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भाग 1: हवेली का आखिरी मेहमान
Yogesh Kumar Maurya · Psychological Horror · 8 मिनट
- Writer
- Yogesh Kumar Maurya
- Story
- खौफ की खामोशी: चीखों का कब्रिस्तान
- Chapter
- 1 of 4
- Category
- Psychological Horror
- Reading time
- 8 min
- Words
- 1511
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
खौफ की खामोशी: चीखों का कब्रिस्तान
लेखक: योगेश कुमार मौर्य
भाग 1: हवेली का आखिरी मेहमान
देवगढ़ की पहाड़ियां दिन में जितनी शांत और खूबसूरत दिखती थीं, सूरज ढलते ही उनका मिजाज उतना ही भयानक हो जाता था। घने जंगलों, तीखे मोड़ों और साल के ऊंचे वृक्षों के बीच बसा यह कस्बा पुरानी कहानियों और अनसुलझे रहस्यों का गढ़ था। लेकिन इन सबमें सबसे ज्यादा डरावनी जगह थी घाटी के मुहाने पर खड़ी 'काली हवेली'।
यह तीन मंजिला हवेली पिछली आधी सदी से खाली पड़ी थी। स्थानीय लोगों का मानना था कि जो भी इस हवेली की चौखट लांघता है, वह या तो जिंदा वापस नहीं लौटता या अपनी दिमागी हालत खो बैठता है। लेकिन आज की रात कुछ अलग थी। आज की रात खौफ का वो मंजर सामने आने वाला था, जिसे देवगढ़ ने अपनी पूरी तारीख में कभी नहीं देखा था।
रात के ठीक पौने तीन बज रहे थे।
बर्फीली हवाएं हवेली की टूटी खिड़कियों के शीशों को थपथपा रही थीं, जिससे ऐसा लग रहा था मानो कोई बाहर से अंदर आने की गुहार लगा रहा हो। कोहरे की चादर इतनी घनी थी कि टोर्च की रौशनी भी कुछ ही मीटर आगे जाकर दम तोड़ देती थी।
इसी सन्नाटे को चीरते हुए एक काली जीप हवेली के जंग लगे लोहे के मुख्य द्वार के सामने आकर रुकी। जीप का दरवाजा खुला और अर्णव बाहर निकला। अर्णव—देश का माना हुआ इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट और क्राइम थ्रिलर लेखक। तीस साल का अर्णव साहसी था, लेकिन बेवकूफ नहीं। उसके हाथ में एक भारी-भरकम लेजर टोर्च, एक वॉयस रिकॉर्डर और उसकी कमर में एक लाइसेंसी पिस्टल लगी थी।
अर्णव को तीन घंटे पहले एक गुप्त संदेश मिला था। एक अनजान नंबर से आए वॉइस नोट में केवल एक पंक्ति कही गई थी: "अगर देवगढ़ के सबसे बड़े राज से पर्दा उठाना चाहते हो, तो रात तीन बजे काली हवेली की पहली मंजिल पर पहुंचो। सबूत तुम्हारा इंतजार कर रहा है।"
अर्णव ने हवेली के जंग लगे गेट को धक्का दिया। एक भयानक चरमराने की आवाज पूरे सन्नाटे में गूंज गई। सूखी पत्तियों पर अपने जूतों की सरसराहट के साथ वह मुख्य परिसर में दाखिल हुआ। हवा में एक अजीब सी दुर्गंध थी—सड़े हुए चमड़े, पुराने खून और जंग की गंध।
जैसे ही वह हवेली के मुख्य लकड़ी के दरवाजे के पास पहुंचा, उसे किसी के चलने की आहट महसूस हुई। उसने तुरंत टोर्च की बीम चारों तरफ घुमाई। कुछ नहीं था, सिवाय दीवारों पर रेंगती हुई मकड़ियों और पुरानी काली तस्वीरों के।
ठीक तीन बजे... हवेली का भारी-भरकम सागौन का दरवाजा बिना किसी इंसान के छुए, एक खौफनाक चरमराहट के साथ अपने आप खुलता चला गया।
अर्णव ने अपनी सांसों को नियंत्रित करने की कोशिश की। उसने अपनी पिस्टल पर पकड़ मजबूत की और हवेली के अंदर पहला कदम रखा। जैसे ही उसके कदम अंदर पड़े, पीछे से भारी दरवाजा पूरे जोर से बंद हो गया—धड़ाम!
अर्णव तेजी से पीछे घूमा और दरवाजे को खींचने की कोशिश की, लेकिन वह ऐसे जकड़ चुका था जैसे उसे बाहर से किसी ने वेल्ड कर दिया हो। हवा का दबाव अचानक इतना बढ़ गया कि दीवार पर टंगे पुराने झूमर की मोमबत्तियां और अर्णव की टोर्च की बीम एक साथ बुझ गई।
पूरा हॉल एक झटके में ऐसे स्याह अंधेरा का शिकार हो गया, जैसे किसी ने रौशनी की गर्दन मरोड़ दी हो।
अंधेरा इतना गाढ़ा था कि हाथ को हाथ दिखाई नहीं दे रहा था। अर्णव ने घबराकर अपनी टोर्च को दो-तीन बार थपथपाया। जब टोर्च दोबारा जली, तो हवा में मौजूद नमी और सिहरन दस गुना बढ़ चुकी थी।
तभी, हवेली की पहली मंजिल से एक आवाज आई—
छप... छप... छप...
यह किसी के गीले और नंगे पैरों के फर्श पर पड़ने की आवाज थी। लेकिन वह पानी नहीं था। हवा में फैलती लोहे जैसी गंध बता रही थी कि ऊपर फर्श पर बहने वाला तरल पदार्थ कुछ और ही है। अर्णव ने टोर्च की रोशनी को सीढ़ियों की तरफ घुमाया।
धूल से भरी संगमरमर की सीढ़ियों पर ऊपर से नीचे की तरफ लाल रंग की एक गाढ़ी धार बहती हुई आ रही थी। हर कदम के साथ फर्श पर एक खूनी छाप छूट रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे कोई भारी लाश को घसीटते हुए ऊपर ले गया हो।
"कौन है वहां?" अर्णव की आवाज कांप गई, हालांकि उसने इसे छुपाने की पूरी कोशिश की। "पुलिस को खबर दी जा चुकी है! बाहर निकलो!"
जवाब में केवल सीढ़ियों के ऊपर से बहती हुई लाल धार और हवा का खौफनाक शोर मिला।
अर्णव ने सीढ़ियों पर कदम रखा। हर कदम के साथ संगमरमर पर चिपचिपाहट का अहसास हो रहा था। उसकी सांसें भारी हो रही थीं और दिल की धड़कनें पसलियों को तोड़कर बाहर आने को आमादा थीं। जब वह सीढ़ियां चढ़कर पहली मंजिल के मुख्य हॉल में पहुंचा, तो टोर्च का घेरा सामने रखी एक विशाल आदमकद लकड़ी की कुर्सी पर जाकर रुका।
और जो नजारा अर्णव के सामने था, उसने उसके होश फाख्ता कर दिए।
कुर्सी पर देवगढ़ के सबसे रसूखदार और अमीर बिजनेसमैन यशवर्धन राय की लाश बैठी हुई थी। लेकिन यह कोई साधारण हत्या नहीं थी; यह हैवानियत की सारी हदें पार कर देने वाला एक खौफनाक मंजर था।
यशवर्धन की आंखें पूरी तरह से अपने कोटरों से बाहर उबली हुई थीं, जैसे मरने से ठीक पहले उसने खौफ का वो रूप देख लिया हो जिसे किसी इंसान की आंखें सह नहीं सकतीं। उसकी दोनों पुतलियां फटी हुई थीं। उसके चेहरे की त्वचा को किसी बहुत ही धारदार और जंग लगे औजार से बड़ी बेरहमी से एक-एक इंच करके छीला गया था, जिससे लाल मांस और सफेद हड्डियां साफ दिखाई दे रही थीं।
लेकिन सबसे ज्यादा कजा देने वाला मंजर उसके सीने का था।
यशवर्धन के सीने के ठीक बीचों-बीच किसी भारी कुल्हाड़ी से वार करके पसलियों को तोड़ दिया गया था। उसके सीने को चीरकर उसका दिल बाहर निकाल लिया गया था। उस खाली, खूनी और भयानक गुहा (cavity) के अंदर... एक प्राचीन मिट्टी का दीया रखा हुआ था।
वह दीया जल रहा था! लेकिन उसकी लौ पीली या नारंगी नहीं थी—वह एक अमानवीय नीली लौ के साथ धधक रहा था। मांस और खून के बीचों-बीच जलते उस दीये से एक नीली धुआं उठ रही थी, जो पूरे कमरे में किसी कड़वी औषधि जैसी अजीब महक फैला रही थी।
अर्णव स्तब्ध खड़ा रह गया। उसके हाथ से टोर्च छूटते-छूटते बची।
तभी उसकी नजर यशवर्धन के पीछे की पुरानी चूने की दीवार पर गई। उस दीवार पर यशवर्धन के ही कटे हुए हाथों के खून से, बड़े-बड़े और भयानक अक्षरों में कुछ लिखा हुआ था।
अर्णव ने टोर्च की रोशनी वहां केंद्रित की। वहां लिखा था:
"यह तो बस पहला चिराग है... अभी 119 लाशों का जलना बाकी है। ढूंढ सको तो रोक लो, वरना अगला नंबर तुम्हारा है।"
119 लाशें? अर्णव का दिमाग सुन्न पड़ गया। क्या यह कोई साइकोपैथ सीरियल किलर था? या फिर देवगढ़ की उन सदियों पुरानी भूतिया मान्यताओं का काला सच?
अर्णव ने हिम्मत जुटाई। एक पत्रकार का फर्ज और सबूत इकट्ठा करने का जुनून खौफ पर हावी होने लगा। उसने अपनी जेब से फोन निकाला ताकि इस खौफनाक मंजर की तस्वीर ले सके। लेकिन जैसे ही उसने कैमरे का बटन दबाया, फोन की स्क्रीन नीली पड़ी और तेज झनझनाहट के साथ बंद हो गई।
उसी पल, हवेली का माहौल पूरी तरह बदल गया।
कमरे के चारों कोनों से, ऐसा लगा जैसे दीवारें खुद रोने लगी हों। एक साथ कई औरतों और बच्चों के चीखने, कराहने और गिड़गिड़ाने की आवाजें गूंजने लगीं। ऐसा लग रहा था मानो सैकड़ों अतृप्त आत्माएं उस काली हवेली की चूने की दीवारों में जिंदा दफन हैं और अपनी आजादी की भीख मांग रही हैं।
“बचाओ... हमें बचाओ... वह आ जाएगा... वह सबका दिल निकाल लेगा...”
अदृश्य चीखों की गूंज इतनी तेज हो गई कि अर्णव को अपने दोनों कानों पर हाथ रखना पड़ा। उसकी आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा।
तभी, जो हुआ, उसने अर्णव की बची-कुची हिम्मत की आखिरी ईंट भी उखाड़ फेंकी।
कुर्सी पर बैठी यशवर्धन की बेजान और छिली हुई लाश में अचानक एक झटका आया।
कटक... कटक...
हड्डियों के टूटने और मुड़ने की खौफनाक आवाजों के साथ, यशवर्धन की गर्दन धीरे-धीरे, एक-एक इंच करके अर्णव की तरफ घूमने लगी। उसकी बाहर निकली हुई, फटी आंखें सीधे अर्णव की आंखों में घूर रही थीं। उसके कटे हुए और बिना त्वचा वाले होठों के बीच से गाढ़ा, काला खून बहकर फर्श पर टपकने लगा।
और फिर... उस मुर्दा, कटे हुए गले से एक गूंजती हुई, अमानवीय और भयानक हंसी की आवाज आई—
"हाहाहाहा... अर्णव... देर कर दी तुमने... पहला चिराग जल चुका है..."
लाश की उंगलियां अचानक उठीं और अर्णव की तरफ इशारा करने लगीं। सीने के अंदर जलता हुआ नीला दीया अचानक और तेज धधक उठा, और उसकी नीली रोशनी में पूरा हॉल किसी नरक के दरवाजे जैसा दिखने लगा।
अर्णव की रीढ़ में खौफ का ऐसा करंट दौड़ा कि वह पीछे की तरफ गिरा। उसकी टोर्च हाथ से छूटकर फर्श पर गिर गई और दूर जा लुढ़की। अंधेरे में उसे लगा कि कोई बेहद ठंडा, गीला और अमानवीय हाथ उसकी गर्दन की तरफ बढ़ रहा है...
अगले भाग में क्या होगा?
क्या अर्णव उस काली हवेली से जिंदा बचकर निकल पाएगा या वह इस खूनी खेल की दूसरी लाश बनेगा?
कौन है वो साया जो 120 चिरागों की खौफनाक बलि मांग रहा है?
और शहर के सबसे बड़े बिजनेसमैन यशवर्धन राय का उस काली हवेली और उस नीली लौ से क्या गहरा रिश्ता था?
(कहानी जारी है... अगला भयानक रहस्य जानने के लिए पढ़िये भाग - 2)