PretikaJinn & Spiritsहमज़ाद

Episode 6 — जो बचाने आया

Pretika · Jinn & Spirits · 5 मिनट

Writer
Pretika
Story
हमज़ाद
Chapter
7 of 11
Category
Jinn & Spirits
Reading time
5 min
Words
810
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

अगली सुबह माँ जिस अमिल को अपने साथ लेकर आईं, उनका नाम था मुनीर बाबा। सत्तर के आसपास की उम्र होगी, लंबा क़द, सफ़ेद दाढ़ी, और आँखों में एक ऐसी ठंडक जो देखते ही तुम्हें बेचैन कर दे। माँ बरसों से उन पर भरोसा करती आई थीं — वो कहती थीं कि जब भी खानदान में कोई अनहोनी हुई है, मुनीर बाबा ने ही उसे सँभाला है। पर जिस पल वो मेरे flat में दाख़िल हुए, मुझे वो अनजान message याद आ गया, वही एक लाइन — जो तुम्हारी माँ बुला रही है, वो तुम्हारी मदद के लिए नहीं आ रहा। और न जाने क्यों, उनकी उस ठंडी मुस्कान को देखकर, मेरे अंदर का कोई हिस्सा उन पर यक़ीन नहीं कर पाया।
मुनीर बाबा ने ज़्यादा बात नहीं की। उन्होंने धीरे-धीरे पूरे कमरे में नज़र घुमाई, जैसे हवा में कुछ पढ़ रहे हों। फिर वो सीधे उस ढके हुए आईने के पास गए, चादर हटाई, और देर तक उसमें देखते रहे — इतनी देर कि मुझे अजीब लगने लगा। आख़िर में उन्होंने मेरी कलाई पकड़ी, वो गोल लाल निशान देखा, और पहली बार उनके चेहरे का भाव बदला। पर वो डर नहीं था, ज़ोया। मैं क़सम खाकर कहती हूँ, वो डर नहीं था। वो कुछ और था... जैसे कोई बहुत क़ीमती चीज़ देखकर किसी की आँखें चमक उठती हैं, वैसे।
उन्होंने माँ से धीमी आवाज़ में कहा — बहन, ये मामूली साया नहीं है। पंद्रह साल की क़ैद के बाद जब कोई इस तरह आज़ाद होता है, तो वो कमज़ोर नहीं होता... वो और भी मज़बूत होकर लौटता है। इसने तो अपनी ताक़त... — और यहाँ वो रुक गए, जैसे बाकी बात उन्होंने जान-बूझकर निगल ली हो।
उन्होंने कहा कि वो उसी रात एक अमल करेंगे, कुछ पढ़ेंगे, दोबारा एक ताबीज़ तैयार करेंगे। पर उससे पहले, उन्होंने मुझसे एक अजीब बात कही — आज रात जो कुछ भी हो, बेटा, चाहे कुछ भी हो, उसे रोकने की कोशिश मत करना। बस देखती रहना। और मैं तब नहीं समझी कि उनका मतलब क्या था।
उस रात, मैं तीन बजकर बयालीस का इंतज़ार कर रही थी। पर इस बार जो आया, वो वो नहीं था।
पहले कमरा ठंडा हुआ। इतना ठंडा कि मेरी साँस भाप बनकर दिखने लगी — गर्मी के मौसम में। और वो खुशबू, जो मेरी हो चुकी थी, वो ऊद वाली गरम खुशबू, अचानक गायब हो गई। उसकी जगह एक और बू आई — गीली राख जैसी, सड़ी हुई, ठंडी। और तभी मुझे लगा जैसे बिस्तर के पायताने कोई खड़ा है। कोई जिसका कोई चेहरा नहीं था, बस एक अँधेरा जो बाकी अँधेरे से भी ज़्यादा गहरा था। और वो अँधेरा मेरी तरफ़ बढ़ने लगा।
मैं हिल नहीं पा रही थी। चीख़ नहीं पा रही थी। मुझे लगा जैसे कोई बर्फ़ जैसी ठंडी उँगलियाँ मेरे टख़ने से ऊपर की तरफ़ रेंग रही हैं, मुझे अपनी तरफ़ खींच रही हैं, किसी गहरे, ठंडे कुएँ की तरफ़। मेरी आँखों से आँसू बहने लगे। मुझे लगा, बस, आज सब ख़त्म।
और तभी, कमरे में गर्मी लौट आई।
इतनी तेज़ी से, जैसे किसी ने आग का दरवाज़ा खोल दिया हो। वो ऊद वाली खुशबू पूरे कमरे में भर गई, इस बार तेज़, लगभग गुस्से में। और मैंने महसूस किया — वो मेरे और उस ठंडे अँधेरे के बीच आ खड़ा हुआ। मैं उसे अब भी देख नहीं पा रही थी, पर मैं उसकी मौजूदगी को महसूस कर सकती थी, अपने और उस चीज़ के बीच एक गरम, जलती हुई दीवार की तरह। हवा गूँज उठी, किसी बहुत गहरी, बहुत पुरानी आवाज़ से — कोई ऐसे शब्द जो मैं समझ नहीं पाई, पर जिनमें साफ़ चेतावनी थी। और वो ठंडा अँधेरा... पीछे हटने लगा। सिमटने लगा। और फिर, एक पल में, गायब हो गया।
मेरे टख़ने पर से वो ठंडी पकड़ छूट गई। कमरा फिर गरम था, फिर उसी खुशबू से भरा। और मुझे ऐसा लगा — बहुत हल्के से, बहुत साफ़ — जैसे किसी ने मेरे माथे पर से एक लट हटाई हो। जैसे कोई देख रहा हो कि मैं ठीक तो हूँ।
दरवाज़ा खुला। मुनीर बाबा अंदर आए। मैंने सोचा वो घबराए होंगे, राहत में होंगे। पर वो वहीं दहलीज़ पर रुक गए, कमरे में चारों तरफ़ देखा — उस बची हुई खुशबू को जैसे सूँघा — और उनके चेहरे पर वही चमक लौट आई, इस बार और भी तेज़। उन्होंने बहुत धीरे से, लगभग अपने आप से कहा — इसने... इसने उसे भगा दिया। ये तो नामुमकिन है। एक हमज़ाद, अपने ही मालिक के भेजे साये को रोक दे...
और फिर उन्होंने मुझे देखा, और अपनी बात अधूरी छोड़ दी। पर मैं सुन चुकी थी। मालिक का भेजा साया। मतलब वो ठंडी चीज़ किसी ने भेजी थी। और वो जो मुझे बचाने आया था — वो उस भेजने वाले के ख़िलाफ़ खड़ा हो गया था।
उस रात मुझे नींद नहीं आई। पर पहली बार, मेरे मन में डर से ज़्यादा एक सवाल था — अगर वो मुझे नुक़सान पहुँचाना चाहता, तो आज उससे अच्छा मौक़ा कभी नहीं होता। फिर उसने मुझे बचाया क्यों?

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