PretikaSerial Horrorकाली रात का सच

भाग 3 — बारह साल पुरानी मौत

Yogesh Kumar Maurya · Serial Horror · 11 मिनट

Writer
Yogesh Kumar Maurya
Story
काली रात का सच
Chapter
3 of 4
Category
Serial Horror
Reading time
11 min
Words
2090
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

अंधेरी सुरंग में वह आवाज गूंजकर शांत हो चुकी थी—

“दूसरी मौत का समय आ गया है…”

कुछ क्षण तक किसी ने कुछ नहीं कहा।

इंस्पेक्टर आरव राठौर की टॉर्च सुरंग की दीवारों पर घूम रही थी। पुरानी ईंटों पर नमी चमक रही थी। कहीं-कहीं से पानी की बूंदें टपक रही थीं।

टप…

टप…

टप…

लेकिन पायल की आवाज बंद हो चुकी थी।

आरव ने अपनी पिस्तौल नीचे नहीं की।

“सब लोग यहीं रुकेंगे।”

देवेंद्र ने पूछा—

“सर, अंदर कोई है तो?”

“इसीलिए रुकना है।”

आरव धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

सुरंग इतनी संकरी थी कि दो आदमी मुश्किल से साथ चल सकते थे। दोनों तरफ मोटी पत्थर की दीवारें थीं। जमीन पर धूल की मोटी परत थी, मगर उस धूल के बीच कई ताजा निशान दिखाई दे रहे थे।

आरव नीचे झुका।

जूते के निशान।

वही पैटर्न, जो ऊपर गुप्त कमरे के पास मिला था।

उसने निशान की तस्वीर खिंचवाई।

“देवेंद्र।”

“जी सर।”

“इन निशानों को कोई छुएगा नहीं।”

“जी।”

आरव आगे बढ़ा।

करीब बीस कदम बाद सुरंग दो हिस्सों में बंट गई।

बाईं तरफ जाने वाला रास्ता नीचे उतर रहा था।

दाईं तरफ वाला रास्ता ऊपर की ओर जा रहा था।

दीवार पर पुराने रंग से दो शब्द लिखे थे—

“नीचे मत जाना।”

देवेंद्र ने कहा—

“सर…”

आरव ने उसकी तरफ देखा।

“क्या?”

“किसी ने ये अभी लिखा है?”

आरव ने टॉर्च की रोशनी डाली।

रंग नया नहीं था।

बहुत पुराना था।

लेकिन उसके ऊपर उंगली से खरोंचकर एक नया निशान बनाया गया था।

काला त्रिकोण।

वही निशान जो धमकी वाले कागज पर था।

आरव ने कहा—

“हम नीचे जाएंगे।”

देवेंद्र ने हिचकिचाकर पूछा—

“लेकिन लिखा है…”

आरव ने उसकी तरफ देखा।

“पुलिस अगर हर चेतावनी पढ़कर रुक जाए तो अपराधी चेतावनियां लिखते रहेंगे।”

वे नीचे उतरने लगे।

पीछे मीरा, कबीर और दो सिपाही थे।

रागिनी और मंगल को ऊपर रहने का आदेश दिया गया था।

लेकिन किसी को पता नहीं था कि उसी समय रागिनी चुपचाप सुरंग के प्रवेश द्वार तक आ चुकी थी।

मंगल ने उसे रोकने की कोशिश की।

“बिटिया, मत जाइए।”

रागिनी ने धीमे स्वर में कहा—

“अगर सच वहां है तो मुझे जाना होगा।”

“सच कभी-कभी इंसान को जिंदा नहीं छोड़ता।”

रागिनी ने उसकी तरफ देखा।

“मंगल काका… बारह साल से मैं इसी डर के साथ जी रही हूं।”

वह सुरंग में उतर गई।

मंगल कुछ पल वहीं खड़ा रहा।

फिर उसने चारों तरफ देखा।

और उसके चेहरे पर एक ऐसा भाव आया जैसे वह किसी बहुत पुराने पाप को दोबारा जागते हुए देख रहा हो।

---

सुरंग का रास्ता करीब पचास मीटर नीचे गया।

अचानक सामने लोहे का एक दरवाजा दिखाई दिया।

दरवाजे पर जंग लगी थी।

बीच में वही काला त्रिकोण बना था।

आरव ने दरवाजे का निरीक्षण किया।

“ताला पुराना है।”

देवेंद्र ने कहा—

“सर, इसे तोड़ दें?”

“रुको।”

आरव ने ताले के पास टॉर्च डाली।

ताले पर धूल जमी थी।

लेकिन कुंडी के पास ताजा खरोंचें थीं।

“किसी ने इसे हाल में खोला है।”

कबीर ने पूछा—

“तो चाबी किसके पास होगी?”

आरव ने कहा—

“यही पता करना है।”

मीरा ने दरवाजे के नीचे देखा।

वहां से हवा आ रही थी।

“अंदर कोई खुली जगह है।”

आरव ने सिपाही को इशारा किया।

ताला तोड़ दिया गया।

दरवाजा चरमराता हुआ खुला।

अंदर एक बड़ा भूमिगत कमरा था।

कमरे की छत नीची थी।

दीवारों पर पुराने लकड़ी के रैक बने थे।

कुछ रैक खाली थे।

कुछ पर फाइलें रखी थीं।

और बीच में एक भारी मेज थी।

मेज पर एक लालटेन जल रही थी।

देवेंद्र ने हैरानी से कहा—

“सर…”

आरव ने हाथ उठाकर उसे चुप कराया।

लालटेन की लौ अभी भी कांप रही थी।

इसका मतलब कोई यहां कुछ देर पहले तक था।

आरव मेज के पास गया।

वहां तीन चीजें रखी थीं—

एक पुरानी डायरी।

एक चांदी की पायल।

और एक तस्वीर।

आरव ने तस्वीर उठाई।

उसमें चार लोग थे।

ठाकुर रणविजय सिंह।

एक जवान लड़की—नंदिनी।

एक लगभग पच्चीस साल का युवक।

और चौथा व्यक्ति…

जिसका चेहरा तस्वीर से काट दिया गया था।

कबीर ने तस्वीर देखते ही कहा—

“ये वही तस्वीर है।”

आरव ने उसकी तरफ देखा।

“तुमने पहले देखी है?”

“हां।”

“कहां?”

“बारह साल पहले की एक पुरानी खबर में।”

“तुम्हें उस खबर की कॉपी चाहिए।”

कबीर ने सिर हिलाया।

“मेरे पास है।”

आरव ने तस्वीर को ध्यान से देखा।

“इस युवक को पहचानते हो?”

कबीर ने कहा—

“नाम था विक्रांत।”

आरव ने पूछा—

“कौन विक्रांत?”

“रणविजय का छोटा भाई।”

देवेंद्र ने चौंककर पूछा—

“लेकिन रिकॉर्ड में तो ठाकुर रणविजय का कोई भाई नहीं है।”

कबीर ने उसकी तरफ देखा।

“यही तो रहस्य है।”

आरव ने तस्वीर पलटी।

पीछे तारीख लिखी थी—

17 अगस्त 2014

आज की तारीख भी 17 अगस्त थी।

आरव की नजर तस्वीर से हटकर डायरी पर गई।

उसने डायरी खोली।

पहले कई पन्ने खाली थे।

फिर एक पन्ने पर लिखा था—

“17 अगस्त — रात 12:07।”

नीचे लिखा था—

“नंदिनी को आज सच पता चल गया।”

आरव ने अगला पन्ना पलटा।

“रणविजय डर गया है।”

अगला पन्ना।

“विक्रांत ने उसे चेतावनी दी है।”

अगला।

“अगर नंदिनी ने पुलिस को सब बता दिया तो सब खत्म हो जाएगा।”

आरव ने डायरी बंद कर दी।

कबीर ने पूछा—

“क्या लिखा है?”

“बहुत कुछ।”

“क्या?”

आरव ने डायरी उसे नहीं दी।

“पहले मैं पढ़ूंगा।”

मीरा ने मेज की तरफ इशारा किया।

“यहां खून का एक छोटा निशान है।”

आरव झुका।

मेज के किनारे पर सूखा हुआ खून था।

“पुराना?”

मीरा ने देखा।

“नहीं। काफी ताजा है।”

आरव ने तुरंत कमरे की तलाशी का आदेश दिया।

अचानक देवेंद्र ने आवाज लगाई—

“सर!”

वह कमरे के दूसरे कोने में खड़ा था।

दीवार पर एक छोटा दरवाजा था।

दरवाजे पर लिखा था—

“नंदिनी।”

आरव ने कुंडी खोली।

अंदर एक छोटा कमरा था।

कमरे में कुछ नहीं था।

सिर्फ दीवार पर एक बड़ा आईना।

आरव आईने के सामने खड़ा हुआ।

उसमें उसका चेहरा दिखाई दे रहा था।

मीरा उसके पीछे खड़ी थी।

देवेंद्र दरवाजे के पास।

कबीर दूसरी ओर।

अचानक आरव की नजर आईने पर गई।

उसमें एक पांचवां व्यक्ति दिखाई दे रहा था।

सफेद कपड़े पहने एक लड़की।

आरव ने तुरंत पीछे देखा।

कोई नहीं।

उसने दोबारा आईने की तरफ देखा।

लड़की अभी भी दिखाई दे रही थी।

वह उसके बिल्कुल पीछे खड़ी थी।

आरव ने पिस्तौल निकाल ली।

“कौन है?”

मीरा ने पूछा—

“क्या हुआ?”

आरव ने आईने की ओर इशारा किया।

लेकिन अब उसमें सिर्फ चार लोग थे।

कबीर ने कहा—

“आपने कुछ देखा?”

आरव कुछ पल चुप रहा।

फिर बोला—

“शायद रोशनी का भ्रम था।”

लेकिन उसके हाथ में पकड़ी पिस्तौल अब भी नीचे नहीं हुई थी।

---

उसी समय ऊपर से एक तेज आवाज आई।

जैसे कोई भारी चीज गिर गई हो।

देवेंद्र ने कहा—

“सर, ऊपर कोई है।”

आरव ने तुरंत आदेश दिया—

“दो लोग मेरे साथ।”

वे सुरंग की तरफ लौटे।

लेकिन मीरा ने कहा—

“रुकिए।”

आरव ने पलटकर देखा।

मीरा फर्श पर झुकी हुई थी।

उसने एक छोटा-सा कांच का टुकड़ा उठाया।

“ये अभी टूटा है।”

“कहां से?”

“आईने से।”

आरव ने आईने को देखा।

उसके नीचे बहुत छोटा-सा हिस्सा टूटा हुआ था।

मीरा ने कहा—

“शायद इसी रास्ते से कोई अंदर आया या बाहर गया।”

आरव ने आईने के पीछे हाथ लगाया।

एक पतली जगह महसूस हुई।

उसने जोर लगाया।

आईना थोड़ा घूम गया।

पीछे अंधेरी जगह थी।

एक और रास्ता।

कबीर के चेहरे पर भय उतर आया।

“इस हवेली में कितने रास्ते हैं?”

आरव ने कहा—

“अब तक तीन।”

कबीर बोला—

“पुरानी कहानी में सात बताए गए हैं।”

आरव ने उसकी तरफ देखा।

“तुम बहुत कुछ जानते हो।”

कबीर चुप हो गया।

आरव ने कहा—

“अब ये तय है कि तुम सिर्फ पत्रकार नहीं हो।”

कबीर ने उसकी आंखों में देखा।

“मैं नंदिनी की मौत की सच्चाई तलाश रहा हूं।”

“क्यों?”

“क्योंकि मेरी बड़ी बहन उस रात गायब हुई थी।”

आरव कुछ पल उसे देखता रहा।

“नाम?”

“काव्या।”

“वह नंदिनी को जानती थी?”

“हां।”

“कितना?”

कबीर की आवाज भारी हो गई।

“वह उसकी सबसे करीबी दोस्त थी।”

---

ऊपर से अचानक रागिनी की चीख सुनाई दी।

“आरव!”

आरव बिना समय गंवाए सुरंग से बाहर दौड़ा।

जब वह मुख्य हॉल में पहुंचा तो रागिनी जमीन पर बैठी थी।

उसके हाथ में एक पुरानी तस्वीर थी।

मंगल उसके पास खड़ा था।

आरव ने पूछा—

“क्या हुआ?”

रागिनी ने तस्वीर आगे कर दी।

“ये मुझे नंदिनी के कमरे में मिली।”

आरव ने तस्वीर ली।

तस्वीर में नंदिनी थी।

उसके साथ रागिनी भी थी।

दोनों मुस्कुरा रही थीं।

पीछे वही काली हवेली।

तस्वीर पुरानी थी।

लेकिन उसके पीछे लिखी तारीख देखकर आरव की नजर ठहर गई—

16 अगस्त 2014।

एक दिन पहले।

रागिनी ने धीमे स्वर में कहा—

“नंदिनी मेरी बहन जैसी थी।”

आरव ने पूछा—

“आपने हमें ये पहले क्यों नहीं बताया?”

“क्योंकि…”

रागिनी ने तस्वीर के पीछे की ओर इशारा किया।

वहां हाथ से लिखा था—

“अगर मैं मर जाऊं तो रागिनी पर भरोसा मत करना।”

आरव ने तुरंत रागिनी की तरफ देखा।

रागिनी का चेहरा सफेद पड़ गया।

“मैंने ये नहीं लिखा।”

“लेकिन किसी ने लिखा है।”

“हां।”

“कौन?”

“मुझे नहीं पता।”

आरव ने पूछा—

“उस रात क्या हुआ था?”

रागिनी ने आंखें बंद कर लीं।

“बारह साल पहले…”

वह रुक गई।

“नंदिनी को पता चला था कि हवेली के तहखाने में कुछ छिपाया गया है।”

“क्या?”

“मुझे नहीं पता।”

“झूठ।”

“मैं सच कह रही हूं।”

“फिर उसने क्या किया?”

“उसने चाचा से पूछा।”

“रणविजय से?”

“हां।”

“और?”

रागिनी की आवाज धीमी हो गई।

“उस रात नंदिनी बहुत डर गई थी।”

“किससे?”

“विक्रांत से।”

आरव की नजर कबीर से मिली।

कबीर कुछ नहीं बोला।

रागिनी ने आगे कहा—

“विक्रांत चाचा का छोटा भाई था।”

आरव ने पूछा—

“वह अब कहां है?”

रागिनी ने सिर उठाया।

उसकी आंखों में ऐसा डर था जिसे देखकर कमरे का वातावरण बदल गया।

“मर चुका है।”

“कब?”

“उसी रात।”

आरव कुछ पल चुप रहा।

“नंदिनी और विक्रांत दोनों की मौत एक ही रात हुई?”

रागिनी ने सिर हिला दिया।

“लेकिन पुलिस रिकॉर्ड में सिर्फ नंदिनी की मौत है।”

“विक्रांत की लाश कभी नहीं मिली।”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

कबीर ने धीमे स्वर में कहा—

“यही झूठ था।”

आरव उसकी तरफ मुड़ा।

“क्या?”

“विक्रांत मरा नहीं था।”

रागिनी ने उसे घूरकर देखा।

“तुम्हें कैसे पता?”

कबीर ने कहा—

“क्योंकि मेरी बहन काव्या ने आखिरी बार उसे जिंदा देखा था।”

आरव ने तुरंत पूछा—

“कहां?”

कबीर ने जवाब दिया—

“काली हवेली के तहखाने में।”

अचानक मंगल पीछे हट गया।

उसके हाथ से लालटेन गिरते-गिरते बची।

आरव ने पूछा—

“मंगल?”

बूढ़ा कांप रहा था।

“क्या हुआ?”

मंगल ने धीरे से कहा—

“विक्रांत…”

उसकी आवाज टूट गई।

“विक्रांत को मैंने आखिरी बार देखा था।”

आरव उसकी ओर बढ़ा।

“कब?”

मंगल ने आंखें बंद कर लीं।

“बारह साल पहले…”

“कहां?”

मंगल ने कांपती उंगली से उसी सुरंग की तरफ इशारा किया।

“यहीं।”

---

अचानक हवेली की सारी बत्तियां बुझ गईं।

पूर्ण अंधेरा।

रागिनी चीख उठी।

देवेंद्र ने टॉर्च जलाई।

मंगल गायब था।

आरव ने चारों तरफ देखा।

“मंगल!”

कोई जवाब नहीं।

कबीर ने कहा—

“वह अभी यहीं था।”

आरव ने देवेंद्र को आदेश दिया—

“मुख्य दरवाजा बंद करो।”

“जी।”

“कोई हवेली से बाहर नहीं जाएगा।”

मीरा ने फर्श की ओर टॉर्च डाली।

वहां गीले पैरों के निशान थे।

लेकिन इस बार निशान ऊपर की मंजिल की ओर जा रहे थे।

आरव उनके पीछे दौड़ा।

सीढ़ियों पर पहुंचते ही उसे मंगल दिखाई दिया।

वह तीसरी मंजिल के आखिरी कमरे के सामने खड़ा था।

स्थिर।

बिल्कुल शांत।

आरव ने पुकारा—

“मंगल!”

मंगल ने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर देखा।

उसके हाथ में एक पुरानी चाबी थी।

“साहब…”

“ये चाबी कहां मिली?”

मंगल ने जवाब नहीं दिया।

आरव ने चाबी ले ली।

उस पर सिर्फ एक अक्षर खुदा था—

N

नंदिनी।

आरव ने कमरे का दरवाजा खोला।

अंदर अंधेरा था।

टॉर्च की रोशनी कमरे में घूमी।

एक पल के लिए कुछ नहीं दिखाई दिया।

फिर रोशनी दीवार पर पड़ी।

दीवार पर दर्जनों नाम लिखे थे।

कुछ नामों के आगे तारीखें थीं।

कुछ के आगे लाल निशान।

सबसे नीचे नया नाम लिखा था—

रणविजय सिंह — 17 अगस्त 2026

उसके नीचे चार खाली जगहें थीं।

आरव ने गहरी सांस ली।

“चार…”

मीरा ने धीमे स्वर में कहा—

“वही चार मौतें।”

आरव ने दीवार को ध्यान से देखा।

सबसे ऊपर पहला नाम था—

नंदिनी — 17 अगस्त 2014

उसके आगे लाल निशान नहीं था।

आरव चौंक गया।

“अगर बाकी सभी मृतकों के नाम के आगे निशान है…”

मीरा ने कहा—

“तो नंदिनी के आगे क्यों नहीं?”

कबीर ने धीरे से कहा—

“क्योंकि वह मरी ही नहीं थी।”

रागिनी ने चीखकर कहा—

“चुप रहो!”

उसी क्षण कमरे के पीछे से आवाज आई—

छन… छन… छन…

पायल।

सभी की नजर एक साथ कमरे के अंधेरे कोने की ओर गई।

वहां सफेद कपड़े पहने एक आकृति खड़ी थी।

लंबे बाल चेहरे पर।

वह धीरे-धीरे आगे बढ़ी।

रागिनी पीछे हट गई।

“नंदिनी…”

आकृति रुकी।

उसने सिर उठाया।

चेहरा अंधेरे में था।

फिर धीमी आवाज आई—

“रागिनी…”

रागिनी की आंखों से आंसू बह निकले।

“नंदिनी?”

आरव ने पिस्तौल तान दी।

“रुको!”

आकृति ने उसकी तरफ देखा।

कुछ क्षण बाद वह पीछे हटने लगी।

आरव उसके पीछे दौड़ा।

कमरे के दूसरे दरवाजे से बाहर निकलते ही वह गायब हो चुकी थी।

आरव ने गलियारे की दोनों दिशाओं में टॉर्च डाली।

कोई नहीं।

लेकिन जमीन पर एक कागज पड़ा था।

उसने उठाया।

उस पर सिर्फ एक वाक्य था—

“जिसे तुम नंदिनी समझ रहे हो, वह नंदिनी नहीं है।”

आरव का चेहरा कठोर हो गया।

उसने कागज पलटा।

पीछे एक तारीख लिखी थी—

18 अगस्त 2014।

यानी…

कल की तारीख।

बारह साल पहले।

आरव ने धीरे से कहा—

“कल क्या हुआ था?”

मंगल पीछे खड़ा था।

उसके चेहरे पर आंसू थे।

उसने पहली बार बिना डर के कहा—

“साहब…”

आरव ने उसकी ओर देखा।

मंगल बोला—

“कल नंदिनी की मौत नहीं हुई थी।”

“तो क्या हुआ था?”

मंगल की आवाज कांप रही थी।

“कल…”

वह रुका।

“काली हवेली में चार लोग जिंदा जले थे।”

आरव के चेहरे पर सन्नाटा उतर आया।

“चार?”

मंगल ने सिर हिलाया।

“लेकिन उनकी लाशें कभी नहीं मिलीं।”

उसी क्षण नीचे से एक भयानक चीख सुनाई दी।

फिर गोली चलने की आवाज।

धांय!

आरव, देवेंद्र, मीरा और कबीर एक साथ नीचे की ओर दौड़े।

लेकिन सीढ़ियों तक पहुंचते-पहुंचते दूसरी गोली चली।

धांय!

और फिर सब शांत हो गया।

आरव ने पिस्तौल कसकर पकड़ ली।

नीचे हॉल में एक आदमी पड़ा था।

वह था—

मंगल।

उसके सीने से खून बह रहा था।

और उसके हाथ में वही पुरानी डायरी थी।

आरव दौड़कर उसके पास पहुंचा।

मंगल की सांसें चल रही थीं।

उसने मुश्किल से आंखें खोलीं।

“साहब…”

“किसने गोली मारी?”

मंगल ने कांपते हुए ऊपर देखा।

उसके होंठ हिले—

“वो…”

“कौन?”

“वो… यहीं है…”

“कहां?”

मंगल ने अपनी आखिरी ताकत जुटाकर हवेली की ऊपरी मंजिल की तरफ इशारा किया।

“नंदिनी…”

उसकी आंखें बंद हो गईं।

आरव ने तुरंत उसकी नब्ज जांची।

बहुत कमजोर।

लेकिन जीवित।

देवेंद्र ने कहा—

“सर, गोली चलाने वाला भागा होगा।”

आरव ने सिर उठाया।

ऊपर तीसरी मंजिल की वही खिड़की दिखाई दे रही थी।

और उसके पीछे…

एक परछाईं खड़ी थी।

परछाईं ने हाथ उठाया।

और कांच पर उंगली से कुछ लिखा।

बाहर बिजली चमकी।

शब्द साफ दिखाई दिए—

“अगली मौत… कल रात।”

आरव ने खिड़की की तरफ देखा।

परछाईं गायब हो चुकी थी।

लेकिन अब उसके पास एक बात साफ थी—

यह सिर्फ एक हत्या का मामला नहीं था।

यह बारह साल पुराने अपराध का ऐसा जाल था, जिसमें मृतक, जीवित और शायद पूरा गांव किसी न किसी तरह फंसा हुआ था।

और सबसे खतरनाक बात यह थी कि—

हत्यारा पुलिस के सामने था।

लेकिन वह कौन था?

नंदिनी?

विक्रांत?

रागिनी?

कबीर?

या फिर कोई ऐसा व्यक्ति…

जिसका नाम अभी तक किसी ने लिया ही नहीं था?

आरव ने जमीन पर पड़ी डायरी उठाई।

उसने पहला पन्ना खोला।

आखिरी पन्ने पर ताजा खून से लिखा था—

“कल पहला नाम सामने आएगा।”

आरव ने डायरी बंद कर दी।

उसकी आंखों में अब एक ही लक्ष्य था—

बारह साल पहले 18 अगस्त की रात वास्तव में काली हवेली में क्या हुआ था?

और उस सवाल का जवाब…

शायद दूसरी मौत से पहले मिलना जरूरी था।

क्रमशः…

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