PretikaSerial Horrorकाली रात का सच

भाग 4 — आधी रात की पायल

Yogesh Kumar Maurya · Serial Horror · 14 मिनट

Writer
Yogesh Kumar Maurya
Story
काली रात का सच
Chapter
4 of 4
Category
Serial Horror
Reading time
14 min
Words
2670
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

रात के एक बजकर उनतालीस मिनट हुए थे।
काली हवेली के भीतर अब भी अफरा-तफरी मची हुई थी।
मंगल जमीन पर पड़ा था। उसके सीने में गोली लगी थी, लेकिन वह अभी जिंदा था। मीरा उसके घाव पर दबाव बनाए हुए थी और देवेंद्र वायरलेस पर एंबुलेंस तथा अतिरिक्त पुलिस बल को बुला रहा था।
इंस्पेक्टर आरव राठौर की नजर लगातार तीसरी मंजिल की खिड़की पर थी।
कुछ मिनट पहले वहां जो परछाईं दिखाई दी थी, वह अब गायब थी।
लेकिन खिड़की के शीशे पर लिखा संदेश अब भी साफ था—
“अगली मौत… कल रात।”
आरव ने सीढ़ियों की ओर देखा।
“देवेंद्र!”
“जी सर।”
“दो आदमी लेकर ऊपर जाओ। तीसरी मंजिल की पूरी तलाशी लो। हर कमरा, हर खिड़की, हर अलमारी।”
“जी।”
“और ध्यान रहे—कोई चीज छूना नहीं।”
देवेंद्र दो सिपाहियों के साथ ऊपर दौड़ गया।
आरव नीचे झुका और मंगल के चेहरे के पास आया।
“मंगल।”
बूढ़े की आंखें आधी खुली थीं।
“मंगल, मेरी आवाज सुन रहे हो?”
उसने हल्का-सा सिर हिलाया।
“किसने गोली मारी?”
मंगल ने होंठ हिलाए।
आवाज नहीं निकली।
मीरा ने कहा—
“उन्हें बोलने मत दीजिए। ज्यादा खून बह रहा है।”
आरव पीछे हट गया।
मीरा ने तुरंत उसकी तरफ देखा।
“अगर दस मिनट के भीतर अस्पताल नहीं पहुंचाया गया तो हालत गंभीर हो सकती है।”
“एंबुलेंस?”
“रास्ते में है।”
आरव ने सिर हिलाया।
तभी उसकी नजर मंगल के दाहिने हाथ पर पड़ी।
उसकी मुट्ठी बंद थी।
आरव ने हाथ पकड़ने की कोशिश की।
मंगल ने अचानक उसकी कलाई कसकर पकड़ ली।
उसकी आंखें फैल गईं।
“साहब…”
“हां?”
“नाम…”
आरव झुक गया।
“किसका नाम?”
मंगल ने बहुत मुश्किल से कहा—
“पहला… नाम…”
“कहिए।”
“वो… नीचे…”
“कहां नीचे?”
मंगल ने सुरंग की ओर इशारा करने की कोशिश की।
लेकिन उसकी ताकत जवाब देने लगी।
“मंगल!”
मीरा ने उसकी नब्ज देखी।
“होश जा रहा है।”
आरव ने तुरंत कहा—
“मंगल, आखिरी बार पूछ रहा हूं। पहला नाम कौन है?”
मंगल ने आंखें बंद कर लीं।
कुछ क्षण बाद उसके होंठ हिले—
“काव्या…”
आरव का चेहरा बदल गया।
कबीर, जो कुछ दूरी पर खड़ा था, अचानक जैसे पत्थर का हो गया।
“काव्या?”
उसके मुंह से सिर्फ यही शब्द निकला।
आरव ने उसकी तरफ देखा।
“तुम्हारी बहन?”
कबीर ने कोई जवाब नहीं दिया।
उसकी आंखें मंगल पर जमी थीं।
“काव्या…”
उसकी आवाज टूट गई।
“लेकिन काव्या तो बारह साल पहले गायब हो गई थी।”
आरव ने पूछा—
“और तुमने हमें ये बात पहले क्यों नहीं बताई?”
कबीर ने धीरे से कहा—
“मैंने बताया था कि वह नंदिनी की दोस्त थी।”
“लेकिन यह नहीं बताया कि वह गायब हुई थी।”
“मैं…”
“तुम्हारी बहन का नाम इस हवेली में लिखे नामों की सूची में क्यों था?”
कबीर ने जवाब नहीं दिया।
आरव ने उसकी तरफ कदम बढ़ाया।
“कबीर, अब तुम्हें सब बताना पड़ेगा।”
कबीर की आंखों में गुस्सा और दर्द दोनों थे।
“अगर मैं सब बता दूंगा तो क्या मेरी बहन वापस आ जाएगी?”
आरव कुछ पल चुप रहा।
“नहीं।”
“तो फिर?”
“लेकिन उसका हत्यारा मिल सकता है।”
कबीर ने उसकी तरफ देखा।
“मैं चाहता हूं कि उसे सजा मिले।”
आरव ने कहा—
“तो सच बताओ।”
ऊपर से देवेंद्र की आवाज आई—
“सर!”
आरव ने सिर उठाया।
“क्या मिला?”
“तीसरी मंजिल पर कोई नहीं है।”
“खिड़की?”
“अंदर से बंद।”
“दूसरा रास्ता?”
“एक कमरा बंद था। उसका ताला बाहर से लगा था।”
आरव ने तुरंत कहा—
“ताला तोड़ो।”
कुछ सेकंड बाद आवाज आई—
“सर, अंदर एक कमरा है।”
आरव ऊपर जाने ही वाला था कि मीरा ने रोक दिया।
“मंगल को पहले एंबुलेंस में भेजना जरूरी है।”
आरव ने सिर हिलाया।
“देवेंद्र!”
“जी।”
“मंगल को नीचे लाओ।”
दो सिपाही स्ट्रेचर लेकर पहुंचे।
मंगल को उठाया गया।
जैसे ही वे उसे मुख्य दरवाजे की तरफ ले जा रहे थे, मंगल की आंखें अचानक खुलीं।
उसने छत की तरफ देखा।
उसका चेहरा भय से भर गया।
“नहीं…”
मीरा ने पूछा—
“क्या हुआ?”
मंगल ने बहुत धीमे कहा—
“वो… फिर आ गई…”
“कौन?”
मंगल की नजरें दरवाजे के ऊपर टिक गईं।
“नंदिनी…”
सभी ने एक साथ ऊपर देखा।
कुछ नहीं था।
लेकिन उसी क्षण—
छन… छन… छन…
पायल की आवाज सुनाई दी।
मुख्य हॉल में मौजूद हर व्यक्ति जम गया।
आवाज ऊपर से आ रही थी।
धीरे-धीरे।
जैसे कोई नंगे पैरों से गलियारे में चल रहा हो और उसके पैरों में सिर्फ एक पायल हो।
छन… छन…
देवेंद्र ने पिस्तौल निकाल ली।
आरव ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया।
“कोई गोली नहीं चलाएगा।”
“लेकिन सर…”
“जब तक लक्ष्य दिखाई न दे।”
आवाज अब सीढ़ियों के पास आ चुकी थी।
छन… छन… छन…
रागिनी पीछे हट गई।
उसने दोनों कान बंद कर लिए।
“नहीं…”
आरव ने पूछा—
“रागिनी?”
“ये वही आवाज है।”
“किसकी?”
“नंदिनी की पायल।”
“तुमने उसकी पायल पहले देखी है?”
रागिनी ने सिर हिलाया।
“वही पायल…”
आरव ने जमीन पर पड़े उस चांदी के आभूषण को याद किया जो सुरंग में मिला था।
उसने देवेंद्र से कहा—
“सुरंग वाली पायल लाओ।”
देवेंद्र कुछ ही सेकंड में वह पायल लेकर आया।
आरव ने उसे हाथ में लिया।
पायल पर खून की बूंद अब भी मौजूद थी।
उसने पायल को हल्के से हिलाया।
कोई आवाज नहीं हुई।
उसने फिर हिलाया।
इस बार बहुत धीमी आवाज आई—
छन…
रागिनी का चेहरा पीला पड़ गया।
“यही है।”
आरव ने पूछा—
“पक्का?”
“हां।”
“तुमने इसे आखिरी बार कब देखा था?”
रागिनी चुप रही।
“रागिनी।”
उसने आंखें बंद कर लीं।
“बारह साल पहले।”
“कहां?”
“नंदिनी के पैर में।”
“उसकी मौत के समय?”
रागिनी ने सिर हिलाया।
“हां।”
“तो फिर यह पायल सुरंग में कैसे आई?”
रागिनी के पास कोई जवाब नहीं था।
पायल की आवाज अचानक बंद हो गई।
आरव ने सीढ़ियों की तरफ टॉर्च डाली।
खाली।
लेकिन ऊपर की रेलिंग पर एक सफेद कपड़ा पड़ा था।
देवेंद्र ने कहा—
“सर, ये अभी वहां नहीं था।”
आरव ऊपर गया।
कपड़ा उठाया।
यह किसी पुराने महिला परिधान का हिस्सा था।
मीरा ने दस्ताने पहनकर कपड़े की जांच की।
“इस पर मिट्टी है।”
आरव ने पूछा—
“पुरानी?”
“नहीं।”
उसने कपड़े को सूंघा।
“गीली मिट्टी।”
आरव ने तुरंत पूछा—
“यानी यह बाहर से आया?”
“संभव है।”
“लेकिन खिड़की बंद थी।”
मीरा ने कहा—
“खिड़की ही रास्ता नहीं होती।”
आरव ने रेलिंग के पीछे देखा।
वहां दीवार में बहुत संकरी दरार थी।
टॉर्च की रोशनी अंदर गई।
एक पतली सुरंग जैसी जगह।
“ये क्या है?”
देवेंद्र ने कहा—
“सर, यहां कोई इंसान नहीं जा सकता।”
आरव ने कहा—
“कोई इंसान नहीं…”
वह रुका।
“लेकिन शायद तार, रस्सी या किसी वस्तु को यहां से खींचा जा सकता है।”
मीरा ने उसकी तरफ देखा।
“आपको लगता है पायल की आवाज भी किसी तकनीक से पैदा की गई?”
आरव ने कहा—
“मुझे लगता है किसी ने हमें डराने के लिए बहुत सोच-समझकर व्यवस्था की है।”
देवेंद्र ने पूछा—
“लेकिन आवाज इतनी असली कैसे थी?”
आरव ने कहा—
“किसी भी पुराने भवन में पाइप, खोखली दीवारें और धातु की चीजें आवाज को दूसरी जगह पहुंचा सकती हैं। पहले ये देखेंगे कि आवाज का स्रोत वास्तव में कहां था।”
मीरा ने कहा—
“और अगर स्रोत कहीं और हुआ?”
आरव ने उसकी तरफ देखा।
“तो यही हमारा पहला असली सुराग होगा।”
मंगल को एंबुलेंस में भेज दिया गया।
पुलिस की एक टीम उसके साथ अस्पताल गई।
आरव ने देवेंद्र को आदेश दिया कि हवेली से बाहर जाने वाले हर रास्ते पर पहरा बढ़ाया जाए।
फिर उसने कबीर को सामने बुलाया।
“अब अपनी बहन के बारे में सब बताओ।”
कबीर ने गहरी सांस ली।
“काव्या बारह साल पहले कॉलेज में पढ़ती थी। वह नंदिनी की दोस्त थी। दोनों अक्सर इस हवेली में आती थीं।”
“क्यों?”
“नंदिनी के पिता की मौत के बाद उसका परिवार कमजोर हो गया था। काव्या उसे अकेला नहीं छोड़ती थी।”
“और रणविजय?”
“उसे काव्या पसंद नहीं करता था।”
“क्यों?”
“काव्या सवाल पूछती थी।”
“किस बारे में?”
“हवेली के पुराने खातों के बारे में।”
आरव की नजर तेज हो गई।
“कौन से खाते?”
“जमीन और संपत्ति के।”
“क्या उसे कुछ मिला था?”
“हां।”
“क्या?”
कबीर ने जेब से एक पुराना कागज निकाला।
“ये।”
आरव ने कागज लिया।
वह एक पुरानी रसीद थी।
तारीख—
14 अगस्त 2014।
नीचे कुछ जमीनों के नंबर लिखे थे।
आरव ने पूछा—
“इसका हत्या से क्या संबंध?”
कबीर बोला—
“काव्या ने पाया था कि ठाकुर परिवार के नाम पर दर्ज कुछ जमीनें वास्तव में दूसरे लोगों की थीं।”
“जालसाजी?”
“शायद।”
“क्या काव्या ने पुलिस से शिकायत की?”
“करने वाली थी।”
“लेकिन?”
“17 अगस्त की रात वह गायब हो गई।”
आरव ने पूछा—
“और 18 अगस्त को नंदिनी की मौत की खबर आई?”
कबीर ने सिर हिलाया।
“हां।”
“काव्या की लाश मिली?”
“नहीं।”
“तो आपने क्या किया?”
कबीर की आंखों में गुस्सा भर आया।
“मैं तब छोटा था। पिता ने कहा कि पुलिस में शिकायत करने से ठाकुर परिवार दुश्मन बन जाएगा।”
“फिर?”
“हमने चुप्पी साध ली।”
“और अब?”
“अब मुझे लगता है कि वही चुप्पी मेरी बहन की दूसरी हत्या थी।”
कमरे में खामोशी छा गई।
आरव ने पूछा—
“तुम्हें क्या लगता है काव्या के साथ क्या हुआ?”
कबीर ने कहा—
“उसे तहखाने में ले जाया गया।”
“किसने?”
“विक्रांत ने।”
“तुमने कहा था कि विक्रांत गायब हो गया था।”
“हां।”
“तो तुम्हें कैसे पता?”
कबीर ने आरव की आंखों में देखा।
“क्योंकि काव्या ने मुझे आखिरी बार फोन किया था।”
आरव ने तुरंत पूछा—
“फोन रिकॉर्ड?”
“उस समय मेरे पास उसका फोन नहीं था।”
“कॉल कब आई?”
“17 अगस्त की रात।”
“कितने बजे?”
“ग्यारह बजकर अट्ठावन मिनट।”
आरव चौंका।
“सिर्फ नौ मिनट बाद रणविजय की मौत का अनुमानित समय शुरू हो जाता है।”
कबीर ने कहा—
“काव्या ने सिर्फ एक बात कही थी।”
“क्या?”
“‘कबीर, अगर मैं वापस न आऊं तो काली हवेली के नीचे देखना।’”
आरव ने पूछा—
“तुमने तब नीचे क्यों नहीं देखा?”
“मैं डर गया था।”
“और अब?”
“अब डरने के लिए कुछ बचा नहीं।”
आरव ने उसे गौर से देखा।
“गलत।”
कबीर ने पूछा—
“क्या?”
“तुम्हारी जान।”
इसी बीच रागिनी चुपचाप खिड़की के पास चली गई थी।
वह बाहर अंधेरे जंगल को देख रही थी।
आरव उसके पास गया।
“आपने काव्या को आखिरी बार कब देखा था?”
रागिनी ने धीरे से कहा—
“17 अगस्त।”
“कहां?”
“हवेली में।”
“कितने बजे?”
“करीब दस बजे।”
“वह अकेली थी?”
“नहीं।”
“कौन था?”
रागिनी ने जवाब देने से पहले लंबी सांस ली।
“विक्रांत।”
आरव ने तुरंत पूछा—
“आपने उसे देखा था?”
“हां।”
“लेकिन आपने कहा था कि विक्रांत की लाश कभी नहीं मिली।”
“मैंने कहा था।”
“और आपने यह नहीं बताया कि आपने उसे आखिरी बार जिंदा देखा।”
रागिनी ने सिर झुका लिया।
“मैं डर गई थी।”
“किससे?”
“रणविजय से।”
“आपके चाचा से?”
“हां।”
“क्यों?”
रागिनी ने उसकी तरफ देखा।
“क्योंकि उस रात मैंने उन्हें पहली बार किसी को मारने की धमकी देते सुना था।”
आरव ने पूछा—
“किसे?”
रागिनी ने फुसफुसाकर कहा—
“नंदिनी को।”
ऊपर तीसरी मंजिल पर फोरेंसिक टीम को कुछ और मिला।
देवेंद्र ने आरव को बुलाया।
“सर, ये देखिए।”
फर्श पर खून के बहुत छोटे छींटे थे।
मीरा उन्हें देख रही थी।
“ये गोली के नहीं हैं।”
आरव ने पूछा—
“तो?”
“किसी तेज धार वाली चीज से चोट लगने के बाद खून की छोटी बूंदें उड़ी हैं।”
“कहां की घटना?”
“यहीं।”
आरव ने चारों तरफ देखा।
“लेकिन यहां कोई लाश नहीं।”
“घटना यहां हुई होगी।”
“और लाश नीचे ले जाई गई?”
“संभव है।”
आरव ने फर्श के निशान देखे।
“कोई घसीटने के निशान?”
“नहीं।”
मीरा ने कहा—
“यही बात अजीब है।”
आरव ने पूछा—
“क्यों?”
“अगर घायल व्यक्ति को यहां से ले जाया गया होता तो कुछ न कुछ निशान जरूर मिलते।”
आरव ने खिड़की की तरफ देखा।
फिर दीवार।
फिर फर्श।
अचानक उसकी नजर लकड़ी की दीवार के नीचे एक बहुत पतली रेखा पर गई।
“इस दीवार को देखो।”
देवेंद्र ने हाथ लगाया।
दीवार का एक हिस्सा हल्का-सा हिला।
आरव ने जोर लगाया।
लकड़ी का पैनल खुल गया।
पीछे संकरा रास्ता था।
मीरा ने कहा—
“एक और गुप्त रास्ता।”
आरव ने टॉर्च अंदर डाली।
करीब दस मीटर बाद रास्ता खत्म हो रहा था।
वहां एक छोटा कमरा था।
कमरे में एक टूटी कुर्सी।
एक लोहे की जंजीर।
और दीवार पर खरोंचों के निशान।
आरव ने जंजीर देखी।
उस पर ताजा खून था।
मीरा ने तुरंत कहा—
“इसे पैक करो।”
आरव दीवार के पास गया।
खरोंचों के बीच कुछ अक्षर बने थे।
क… आ… व्या…
कबीर पीछे से पहुंच गया।
उसने दीवार देखते ही कदम रोक दिए।
“काव्या…”
उसकी आंखें भर आईं।
आरव ने कहा—
“संभव है कि यह नाम किसी ने लिखा हो।”
कबीर ने दीवार छूने की कोशिश की।
आरव ने उसका हाथ रोक दिया।
“छूना मत।”
कबीर ने हाथ पीछे कर लिया।
मीरा ने खरोंचों की तस्वीर ली।
फिर कहा—
“यह बहुत पुराना नहीं है।”
आरव ने पूछा—
“कितना?”
“कुछ दिन। शायद कुछ सप्ताह।”
कबीर ने तुरंत उसकी तरफ देखा।
“मतलब…”
आरव ने उसकी बात पूरी की—
“काव्या का नाम हाल में यहां लिखा गया है।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
कबीर के चेहरे पर आशा और भय दोनों उभरे।
“क्या वह जिंदा हो सकती है?”
आरव ने सीधे उत्तर नहीं दिया।
“हमें सबूत चाहिए।”
रात के दो बजकर पचास मिनट हुए।
हवेली के बाहर बारिश तेज हो चुकी थी।
आरव ने सभी दरवाजों की जांच करवाई।
तभी अचानक लैंडलाइन फोन फिर बजा।
ट्रिंग… ट्रिंग…
कोई हिल नहीं रहा था।
फोन तीसरी बार बजा।
आरव ने रिसीवर उठाया।
“इंस्पेक्टर आरव राठौर बोल रहा हूं।”
कुछ सेकंड खामोशी।
फिर बहुत धीमी आवाज—
“आपने पहला नाम ढूंढ लिया।”
आरव ने पूछा—
“तुम कौन हो?”
“जिसका नाम अगली सूची में है।”
“नाम बताओ।”
दूसरी तरफ हल्की हंसी सुनाई दी।
“तुम्हें तो पता चल ही गया है।”
आरव ने आवाज रिकॉर्ड करने का संकेत देवेंद्र को दिया।
“काव्या?”
लाइन के दूसरी तरफ अचानक सांसें तेज हो गईं।
फिर आवाज आई—
“काव्या को ढूंढना बंद करो।”
“क्यों?”
“क्योंकि वह तुम्हें उस जगह ले जाएगी जहां से कोई वापस नहीं आया।”
“कहां?”
कुछ सेकंड खामोशी रही।
फिर—
“नंदिनी का कमरा।”
लाइन कट गई।
आरव ने रिसीवर नीचे रखा।
देवेंद्र ने पूछा—
“सर, आवाज पुरुष की थी या महिला की?”
आरव ने कहा—
“स्पष्ट नहीं।”
“लेकिन उसने काव्या का नाम सुना तो चुप क्यों हो गया?”
आरव ने जवाब नहीं दिया।
उसने ऊपर देखा।
नंदिनी का कमरा।
तीसरी मंजिल का आखिरी कमरा।
वही कमरा जिसकी चाबी मंगल के पास मिली थी।
आरव, मीरा और देवेंद्र ऊपर पहुंचे।
दरवाजा खुला था।
अंदर घुप्प अंधेरा।
आरव ने टॉर्च जलाई।
कमरे में पुराने सामान थे।
एक पलंग।
एक अलमारी।
एक ड्रेसिंग टेबल।
और दीवार पर नंदिनी की बचपन की तस्वीरें।
मीरा ने कहा—
“ये कमरा वर्षों से बंद रहा होगा।”
आरव ने पूछा—
“फिर धूल इतनी कम क्यों है?”
मीरा ने फर्श की ओर इशारा किया।
“क्योंकि किसी ने हाल में सफाई की है।”
आरव का चेहरा कठोर हो गया।
“किसी ने यहां आना-जाना जारी रखा है।”
अलमारी खोली गई।
अंदर पुराने कपड़े थे।
नीचे एक लकड़ी का बक्सा।
बक्से पर लिखा था—
N.S.
आरव ने बक्सा खोला।
अंदर चिट्ठियां थीं।
कुछ तस्वीरें।
और एक छोटा टेप रिकॉर्डर।
देवेंद्र ने कहा—
“सर, ये तो बहुत पुराना है।”
आरव ने टेप रिकॉर्डर उठाया।
उसमें कैसेट लगी थी।
मीरा ने पूछा—
“क्या इसे चलाएं?”
आरव ने कहा—
“हां।”
टेप चलाया गया।
पहले सिर्फ खरखराहट।
फिर एक लड़की की आवाज।
बहुत धीमी।
डरी हुई।
“अगर ये रिकॉर्डिंग किसी को मिले… तो समझ लेना कि मुझे खतरा है।”
रागिनी दरवाजे पर आकर खड़ी हो गई।
आवाज जारी रही—
“रणविजय चाचा झूठ बोल रहे हैं।”
कबीर आगे बढ़ा।
टेप में लड़की रो रही थी।
“विक्रांत को उन्होंने नहीं मारा… विक्रांत कुछ जानता था…”
अचानक आवाज टूटने लगी।
फिर एक पुरुष की आवाज आई।
“नंदिनी!”
लड़की चीखी—
“दूर रहो!”
फिर किसी चीज के गिरने की आवाज।
टेप में कुछ सेकंड अफरा-तफरी।
फिर नंदिनी की आखिरी स्पष्ट आवाज—
“अगर मैं नहीं बची तो काव्या को ढूंढना… वही जानती है कि तहखाने में क्या है।”
टेप बंद हो गया।
कमरे में किसी की सांस तक सुनाई नहीं दे रही थी।
कबीर की आंखों से आंसू निकल आए।
“मेरी बहन…”
आरव ने टेप को सुरक्षित किया।
“अब हमारे पास पहला ठोस सबूत है।”
मीरा ने पूछा—
“किस बात का?”
आरव ने कहा—
“नंदिनी की मौत से पहले काव्या को तहखाने के बारे में पता था।”
रागिनी अचानक बोली—
“लेकिन…”
आरव ने उसकी तरफ देखा।
“लेकिन क्या?”
रागिनी ने डरते हुए कहा—
“काव्या को तहखाने के बारे में कैसे पता था?”
आरव ने जवाब दिया—
“ये पता लगाना है।”
रागिनी ने धीरे से कहा—
“क्योंकि उस तहखाने में…”
वह रुक गई।
“क्या?”
उसने फुसफुसाकर कहा—
“विक्रांत की लाश रखी गई थी।”
कमरे की हवा जैसे अचानक जम गई।
कबीर ने रागिनी की तरफ देखा।
“तुमने उसे देखा था?”
रागिनी की आंखों से आंसू बहने लगे।
“हां।”
“कब?”
“17 अगस्त की रात।”
“फिर?”
“उसके बाद नंदिनी मुझे तहखाने से बाहर निकालकर भागी थी।”
“और तुमने पुलिस को क्यों नहीं बताया?”
रागिनी ने सिर झुका लिया।
“क्योंकि…”
“क्योंकि?”
“रणविजय ने हमें धमकी दी थी।”
आरव ने पूछा—
“क्या कहा था?”
रागिनी ने कांपते हुए कहा—
“उसने कहा था…”
वह रो पड़ी।
“अगर हमने किसी को बताया तो काव्या मारी जाएगी।”
कबीर पीछे हट गया।
“काव्या…”
उसकी आवाज में घबराहट थी।
आरव ने तुरंत कहा—
“अब एक बात तय है।”
सभी उसकी तरफ देखने लगे।
“काव्या सिर्फ पुरानी कहानी का हिस्सा नहीं है।”
उसने टेप रिकॉर्डर उठाया।
“वह इस मामले की कुंजी है।”
अचानक कमरे की खिड़की अपने आप बंद हो गई।
धड़ाम!
रागिनी चीख पड़ी।
फिर कमरे में पायल की आवाज गूंजी।
छन… छन… छन…
आरव ने तुरंत आवाज की दिशा पकड़ी।
आवाज ड्रेसिंग टेबल के पीछे से आ रही थी।
उसने टेबल हटवाई।
पीछे दीवार में एक छोटा छेद था।
अंदर से एक पतली धातु की तार निकल रही थी।
आरव ने तार खींची।
दूसरे कमरे से पायल की आवाज आई।
मीरा ने कहा—
“तो यही तरीका था।”
आरव ने सिर हिलाया।
“किसी ने पूरे हवेली में आवाज का जाल बनाया है।”
देवेंद्र ने पूछा—
“तो नंदिनी का भूत?”
आरव ने कहा—
“भूत नहीं। कोई हमें भूत पर विश्वास करवाना चाहता है।”
लेकिन उसी क्षण ड्रेसिंग टेबल के शीशे पर धुंध जमने लगी।
कमरे में तापमान अचानक गिर गया।
सबकी नजर शीशे पर टिक गई।
धीरे-धीरे धुंध के ऊपर उंगली से शब्द उभरने लगे।
एक-एक करके।
“आरव…”
फिर—
“तुम गलत हो।”
फिर आखिरी शब्द—
“मैं यहीं हूं।”
आरव आगे बढ़ा।
उसने शीशे को छुआ।
शीशा बर्फ जैसा ठंडा था।
उसने टॉर्च की रोशनी पीछे डाली।
कोई नहीं।
लेकिन शीशे के निचले हिस्से में एक छोटी-सी तस्वीर चिपकी थी।
आरव ने उसे सावधानी से निकाला।
तस्वीर देखकर कबीर के चेहरे का रंग उड़ गया।
तस्वीर में एक लड़की थी।
काव्या।
उसके साथ एक छोटी बच्ची।
और पीछे वही काली हवेली।
तस्वीर के नीचे तारीख लिखी थी—
16 अगस्त 2026।
कबीर ने कांपते हुए कहा—
“ये… असंभव है।”
आरव ने पूछा—
“क्यों?”
“क्योंकि काव्या की तस्वीर बारह साल पुरानी होनी चाहिए।”
मीरा ने तस्वीर को देखा।
“तस्वीर नई है।”
आरव ने पलटकर पीछे देखा।
पीछे सिर्फ एक वाक्य लिखा था—
“पहला नाम मिल गया… अब दूसरा नाम पढ़ो।”
नीचे काले त्रिकोण का निशान था।
और उसके ठीक नीचे एक नाम—
“मंगल।”
आरव का चेहरा बदल गया।
“मंगल तो जिंदा है।”
मीरा ने धीमे स्वर में कहा—
“फिलहाल।”
उसी समय नीचे से एंबुलेंस की आवाज सुनाई दी।
देवेंद्र खिड़की की ओर गया।
“सर, अस्पताल वाली गाड़ी वापस आ गई।”
आरव ने पूछा—
“इतनी जल्दी?”
देवेंद्र ने बाहर देखा।
फिर उसकी आवाज अचानक कांप गई।
“सर…”
“क्या हुआ?”
“गाड़ी में कोई नहीं है।”
आरव खिड़की तक पहुंचा।
नीचे एंबुलेंस खड़ी थी।
दरवाजा खुला हुआ था।
स्ट्रेचर खाली था।
मंगल गायब था।
और एंबुलेंस के पिछले दरवाजे पर खून से सिर्फ एक शब्द लिखा था—
“दूसरा।”
आरव कुछ क्षण उसे देखता रहा।
फिर उसने अपनी पिस्तौल निकाली।
“हवेली बंद करो।”
देवेंद्र ने पूछा—
“सर?”
आरव की आंखें अंधेरे जंगल पर थीं।
“मंगल को कोई लेकर नहीं गया।”
“तो?”
आरव ने धीमे स्वर में कहा—
“मंगल खुद कहीं गया है… या किसी ने उसे ऐसी जगह पहुंचा दिया है जहां से वो वापस नहीं आ सकता।”
उसी क्षण जंगल की तरफ से पायल की आवाज आई।
छन… छन… छन…
फिर एक और आवाज।
बहुत धीमी।
बहुत दूर से।
लेकिन साफ—
“मंगल अगला नहीं है…”
आरव ने सांस रोक ली।
आवाज फिर आई—
“अगला नाम… रागिनी है।”
आरव ने तुरंत पीछे देखा।
रागिनी कमरे में नहीं थी।
वह गायब थी।
और कमरे के खुले दरवाजे के बाहर फर्श पर उसके पैरों के निशान बने थे।
नंगे पैर।
गीले।
और वे निशान…
सीधे उसी अंधेरी सुरंग की ओर जा रहे थे जहां बारह साल पहले नंदिनी, काव्या और विक्रांत के रहस्य दफन किए गए थे।
क्रमशः…

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