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भाग 2: नीली लौ का कातिल
Yogesh Kumar Maurya · Psychological Horror · 8 मिनट
- Writer
- Yogesh Kumar Maurya
- Story
- खौफ की खामोशी: चीखों का कब्रिस्तान
- Chapter
- 2 of 4
- Category
- Psychological Horror
- Reading time
- 8 min
- Words
- 1407
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
अंधेरे में उस बर्फीले और गीले हाथ की सख्त पकड़ अर्णव की गर्दन पर कसने ही वाली थी कि उसने अपनी पूरी ताकत समेटकर पीछे की तरफ छलांग लगा दी। पीठ जमीन पर टकराते ही उसने अपने घुटनों के बल खिसककर दूर लुढ़की टोर्च को झपट लिया। टोर्च की रोशनी जैसे ही सामने पड़ी, उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं।
कुर्सी पर रखी यशवर्धन की लाश का धड़ नीचे झुक चुका था। उसके सीने के अंदर जल रहा नीला दीया अब फड़कने लगा था, और उससे निकलता गाढ़ा नीला धुआं किसी साए की तरह हवा में इंसानी आकृति बनाने लगा था।
"भागो!" अर्णव के दिमाग के आखिरी शांत कोने ने चीखकर चेतावनी दी।
उसने बिना एक पल गंवाए पीछे मुड़कर दौड़ लगा दी। हवेली के गलियारे में पीछे से आ रही चीखों और भयानक हंसी का शोर बढ़ता ही जा रहा था। सीढ़ियों पर जमा खून फिसलने लगा था, लेकिन अर्णव फिसलते-संभलते हुए नीचे की मंजिल की तरफ भागा।
मुख्य दरवाजे पर पहुंचकर उसने पूरी ताकत से हैंडल को खींचा। दरवाजा किसी भारी चट्टान की तरह अड़ा हुआ था। पीछे मुड़कर देखा तो सीढ़ियों के ऊपरी हिस्से पर वह नीला धुआं धीरे-धीरे उतर रहा था—एक बिना चेहरे वाली, विशालकाय आकृति का रूप लेकर, जिसके हाथ में एक खूनी कुल्हाड़ी की परछाई तैर रही थी।
अर्णव ने जेब से अपनी पिस्टल निकाली और बिना सोचे-समझे दरवाजे के भारी पुराने लॉक पर दो गोलियां दाग दीं—ठांय! ठांय!
धातु की चिंगारी उड़ी और ताला टूट गया। अर्णव ने दरवाजे को धक्का दिया और बर्फीली हवा के साथ बाहर की तरफ गिर पड़ा। पीछे हवेली के अंदर से एक ऐसी खौफनाक और चीरती हुई चीख गूंजी, जिसने आसपास के पेड़ों पर बैठे कौवों के झुंड को आधी रात को उड़ने पर मजबूर कर दिया।
अर्णव हांफते हुए अपनी जीप की तरफ भागा। चाबी लगाकर उसने जैसे-तैसे इंजन स्टार्ट किया। जीप के शीशे पर कोहरे की जगह लाल रंग की बूंदें जमने लगी थीं। उसने जीप को रिवर्स लिया और एक्सीलेटर पर पूरा पैर दबा दिया। पीछे मुड़कर देखने की उसकी हिम्मत नहीं हुई, लेकिन जीप के रियर-व्यू मिरर में उसे साफ दिखा—काली हवेली की पहली मंजिल की उस खिड़की पर एक नीली रोशनी जल रही थी, और उसके सामने एक साया खड़ा होकर उसे दूर जाते हुए देख रहा था।
सुबह के छह बजे थे।
देवगढ़ पुलिस स्टेशन में इंस्पेक्टर विक्रम राठौड़ अपने केबिन में काली कॉफी के सिप ले रहे थे, जब अर्णव बदहवास हालत में अंदर दाखिल हुआ। उसके कपड़े कीचड़ और सूखी पत्तियों से सने थे, चेहरा पीला पड़ा हुआ था, और हाथ लगातार कांप रहे थे।
"अर्णव? तुम इस वक्त? और यह तुम्हारी क्या हालत है?" विक्रम ने अचरज से अपनी चश्मा ठीक करते हुए पूछा।
"विक्रम... काली हवेली... यशवर्धन राय..." अर्णव की सांसें इतनी फूली हुई थीं कि शब्द टूट रहे थे। "यशवर्धन राय का कत्ल हो गया है। बहुत भयानक कत्ल। तुम्हें अभी वहां चलना होगा!"
विक्रम का चेहरा सख्त हो गया। "क्या बकवास कर रहे हो? यशवर्धन राय देवगढ़ के सबसे बड़े आदमी हैं। कल रात ही मेरी उनसे मेयर के बंगले पर मुलाकात हुई थी।"
"मैं सच कह रहा हूं विक्रम!" अर्णव ने चिल्लाते हुए मेज पर हाथ मारा। "उनका सीना चीरकर उनका दिल निकाल लिया गया है! उसके अंदर एक नीला दीया जल रहा है! दीवार पर 120 मौतों का पैगाम लिखा है!"
विक्रम ने अर्णव की आंखों में तैरते हुए असली खौफ को देखा। वह जानता था कि अर्णव एक सुलझा हुआ पत्रकार है, जो आसानी से आपा नहीं खोता। उसने तुरंत अपनी टीम को अलर्ट किया और तीन पुलिस गाड़ियां काली हवेली के लिए रवाना हो गईं।
जब पुलिस की टीम काली हवेली पहुंची, तो सुबह का धुंधला उजाला फैल चुका था। लेकिन हवेली का खौफ जरा भी कम नहीं हुआ था।
विक्रम और अर्णव, अपने हाथों में गन लिए, हवेली के अंदर दाखिल हुए। पुलिस कांस्टेबल पीछे-पीछे चल रहे थे। फर्श पर अभी भी सूखे हुए खून के निशान थे, जो अर्णव का दावा सच साबित कर रहे थे।
सीढ़ियां चढ़कर जब सब पहली मंजिल के उस हॉल में पहुंचे, तो वहां का नजारा देखकर पूरी पुलिस टीम ठिठक गई।
लकड़ी की वही आदमकद कुर्सी हॉल के बीचों-बीच रखी थी।
लेकिन... कुर्सी खाली थी!
वहां कोई लाश नहीं थी। सीने में जलता हुआ कोई नीला दीया नहीं था।
"यह... यह कैसे हो सकता है?" अर्णव का दिमाग चकरा गया। वह दौड़कर कुर्सी के पास गया। फर्श पर भारी मात्रा में खून फैला हुआ था, जो इस बात की गवाही दे रहा था कि यहां कोई इंसान तड़पकर मरा है। लेकिन दीवार?
अर्णव ने दीवार की तरफ देखा। कल रात जहां खून से 120 मौतों वाली चेतावनी लिखी थी, वहां अब केवल पुरानी, उखड़ी हुई चूने की दीवार थी। वह इबारत पूरी तरह गायब हो चुकी थी!
विक्रम ने अर्णव के कंधे पर हाथ रखा। "अर्णव, तुम ठीक तो हो ना? कहीं तुम्हारा कोई पुराना ट्रॉमा फिर से तो..."
"नहीं विक्रम! मैं कसम खाता हूं, मैंने अपनी इन्हीं आंखों से देखा था!" अर्णव ने बेबसी से चिल्लाकर कहा। "यह खून किसका है फिर? यह ताजा खून है!"
इसी बीच, एक सीनियर फॉरेंसिक ऑफिसर ने झुककर फर्श से कुछ उठाया। "सर, यहां एक अजीब चीज़ मिली है।"
विक्रम और अर्णव उसकी तरफ बढ़े। ऑफिसर के हाथ में एक छोटा सा, तांबे का प्राचीन सिक्का था। उस सिक्के पर एक तरफ एक विचित्र त्रिकोण (Triangle) बना हुआ था जिसके बीच में एक खुली आंख थी, और दूसरी तरफ एक अरबी या किसी प्राचीन भाषा में उकेरा गया शब्द था।
अर्णव ने उस सिक्के को देखते ही पहचान लिया। "यह वही निशान है... जो यशवर्धन राय की अंगूठी पर बना रहता था!"
तभी विक्रम के फोन की घंटी बजी। फोन की स्क्रीन पर 'कंट्रोल रूम' चमक रहा था। विक्रम ने कॉल रिसीव किया।
"जय हिंद सर! एक बहुत बड़ी खबर है," दूसरी तरफ से कांस्टेबल की आवाज आ रही थी, जिसमें अजीब सा डर था।
"क्या बात है, साफ-साफ बताओ?" विक्रम ने पूछा।
"सर... बिजनेसमैन यशवर्धन राय के बंगले से खबर आई है। आज सुबह ठीक 5 बजे, उनके बेडरूम में यशवर्धन राय की लाश मिली है।"
यह सुनते ही अर्णव और विक्रम दोनों के पैरों तले से जमीन खिसक गई।
विक्रम ने फोन को कसकर पकड़ा। "क्या? लाश बेडरूम में? कत्ल कैसे हुआ?"
कंट्रोल रूम से आई आवाज ने दोनों की बची-कुची समझ को झकझोर कर रख दिया—
"सर, फॉरेंसिक टीम का कहना है कि उनकी मौत रात के ठीक 3 बजे हुई है। उनका सीना किसी धारदार हथियार से चीरा गया है... और सर, सबसे अजीब बात यह है कि उनका दिल गायब है!"
अर्णव और विक्रम बिना एक पल गंवाए यशवर्धन राय के आलीशान बंगले पर पहुंचे। पूरा बंगला पुलिस छावनी में तब्दील हो चुका था।
बेडरूम के अंदर का नजारा काली हवेली से अलग नहीं था, सिवाय इसके कि यहां दीवार पर कोई लिखावट नहीं थी और सीने में दीया नहीं जल रहा था। लेकिन यशवर्धन का सीना उसी तरह चीरा गया था, और आंखें उसी तरह फटी हुई थीं।
विक्रम फॉरेंसिक हेड डॉक्टर वर्मा के पास गया। "डॉक्टर, डेथ टाइम क्या है?"
"सटीक रात के 3 बजे," डॉक्टर वर्मा ने दस्ताने उतारते हुए कहा। "लेकिन विक्रम, एक बात मुझे बहुत परेशान कर रही है। लाश के फेफड़ों और गले के अंदर से हमें एक अजीब किस्म का नीला राख मिला है। ऐसा लगता है जैसे मरने से ठीक पहले इसने कोई रसायन सांस के जरिए अंदर लिया था।"
अर्णव दूर खड़ा होकर लाश को घूर रहा था। उसकी दिमागी सुइयों के बीच एक खौफनाक ताना-बाना बुन रहा था।
रात 3 बजे वह काली हवेली में था। उसने रात 3 बजे यशवर्धन की लाश को काली हवेली में देखा था। और फॉरेंसिक रिपोर्ट कह रही है कि यशवर्धन की मौत रात 3 बजे अपने ही घर के बेडरूम में हुई थी!
क्या यह कोई भ्रम था? या एक ही वक्त पर लाश दो अलग-अलग जगहों पर मौजूद थी?
तभी अर्णव को अपने कोट की जेब में कुछ भारीपन महसूस हुआ। उसने जेब में हाथ डाला। उसकी उंगलियां किसी धातु की चीज से टकराईं।
उसने जेब से हाथ बाहर निकाला। उसकी हथेली पर वही प्राचीन तांबे का सिक्का रखा था... जो उसने कुछ देर पहले काली हवेली में फॉरेंसिक टीम के पास देखा था!
और उस सिक्के के नीचे एक छोटा सा, मोड़ा हुआ पुराना कागज का टुकड़ा चिपका हुआ था। अर्णव ने कांपते हाथों से उस कागज को खोला। उस पर नीली स्याही से लिखा था:
"दूसरा चिराग आज रात 3 बजे जलेगा... देवगढ़ का अगला सबसे बड़ा राज़ मिटने वाला है। हवेली तुम्हारा इंतजार कर रही है, अर्णव।"
अगले भाग में क्या होगा?
कौन है वो दूसरा इंसान जिसकी मौत की तारीख तय हो चुकी है?
अर्णव की जेब में वो सिक्का और पैगाम कैसे पहुंचा, जब कोई उसके करीब भी नहीं आया था?
क्या काली हवेली कोई ऐसा दरवाजा है जो सीधे नरक से जुड़ता है?