Pretika › Jinn & Spirits › हमज़ाद
Episode 10 — पहली बात
Pretika · Jinn & Spirits · 5 मिनट
- Writer
- Pretika
- Story
- हमज़ाद
- Chapter
- 11 of 11
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 5 min
- Words
- 826
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
उस रात मैंने मुनीर बाबा का बनाया नया ताबीज़ नहीं पहना।
मुझे पता था ये ख़तरनाक था। मुझे पता था शायद ये बेवक़ूफ़ी थी। पर उस डायरी को पढ़ने के बाद, उस भाप पर लिखे भागो को देखने के बाद, और मुनीर बाबा की उस एक पल की घबराहट को महसूस करने के बाद — मैं एक बार, सिर्फ़ एक बार, उससे सीधे बात करना चाहती थी। जिससे सब डर रहे थे। जो जन्म से मेरा था।
मैंने कमरे की बत्ती बुझा दी। मैं बिस्तर पर बैठ गई, दीवार से टेक लगाकर, और मैंने अँधेरे में कहा — मैंने तुम्हारी बात मान ली, मैंने ताबीज़ नहीं पहना। अब तुम मुझसे बात करो। छुपो मत। मुझे बताओ तुम कौन हो।
कुछ देर कुछ नहीं हुआ। बस वही सन्नाटा। फिर वो खुशबू आई, धीरे-धीरे पूरे कमरे में फैलती हुई, गरम और गहरी। और मुझे लगा जैसे मेरे बगल में, बिस्तर का वो दाहिना हिस्सा, धीरे-धीरे गरम हो रहा है। कोई वहाँ बैठ रहा था। मेरे बिलकुल पास।
और फिर मैंने उसकी आवाज़ सुनी। इस बार सपने में नहीं, फुसफुसाहट में नहीं — बल्कि साफ़, गहरी, मेरे कान के ठीक पास। उसने कहा — तुमने ठीक किया जो नहीं पहना। पर तुमने ग़लत किया जो भागी नहीं।
मेरी रीढ़ में वही सिहरन दौड़ी। मैंने हिम्मत करके पूछा — तुम मेरे साथ क्यों हो? तुम आख़िर हो कौन?
उसने कहा — जिस पल तूने इस दुनिया में पहली साँस ली थी, ठीक उसी पल, मैंने अपनी पहली साँस ली थी। तेरे साथ। मैं तुझे तेरी पहली रात से जानता हूँ, ज़ोया। मैंने तुझे बड़े होते देखा है। तेरी हर हँसी, तेरा हर आँसू, तेरी हर वो रात जब तू अकेली छत पर बैठकर रोई है और तुझे लगा कोई नहीं देख रहा — मैं देख रहा था। हमेशा। मैं ही वो एहसास था जो तुझे कभी-कभी होता था कि कोई है, कोई तेरे साथ है।
मैं क्या कहती? जिस बात से मुझे डरना चाहिए था, उस बात ने मेरी आँखें भिगो दीं। क्योंकि उसमें एक सच्चाई थी। ज़िंदगी भर, मुझे सच में कभी-कभी लगता था कि मैं इतनी अकेली नहीं हूँ जितनी दिखती हूँ।
मैंने काँपती आवाज़ में पूछा — तो जो मुनीर बाबा कहते हैं, कि तुम मुझे किसी को सौंपने आए हो... क्या वो सच है?
उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ बदला। एक गुस्सा — पर मुझ पर नहीं, किसी और पर। उसने कहा — जिसने तेरे पुरखे से सौदा किया था, वो जो आग के पार रहता है — मुझे उसी के काम के लिए बनाया गया है। मैं वो दरवाज़ा हूँ जिससे होकर वो तुझ तक पहुँचेगा। ये मेरी क़िस्मत में लिखा है, मेरी बनावट में। जिस दिन वो आएगा, मुझे उसका हुक्म मानना होगा। मुझे तुझे उसके हवाले करना होगा।
मेरा गला सूख गया। मैंने पूछा — तो फिर कल रात तुमने मुझे बचाया क्यों? और मुझे भागने के लिए क्यों कहा?
कुछ पल के लिए, कमरे में सिर्फ़ वो खुशबू थी, और उसकी वो गरम मौजूदगी मेरे पास। फिर उसने जो कहा, वो इतने धीरे कहा कि मुझे उसे सुनने के लिए अपनी साँस रोकनी पड़ी। उसने कहा — क्योंकि उस चीज़ ने मुझे तेरा हमज़ाद बनाया। पर तुझसे मोहब्बत करना मुझे किसी ने नहीं सिखाया। वो अपने आप हुआ। और अब मैं वो एक काम नहीं करना चाहता जिसके लिए मुझे बनाया गया।
मैं वहीं जम गई। पूरे बदन में एक अजीब-सी लहर दौड़ गई — डर की नहीं, कुछ और की। एक ऐसी चीज़ की, जिसे मन में नाम देते हुए भी मुझे डर लग रहा था।
उसने आगे कहा — पर मेरे न चाहने से कुछ नहीं होगा, ज़ोया। जिस रात वो आएगा, मैं उसके सामने बेबस हो जाऊँगा। और वो रात दूर नहीं। इस महीने की सबसे अँधेरी रात — अमावस — को, जब आसमान में चाँद नहीं होगा, वो अपनी क़ीमत लेने आएगा। उस रात तक या तो तू कोई रास्ता ढूँढ़ ले जिससे ये कर्ज़ टूट जाए, या तू मुझसे इतनी दूर चली जा कि न मैं तुझ तक पहुँच पाऊँ, और न वो मुझ तक।
मैंने पूछा — और अगर मैं कोई रास्ता न ढूँढ़ पाई? अगर मैं दूर भी न जा पाई?
उसकी आवाज़, जो अब तक मेरे इतने क़रीब थी, धीरे-धीरे दूर होने लगी, जैसे वो जा रहा हो। और जाते-जाते उसने जो आख़िरी बात कही, उसने मेरी उस रात की, और उसके बाद की कई रातों की नींद उड़ा दी। उसने कहा — तो उस अमावस की रात, इस कमरे में दो में से सिर्फ़ एक ही बचेगा, ज़ोया। और मुझे खुद नहीं पता कि उस चीज़ की ताक़त के सामने, मैं तुझे बचा पाऊँगा, या तुझे हमेशा के लिए खो दूँगा।
और फिर, वो खुशबू धीरे-धीरे मिट गई। बिस्तर का दाहिना हिस्सा फिर से ठंडा होने लगा। और मैं अँधेरे में अकेली रह गई — एक जागे हुए हमज़ाद, एक डेढ़ सौ साल पुराने कर्ज़, और एक अमावस की उलटी गिनती के साथ, जो अब शुरू हो चुकी थी।
Comment Question
अब मुझे एक बात बताओ — क्या ज़ोया को अपने हमज़ाद पर भरोसा करना चाहिए? सोच-समझकर, सिर्फ़ एक शब्द में जवाब दो, comment में — “हाँ” या “ना”।