PretikaJinn & Spiritsहमज़ाद

Episode 8 — मीर साहब का चिल्ला

Pretika · Jinn & Spirits · 4 मिनट

Writer
Pretika
Story
हमज़ाद
Chapter
9 of 11
Category
Jinn & Spirits
Reading time
4 min
Words
666
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

भागो। उस एक लफ़्ज़ ने मेरी रातों की बची-खुची नींद भी छीन ली। पर मैं भागती भी तो कहाँ? जो चीज़ जन्म से मेरे साथ थी, उससे भागकर मैं कहाँ जाती? और सच कहूँ, अब मैं भागना नहीं, समझना चाहती थी। मुझे जानना था कि ये सब शुरू कहाँ से हुआ। ये कर्ज़ क्या था, किसने लिया था, और मैं क्यों उसकी क़ीमत बन गई।
अगले दिन, जब मुनीर बाबा किसी काम से बाहर गए, मैंने माँ को पकड़ा और कहा — मुझे सब बताओ। शुरू से। उस पुरखे के बारे में, जिसने ये सब शुरू किया।
माँ ने पहले टालने की कोशिश की। पर जब मैंने उन्हें वो भाप पर लिखा लफ़्ज़ बताया, तो उनका चेहरा सफ़ेद पड़ गया, और उन्होंने एक पुराना, चमड़े की जिल्द वाला बस्ता निकाला जो वो अपने साथ लाई थीं। उसमें एक बहुत पुरानी, पीली पड़ चुकी डायरी थी — हमारे उसी पुरखे की, जिसका नाम था मीर ग़ुलाम हैदर। लोग उन्हें मीर साहब कहते थे।
माँ ने बताया, और डायरी के कुछ पन्नों ने बाकी। और जो तस्वीर मेरे सामने बनी, वो कुछ यूँ थी।
आज से कोई डेढ़ सौ साल पहले, एक पुराने क़स्बे में, मीर साहब रहते थे। वो अपने ज़माने के सबसे बड़े अमिलों में से एक थे। कहते हैं उनके एक इशारे पर जिन्नात हाज़िर हो जाते थे। दूर-दूर से लोग अपनी मुसीबतें लेकर उनके पास आते — किसी पर कोई साया हो, किसी का बच्चा बीमार हो, किसी के घर में कोई बला हो — मीर साहब सब ठीक कर देते। पर जैसे-जैसे उनकी शोहरत बढ़ी, वैसे-वैसे उनके अंदर की भूख भी बढ़ती गई। दूसरों के जिन्नात को क़ाबू करना अब उन्हें छोटा लगने लगा। वो कुछ ऐसा चाहते थे जो किसी और अमिल के पास न हो। वो ऐसी ताक़त चाहते थे जो हमेशा उनके साथ रहे, जो कभी धोखा न दे।
और तभी उन्हें उस चीज़ का ख़याल आया जिसके बारे में बड़े-बूढ़े सिर्फ़ डरते हुए फुसफुसाते थे — अपना हमज़ाद।
डायरी में मीर साहब ने खुद लिखा था — जब इंसान का अपना हमज़ाद उसके क़ब्ज़े में आ जाए, तो उससे बड़ी ताक़त कोई नहीं। क्योंकि वो तुम्हें तुमसे बेहतर जानता है। वो तुम्हारे दुश्मन की चाल तुमसे पहले जान लेता है। पर उसे जगाना... आग से खेलना है।
अपने हमज़ाद को जगाने के लिए एक अमल करना पड़ता है, जिसे चिल्ला कहते हैं — यानी चालीस रातों का एक बहुत कठिन, इबादत जैसा अमल, जिसमें अमिल खुद को दुनिया से काटकर, एक बंद कमरे में, हर रात एक तय वक़्त पर, एक ख़ास तरीक़े से अपने ही हमशक्ल को पुकारता है। इन चालीस रातों में उसे न किसी से मिलना होता है, न ठीक से कुछ खाना-पीना, न ठीक से सोना। और सबसे ज़रूरी — इन चालीस रातों में, चाहे कुछ भी दिखे, चाहे कैसी भी आवाज़ आए, अमिल को डरना नहीं होता, रुकना नहीं होता। क्योंकि जिस पल वो डरा, जिस पल उसका यक़ीन डगमगाया, उसी पल उसका हमज़ाद उस पर हावी हो जाता है।
मीर साहब ने वो चिल्ला शुरू किया।
डायरी के पन्ने बताते हैं कि पहली कुछ रातें ख़ाली गुज़रीं। बस एक सन्नाटा, एक इंतज़ार। फिर दसवीं रात के आसपास, चीज़ें शुरू हुईं। कमरे में साये हिलने लगे। दीवारों से आवाज़ें आने लगीं — कभी किसी अपने की, कभी किसी मरे हुए की। बीसवीं रात तक, मीर साहब लिखते हैं, उन्हें अपना ही अक्स कमरे के कोनों में दिखने लगा था — पर वो अक्स उनके साथ हिलता नहीं था, वो अपनी मर्ज़ी से हिलता था, उन्हें देखता था, उन पर हँसता था।
और फिर आई चालीसवीं रात।
डायरी में उस रात के बारे में जो लिखा है, वो लिखावट बाकी सब से अलग है — काँपती हुई, टेढ़ी-मेढ़ी, जैसे लिखने वाले का हाथ काबू में न हो। सिर्फ़ कुछ ही लाइनें हैं उस रात की। और आख़िरी लाइन पढ़कर मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
मीर साहब ने लिखा था — वो आ गया है। पर ये वो नहीं है जिसे मैंने बुलाया था। मैंने अपने हमज़ाद को बुलाया था। पर जो दहलीज़ पर खड़ा है... वो कोई और है। कोई बहुत बड़ा। और वो मुस्कुरा रहा है।

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