PretikaPsychological Horrorखौफ की खामोशी: चीखों का कब्रिस्तान

​भाग 3: दूसरा चिराग

Yogesh Kumar Maurya · Psychological Horror · 7 मिनट

Writer
Yogesh Kumar Maurya
Story
खौफ की खामोशी: चीखों का कब्रिस्तान
Chapter
3 of 4
Category
Psychological Horror
Reading time
7 min
Words
1350
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

अर्णव की हथेली पर रखा वह तांबे का सिक्का बर्फ से भी ज्यादा ठंडा महसूस हो रहा था। कागज पर लिखी वह नीली इबारत जैसे अर्णव के वजूद को ही निगल जाने पर आमादा थी—दूसरा चिराग आज रात 3 बजे जलेगा...
​अर्णव ने बिना देर किए विक्रम को वह कागज और सिक्का दिखाया। विक्रम का चेहरा गुस्से और अविश्वास से लाल हो गया। उसने तुरंत पूरी हवेली की घेराबंदी करने और फॉरेंसिक टीम के उस कर्मचारी से पूछताछ करने के आदेश दिए, जिसने काली हवेली में पहला सिक्का उठाया था। लेकिन अजीब बात यह थी कि हवेली में सबूत के तौर पर मिला वह पहला सिक्का फॉरेंसिक बैग से गायब हो चुका था!
​"यह कोई इंसानी खेल नहीं है, विक्रम," अर्णव ने दबी हुई खौफनाक आवाज में कहा। "कोई है जो कानून, वक्त और मौत—तीनों के साथ एक साथ खेल रहा है।"
​विक्रम ने सिगरेट का एक गहरा कश खींचा और धुएं का गुबार छोड़ते हुए बोला, "मैं आत्माओं और जिन्नों पर यकीन नहीं करता अर्णव। यह किसी पहुंचे हुए साइकोपैथ सिरफिरे का काम है, जिसके पास मॉडर्न टेक्नोलॉजी और गहरी साजिश की ताकत है। लेकिन सवाल यह है कि दूसरा शिकार कौन है?"
​दोपहर के दो बज चुके थे। देवगढ़ पुलिस स्टेशन में एक गुप्त इमरजेंसी मीटिंग बुलाई गई।
​अर्णव और विक्रम ने शहर के सबसे ताकतवर और अमीर लोगों की एक लिस्ट बनाई। यशवर्धन राय देवगढ़ के ट्रिब्यूनल और ट्रस्ट के सबसे बड़े मेंबर थे। अगर यह किलर देवगढ़ की प्रमुख हस्तियों को निशाना बना रहा था, तो लिस्ट में अगला नाम देवगढ़ के सबसे बड़े सर्जन और अस्पताल के मालिक डॉ. शशांक शास्त्री का था।
​डॉ. शास्त्री, यशवर्धन राय के पुराने और बेहद करीबी दोस्त भी थे।
​विक्रम अपनी दो पुलिस गाड़ियों की फ्लीट के साथ सीधे डॉ. शशांक शास्त्री के प्राइवेट अस्पताल पहुंचे। डॉ. शास्त्री अपने केबिन में एक क्रिटिकल सर्जरी की तैयारी कर रहे थे। जब विक्रम और अर्णव ने उन्हें पूरी बात बताई, तो शास्त्री के चेहरे की हवाइयां उड़ गईं, लेकिन उन्होंने इसे अंधविश्वास बताकर खारिज करने की कोशिश की।
​"इंस्पेक्टर, मैं एक सर्जन हूं। मैंने हजारों इंसानी सीने काटे हैं," डॉ. शास्त्री ने अपने चश्मे को पोंछते हुए कहा, हालांकि उनके चेहरे पर आ रहा पसीना कुछ और ही बयां कर रहा था। "यशवर्धन की मौत से मैं सदमे में हूं, लेकिन मुझे किसी अदृश्य साए या 120 चिरागों का डर दिखाकर डराया नहीं जा सकता।"
​"डॉक्टर साहब, बात डर की नहीं, आपकी सुरक्षा की है," अर्णव ने आगे बढ़कर उनके टेबल पर वह पर्चा रख दिया। "यह सिक्का और यह नीली स्याही वाला पैगाम... यह कोई मजाक नहीं है। कातिल ने रात 3 बजे का वक्त दिया है।"
​डॉ. शास्त्री ने उस सिक्के को देखा, और अचानक उनके हाथों की थरथराहट बढ़ गई। उनकी आंखों में वही खौफ तैरने लगा जो काली हवेली में यशवर्धन की आंखों में था।
​"यह... यह सिक्का तुम्हें कहां से मिला?" डॉ. शास्त्री की आवाज अचानक बहुत धीमी हो गई।
​"काली हवेली से," अर्णव ने पैनी नजरों से डॉक्टर को घूरा। "आप इस सिक्के को पहचानते हैं, है ना डॉक्टर? यशवर्धन, आप और काली हवेली... क्या रिश्ता है आप लोगों का उस जगह से?"
​डॉ. शास्त्री ने कुछ कहने के लिए मुंह खोला ही था कि उनके केबिन की लाइट अचानक झपझपाने लगी। कमरे का तापमान अचानक गिर गया। मेज पर रखी पानी की बोतल का पानी अपने आप जमने लगा।
​शास्त्री ने तुरंत अपनी बात बदली, "मुझे कुछ नहीं पता! विक्रम जी, मुझे पुलिस प्रोटेक्शन दीजिए। मैं आज रात अपने फार्महाउस पर रहूंगा। वहां कोई परिंदा भी पर नहीं मार सकता।"
​रात के 1:30 बज रहे थे।
​डॉ. शास्त्री का फार्महाउस देवगढ़ के बाहरी इलाके में, घने जंगलों के बीच बना एक अभेद्य किला था। चारों तरफ 12 फीट ऊंची दीवारें थीं, जिन पर कंटीले तार और हाई-वोल्टेज करंट दौड़ रहा था। विक्रम ने फार्महाउस के हर कोने पर अपने सबसे बेहतरीन 15 कमांडो तैनात कर दिए थे। खुद विक्रम, अर्णव और दो सशस्त्र पुलिस अफसर डॉ. शास्त्री के साथ उनके मेन लिविंग रूम में मौजूद थे।
​समय किसी जहरीले नाग की तरह रेंग रहा था।
​2:45 AM...
​पूरे फार्महाउस में मौत का सन्नाटा पसरा हुआ था। डॉ. शास्त्री एक सोफे पर बैठे लगातार अपने हाथ मल रहे थे। अर्णव कमरे में चक्कर काट रहा था, जबकि विक्रम अपनी रिवॉल्वर लोड करके दरवाजे पर खड़ा था।
​2:55 AM...
​अचानक, पूरे फार्महाउस की बिजली गुल हो गई। बैकअप जनरेटर शुरू होना चाहिए था, लेकिन वह भी काम नहीं कर रहा था। पूरा फार्महाउस घने अंधेरे में डूब गया।
​बाहर से एक साथ भारी सन्नाटा टूट गया। कमांडो की चीखें आने लगीं, जैसे किसी विशाल जानवर ने उन पर हमला कर दिया हो।
​"कमांडो! रिस्पॉन्ड करो!" विक्रम ने अपने वॉकी-टॉकी में चिल्लाया। लेकिन दूसरी तरफ से केवल भयानक झनझनाहट और हड्डियों के टूटने की खौफनाक आवाजें आ रही थीं—चट... कटक...
​"वह आ गया है... वह हमें नहीं छोड़ेगा!" डॉ. शास्त्री पागलों की तरह चीखने लगे।
​2:59 AM...
​कमरे का तापमान इतना गिर गया कि अर्णव और विक्रम के मुंह से भाप निकलने लगी। अचानक, कमरे के बीचों-बीच फर्श की टाइल्स एक-एक करके फटने लगीं।
​फर्श के नीचे से वही बदबूदार, जहरीला नीला धुआं बाहर निकलने लगा।
​अर्णव ने अपनी टोर्च जलाई, लेकिन टोर्च की रोशनी उस नीले धुएं से टकराकर नीली पड़ गई। कमरे के दरवाजे अपने आप जोर-जोर से पिटने लगे।
​और ठीक 3:00 बजे...
​घड़ी ने तीन बार घंटा बजाया—टंै... टंै... टंै...
​उसी पल, डॉ. शास्त्री की चीख पूरे फार्महाउस में गूंज उठी।
​विक्रम और अर्णव पीछे घूमे। जो नजारा उन्होंने देखा, उसने दोनों के रोंगटे खड़े कर दिए। डॉ. शास्त्री हवा में तीन फीट ऊपर उठे हुए थे, जैसे किसी अदृश्य विशाल हाथ ने उनकी गर्दन को दबोच रखा हो। उनके कपड़े अपने आप फटने लगे।
​"विक्रम... बचाओ!" शास्त्री का गला घुट रहा था, उनकी आंखें बाहर उबलने लगी थीं।
​विक्रम ने हवा में गोलियां चलाईं—ठांय! ठांय! ठांय! लेकिन गोलियां उस नीले धुएं के पार निकल गईं, जैसे वह केवल हवा हो।
​अचानक, डॉ. शास्त्री के सीने के कपड़े पर आग की एक नीली लकीर खींची। उनका सीना किसी धारदार अदृश्य कुल्हाड़ी से दो हिस्सों में चिरता चला गया। खून की तेज धार अर्णव और विक्रम के चेहरों पर आकर गिरी।
​"नहीं!" अर्णव आगे बढ़ा, लेकिन एक भयंकर हवा के झोंके ने उसे दीवार से दे मारा।
​डॉ. शास्त्री का तड़पता हुआ दिल हवा में बाहर निकला, और अपने आप नीचे फर्श पर गिर पड़ा। उस खाली, खूनी सीने के अंदर... एक और मिट्टी का दीया प्रकट हुआ।
​और एक झटके में, वह दीया नीली लौ के साथ धधक उठा!
​डॉ. शास्त्री का बेजान शरीर एक भारी आवाज के साथ फर्श पर गिर पड़ा।
​कमरे की दीवार पर, उनके ही बहते हुए खून से अपने आप नए शब्द उभरने लगे:
​"दूसरा चिराग रोशन हुआ... 118 बलि बाकी हैं। अर्णव, सच बहुत गहरा है... अगली बारी देवगढ़ के रक्षक की है।"
​धुआं धीरे-धीरे छटने लगा। बिजली वापस आ गई।
​पूरा कमरा खून से लथपथ था। बाहर तैनात सभी 15 कमांडो बेहोश और खून से तरबतर पड़े थे, उनकी बंदूकों की नालें मुड़ी हुई थीं।
​विक्रम घुटनों के बल फर्श पर बैठ गया। एक जाबांज पुलिस अफसर, जो अपनी जिंदगी में किसी से नहीं डरा था, आज उसकी आंखों में खौफ के आंसू थे।
​अर्णव लंगड़ाते हुए डॉ. शास्त्री की लाश के पास पहुंचा। जलते हुए नीले दीये के पास फिर से एक प्राचीन तांबे का सिक्का रखा हुआ था। लेकिन इस बार, उस सिक्के के नीचे एक पुरानी, पीली पड़ चुकी तस्वीर दबी हुई थी।
​अर्णव ने कांपते हाथों से वह तस्वीर उठाई।
​वह तस्वीर 1976 की थी—लगभग 50 साल पुरानी।
​तस्वीर में काली हवेली के सामने चार नवयुवक मुस्कुराते हुए खड़े थे।
पहला इंसान था—यशवर्धन राय।
दूसरा इंसान था—डॉ. शशांक शास्त्री।
तीसरा इंसान... खुद विक्रम के दादाजी, जो उस दौर में देवगढ़ के जेलर थे!
और चौथा इंसान... एक 20 साल का नवयुवक था, जिसका चेहरा किसी ने जलते हुए अंगारे से पूरी तरह जलाकर मिटा दिया था!
​अर्णव ने मुड़कर विक्रम की तरफ देखा। विक्रम का चेहरा पीला पड़ चुका था।
​"विक्रम..." अर्णव की आवाज में थरथराहट थी। "यह कोई अंधविश्वास या सिरफिरा कातिल नहीं है। यह 50 साल पुराना एक खूनी पाप है... जो अपने हिस्से का खून मांगने वापस आया है!"
​अगले भाग में क्या होगा?
​1976 में काली हवेली में ऐसा क्या खौफनाक कांड हुआ था, जिसे इतिहास के पन्नों में दफना दिया गया?
​कौन था वह चौथा शख्स जिसका चेहरा तस्वीर में जला दिया गया है?
​क्या विक्रम अपने दादाजी के उस काले अतीत से बच पाएगा, या कातिल का अगला निशाना खुद इंस्पेक्टर विक्रम राठौड़ होगा?

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