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भाग 2 — खून से लिखा संदेश
Yogesh Kumar Maurya · Serial Horror · 13 मिनट
- Writer
- Yogesh Kumar Maurya
- Story
- काली रात का सच
- Chapter
- 2 of 4
- Category
- Serial Horror
- Reading time
- 13 min
- Words
- 2452
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
रात के साढ़े बारह बज चुके थे।
काली हवेली के भीतर मौजूद हर व्यक्ति की निगाह उसी जगह टिकी थी, जहां कुछ मिनट पहले फर्श पर खून से लिखा गया था—
“अभी चार और बाकी हैं।”
कमरे में ऐसी खामोशी थी कि किसी की सांसों की आवाज भी साफ सुनाई दे रही थी।
इंस्पेक्टर आरव राठौर कुछ क्षण उस संदेश को देखता रहा।
फिर उसने जेब से मोबाइल निकाला और तस्वीर खींचने के बजाय सिपाही देवेंद्र से कहा—
“फोटोग्राफिक टीम को ऊपर बुलाओ। कोई इस फर्श के पास नहीं जाएगा।”
देवेंद्र ने तुरंत वायरलेस उठाया।
“कंट्रोल, क्राइम सीन यूनिट को काली हवेली की तीसरी मंजिल पर भेजिए। तत्काल।”
आरव ने रागिनी की ओर देखा।
वह अब भी कांप रही थी।
“आपने ये संदेश पहले कभी देखा है?”
रागिनी ने सिर हिला दिया।
“नहीं।”
“झूठ मत बोलिए।”
“मैं सच कह रही हूं।”
“फिर आपको इतना डर किस बात का है?”
रागिनी ने कुछ कहने के लिए मुंह खोला, लेकिन आवाज नहीं निकली।
आरव उसके पास गया।
“रागिनी, आपके चाचा की हत्या हुई है। अभी आपकी आंखों के सामने एक धमकी लिखी गई है। अगर आप कुछ जानती हैं और छिपा रही हैं तो अगली मौत रोकना मुश्किल होगा।”
रागिनी ने कांपते हुए पूछा—
“आप सच में मानते हैं कि ये किसी इंसान ने किया है?”
आरव ने बिना झिझक कहा—
“हां।”
“और अगर वो इंसान नहीं हुआ तो?”
“तो भी मुझे उसके पीछे किसी इंसान को ढूंढना होगा।”
रागिनी ने उसकी तरफ देखा।
“आपको डर नहीं लगता?”
आरव के चेहरे पर हल्की कठोर मुस्कान आई।
“डर लगता है। लेकिन डर के कारण जांच बंद नहीं होती।”
उसी समय बाहर से गाड़ियों की आवाज सुनाई दी।
कुछ मिनट बाद दो लोग सीढ़ियों से ऊपर आए।
एक महिला डॉक्टर, लगभग बत्तीस वर्ष की।
बाल पीछे बंधे हुए, हाथ में मेडिकल किट और चेहरे पर गंभीरता।
उसके पीछे एक फोटोग्राफर और दो फोरेंसिक कर्मचारी थे।
महिला ने आरव के सामने आकर कहा—
“डॉ. मीरा सिन्हा।”
आरव ने सिर हिलाया।
“आपको आने में देर हो गई।”
“रास्ते में पुलिस बैरिकेड था। रास्ता साफ करवाकर आई हूं।”
मीरा ने कमरे में नजर दौड़ाई।
“मृतक?”
“ठाकुर रणविजय सिंह।”
मीरा लाश के पास बैठ गई।
उसने दस्ताने पहने और गर्दन के घाव को ध्यान से देखने लगी।
“एक गहरा घाव है।”
आरव ने पूछा—
“मौत का संभावित समय?”
“पहले शरीर की जांच करने दीजिए।”
मीरा ने थर्मामीटर से तापमान लिया, आंखों की जांच की, फिर हाथों और गर्दन की स्थिति देखी।
“शरीर का तापमान, रिगर मॉर्टिस और आसपास की परिस्थितियों को देखकर मौत लगभग ग्यारह बजकर पचास मिनट से बारह बजकर दस मिनट के बीच हुई होगी।”
आरव ने तुरंत पूछा—
“मतलब बारह बजकर सात मिनट?”
मीरा ने उसकी तरफ देखा।
“हो सकता है। लेकिन अभी इसे निश्चित समय मत मानिए।”
आरव ने घड़ी की तरफ इशारा किया।
“वह घड़ी बारह बजकर सात मिनट पर रुकी हुई है।”
मीरा उठकर घड़ी के पास गई।
उसने घड़ी को ध्यान से देखा।
“ये घड़ी कब से बंद थी?”
मंगल ने दूर से जवाब दिया—
“कई साल से।”
मीरा ने घड़ी का पिछला ढक्कन खोला।
कुछ सेकंड बाद बोली—
“घड़ी बंद नहीं थी।”
सब चौंक गए।
आरव ने पूछा—
“क्या मतलब?”
“इसके अंदर की स्प्रिंग पूरी तरह ढीली है। इसे किसी ने हाल में घुमाया होगा, लेकिन घड़ी को सही तरीके से चलने के लिए जितनी ऊर्जा चाहिए थी, उतनी नहीं दी गई। कुछ सेकंड या कुछ मिनट चलकर फिर रुक गई होगी।”
आरव ने देवेंद्र की तरफ देखा।
“मतलब किसी ने इसे जानबूझकर चलाया।”
मीरा ने कहा—
“संभावना है।”
आरव ने घड़ी की तस्वीर खिंचवाई।
“किसी को इस कमरे में समय का भ्रम पैदा करना था।”
मीरा ने उसकी ओर देखा।
“या फिर किसी को ऐसा दिखाना था कि हत्या ठीक बारह बजकर सात मिनट पर हुई।”
आरव कुछ पल चुप रहा।
फिर उसने लाश की मुट्ठी की तरफ इशारा किया।
“ये भी देखिए।”
मीरा ने रणविजय की दाहिनी हथेली देखी।
“मुट्ठी किसने खोली?”
आरव ने कहा—
“मैंने।”
मीरा की भौंह तन गई।
“आपको नहीं खोलनी चाहिए थी।”
“मुझे पता है। लेकिन अंदर कागज था।”
“कागज?”
आरव ने सबूत वाले पारदर्शी बैग की तरफ इशारा किया।
“खून से लिखा हुआ संदेश।”
मीरा ने बैग को उठाकर रोशनी के सामने किया।
कागज पर लिखा था—
मैं वापस आ गई हूँ।
मीरा ने कुछ सेकंड उसे देखा।
“ये खून है?”
“प्रारंभिक तौर पर।”
“मृतक का?”
“अभी जांच नहीं हुई।”
मीरा ने कागज वापस रख दिया।
“फिर कुछ भी निष्कर्ष मत निकालिए।”
आरव हल्का-सा मुस्कुराया।
“मैं निष्कर्ष नहीं निकालता, डॉक्टर। सवाल इकट्ठे करता हूं।”
“अच्छी आदत है।”
“और आपके पास?”
मीरा ने लाश की तरफ देखते हुए कहा—
“मुझे लगता है हत्या के बाद संदेश लिखा गया है।”
आरव की आंखें सिकुड़ गईं।
“आपको ऐसा क्यों लगता है?”
“मृतक के हाथ पर खून का जो पैटर्न है, वह उस तरह नहीं है जैसा किसी व्यक्ति के जिंदा रहते अपनी मुट्ठी में कागज पकड़ने पर होता। पहले मुझे लैब रिपोर्ट चाहिए, लेकिन अभी तक के संकेत यही कहते हैं।”
आरव ने तुरंत पूछा—
“मतलब हत्यारे ने कागज बाद में रखा?”
“संभावना है।”
आरव ने धीरे से कहा—
“तो हत्यारा चाहता था कि हमें लगे कि रणविजय ने खुद ये संदेश पकड़ा था।”
मीरा ने कोई जवाब नहीं दिया।
उधर फोरेंसिक टीम गलियारे में मिले पैरों के निशानों की जांच कर रही थी।
एक विशेषज्ञ ने आरव को बुलाया।
“सर।”
आरव वहां गया।
“क्या मिला?”
विशेषज्ञ ने टॉर्च जमीन पर डाली।
“निशान असली हैं।”
“नंगे पैर?”
“हां।”
“पुरुष या महिला?”
“अभी निश्चित नहीं।”
“आकार?”
“लगभग सात नंबर।”
आरव नीचे बैठ गया।
उसने निशान ध्यान से देखा।
“गीले हैं।”
“जी।”
“बारिश तो हुई नहीं।”
विशेषज्ञ ने कहा—
“यही बात अजीब है।”
आरव ने पूछा—
“पानी?”
“संभवतः।”
“कहां से आया?”
“अभी पता नहीं।”
आरव ने गलियारे से नीचे तक निशानों की दिशा देखी।
निशान उस कमरे तक जा रहे थे जहां रणविजय की हत्या हुई थी।
फिर सीढ़ियों की तरफ मुड़ते थे।
लेकिन नीचे आते-आते वे गायब हो गए थे।
आरव ने पूछा—
“क्या किसी ने इन्हें मिटाया?”
“नहीं सर।”
“तो?”
विशेषज्ञ ने कंधे उचकाए।
“जमीन की सतह यहां अलग है। संभव है कि किसी सूखे कपड़े या किसी ऐसी चीज से पैर ढके गए हों जिसके कारण नीचे के हिस्से में निशान नहीं बने।”
आरव ने तुरंत कहा—
“मोल्ड बनाओ। हर निशान का।”
“जी सर।”
आरव ने जमीन पर उंगली नहीं लगाई।
“और उस तरल का सैंपल लो।”
“जी।”
मीरा पीछे खड़ी यह सब सुन रही थी।
उसने कहा—
“आरव।”
“हां?”
“अगर कोई यहां नंगे पैर आया था तो उसके तलवों पर कुछ न कुछ होना चाहिए। मिट्टी, धूल, लकड़ी के कण…”
आरव ने उसकी बात पूरी की—
“लेकिन यहां सिर्फ पानी के निशान हैं।”
“ठीक।”
आरव ने गलियारे की तरफ देखा।
“तो सवाल है—वो पानी आया कहां से?”
तभी नीचे से आवाज आई—
“सर!”
आरव और मीरा दोनों तेजी से नीचे गए।
हॉल में एक पुलिसकर्मी खड़ा था।
उसके हाथ में लाल रंग का कपड़ा था।
“ये क्या है?”
“सीढ़ियों के पीछे मिला है।”
आरव ने दस्ताने पहनकर कपड़ा लिया।
वह किसी पुराने कपड़े का टुकड़ा था।
किनारे पर काले धागे लगे थे।
मीरा ने उसे देखा।
“इस पर खून हो सकता है।”
“लैब में भेजो।”
पुलिसकर्मी चला गया।
आरव ने मंगल को बुलाया।
“ये कपड़ा किसका है?”
मंगल ने उसे देखते ही नजरें झुका लीं।
आरव ने पकड़ लिया।
“आप पहचानते हैं।”
“नहीं साहब।”
“मंगल।”
बूढ़े ने गहरी सांस ली।
“ये… नंदिनी बिटिया की पोशाक जैसा है।”
रागिनी, जो कुछ दूरी पर खड़ी थी, अचानक बोल पड़ी—
“नहीं!”
सभी की नजर उसकी तरफ गई।
रागिनी ने तुरंत अपने मुंह पर हाथ रख लिया।
आरव उसके पास पहुंचा।
“आपने कहा था कि आपको नंदिनी के बारे में कुछ नहीं पता।”
रागिनी चुप रही।
“अब ये बताइए कि आपने कपड़े को देखते ही क्यों कहा कि नहीं?”
“मैं…”
“क्या?”
“मुझे नहीं पता।”
आरव ने सख्त आवाज में कहा—
“आपको सब पता है।”
रागिनी की आंखों में आंसू आ गए।
“मैं कुछ नहीं कह सकती।”
“क्यों?”
“क्योंकि अगर मैंने कहा तो…”
वह रुक गई।
आरव ने पूछा—
“तो?”
रागिनी ने धीरे से कहा—
“अगली लाश मेरी होगी।”
कुछ देर बाद हवेली के बाहर बारिश शुरू हो गई।
बिजली चमकती रही।
पुलिस ने हवेली को चारों तरफ से घेर लिया था।
आरव ने आदेश दिया कि कोई भी व्यक्ति बिना अनुमति परिसर से बाहर न जाए।
रागिनी को नीचे के एक कमरे में बैठाया गया।
मंगल को भी वहीं रखा गया।
देवेंद्र बाहर पहरा दे रहा था।
आरव और मीरा ऊपर जांच में लगे थे।
तभी अचानक एक सिपाही दौड़ता हुआ आया।
“सर!”
“क्या हुआ?”
“बाहर एक आदमी आया है।”
“कौन?”
“कहता है पत्रकार है।”
आरव नीचे गया।
मुख्य दरवाजे पर एक युवक खड़ा था।
करीब तीस साल की उम्र।
कंधे पर कैमरा।
हाथ में नोटबुक।
भीगे हुए बाल।
उसने आरव को देखते ही कहा—
“इंस्पेक्टर आरव राठौर?”
“हां।”
“मैं कबीर मल्होत्रा हूं। स्थानीय क्राइम रिपोर्टर।”
आरव ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा।
“इतनी रात को यहां क्या कर रहे हो?”
“हत्या की खबर मिली।”
“खबर किसने दी?”
कबीर कुछ क्षण चुप रहा।
“स्रोत नहीं बता सकता।”
“ये प्रेस की आजादी नहीं, क्राइम सीन है।”
“मैं अंदर नहीं आया था।”
आरव ने उसके कैमरे की तरफ देखा।
“फोटो खींचे?”
“बाहर से।”
“दिखाओ।”
कबीर ने कैमरा दिया।
आरव ने तस्वीरें देखनी शुरू कीं।
हवेली की तस्वीरें थीं।
बाहर की।
खिड़कियों की।
मुख्य दरवाजे की।
फिर एक तस्वीर पर आरव की नजर रुक गई।
तीसरी मंजिल की खिड़की।
उसी खिड़की में सफेद कपड़े पहने एक धुंधली आकृति दिखाई दे रही थी।
आरव ने स्क्रीन पर तस्वीर बड़ा किया।
कबीर ने कहा—
“मैंने भी इसे देखा था।”
“कब?”
“करीब बारह बजकर पांच मिनट पर।”
आरव ने उसकी तरफ देखा।
“तुम्हारी घड़ी?”
“मेरे कैमरे में टाइम स्टैम्प है।”
आरव ने तस्वीर का विवरण देखा।
00:05:42
आरव कुछ क्षण चुप रहा।
“तुमने ये फोटो कब खींची?”
“ठीक उस वक्त।”
“उस समय हवेली की ऊपरी मंजिल में कौन था?”
कबीर ने कहा—
“मुझे नहीं पता।”
आरव ने कैमरा उसे वापस नहीं किया।
“ये कैमरा जब्त किया जाता है।”
कबीर ने तुरंत विरोध किया।
“लेकिन सर—”
“ये हत्या की जांच है।”
कबीर चुप हो गया।
आरव ने पूछा—
“तुम्हें नंदिनी के बारे में क्या पता है?”
कबीर का चेहरा बदल गया।
“बहुत कुछ।”
आरव ने उसे गौर से देखा।
“कितना?”
कबीर ने धीमे स्वर में कहा—
“इतना कि मुझे यकीन है रणविजय की मौत सिर्फ शुरुआत है।”
आरव ने कहा—
“और तुम्हें कैसे पता?”
कबीर ने अपनी जेब से एक मुड़ा हुआ कागज निकाला।
“क्योंकि मुझे ये आज सुबह मिला था।”
आरव ने कागज लिया।
उस पर हाथ से लिखा था—
“आज रात काली हवेली में पहली मौत होगी।”
नीचे कोई नाम नहीं था।
सिर्फ एक निशान था—
एक गोल घेरे के अंदर बना हुआ काला त्रिकोण।
आरव की नजर उस निशान पर टिक गई।
“ये तुम्हें कहां मिला?”
“मेरे ऑफिस के दरवाजे के नीचे।”
“किसने भेजा?”
“नहीं जानता।”
“और तुम सीधे यहां चले आए?”
“हां।”
“क्यों?”
कबीर ने कहा—
“क्योंकि बारह साल पहले भी मुझे इसी निशान वाला एक कागज मिला था।”
आरव कुछ कहता, उससे पहले ऊपर से जोरदार आवाज आई।
धड़ाम!
सभी ने सिर उठाया।
फिर एक चीख सुनाई दी।
“बचाओ!”
रागिनी की आवाज थी।
आरव पिस्तौल निकालकर सीढ़ियों की ओर दौड़ा।
देवेंद्र उसके पीछे था।
कबीर भी पीछे भागा।
मीरा ऊपर पहुंच चुकी थी।
रागिनी गलियारे में खड़ी थी।
उसके सामने फर्श पर खून फैला था।
लेकिन कोई लाश नहीं थी।
आरव ने चारों तरफ देखा।
“क्या हुआ?”
रागिनी कांपते हुए बोली—
“वह… यहां थी।”
“कौन?”
“नंदिनी…”
“तुमने देखा?”
“हां।”
“कहां?”
रागिनी ने सामने वाले बंद कमरे की ओर इशारा किया।
“उस कमरे में।”
आरव ने दरवाजा खोला।
कमरा खाली था।
सिर्फ एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी।
और कुर्सी पर रखा था—
एक सफेद कपड़ा।
उस पर ताजा खून लगा था।
मीरा ने कपड़े को देखा।
“इसे छूना मत।”
आरव ने पूछा—
“खून किसका?”
“लैब बताएगी।”
आरव ने कमरे का निरीक्षण किया।
खिड़की बंद।
अलमारी बंद।
कोई दूसरा रास्ता नहीं।
लेकिन फर्श पर खून की एक पतली लकीर थी।
वह लकीर कमरे से निकलकर दीवार तक जाती थी।
और वहीं खत्म हो जाती थी।
आरव ने दीवार को थपथपाया।
ठक… ठक…
एक जगह आवाज अलग थी।
खोखली।
उसने देवेंद्र की तरफ देखा।
“दीवार तोड़ने की जरूरत नहीं।”
उसने कमरे की पुरानी अलमारी हटवाई।
पीछे लकड़ी का छोटा पैनल था।
आरव ने उसे सावधानी से दबाया।
पैनल खुल गया।
अंदर अंधेरी सुरंग थी।
रागिनी चीख उठी—
“नहीं!”
आरव ने टॉर्च अंदर डाली।
सुरंग नीचे की तरफ जा रही थी।
काफी पुरानी।
लेकिन धूल के बीच कुछ ताजा निशान थे।
पैरों के निशान।
और इस बार…
नंगे पैर नहीं।
जूते के निशान।
आरव नीचे झुका।
जूते का पैटर्न साफ था।
उसने तुरंत फोटो खिंचवाई।
“अब हमारे पास इंसान के होने का सबूत है।”
मीरा ने कहा—
“और शायद वही व्यक्ति पानी वाले पैरों के निशान भी बना रहा था।”
आरव ने सिर हिलाया।
“हो सकता है।”
कबीर ने सुरंग की तरफ देखते हुए कहा—
“ये रास्ता कहां जाता है?”
मंगल की आवाज पीछे से आई—
“तहखाने में।”
आरव ने उसकी तरफ देखा।
“तुम्हें इस सुरंग के बारे में पहले से पता था?”
मंगल चुप रहा।
आरव ने सख्ती से पूछा—
“मंगल!”
बूढ़े ने कांपते हुए कहा—
“साहब… इस हवेली में सात गुप्त रास्ते हैं।”
“और कितने लोगों को पता है?”
“पहले ठाकुर साहब को… फिर…”
“फिर?”
मंगल ने रागिनी की तरफ देखा।
रागिनी ने नजरें झुका लीं।
आरव ने तुरंत समझ लिया।
“रागिनी को भी पता है।”
रागिनी ने कुछ नहीं कहा।
उसी क्षण नीचे से फोन की घंटी सुनाई दी।
एक बार।
दो बार।
तीन बार।
देवेंद्र नीचे दौड़ा।
कुछ सेकंड बाद उसकी आवाज गूंजी—
“सर!”
आरव नीचे गया।
देवेंद्र के हाथ में हवेली का पुराना लैंडलाइन फोन था।
“ये अभी बजा।”
आरव ने रिसीवर उठाया।
दूसरी तरफ कोई आवाज नहीं थी।
सिर्फ भारी सांसें।
फिर बहुत धीमी आवाज आई—
“एक…”
आरव ने कहा—
“कौन?”
“दो…”
“कौन बोल रहा है?”
“तीन…”
आरव ने फोन कसकर पकड़ा।
“अपना नाम बताओ!”
कुछ सेकंड खामोशी रही।
फिर फुसफुसाहट आई—
“चार…”
लाइन कट गई।
आरव ने रिसीवर नीचे रखा।
देवेंद्र ने पूछा—
“सर, ये क्या था?”
आरव ने उसकी तरफ देखा।
“गिनती।”
“किसकी?”
आरव ने धीरे से कहा—
“मौतों की।”
उसी समय ऊपर से मीरा की आवाज आई—
“आरव!”
आरव दौड़कर ऊपर गया।
मीरा रणविजय की लाश के पास खड़ी थी।
उसके हाथ में फोरेंसिक रिपोर्ट का प्रारंभिक परिणाम था।
“क्या मिला?”
मीरा ने कागज उसकी तरफ बढ़ाया।
“रणविजय के कपड़ों पर जो खून है, उसका कुछ हिस्सा उसका अपना है।”
आरव ने पूछा—
“कुछ हिस्सा?”
“हां।”
“बाकी?”
मीरा ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा—
“बाकी खून किसी और व्यक्ति का है।”
आरव कुछ पल चुप रहा।
“किसका?”
“अभी डीएनए रिपोर्ट नहीं आई।”
मीरा ने फिर कहा—
“लेकिन एक और बात है।”
“क्या?”
“रणविजय के नाखूनों के नीचे त्वचा के बहुत छोटे कण मिले हैं।”
आरव की आंखों में चमक आ गई।
“मतलब उसने हत्यारे से संघर्ष किया था?”
“संभवतः।”
“लैब को तुरंत भेजो।”
“भेज दिया है।”
आरव ने लाश की तरफ देखा।
फिर उसकी नजर उस कागज पर गई—
मैं वापस आ गई हूँ।
और फिर फर्श पर लिखे शब्दों पर—
अभी चार और बाकी हैं।
उसने धीरे से कहा—
“हत्यारा हमें डराना चाहता है।”
मीरा ने पूछा—
“और अगर नहीं?”
आरव ने उसकी तरफ देखा।
“तो हमें उन चार लोगों को ढूंढना होगा।”
“कौन चार?”
आरव ने रागिनी की तरफ देखा।
मंगल की तरफ देखा।
फिर कबीर की तरफ।
और अंत में हवेली की दीवारों की ओर।
“ये हमें अभी नहीं पता।”
अचानक बाहर बिजली चमकी।
उसी रोशनी में तीसरी मंजिल की खिड़की फिर दिखाई दी।
लेकिन इस बार वहां कोई लड़की नहीं थी।
वहां एक आदमी खड़ा था।
काला कोट।
सिर झुका हुआ।
चेहरा अंधेरे में छिपा हुआ।
आरव ने तुरंत पिस्तौल उठाई।
“वहां!”
सभी खिड़की की तरफ दौड़े।
लेकिन बिजली दोबारा चमकी तो खिड़की खाली थी।
आरव सीढ़ियों की ओर भागा।
तीसरी मंजिल तक पहुंचा।
खिड़की अंदर से बंद थी।
उसने कुंडी देखी।
कोई छेड़छाड़ नहीं।
लेकिन खिड़की के नीचे फर्श पर एक छोटा-सा कागज पड़ा था।
आरव ने उसे दस्ताने से उठाया।
उस पर सिर्फ एक लाइन लिखी थी—
“इंस्पेक्टर आरव राठौर, तुम्हें सच चाहिए… तो तहखाने में आओ।”
नीचे वही काला त्रिकोण बना था।
आरव ने कागज को कुछ क्षण देखा।
कबीर ने पीछे से कहा—
“आप जाएंगे?”
आरव ने जवाब दिया—
“हां।”
मीरा ने तुरंत कहा—
“अकेले नहीं।”
आरव ने पिस्तौल चेक की।
“कोई भी अकेला नहीं जाएगा।”
उसने देवेंद्र को आदेश दिया—
“चार आदमी साथ लो। सुरंग की पूरी तलाशी होगी।”
फिर उसने आखिरी बार उस कागज को देखा।
उसकी आंखों में अब डर नहीं था।
सिर्फ एक सवाल था—
अगर हत्यारा सचमुच तहखाने में इंतजार कर रहा था, तो वह पुलिस को वहां क्यों बुला रहा था?
और उससे भी बड़ा सवाल—
क्या काली हवेली का तहखाना सिर्फ एक गुप्त रास्ता था… या वहां बारह साल से छिपा हुआ वह सच था, जिसके लिए आज रात पहली हत्या की गई थी?
आरव ने टॉर्च उठाई।
“चलो।”
सुरंग के अंधेरे मुहाने के सामने वह रुक गया।
अंदर से ठंडी हवा का झोंका आया।
उस हवा में मिट्टी की गंध थी।
नमी की गंध थी।
और…
हल्की-सी खून की गंध भी।
आरव ने टॉर्च जलाई।
सुरंग के भीतर कुछ कदम आगे जमीन पर किसी चीज की चमक दिखाई दी।
वह झुका।
एक पुरानी चांदी की पायल।
उस पर खून की एक बूंद जमी थी।
और पायल के नीचे धूल में किसी ने उंगली से लिखा था—
“नंदिनी मरी नहीं थी।”
आरव की सांस एक पल को रुक गई।
उसने धीरे से पीछे मुड़कर रागिनी की तरफ देखा।
रागिनी का चेहरा बिल्कुल सफेद पड़ चुका था।
वह दीवार का सहारा लेकर खड़ी थी।
आरव ने पूछा—
“रागिनी…”
वह कांपते हुए बोली—
“मैंने आपको कहा था…”
“क्या?”
रागिनी की आंखों से आंसू बहने लगे।
“वो वापस आ गई है।”
आरव ने पायल को देखा।
फिर अंधेरी सुरंग को।
और पहली बार उसके मन में यह सवाल उठा—
अगर नंदिनी सचमुच मर चुकी थी… तो उसकी पायल बारह साल बाद इस तहखाने में कैसे पहुंची?
अंधेरे के भीतर कहीं बहुत दूर से आवाज आई—
छन… छन… छन…
आरव ने टॉर्च आगे कर दी।
सुरंग खाली थी।
लेकिन आवाज लगातार करीब आ रही थी।
छन… छन… छन…
फिर अचानक सब कुछ शांत हो गया।
और उसी अंधेरे में किसी ने बहुत धीमे स्वर में कहा—
“दूसरी मौत का समय आ गया है…”
क्रमशः…