वो आँसू ज़मीन पर गिरते, वहाँ हल्की-सी भाप उठती।
"मुझ पर एक लानत है। जिस आग में मैं जली थी, उसने मुझे मारा नहीं — उसने मुझे इस हवेली से बाँध दिया, हमेशा के लिए। और इस बंधन की एक भयानक क़ीमत है। हर कुछ सालों में, एक अमावस की रात आती है — जिसे मैं 'वो रात' कहती हूँ। उस रात, मुझे जीने के लिए, इस दुनिया में टिके रहने के लिए, एक इंसान की रूह चाहिए होती है। और वो रूह किसी और की नहीं हो सकती... सिर्फ़ उस इंसान की, जिससे मैं सच्चा इश्क़ करती हूँ।"
अरमान की साँसें रुक गईं।
"सदियों से," नूर रोते हुए बोलती रही, "मैंने ये किया है। मैंने कई बार इश्क़ का नाटक किया, कई नौजवानों को अपने जाल में फँसाया, और 'वो रात' आने पर, मैंने उनकी रूह निगलकर ख़ुद को बचा लिया। यही वो कहानी है, जो ये क़स्बा जानता है। यही वजह है कि वो लड़के कभी वापस नहीं लौटे। मैं एक क़ातिल हूँ, अरमान। एक राक्षसी।"
"पर इस बार," उसकी आवाज़ टूट गई, "इस बार सब कुछ बदल गया। इस बार मैंने नाटक नहीं किया। इस बार... मुझे सच में, अपनी पूरी रूह से, तुझसे मोहब्बत हो गई। पहली बार, सदियों में पहली बार। और यही मेरी सबसे बड़ी सज़ा है। क्योंकि 'वो रात' अब बस दो दिन दूर है। और मेरे पास सिर्फ़ दो रास्ते हैं — या तो मैं तेरी रूह निगलकर ख़ुद ज़िंदा रहूँ... या फिर मैं तुझे बचाने के लिए, ख़ुद उस आग में हमेशा के लिए मिट जाऊँ। इसीलिए मैंने तुझसे कहा था — भाग जा। ताकि मुझे इन दोनों में से कोई रास्ता न चुनना पड़े।"
अरमान वहीं ज़मीन पर बैठ गया। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे — पर वो डर के नहीं, मोहब्बत के आँसू थे। उसने ऊपर देखा, और बोला, "तो फिर ठीक है, नूर। 'वो रात' को, तू मेरी रूह ले लेना। मैं ख़ुशी-ख़ुशी तुझे दे दूँगा। अगर मेरी रूह से तू सदियों और जी सकती है, तो मेरी ये अदना-सी जान तेरे ही काम आए, इससे अच्छा और क्या होगा?"
नूर ने तड़पकर उसका मुँह अपने ठंडे हाथों से बंद कर दिया। "ख़बरदार!" वो चीख़ी, "दोबारा ये बात मत कहना। मैं तेरी मोहब्बत को निगलकर ज़िंदा नहीं रह सकती, अरमान। ये जीना नहीं, मरने से भी बदतर होगा। मैं... मैं अब और किसी की रूह नहीं लूँगी। ख़ास तौर पर तेरी तो बिल्कुल नहीं।"
उस रात उन दोनों ने एक-दूसरे को आख़िरी बार की तरह देखा, और फिर पौ फटने से पहले नूर हवा में घुल गई। अरमान जानता था कि अब बस एक रात बची है। 'वो रात'। अमावस की रात।