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भाग 4: 1976 का खूनी राज
Yogesh Kumar Maurya · Psychological Horror · 7 मिनट
- Writer
- Yogesh Kumar Maurya
- Story
- खौफ की खामोशी: चीखों का कब्रिस्तान
- Chapter
- 4 of 4
- Category
- Psychological Horror
- Reading time
- 7 min
- Words
- 1347
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
फार्महाउस के उस खूनी हॉल में सन्नाटा इतना गहरा था कि अर्णव और विक्रम की चलती हुई सांसें भी चीख जैसी महसूस हो रही थीं। फर्श पर बिखरा लाल गाढ़ा खून अब धीरे-धीरे काला पड़ने लगा था। डॉ. शशांक शास्त्री के सीने के अंदर रखा मिट्टी का दीया नीली लौ के साथ शांत हो चुका था, मानो उसकी प्यास बुझ गई हो।
विक्रम ने कांपते हाथों से अर्णव के हाथ से वह 50 साल पुरानी पीली पड़ चुकी तस्वीर छीनी। उसकी नजरें तीसरे चेहरे पर जाकर टिक गईं—जेलर गजराज सिंह राठौड़, यानी उसके अपने सगे दादाजी।
"यह... यह मुमकिन नहीं है," विक्रम की आवाज गले में ही घुट कर रह गई। "मेरे दादाजी एक बेहद ईमानदार और जांबाज अफसर थे। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी देवगढ़ की सेवा में लगा दी। उनका इस काली हवेली या किसी खूनी साजिश से कोई लेना-देना नहीं हो सकता!"
"विक्रम, आंखें मूंदने से सच नहीं बदलेगा," अर्णव ने विक्रम के कंधे को सहलाते हुए कहा। "कातिल कोई मामूली इंसान नहीं है। वह अतीत के कब्रों को खोदकर उन गड़े हुए रहस्यों को बाहर निकाल रहा है जिन्हें तुम लोगों ने या तुम्हारे पुरखों ने छुपाने की कोशिश की थी। ध्यान से देखो इस चौथे चेहरे को... इसका चेहरा जलाया नहीं गया है, इसे किसी बहुत ही नुकीली चीज से खुरचकर मिटाया गया है। आखिर कौन था यह चौथा शख्स?"
तभी बाहर से एम्बुलेंस और बैकअप पुलिस बल की सायरन की आवाजें गूंजने लगीं। सुबह की पहली किरण फार्महाउस के टूटे शीशों से छनकर अंदर आ रही थी, लेकिन वह धूप भी कमरे के खौफ को कम करने में नाकाम साबित हो रही थी।
दोपहर के 12 बज रहे थे।
विक्रम ने अपने दादाजी के पुराने सरकारी दस्तावेजों और रिकॉर्ड्स को खंगालने का फैसला किया। देवगढ़ सेंट्रल जेल के अंडरग्राउंड रिकॉर्ड रूम में धूल और सीलन की कड़वी बदबू फैली हुई थी। 1976 की फाइलों का एक भारी-भरकम पुलिंदा विक्रम और अर्णव के सामने रखा था।
पन्ने पलटते हुए अर्णव की उंगलियां 'अक्टूबर 1976' की एक डायरी पर रुकीं। उस डायरी के पन्नों पर जेलर गजराज सिंह की हस्तलिपि साफ दिखाई दे रही थी। लेकिन कई पन्नों को जानबूझकर ब्लेड से काट दिया गया था।
तभी, 14 अक्टूबर 1976 की तारीख वाले पन्ने पर अर्णव की नजरें टिक गईं। वहां लिखा था:
"आज रात काली हवेली में हमने जो किया, वह कानून की नजर में गुनाह है... लेकिन हमारी आने वाली नस्लों की दौलत और शोहरत के लिए वह जरूरी था। 'अघोरी आनंदनाथ' की बलि की रस्म पूरी हो चुकी है। उसका सीना चीरकर वह रहस्यमय नीली मणी निकाल ली गई है। यशवर्धन, शशांक और मैंने कसम खाई है कि यह राज हमारे साथ ही दफन रहेगा। उस अघोरी का शव हवेली के तलघर की सबसे गहरी दीवार में चुनवा दिया गया है। अगर वह कभी वापस आया... तो तबाही लाएगा।"
डायरी के उस पन्ने को पढ़ते ही विक्रम के हाथ से डायरी छूटकर जमीन पर गिर पड़ी। उसके पैरों तले से जमीन खिसक गई। उसके दादाजी, जिन्हें वह अपना आदर्श मानता था, वे एक बेरहम अघोरी साधु की कत्ल की साजिश में शामिल थे!
"अघोरी आनंदनाथ..." अर्णव ने बड़बड़ाते हुए कहा। "तो यह है उस 120 चिरागों का खौफनाक सच! यशवर्धन राय, डॉ. शास्त्री और तुम्हारे दादाजी—तीनों ने मिलकर 1976 में उस अघोरी का कत्ल किया था। लेकिन अघोरी की बलि का क्या मकसद था?"
"और वह चौथा इंसान कौन था?" विक्रम ने हांफते हुए पूछा। "डायरी में सिर्फ तीन लोगों के नाम हैं—यशवर्धन, शशांक और गजराज! वह चौथा शख्स कौन था जिसका चेहरा तस्वीर में खुरचा गया था?"
शाम ढलने लगी थी।
अर्णव और विक्रम ने तय किया कि उन्हें इस खूनी कड़ी को सुलझाने के लिए देवगढ़ के सबसे पुराने श्मशान घाट के बूढ़े अघोरी बाबा 'काल भैरव' के पास जाना होगा। बाबा काल भैरव देवगढ़ के अकेले ऐसे इंसान थे जो 1976 के उस दौर के गवाह थे।
श्मशान घाट के बीचों-बीच जलती हुई चिताओं के धुएं और राख के बीच बाबा काल भैरव एक इंसानी खोपड़ी में जल पी रहे थे। उनकी लाल-अंगारा जैसी आंखें अंधेरे में चमक रही थीं।
जैसे ही अर्णव और विक्रम उनके सामने पहुंचे, बाबा ने एक भयानक ठहाका लगाया।
"आ गए... कबीले का आखिरी खून लेकर आ गए!" बाबा की आवाज किसी गड़गड़ाहट जैसी थी। "50 साल पुराना वो पाप अब अपना हिसाब मांगने आया है! नीली लौ जल चुकी है... पहली बलि यशवर्धन, दूसरी बलि शशांक... और अब तीसरी बलि राठौड़ खानदान के चिराग की होगी!"
विक्रम ने आगे बढ़कर अपनी गन निकाली, "बाबा, साफ-साफ बताओ! कौन है वो कातिल? क्या आनंदनाथ की रूह वापस आ गई है?"
बाबा काल भैरव ने अपनी धूनी से चुटकी भर भस्म उठाई और हवा में उड़ा दी। नीली धुआं फिर से हवा में तैरने लगी।
"आनंदनाथ कोई मामूली साधु नहीं था," बाबा ने रहस्यमयी अंदाज में कहा। "उसके पास 120 जन्मों का काला तंत्रज्ञान था। वह अमर होना चाहता था। लेकिन तुम्हारे दादा और उनके साथियों ने लालच में आकर उसकी साधना के 120वें दिन उसका सीना चीर दिया। आनंदनाथ ने मरते-मरते श्राप दिया था—‘जिस तरह तुमने मेरा सीना चीरकर मेरा दिल निकाला है, मेरी रूह 120 बलि लेकर वापस आएगी। हर बलि के साथ मेरा एक चिराग जलेगा और जिस दिन 120वां चिराग जलेगा... पूरी देवगढ़ घाटी श्मशान बन जाएगी!’"
"लेकिन चौथा आदमी कौन था बाबा?" अर्णव ने चीखकर पूछा। "तस्वीर में एक चौथा शख्स भी है! उसका चेहरा किसने मिटाया?"
बाबा काल भैरव का चेहरा खौफ से सुन्न हो गया। उन्होंने अपनी थरथराती उंगली सीधे अर्णव की तरफ उठा दी।
"चौथा आदमी... आनंदनाथ का इकलोटा चेला था! जिसे उन तीन दरिंदों ने जिंदा जला दिया था... और उसका नाम था—राघवेंद्र!"
अर्णव का दिल जोर से धड़का। "राघवेंद्र? लेकिन उसका इस सब से क्या रिश्ता?"
"राघवेंद्र मरा नहीं था..." बाबा ने धीमी आवाज में कहा। "उसका आधा शरीर जल चुका था। वह 50 सालों से काली हवेली के तलघर में उस अघोरी की समाधि की रखवाली कर रहा है। वह इंसान नहीं रहा... वह शैतान का अवतार बन चुका है! और सबसे खौफनाक बात जानते हो अर्णव? राघवेंद्र कोई और नहीं... तुम्हारे अपने परदादा का भाई था!"
यह सुनते ही अर्णव के सर पर जैसे आसमान टूट पड़ा। वह खुद उस खूनी वंश और उस काले तंत्र के इतिहास से जुड़ा हुआ था!
रात के 2:30 बज चुके थे।
अचानक पूरे श्मशान घाट की हवा में भयानक ठंडक छा गई। जलती हुई चिताओं की आग नारंगी से बदलकर नीली होने लगी!
घने कोहरे के बीच से, हाथों में खूनी कुल्हाड़ी लिए एक विशालकाय साया धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा। उसकी आधी त्वचा जली हुई और खौफनाक थी, और उसकी छाती पर 120 चिरागों के निशान उकेरे हुए थे।
वह राघवेंद्र था!
"अर्णव..." उस भयानक साए के गले से घूरती हुई आवाज आई। "तुम हमारे ही खून हो... हटो रास्ते से! आज रात राठौड़ खानदान के आखिरी चिराग यानी विक्रम का सीना चीरकर तीसरा दीया रोशन होगा!"
विक्रम ने बिना डरे अपनी गन की पूरी मैगजीन उस साए पर खाली कर दी—ठांय! ठांय! ठांय! ठांय!
लेकिन गोलियां उस साए के सीने को चीरती हुई पार निकल गईं, जैसे वह केवल छाया और धुएं का बना हो। राघवेंद्र ने एक ही झटके में विक्रम को हवा में उठाया और दूर एक जलती हुई चिता पर दे मारा।
विक्रम दर्द से कराह उठा। राघवेंद्र अपनी खूनी कुल्हाड़ी उठाकर विक्रम के सीने की तरफ बढ़ा।
"नहीं!" अर्णव ने बीच में कूदकर अघोरी बाबा काल भैरव की धूनी से जलती हुई त्रिशूल उठाई और राघवेंद्र की पीठ में घोंप दी।
एक खौफनाक चीख के साथ पूरे श्मशान घाट की जमीन हिलने लगी। राघवेंद्र पीछे मुड़ा, उसकी आंखें नीली लौ से धधक रही थीं। उसने अर्णव की गर्दन दबोच ली।
"अर्णव... तू अपने ही पूर्वज के खिलाफ खड़ा हो रहा है?" राघवेंद्र का खौफनाक चेहरा अर्णव के चेहरे से कुछ ही इंच दूर था। "तीसरा चिराग तो जलकर रहेगा... आज रात 3 बजे विक्रम मरेगा, या फिर उसकी जगह तू बलि चढ़ेगा!"
घड़ी में 2:59 AM हो रहे थे।
अर्णव की सांसें रुक रही थीं। विक्रम नीचे पड़ा अपनी गन उठाने की कोशिश कर रहा था। नीली लौ का तांडव अपने शबाब पर था...
अगले भाग में क्या होगा?
क्या अर्णव अपनी जान देकर विक्रम की रक्षा करेगा, या विक्रम राठौड़ खानदान के तीसरे चिराग के रूप में बलि चढ़ जाएगा?
काली हवेली के तलघर में कौन सा ऐसा भयानक सच छुपा है जो पूरे शहर को निगलने वाला है?
क्या 120 चिरागों के इस खूनी सिलसिले को रोकने का कोई तरीका मौजूद है?