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भाग 18: कुलधरा के भूतिया खंडहर, उबलती रेत और 70 डिग्री का नरक
Piyashi Atma · Haunted Places · 11 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- चीखती खामोशियां: देवदार हवेली का अभिशाप
- Chapter
- 18 of 18
- Category
- Haunted Places
- Reading time
- 11 min
- Words
- 2104
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
भारतीय वायुसेना के विशेष सुखोई-30एमकेआई लड़ाकू विमान और उसके पीछे उड़ रहे सामरिक ट्रांसपोर्ट जेट ने गुवाहाटी से जैसलमेर तक की लगभग दो हजार किलोमीटर की दूरी को महज ढाई घंटे में नाप दिया था।
जैसे ही विमान राजस्थान के थार मरुस्थल के हवाई क्षेत्र में प्रविष्ट हुआ, कॉकपिट के तापमान सेंसर असामान्य आंकड़े दर्शाने लगे। बाहर 35,000 फीट की ऊंचाई पर, जहाँ तापमान सामान्यतः शून्य से पचास डिग्री नीचे होना चाहिए था, वहां की हवा भी एक अजीब सी शुष्क और बेचैन कर देने वाली तपिश से भरी हुई थी। नीचे देखने पर थार का विशाल मरुस्थल पीले रंग के बजाय एक गहरे, अंगारे जैसे तांबई-लाल रंग में सुलगता हुआ दिखाई दे रहा था।
शाम के करीब 05:45 PM बज रहे थे जब विमान जैसलमेर एयरफोर्स स्टेशन के रनवे पर उतरा।
कबीर और कर्नल रणवीर शेखावत जैसे ही विमान के रैंप से नीचे उतरे, एक ऐसी गर्म और दमघोंटू हवा के बवंडर ने उनका स्वागत किया मानो किसी ने भट्टी का ढक्कन सीधे उनके चेहरों के सामने खोल दिया हो। सूरज ढलने की कगार पर था, लेकिन क्षितिज पर कोई संझा-सुंदरी की लालिमा नहीं थी; आसमान में चारों तरफ खून और राख के मिले-जुले काले-लाल बादलों का ऐसा गुबार छाया था जिसने पूरे रेगिस्तान को एक अप्राकृतिक गोधूलि में डुबो दिया था।
एयरबेस के भूमिगत ऑपरेशंस रूम में भारतीय सेना की दक्षिणी-पश्चिमी कमान के मेजर जनरल राठौड़ और स्पेशल फोर्सेज के अधिकारी पहले से ही तनावग्रस्त मुद्रा में नक्शों के सामने खड़े थे।
"कर्नल रणवीर, भगवान का शुक्र है आप समय पर आ गए," मेजर जनरल राठौड़ ने माथे का पसीना पोंछते हुए कहा। उनके चेहरे पर युद्ध के बड़े से बड़े मोर्चे पर भी न दिखने वाला खौफ साफ झलक रहा था। "स्थिति अब किसी भी सैन्य नियंत्रण से बाहर हो चुकी है। जैसलमेर शहर से बीस किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में स्थित वह 300 साल पुराना वीरान गांव... 'कुलधरा'... साक्षात नर्क का अंगारा बन चुका है।"
कर्नल रणवीर ने सैटेलाइट स्क्रीन की ओर देखा। "थर्मल और सीस्मोलॉजिकल (भूकंपीय) डेटा क्या कह रहा है, जनरल?"
जनरल राठौड़ ने एक लाल रंग की ग्राफ प्लेट आगे बढ़ाई। "कुलधरा गांव के ठीक केंद्र में, जहाँ वह प्राचीन बावड़ी और खंडहर हैं, वहां जमीन का सतही तापमान 72 डिग्री सेल्सियस पार कर चुका है! जमीन के नीचे 500 मीटर की गहराई से ऐसी भयानक चुंबकीय और तापीय तरंगें उठ रही हैं जिन्होंने हमारे रडार, ड्रोन और जीपीएस सिग्नल्स को पूरी तरह जाम कर दिया है। और सबसे भयानक बात... हमारी 10-पैरा (स्पेशल फोर्सेज) की एक टोही टुकड़ी बख्तरबंद गाड़ियों के साथ गांव की बाहरी परिधि में गई थी... उनका अंतिम रेडियो संदेश केवल चीखों और जलती हुई हड्डियों की आवाजों से भरा था। उसके बाद से कोई संपर्क नहीं है!"
कबीर ने अपनी जेब से वह प्राचीन सोने का नक्शा निकाला जो गुवाहाटी में अघोरानंद के कंकाल की राख से मिला था। उसने नक्शे को मेज पर बिछाया।
"यह कोई प्राकृतिक भूगर्भीय घटना नहीं है, जनरल," कबीर ने गंभीर, शांत स्वर में कहा। उसकी आवाज में अब एक प्राचीन साधक का अधिकार था। "1825 में जब पालीवाल ब्राह्मणों ने रातों-रात कुलधरा को खाली किया था, तो इतिहास ने यही समझा कि वे दीवान सालिम सिंह के जुल्मों से तंग आकर भागे थे। लेकिन इस नक्शे का सच कुछ और ही कहता है। पालीवाल ब्राह्मण दरअसल 'अग्नि-शिला' के प्राचीन रक्षक थे। वे जानते थे कि गांव की सबसे गहरी बावड़ी के नीचे पाताल लोक की वह तीसरी महा-शिला सोई हुई है।"
कबीर ने नक्शे के उस बिंदु पर उंगली रखी जहाँ प्राचीन संस्कृत में 'पाताल-कुंड' खुदा हुआ था।
"जब उत्तर की देवदार हवेली वाली 'अंध-शिला' और कामाख्या की 'रक्त-शिला' शांत हुईं, तो उनकी सारी अवशिष्ट ऊर्जा इस तीसरी शिला के भीतर खिंच आई है। यह शिला 'अग्नि तत्व' और 'महा-संहार' का केंद्र है। यदि आज अमावस्या की ठीक मध्यरात्रि—रात के 12:00 बजे—यह शिला पूरी तरह फूट गई, तो थार मरुस्थल की यह भूमिगत आग पूरे देश की टेक्टोनिक प्लेट्स को पिघला देगी। कुछ ही मिनटों में चारों तरफ केवल लावा और राख का समंदर होगा!"
"हमारे पास कितना समय है कबीर?" कर्नल रणवीर ने पूछा।
कबीर ने अपनी कलाई पर बंधी सैन्य घड़ी देखी।
समय हो रहा था—शाम के 06:15 PM।
"रात के 12:00 बजे तक... यानी हमारे पास केवल पौने छह घंटे बचे हैं!"
कर्नल रणवीर ने एक सेकंड भी नहीं गंवाया। "जनरल, हमें दो विशेष 'कस्पार' (Casspir) माइन-प्रोटेक्टेड बख्तरबंद गाड़ियां, थर्मल इंसुलेटेड सूट और लिक्विड नाइट्रोजन कैनन चाहिए। कोई साधारण सैनिक अंदर नहीं जाएगा... केवल मैं, कबीर और मेरी प्रभाग-9 के चार सबसे बेहतरीन कमांडो जाएंगे!"
शाम के करीब सात बजे।
रेगिस्तान के घने, गर्म अंधकार को चीरती हुई दोनों भारी बख्तरबंद गाड़ियां कुलधरा के रेतीले टीलों की ओर बढ़ रही थीं।
जैसे ही गाड़ियां कुलधरा की बाहरी सीमा—पुराने पत्थर के टूटे हुए तोरण-द्वार—से दो किलोमीटर दूर पहुंचीं, गाड़ियों के पहियों के नीचे से भयानक आवाजें आने लगीं।
चर्रर्र... फट्-फट्!
सड़क का डामर पूरी तरह पिघलकर काले कीचड़ जैसा बन चुका था। गाड़ियों के विशेष बुलेटप्रूफ टायरों का रबर 70 डिग्री की उस असहनीय गर्मी से पिघलने लगा और केबिन के भीतर लगे एसी पूरी तरह फेल हो गए। अंदर का तापमान 55 डिग्री पहुंच गया। कबीर और कमांडो के पसीने से उनके कपड़े ऐसे भीग चुके थे मानो वे पानी के भीतर बैठे हों।
धड़ाम!
अचानक मुख्य गाड़ी का इंजन एक भयानक धमाके के साथ बंद हो गया। डैशबोर्ड के सारे इलेक्ट्रॉनिक मीटर पिघलकर प्लास्टिक का ढेर बन गए।
"गाड़ियां छोड़ो! पैदल आगे बढ़ना होगा!" कर्नल रणवीर ने चिल्लाते हुए बख्तरबंद दरवाजा लात मारकर खोला।
कबीर, कर्नल और चार कमांडो अपने भारी थर्मल सूट, विशेष तांबे की राइफलों और आग बुझाने वाले क्रायोजेनिक सिलेंडरों के साथ बाहर रेत पर कूदे।
बाहर कदम रखते ही कबीर को ऐसा लगा मानो उसने सीधे किसी दहकते हुए तंदूर के भीतर पैर रख दिया हो।
जूतों के मोटे तलवों के बावजूद पैरों के नीचे की रेत इतनी गर्म थी कि तलवों की चमड़ी जलने लगी थी। चारों तरफ हवा में कोई सामान्य धूल नहीं थी; हवा में पिघले हुए कांच और गंधक के बारीक कण उड़ रहे थे जो सांस लेते ही फेफड़ों को छील रहे थे।
और सामने खड़ा था—कुलधरा का 300 साल पुराना शापित गांव।
पीले बलुआ पत्थर की बनी सैकड़ों हवेलियां, मंदिर, चौपालें और संकरी गलियां खंडहर के रूप में खड़ी थीं। छतों के बिना वे हवेलियां अंधकार में किसी विशाल, प्राचीन कंकाल के पंजरों जैसी दिख रही थीं।
लेकिन सबसे खौफनाक बात यह थी कि उन सैकड़ों टूटे हुए घरों के भीतर कोई अंधेरा नहीं था; हर टूटी हुई खिड़की, हर दरवाजे और हर रोशनदान के भीतर से नीले और बैंगनी रंग की आग की लपटें अपने आप भड़क रही थीं!
धम... धम... धम...
जमीन के भीतर से ऐसी गहरी, भारी धड़कनें आ रही थीं जैसे कोई विशालकाय दैत्य धरती के सीने को नीचे से हथौड़ों से पीट रहा हो।
"सावधान! अपनी फॉर्मेशन बनाए रखो!" कर्नल रणवीर ने अपनी नाइट-विजन दूरबीन से खंडहरों को देखते हुए चेतावनी दी।
तभी, कुलधरा की मुख्य चौड़ी गली के दोनों तरफ बने खंडहरों से एक अजीब सी, हड्डियों के आपस में टकराने की 'कट-कट-कट' आवाजें आने लगीं।
कबीर ने टॉर्च की रोशनी सामने की हवेली पर डाली।
हवेली की चौखट से एक साया बाहर निकला।
वह कोई जीवित इंसान नहीं था। वह 1940 के दौर के ब्रिटिश सैनिकों की खाकी वर्दी में लिपटा एक सूखा हुआ कंकाल था, जिसके हाथ में जलती हुई बेयोनेट (संगीन) लगी राइफल थी। उसकी खोपड़ी की खाली आंखों में नीली आग की लपटें नाच रही थीं।
और केवल एक नहीं...
कुछ ही सेकंडों के भीतर, खंडहरों की गलियों, सूखे कुओं और रेत के टीलों से सैकड़ों कंकाल जमीन फाड़कर बाहर निकलने लगे! कुछ 1825 के राजस्थानी धोती-कुर्ते में लिपटे पालीवाल कंकाल थे, तो कुछ 1940 के ब्रिटिश सैनिकों और शोधकर्ताओं के कंकाल थे।
वे सब मिलकर एक विशाल, जलती हुई सेना की तरह कबीर और कमांडो की ओर बढ़ने लगे। उनके जबड़े आपस में टकरा रहे थे और उनके मुंह से एक ही भयानक, एकरस स्वर निकल रहा था:
"अग्नि-शिला जाग रही है... तुम्हारी अस्थियां इस भट्टी की समिधा बनेंगी!"
"फायर!" कर्नल रणवीर ने आदेश दिया।
कमांडो ने अपनी क्रायोजेनिक और तांबे की राइफलों से गोलियों की बौछार कर दी।
तड़-तड़-तड़-तड़! बूम!
क्रायोजेनिक (अत्यधिक ठंडी नाइट्रोजन) गोलियां जैसे ही उन जलते हुए कंकालों से टकरातीं, थर्मल शॉक के कारण वे कंकाल कांच की तरह बिखरकर राख बन जाते। लेकिन उनकी संख्या सैकड़ों में थी। वे रेत के भीतर से किसी चींटियों के झुंड की तरह लगातार बाहर आ रहे थे।
तभी, रेगिस्तान की जमीन में एक भयानक दरार पड़ी।
कबीर के पैरों के नीचे की रेत अचानक एक विशाल 'क्विक्सैंड' (दलदल) की तरह घूमने लगी। रेत का एक विशाल, बीस फीट ऊंचा हाथ जमीन से बाहर निकला और उसने एक कमांडो को उसकी कमर से जकड़ लिया!
"बचाओ!" कमांडो चीखा। इससे पहले कि कोई कुछ कर पाता, वह विशाल रेतीला हाथ उस कमांडो को खींचकर सीधे उबलती हुई रेत के नीचे पाताल में ले गया। केवल उसकी पिघलती हुई राइफल सतह पर रह गई।
"कबीर, हमें रुकना नहीं है! मुख्य बावड़ी कहाँ है?" कर्नल रणवीर ने अपनी असॉल्ट राइफल से दो कंकालों के सिर उड़ाते हुए पूछा।
कबीर ने अपनी दाहिनी हथेली आगे की।
उसकी हथेली पर बनी 'पाताल-मुद्रा' से नीली दिव्य ज्वाला का एक विशाल त्रिशूल प्रकट हो गया। कबीर ने उस त्रिशूल को हवा में घुमाकर जमीन पर पूरी ताकत से दे मारा।
कड़ाssssक!
नीली ऊर्जा का एक विशाल घेरा बना जिसने सामने आ रहे दर्जनों कंकालों को एक ही झटके में भस्म कर दिया।
कबीर ने गांव के ठीक मध्य में स्थित एक विशाल, प्राचीन पत्थर के गुंबद की ओर इशारा किया: "वहां! वह कुलधरा की मुख्य प्राचीन बावड़ी (Stepwell) है! सारा लावा वहीं से फूट रहा है!"
कबीर, कर्नल रणवीर और बचे हुए तीन कमांडो आग और कंकालों के उस चक्रव्यूह को चीरते हुए पागलों की तरह उस गुंबद की ओर दौड़े।
गुंबद के भीतर कदम रखते ही तापमान इतना बढ़ गया कि कर्नल रणवीर के थर्मल सूट का बाहरी शीशा चटक गया।
सामने वह 300 साल पुरानी, विशालकाय बावड़ी थी।
यह कोई साधारण कुआं नहीं था; यह जमीन के भीतर 100 फीट नीचे उतरने वाली 84 पथरीली सीढ़ियों का एक विशाल, अष्टकोणीय भूलभुलैया था। लेकिन उन सीढ़ियों के सबसे निचले तल पर पानी नहीं था...
वहाँ पिघला हुआ, खौलता हुआ लाल-पीला लावा और नीली लपटों का एक विशाल महासागर हिलोरें मार रहा था!
और उस खौलते हुए लावे के ठीक बीचों-बीच... एक विशाल, जलते हुए काले उल्कापिंड जैसी शिला हवा में तैर रही थी—'अग्नि-शिला' (The Stone of Embers)!
उस शिला का तापमान कम से कम 2000 डिग्री सेल्सियस था। उसकी सतह से आग के विशाल बवंडर उठ रहे थे जो बावड़ी की छत को पिघला रहे थे।
कबीर ने अपनी घड़ी देखी।
समय हो रहा था—रात के 11:35 PM।
अंतिम महा-विनाश में केवल पच्चीस मिनट बाकी थे!
तभी, उस खौलते हुए लावे के महासागर में एक भयानक हलचल हुई।
भभकssss! बूम!
लावे का एक पचास फीट ऊंचा फव्वारा उठा और उस लपटों के बवंडर के भीतर से पाताल लोक का अंतिम और सबसे भयानक अधिपति बाहर निकला।
वह था—'ज्वाला-भैरव' (The Lord of the Abyss Fire)!
उसका आकार पच्चीस फीट ऊंचा था। उसका पूरा शरीर पिघलते हुए लावे, काली चट्टानों और जलती हुई धातु से बना था। उसके सिर पर आग के छह विशाल सींग थे। उसकी तीन आंखें थीं जो साक्षात सूर्य की तरह धधक रही थीं, और उसके आठ विशाल हाथों में जलते हुए पाषाण-त्रिशूल और लावा के गोले थे।
"हाहाहाहाहा!" ज्वाला-भैरव की हंसी से कुलधरा के सारे खंडहर थरथरा उठे। "दो शिलाएं शांत करके तुम इस मरुस्थल में अपनी कब्र खोदने आए हो, नश्वर कीड़ों?!"
ज्वाला-भैरव ने अपना एक विशाल हाथ हवा में उठाया और लावे का एक विशालकाय, जलता हुआ गोला सीधे कर्नल रणवीर की ओर फेंक दिया!
"कर्नल, हटो!"
कबीर ने कर्नल को बचाने के लिए धक्का दिया। लेकिन लावे के उस गोले के प्रचंड ताप ने कर्नल रणवीर के थर्मल सूट के पिछले हिस्से को जला दिया। कर्नल गंभीर रूप से झुलसकर बावड़ी की 50 फीट गहरी खाई की कगार पर जा गिरे। उनका एक हाथ मुंडेर पर अटका था और नीचे केवल पिघलता हुआ लावा खौल रहा था!
"कबीर... मेरी परवाह मत करो..." कर्नल ने दर्द से कराहते हुए हांफती आवाज में कहा। "घड़ी देखो... 11:45 हो चुका है... केवल पंद्रह मिनट!"
ज्वाला-भैरव अपने भारी, जलते हुए कदमों के साथ बावड़ी की सीढ़ियों को पिघलाता हुआ कबीर की ओर बढ़ रहा था। उसके आठों हाथों के त्रिशूल कबीर के शरीर को राख में मिलाने के लिए सीधे तन चुके थे।
कबीर बावड़ी के सबसे ऊपरी मुहाने पर अकेला खड़ा था।
उसके सामने पच्चीस फीट ऊंचा वह साक्षात अग्नि-दैत्य था, नीचे खौलता हुआ लावे का नर्क था, और समय की सुइयां काल के सबसे भयानक प्रहर की ओर बढ़ रही थीं।
कबीर ने अपनी दोनों मुट्ठियां बांधीं।
अचानक, उसकी दाहिनी हथेली पर बनी वह 'पाताल-मुद्रा' अब केवल नीली नहीं रही... देवदार हवेली की 'अंध-शक्ति' और कामाख्या की 'रक्त-शक्ति' कबीर की आत्मा के भीतर एक साथ प्रज्वलित हो उठीं। कबीर के पूरे शरीर से सुनहरी और नीली दिव्य ज्वालाओं का एक ऐसा प्रचंड महा-मंडल फूटा जिसने उस 70 डिग्री के नरक को भी अपनी शीतल, दिव्य शक्ति से स्तब्ध कर दिया!
कबीर ने बावड़ी की मुंडेर से सीधे उस खौलते हुए लावे के समुद्र की ओर छलांग लगा दी...
अंतिम महा-संग्राम का शंखनाद हो चुका था!