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Episode 7 — ताबीज़ किसके लिए था
Pretika · Jinn & Spirits · 4 मिनट
- Writer
- Pretika
- Story
- हमज़ाद
- Chapter
- 8 of 11
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 4 min
- Words
- 685
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
उस रात के बाद से, मुनीर बाबा की हर बात मुझे अलग लगने लगी।
अगली सुबह उन्होंने वो अमल शुरू किया जिसकी बात उन्होंने की थी। ज़मीन पर कुछ लकीरें खींचीं, बीच में एक मिट्टी का बर्तन रखा, कुछ जड़ी-बूटियाँ जलाईं जिनका धुआँ काला और तीखा था, और घंटों कुछ पढ़ते रहे। माँ एक कोने में बैठी तसबीह पर कुछ पढ़ रही थीं, आँखें बंद, होंठ काँपते हुए। और मैं बीच में बैठी थी, ये समझने की कोशिश करती हुई कि ये लोग मुझे किससे बचा रहे हैं — उस ठंडे अँधेरे से, या उससे जो मुझे उस अँधेरे से बचाकर लाया था?
अमल के बीच में, मुनीर बाबा ने एक बात कही जो मेरे कानों में अटक गई। उन्होंने माँ से कहा — बहन, वो ताबीज़ जो आपने इसे बचपन में पहनाया था, उसका काम इसे सिर्फ़ महफ़ूज़ रखना नहीं था। उसका असली काम था इन दोनों को एक-दूसरे से दूर रखना। ताकि ये कभी आपस में पूरी तरह जुड़ न पाएँ। क्योंकि जिस दिन ये दोनों जुड़ गए... उसी दिन कर्ज़ वसूलने का रास्ता खुल जाएगा।
मैंने पूछा — कैसा कर्ज़? कौन वसूलेगा?
मुनीर बाबा ने पढ़ना नहीं रोका, पर इतना कहा — जिसने तुम्हारे पुरखे को ताक़त दी थी। जिससे उन्होंने सौदा किया था। वो अपनी क़ीमत लेने आएगा। और उसकी क़ीमत... तुम हो, बेटा।
मेरे सिर में जैसे कुछ फट गया। तो वो ठंडी चीज़ जो कल रात आई थी, वो शायद वही थी — कर्ज़ वसूलने वाला, या उसका भेजा हुआ। और अगर वो मुझे ले जाने आया था, और मेरा हमज़ाद उसके सामने खड़ा हो गया था, तो इसका सीधा-सा मतलब था कि मेरा हमज़ाद उस कर्ज़ के ख़िलाफ़ था। वो मुझे उन्हें सौंपना नहीं चाहता था।
पर मुनीर बाबा की कहानी में ये बात फ़िट नहीं बैठती थी। उनके हिसाब से तो हमज़ाद ही ख़तरा था, हमज़ाद ही वो दरवाज़ा था जिससे होकर कर्ज़ वसूला जाना था। फिर वो हमज़ाद अपने ही मक़सद के ख़िलाफ़ क्यों जाता?
और तभी मुझे उस अनजान message की आख़िरी लाइन दोबारा याद आई — जो चीज़ तुम्हारे साथ है, उससे डरने से पहले, ये पूछना कि इतने सालों में उसने तुम्हें कभी नुक़सान क्यों नहीं पहुँचाया।
पंद्रह साल तक वो ताबीज़ था। पर इन पिछले दो महीनों में, जब से ताबीज़ खोया, वो हर रात मेरे पास था। मेरे बगल में। मेरी साँसों के इतने क़रीब। अगर वो मुझे मारना चाहता, अगर वो मुझे किसी को सौंपना चाहता, तो उसके पास सैकड़ों मौक़े थे। पर उसने कभी कुछ नहीं किया। सिवाय एक बार, कल रात, जब उसने मुझे उस ठंडी मौत से खींचकर बचा लिया।
मैंने मुनीर बाबा से कहा — बाबा, अगर हमज़ाद ही ख़तरा है, तो कल रात उसने मुझे उस दूसरी चीज़ से बचाया क्यों?
मुनीर बाबा का हाथ, जो लगातार तसबीह घुमा रहा था, एक पल के लिए रुक गया। बस एक पल। फिर उन्होंने बिना मेरी तरफ़ देखे कहा — तुम इन बातों को नहीं समझोगी, बेटा। ये हमज़ाद बहुत चालाक होते हैं। कभी-कभी शिकारी अपने शिकार की हिफ़ाज़त सिर्फ़ इसलिए करता है, ताकि उसे कोई और न ले जाए। ताकि वो उसे खुद के लिए बचाकर रख सके।
बात में दम था। पर उनकी आवाज़ में जो हल्की-सी घबराहट उस एक पल में थी, वो मुझसे छुपी नहीं। मुनीर बाबा को मेरे उस सवाल से डर लगा था। और जिस इंसान से तुम्हारी हिफ़ाज़त कोई कर रहा हो, अगर वो तुम्हारे सवालों से डरे — तो कुछ न कुछ ज़रूर ग़लत है।
उस रात, जब सब सो गए, मैं अपने बिस्तर पर अकेली लेटी थी। और मैंने बहुत धीरे से, अँधेरे में, पहली बार उससे कुछ कहा। मैंने कहा — अगर तुम सच में हो, और अगर तुमने कल रात मुझे बचाया है, तो मुझे एक निशानी दो।
कुछ पल कुछ नहीं हुआ। फिर, मेरी बंद खिड़की के काँच पर, बाहर से नहीं, अंदर की तरफ़ से, एक हल्की-सी भाप जमी। और उस भाप पर, किसी अनदेखी उँगली ने, बहुत धीरे-धीरे, एक लफ़्ज़ लिखा।
मैंने उसे पढ़ा, और मेरा दिल रुक-सा गया। क्योंकि वो कोई डरावना लफ़्ज़ नहीं था। वो सिर्फ़ एक शब्द था — मेरा नाम। पर मेरे नाम के नीचे, उसने एक और लफ़्ज़ लिखा था, जिसने मुझे उस पूरी रात सोने नहीं दिया।
उसने लिखा था — भागो।