Pretika › Jinn & Spirits › हमज़ाद
Episode 9 — जो दहलीज़ पर खड़ा था
Pretika · Jinn & Spirits · 4 मिनट
- Writer
- Pretika
- Story
- हमज़ाद
- Chapter
- 10 of 11
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 4 min
- Words
- 672
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
डायरी में उसके बाद के पन्ने कई जगह से फटे हुए थे, कुछ जगह स्याही फैली हुई थी, जैसे उन पर कभी पानी — या आँसू — गिरे हों। जो बचा था, उसे जोड़-जोड़कर, और जो माँ को उनकी नानी ने बताया था, उससे मिलाकर, उस चालीसवीं रात की कहानी कुछ यूँ बनती है।
मीर साहब ने चालीस रातों की मेहनत के बाद, आख़िरकार, अपने हमज़ाद को जगा तो लिया था। पर उन्होंने एक ग़लती कर दी थी। किसी लम्हे में — शायद थकान से, शायद घमंड से — उनका यक़ीन एक पल के लिए डगमगा गया था। और उस एक पल की दरार से, कुछ और अंदर आ गया।
क्योंकि हमज़ाद अकेले नहीं होते। उनकी अपनी एक दुनिया है, अपने बड़े हैं, अपने बादशाह हैं। और जब कोई इंसान इतना लालच करता है कि अपने ही हमज़ाद को ग़ुलाम बनाने चले, तो कभी-कभी, उस दुनिया की कोई बहुत बड़ी ताक़त खुद उसका फ़ायदा उठाने चली आती है।
जो उस रात मीर साहब की दहलीज़ पर खड़ा था, वो उनका हमज़ाद नहीं था। वो उससे कहीं बड़ा, कहीं पुराना कुछ था। डायरी में मीर साहब ने उसे सिर्फ़ एक नाम दिया — वो जो आग के पार रहता है। उसका असली नाम लिखने से भी वो डरते थे, क्योंकि उन दुनियाओं में किसी का नाम लेना उसे बुलाने के बराबर होता है।
उस चीज़ ने मीर साहब से कहा — तूने अपने हमज़ाद को जगा तो लिया, पर उसे क़ाबू में रखने की ताक़त तुझमें नहीं। वो तुझे आज ही खा जाएगा। पर मैं तुझे एक रास्ता दे सकता हूँ। मैं तुझे वो ताक़त दूँगा जिसकी तुझे भूख है। तेरा हमज़ाद उम्र भर तेरा ग़ुलाम रहेगा। तेरा नाम सदियों तक लिया जाएगा।
मीर साहब ने, मौत को अपनी दहलीज़ पर खड़ा देखकर, वही पूछा जो हर लालची इंसान पूछता है — इसकी क़ीमत क्या है?
और उस चीज़ ने जो जवाब दिया, वही हमारे खानदान का वो कर्ज़ बन गया जो आज मुझ तक आ पहुँचा।
उसने कहा — क़ीमत आज नहीं। क़ीमत बाद में। तेरे खानदान में, हर पीढ़ी में, एक बच्चा ऐसा पैदा होगा जिसका हमज़ाद जन्म से जागा हुआ होगा — बिलकुल तेरे जगाए हुए हमज़ाद की तरह। ये मेरी निशानी होगी उस बच्चे पर। और एक दिन, बहुत सालों बाद, जब मैं तय करूँगा, मैं आकर उनमें से एक को अपने साथ ले जाऊँगा। उस बच्चे का हमज़ाद ही मेरे लिए वो दरवाज़ा खोलेगा। यही मेरी क़ीमत है।
मीर साहब ने सोचा — ये तो बहुत सालों बाद की बात है। मैं तो तब तक मर चुका हूँगा। किसी और की औलाद की क़ीमत पर मुझे आज ताक़त मिल रही है। और उन्होंने हाँ कर दी। उन्होंने अपनी ही आने वाली नस्लों को उस चीज़ के हाथों गिरवी रख दिया — बस अपनी एक ज़िंदगी की ताक़त के लिए।
डायरी में मीर साहब की आख़िरी कुछ लाइनें उनकी मौत से ठीक पहले की हैं। और उन लाइनों में वो घमंड नहीं है, वो भूख नहीं है। बस एक टूटे हुए, डरे हुए बूढ़े का पछतावा है। उन्होंने लिखा — मैंने जो ताक़त पाई, उसने मुझे अंदर से खा लिया। मेरा हमज़ाद मेरा ग़ुलाम ज़रूर बना, पर उसकी आँखों में जो नफ़रत थी, वो मुझे हर रात दिखती थी। और अब मैं जा रहा हूँ, ये जानते हुए कि मैंने अपने खून के हर उस बच्चे को, जो अभी पैदा भी नहीं हुआ, एक ऐसी रात के हवाले कर दिया है जिसका उन्हें पता भी नहीं होगा।
मैंने डायरी बंद कर दी। मेरे हाथ काँप रहे थे। तो ये था वो कर्ज़। एक बूढ़े के लालच का कर्ज़, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता आया, और अब मेरी दहलीज़ पर आकर खड़ा हो गया था — उसी ठंडे अँधेरे की शक्ल में, जो कल रात मुझे लेने आया था।
पर एक बात अब भी मेरी समझ में नहीं आ रही थी। अगर मेरा हमज़ाद भी उस चीज़ का ग़ुलाम है, उसी की निशानी है, तो वो उसके ख़िलाफ़ जाकर मुझे बचा क्यों रहा था? और मुझे भागने के लिए क्यों कह रहा था?
इस सवाल का जवाब मुझे उसी रात मिला। जब पहली बार, उसने भाप और परछाइयों को छोड़कर, सीधे मुझसे बात की।