PretikaSerial Horrorकाली रात का सच

भाग 1 — काली हवेली की रात

Yogesh Kumar Maurya · Serial Horror · 9 मिनट

Writer
Yogesh Kumar Maurya
Story
काली रात का सच
Chapter
1 of 4
Category
Serial Horror
Reading time
9 min
Words
1793
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

रात के ठीक बारह बजकर सात मिनट हुए थे।
आसमान पर बादल इतने घने थे कि चाँद बार-बार उनके पीछे छिप जा रहा था। तेज हवा के साथ सूखे पेड़ों की टहनियाँ एक-दूसरे से टकरा रही थीं और उनकी आवाज ऐसी लग रही थी जैसे कोई अंधेरे में खड़ा होकर लगातार फुसफुसा रहा हो।
गांव से करीब तीन किलोमीटर दूर, पहाड़ी के ऊपर खड़ी थी—काली हवेली।
बारह साल से बंद।
बारह साल से वीरान।
और बारह साल से गांव वालों के लिए एक ऐसी जगह, जिसका नाम लेते ही लोग अपनी आवाज धीमी कर लेते थे।
हवेली के आसपास कोई घर नहीं था। चारों तरफ घना जंगल, टूटी पत्थर की दीवारें और जंगली घास से ढका रास्ता था। हवेली की ऊंची खिड़कियां रात में किसी अंधी आंख की तरह दिखाई देती थीं।
लेकिन उस रात एक खिड़की में रोशनी थी।
ऊपरी मंजिल की आखिरी खिड़की में।
पीली, कांपती हुई रोशनी।
जैसे अंदर कोई लालटेन लेकर धीरे-धीरे चल रहा हो।
गांव के पुराने चौकीदार मंगल ने जब पहली बार वह रोशनी देखी तो उसकी सांस अटक गई।
वह सड़क किनारे बनी अपनी छोटी-सी चौकी में बैठा था। उसके सामने बुझती हुई अंगीठी थी और हाथ में पीतल का गिलास।
उसने खिड़की की तरफ देखा।
फिर नजरें झुका लीं।
कुछ सेकंड बाद उसने दोबारा देखा।
रोशनी अभी भी थी।
मंगल के हाथ से गिलास छूटकर जमीन पर गिर गया।
“नहीं…”
उसके होंठ कांपे।
“ये नहीं हो सकता।”
उसने खुद को समझाने की कोशिश की।
“हवेली बंद है… वहां कोई नहीं है…”
लेकिन तभी हवेली की ऊपरी मंजिल से एक आवाज आई।
छन… छन… छन…
पायल की आवाज।
मंगल के चेहरे का रंग उड़ गया।
उसने तुरंत चौकी का दरवाजा बंद किया और भीतर से कुंडी चढ़ा दी।
आवाज फिर आई।
छन… छन… छन…
इस बार पहले से ज्यादा साफ।
फिर अचानक—
एक महिला की धीमी चीख जंगल में गूंज उठी।
“बचाओ…”
मंगल दीवार से टिक गया।
उसने अपनी आंखें बंद कर लीं।
बारह साल पहले भी ऐसी ही रात थी।
बारह साल पहले भी इसी हवेली से एक लड़की की चीख सुनाई दी थी।
और अगली सुबह उसकी लाश मिली थी।
उस रात के बाद काली हवेली हमेशा के लिए बंद कर दी गई थी।
लेकिन आज…
बारह साल बाद…
हवेली फिर जाग गई थी।
उसी समय शहर से करीब चालीस किलोमीटर दूर पुलिस की जीप तेज रफ्तार से पहाड़ी की ओर बढ़ रही थी।
जीप चला रहा सिपाही देवेंद्र था।
पीछली सीट पर इंस्पेक्टर आरव राठौर बैठा था।
उसकी उम्र लगभग पैंतीस साल थी। चेहरा शांत, आंखें चौकन्नी और स्वभाव बेहद संयमित।
उसके हाथ में केस फाइल थी।
फाइल के ऊपर लिखा था—
मृतक: ठाकुर रणविजय सिंह।
देवेंद्र ने रियर-व्यू मिरर में आरव की तरफ देखा।
“सर…”
“हां?”
“आपने काली हवेली के बारे में सुना है?”
आरव ने फाइल से नजर नहीं हटाई।
“हां।”
“लोग कहते हैं वहां…”
आरव ने उसकी बात बीच में काट दी।
“लोग बहुत कुछ कहते हैं।”
देवेंद्र चुप हो गया।
कुछ सेकंड बाद फिर बोला—
“लेकिन सर, बारह साल पहले भी एक मौत हुई थी वहां।”
आरव ने पहली बार फाइल बंद की।
“किसकी?”
“एक लड़की की। नाम था… रागिनी?”
“रागिनी नहीं।”
आरव ने धीमे स्वर में कहा।
“नंदिनी।”
देवेंद्र ने हैरानी से उसे देखा।
“आपको पहले से पता है?”
“पुरानी केस फाइल पढ़ी है।”
“तो फिर…”
आरव ने खिड़की से बाहर अंधेरे जंगल की ओर देखते हुए कहा—
“इस बार की हत्या और बारह साल पुरानी मौत के बीच कोई संबंध है या नहीं, यही पता करना है।”
जीप कुछ आगे बढ़ी।
दूर पहाड़ी पर काली हवेली दिखाई देने लगी।
देवेंद्र ने अनायास एक्सीलेटर से पैर हटा लिया।
हवेली की एक खिड़की में रोशनी जल रही थी।
“सर…”
आरव ने उसकी नजर का पीछा किया।
वह कुछ क्षण खिड़की को देखता रहा।
“गाड़ी तेज करो।”
“सर?”
“किसी ने हवेली के अंदर रोशनी जलाई है।”
हवेली के मुख्य दरवाजे पर पुलिस की गाड़ी रुकते ही वहां मौजूद दो सिपाही दौड़कर बाहर आए।
उनमें से एक ने सलाम किया।
“सर, ठाकुर साहब अंदर हैं।”
आरव ने पूछा—
“किस हालत में?”
“मृत।”
“डॉक्टर?”
“अभी रास्ते में हैं।”
“दरवाजा?”
“अंदर से बंद था।”
आरव की भौंह हल्की-सी उठी।
“तो खोला कैसे?”
“हमने दरवाजा तोड़ा।”
आरव ने कुछ नहीं कहा।
वह हवेली के भीतर दाखिल हो गया।
अंदर की हवा बाहर से भी ज्यादा ठंडी थी।
दीवारों पर पुराने चित्र टंगे थे। कई चित्रों पर धूल जमी थी, लेकिन बीच की दीवार पर टंगी एक तस्वीर बिल्कुल साफ थी।
एक जवान लड़की।
सफेद कपड़े।
लंबे बाल।
गंभीर आंखें।
आरव कुछ पल उसे देखता रहा।
“ये कौन है?”
पीछे से मंगल की आवाज आई।
“नंदिनी बिटिया।”
आरव ने पलटकर देखा।
एक बूढ़ा आदमी दरवाजे के पास खड़ा था।
उसकी आंखों में डर था।
“आप मंगल हैं?”
“जी।”
“ठाकुर साहब के यहां कितने साल से काम करते हैं?”
“तीस साल से।”
“आज रात क्या हुआ?”
मंगल ने होंठ खोले, लेकिन आवाज नहीं निकली।
आरव ने दोबारा पूछा—
“मंगल, जो देखा है वही बताइए।”
मंगल ने सिर झुका लिया।
“साहब… मैंने कुछ नहीं देखा।”
आरव की नजर उसके चेहरे पर टिक गई।
“लेकिन कुछ सुना?”
मंगल चुप।
“मंगल।”
“जी।”
“सच बोलिए।”
बूढ़े आदमी ने कांपती आवाज में कहा—
“पायल की आवाज।”
कमरे में मौजूद दोनों सिपाही एक-दूसरे को देखने लगे।
आरव ने पूछा—
“किसकी पायल?”
मंगल ने धीरे से ऊपर लगी तस्वीर की तरफ देखा।
“नंदिनी बिटिया की।”
“आपने उसे देखा?”
“नहीं।”
“तो कैसे कह रहे हैं कि वही थी?”
मंगल ने कोई जवाब नहीं दिया।
आरव ने उसकी तरफ कुछ कदम बढ़ाए।
“ठाकुर रणविजय की हत्या किसने की?”
मंगल ने अचानक आरव की आंखों में देखा।
“जिसने बारह साल पहले नंदिनी बिटिया को मारा था।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
आरव ने पूछा—
“आपको इतना यकीन कैसे है?”
मंगल की आवाज फुसफुसाहट में बदल गई।
“क्योंकि साहब…”
वह रुका।
“आज वही तारीख है।”
आरव की आंखें सिकुड़ गईं।
“क्या?”
“बारह साल पहले भी यही रात थी।”
ऊपरी मंजिल के कमरे में ठाकुर रणविजय सिंह की लाश पड़ी थी।
कमरे का दरवाजा पुलिस ने तोड़ा था।
अंदर एक भारी लकड़ी की मेज, अलमारी, पुरानी घड़ी और दीवार पर टंगी नंदिनी की तस्वीर थी।
रणविजय सिंह कुर्सी के पास जमीन पर पड़े थे।
उनकी उम्र लगभग साठ वर्ष थी।
सफेद कुर्ता खून से लाल हो चुका था।
गर्दन के पास गहरा घाव था।
लेकिन सबसे अजीब बात यह थी कि कमरे में हत्या का हथियार नहीं था।
आरव ने दस्ताने पहने।
वह लाश के पास झुका।
“घाव एक ही है।”
सिपाही ने पूछा—
“सर, चाकू?”
“नहीं मिला।”
“तो हथियार हत्यारा ले गया?”
आरव ने कमरे की तरफ देखते हुए कहा—
“शायद।”
वह धीरे-धीरे कमरे का निरीक्षण करने लगा।
खिड़की अंदर से बंद।
दूसरी खिड़की भी बंद।
बालकनी का दरवाजा बंद।
मुख्य दरवाजा अंदर से बंद।
और सबसे महत्वपूर्ण—
कमरे में कोई जबरन घुसने के निशान नहीं थे।
आरव ने कहा—
“दरवाजा किसने तोड़ा?”
“मैंने, सर।”
“तो उससे पहले अंदर कोई था?”
“नहीं सर।”
“कोई बाहर से निकल सकता था?”
“खिड़की बहुत छोटी है।”
आरव खिड़की के पास गया।
बाहर अंधेरा था।
नीचे लगभग तीस फीट गहरी खाई।
वह कुछ क्षण खिड़की से बाहर देखता रहा।
फिर वापस लाश के पास आया।
“लाश को मत छूना।”
तभी कमरे की पुरानी घड़ी ने आवाज की।
टन्… टन्… टन्…
आरव ने घड़ी की तरफ देखा।
घड़ी में समय था—
12:07।
लेकिन घड़ी बंद थी।
उसकी सुइयां कई सालों से वहीं अटकी हुई थीं।
देवेंद्र ने घबराकर पूछा—
“सर… ये कैसे बज गई?”
आरव ने घड़ी को गौर से देखा।
“किसी ने इसे चलाया है।”
“लेकिन किसने?”
आरव ने कोई उत्तर नहीं दिया।
वह मेज की तरफ बढ़ा।
मेज पर एक खुली डायरी पड़ी थी।
उसके आखिरी पन्ने पर केवल एक वाक्य लिखा था—
“आज वह वापस आएगी।”
आरव ने डायरी उठाई।
“किसकी बात कर रहे थे ठाकुर?”
कोई उत्तर नहीं था।
अचानक पीछे से आवाज आई—
“नंदिनी की।”
आरव ने तेजी से पलटकर देखा।
दरवाजे पर एक युवती खड़ी थी।
काले कपड़े।
पीला चेहरा।
डरी हुई आंखें।
वह थी रागिनी सिंह।
ठाकुर रणविजय की भतीजी।
आरव ने पूछा—
“आप कौन?”
“रागिनी।”
“ठाकुर साहब से आपका क्या रिश्ता?”
“वह मेरे चाचा थे।”
“आपको नंदिनी के बारे में क्या पता है?”
रागिनी का चेहरा अचानक सफेद पड़ गया।
“कुछ नहीं।”
आरव ने डायरी उसकी तरफ बढ़ाई।
“फिर ये नाम क्यों लिखा है?”
रागिनी ने डायरी देखी।
उसकी आंखों में भय उतर आया।
“आपको ये कहां मिली?”
“यहीं।”
“इसे बंद कर दीजिए।”
“क्यों?”
“क्योंकि…”
रागिनी की आवाज कांप गई।
“अगर आपने इसे पढ़ लिया तो वह आपको भी देख लेगी।”
आरव ने शांत स्वर में पूछा—
“कौन?”
रागिनी ने उत्तर नहीं दिया।
उसी क्षण कमरे के बाहर गलियारे से आवाज आई।
छन… छन… छन…
पायल।
धीरे-धीरे।
जैसे कोई कमरे की तरफ आ रहा हो।
रागिनी ने अपना मुंह दोनों हाथों से ढक लिया।
देवेंद्र ने पिस्तौल निकाल ली।
आरव दरवाजे की ओर बढ़ा।
आवाज पास आती गई।
छन… छन… छन…
फिर अचानक बंद।
आरव ने गलियारे में कदम रखा।
कुछ नहीं।
लंबा अंधेरा गलियारा।
दीवारों पर पुराने चित्र।
फर्श पर धूल।
लेकिन धूल के बीच कुछ ताजा निशान थे।
पैरों के निशान।
नंगे पैर।
और वे निशान सीधे उसी कमरे की तरफ आ रहे थे जहां रणविजय की लाश पड़ी थी।
आरव नीचे झुका।
निशान बिल्कुल साफ थे।
लेकिन अगले ही पल उसने एक अजीब चीज देखी।
पैरों के निशान कमरे के दरवाजे तक आए थे।
वहां खत्म हो गए।
आगे कोई निशान नहीं था।
जैसे कोई व्यक्ति दरवाजे तक आया हो…
और फिर हवा में गायब हो गया हो।
आरव ने जमीन को ध्यान से देखा।
उसे विश्वास नहीं हो रहा था।
तभी पीछे से रागिनी की आवाज आई—
“सर…”
आरव ने पलटकर देखा।
रागिनी कमरे के अंदर खड़ी थी।
उसका चेहरा डर से जड़ हो चुका था।
“क्या हुआ?”
उसने कांपती उंगली से लाश की तरफ इशारा किया।
“चाचा की मुट्ठी…”
आरव तुरंत लाश के पास पहुंचा।
रणविजय की दाहिनी मुट्ठी बंद थी।
फोरेंसिक टीम के आने से पहले उसे खोलना उचित नहीं था, लेकिन उंगलियों के बीच से कुछ लाल दिखाई दे रहा था।
आरव ने दस्ताना पहनकर धीरे-धीरे उंगलियां खोलीं।
अंदर एक छोटा-सा कागज था।
कागज पर खून से सिर्फ चार शब्द लिखे थे—
“मैं वापस आ गई हूँ।”
आरव ने कागज को देखा।
फिर नंदिनी की तस्वीर को।
तस्वीर में लड़की की आंखें सीधे उसकी तरफ देख रही थीं।
अचानक कमरे की सारी लाइटें बुझ गईं।
अंधेरा।
पूर्ण अंधेरा।
रागिनी चीखी।
देवेंद्र ने टॉर्च जलाई।
टॉर्च की रोशनी कमरे में घूमी।
लाश वहीं थी।
मेज वहीं थी।
खिड़की बंद थी।
लेकिन नंदिनी की तस्वीर…
दीवार पर नहीं थी।
आरव ने ऊपर देखा।
तस्वीर गायब थी।
“सर…”
देवेंद्र की आवाज कांप रही थी।
“तस्वीर…”
आरव ने कहा—
“मैं देख रहा हूं।”
तभी ऊपर से कुछ गिरने की आवाज आई।
धड़ाम!
सभी ने ऊपर देखा।
कमरे की छत से धूल झड़ी।
और फिर…
एक महिला की बहुत धीमी आवाज सुनाई दी।
“आरव…”
आरव का चेहरा कठोर हो गया।
उसने तुरंत पिस्तौल निकाल ली।
“कौन है?”
कोई उत्तर नहीं।
फिर वही आवाज।
इस बार थोड़ी स्पष्ट—
“आरव…”
देवेंद्र ने डरकर कहा—
“सर, इसने आपका नाम लिया।”
आरव ने टॉर्च ऊपर की।
छत खाली थी।
वह तेजी से कमरे से बाहर निकला।
गलियारा खाली।
लेकिन सामने सीढ़ियों के पास एक सफेद कपड़े की झलक दिखाई दी।
कोई लड़की सीढ़ियों से नीचे जा रही थी।
“रुको!”
आरव उसके पीछे दौड़ा।
सीढ़ियां लंबी थीं।
नीचे अंधेरा था।
सफेद कपड़ा एक पल के लिए दिखाई दिया।
फिर गायब।
आरव नीचे पहुंचा।
सामने मुख्य दरवाजा बंद था।
वहां कोई नहीं था।
उसने जमीन पर टॉर्च डाली।
फर्श पर गीले पैरों के निशान थे।
एक जोड़ी।
और वे निशान हवेली के मुख्य दरवाजे से अंदर नहीं आ रहे थे।
वे हवेली के भीतर से बाहर की ओर जा रहे थे।
लेकिन दरवाजा बंद था।
आरव कुछ क्षण स्थिर खड़ा रहा।
फिर उसने धीरे से कहा—
“ये भूत का मामला नहीं है।”
मंगल पीछे खड़ा था।
उसने कांपते हुए कहा—
“साहब… अगर भूत नहीं है…”
आरव ने उसकी तरफ देखा।
मंगल ने वाक्य पूरा किया—
“तो फिर बारह साल से जो डर हमें खा रहा है… वो कौन है?”
उसी क्षण हवेली के ऊपर कहीं से जोरदार धमाका हुआ।
सभी ने ऊपर देखा।
नंदिनी की तस्वीर वापस अपनी जगह पर थी।
लेकिन अब तस्वीर में एक बदलाव था।
लड़की के चेहरे पर पहले कोई मुस्कान नहीं थी।
अब उसके होंठों पर हल्की मुस्कान थी।
और तस्वीर के नीचे लाल रंग से एक नया वाक्य लिखा था—
“पहली मौत हो चुकी है।”
आरव की आंखें उस वाक्य पर टिक गईं।
उसने धीरे से कहा—
“पहली?”
फिर उसने पूरी हवेली की ओर देखा।
“इसका मतलब…”
उसका वाक्य पूरा होने से पहले बाहर जोरदार बिजली चमकी।
और उसी रोशनी में हवेली की तीसरी मंजिल की खिड़की में एक लड़की खड़ी दिखाई दी।
लंबे बाल।
सफेद कपड़े।
और चेहरा बिल्कुल नंदिनी जैसा।
रागिनी ने उसे देखते ही चीख मार दी—
“नंदिनी!”
अगले ही पल बिजली चली गई।
खिड़की अंधेरी हो गई।
जब रोशनी वापस आई…
वहां कोई नहीं था।
लेकिन नीचे फर्श पर खून से लिखा था—
“अभी चार और बाकी हैं।”
आरव ने उस वाक्य को पढ़ा।
उसके चेहरे पर पहली बार चिंता दिखाई दी।
क्योंकि अगर यह सिर्फ रणविजय की हत्या नहीं थी…
तो काली हवेली में होने वाला असली खेल अभी शुरू हुआ था।
और शायद…
अगली मौत बहुत जल्द होने वाली थी।
क्रमशः…

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