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भाग 17: रक्त-शिला का शुद्धिकरण, वोल्फ का संहार और अघोरानंद के कंकाल का रहस्य
Piyashi Atma · Haunted Places · 10 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- चीखती खामोशियां: देवदार हवेली का अभिशाप
- Chapter
- 17 of 18
- Category
- Haunted Places
- Reading time
- 10 min
- Words
- 1958
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
गुफा के उस विशाल गर्भगृह में हवा का एक-एक कण खून और गंधक के असहनीय ताप से उबल रहा था।
काले लोहे की वे चार भारी, चुंबकीय जंजीरें कबीर की हड्डियों को इतनी क्रूरता से भींच रही थीं कि उसके जोड़ों से चरचराने की आवाजें आ रही थीं। कबीर जमीन से पांच फीट ऊपर हवा में झूल रहा था और उसकी दाहिनी हथेली—जिस पर वह नीली 'पाताल-मुद्रा' चमक रही थी—उस बीस फीट ऊंची, धड़कती हुई लाल 'रक्त-शिला' के खूनी जबड़े की ओर लगातार खिंचती जा रही थी।
शिला की सतह पर बना वह भयानक, मांसल जबड़ा किसी विशाल अजगर के मुंह की तरह खुल चुका था।
उसके भीतर से गाढ़ा, खौलता हुआ लाल तेजाब रिस रहा था जो नीचे गिरते ही पत्थरों को पिघला रहा था। कबीर की हथेली उस जबड़े से केवल तीन इंच दूर थी। उसकी त्वचा की नसें उस अलौकिक खिंचाव से फटने की कगार पर थीं।
सामने खड़ा डॉ. हेनरिक वोल्फ अपनी पिस्तौल ताने, उन्माद से भरे ठहाके लगा रहा था:
"हाँ कबीर! अपने उस दिव्य शून्य की शक्ति इस शिला को सौंप दो! जैसे ही तुम्हारी हथेली इस जबड़े के भीतर जाएगी, यह रक्त-शिला पूरे एशिया के इंसानों की जीवन-ऊर्जा को खींच लेगी... और मैं, डॉ. हेनरिक वोल्फ, इस नए युग का ईश्वर बनूंगा!"
कबीर के मस्तिष्क में अंधाधुंध दबाव बन रहा था। उसकी चेतना क्षीण हो रही थी।
लेकिन ठीक उसी अंतिम, जानलेवा पल में, कबीर के अंतर्मन में गुवाहाटी के उस अखाड़े में बैठे 105 वर्षीय अघोरी बाबा भैरवानंद की भारी, गंभीर आवाज गूंज उठी:
"यह रक्त-शिला है, कबीर... यह केवल रक्त की भाषा समझती है। यदि इस पर किसी पापी का रक्त चढ़ा, तो यह संपूर्ण पृथ्वी का रक्त पी लेगी। लेकिन यदि इस पर किसी ऐसे साधक का रक्त समर्पित किया जाए जिसने स्वयं मृत्यु को परास्त करके पाताल के शून्य को छुआ हो... तो यह शिला पाषाण बनकर हमेशा के लिए सो जाएगी!"
कबीर की आंखों में अचानक एक अदम्य, दिव्य संकल्प कौंध गया।
"तू ईश्वर नहीं बनेगा, वोल्फ..." कबीर ने अपने दांत भींचते हुए कहा। उसकी आवाज में अब कोई दर्द, कोई डर नहीं था। "तू केवल अपनी ही शैतानी महत्वाकांक्षा की चिता बनेगा!"
कबीर ने विरोध करना बंद कर दिया।
उसने अपनी बाईं बांह में बंधी लोहे की जंजीर के नुकीले, धारदार सिरे को अपनी ही दाहिनी कलाई की मुख्य नस पर पूरी ताकत से रगड़ दिया!
छपाक!
कबीर की कलाई की नस कट गई।
उस घाव से जो खून निकला, वह कोई साधारण लाल रक्त नहीं था; वह पाताल के उस आदिम शून्य से होकर लौटा हुआ, नीली और सुनहरी दिव्य किरणों से चमकता हुआ 'शून्य-शोधित रक्त' था!
कबीर ने अपनी बची हुई पूरी जान लगाकर, अपनी दाहिनी हथेली को उस रक्त-शिला के खुलते हुए जबड़े से बचाने के बजाय... सीधे उस जबड़े के ठीक मध्य में, उसकी सबसे संवेदनशील लाल नस पर पूरी ताकत से दे मारा!
छनन्नन... भभकssss!
जैसे ही कबीर का वह जादुई, पवित्र रक्त और उसकी हथेली पर बनी वह 'पाताल-मुद्रा' उस शिला के केंद्र से टकराई, पूरे नीलाचल पर्वत के भीतर एक ऐसा भयानक आध्यात्मिक कंपन हुआ मानो धरती का दिल एक सेकंड के लिए रुक गया हो।
एक अंधा कर देने वाली नीली बिजली उस शिला के सीने में कौंध गई।
शिला के भीतर घूमता हुआ वह खौलता हुआ लाल रक्त अचानक जमने लगा। उसका गहरा लाल रंग तेजी से फीका पड़ने लगा और वह दूधिया-सफेद तथा नीले रंग की शीतल आभा में बदलने लगा।
चर्रर्र... खट-खट-खट!
अचानक, उस शिला से जुड़ी हुई वे सभी पारदर्शी प्लास्टिक की नलियां, जो उन दस अपहृत युवक-युवतियों के शरीरों से उनका खून खींच रही थीं, उल्टी दिशा में दौड़ने लगीं!
शिला ने जो जीवन-ऊर्जा और रक्त उन निर्दोष लोगों से चुराया था, कबीर की पवित्र मुद्रा के प्रभाव से वह ऊर्जा दुगुनी शक्ति के साथ उन अभागे लोगों के शरीरों में वापस लौटने लगी। उन युवक-युवतियों के पीले पड़े चेहरों पर फिर से लाली दौड़ने लगी और उनकी डूबती हुई सांसें सामान्य होने लगीं।
रक्त-शिला की वह बीस फीट ऊंची पारदर्शी, मांसल देह तेजी से ठोस, सूखे और ठंडे काले ग्रेनाइट पत्थर में बदलने लगी।
उसकी वह भयानक धड़कन—धप... धप... धप...—धीमी होते-होते पूरी तरह शांत हो गई। वह महा-शिला अब एक मृत, निर्जीव चट्टान बन चुकी थी, जिसका पाताल लोक से संपर्क हमेशा-हमेशा के लिए कट चुका था!
शिला के शांत होते ही कबीर को जकड़े हुए वे चारों चुंबकीय लोहे के शिकंजे एक साथ टूटकर बिखर गए।
धड़ाम!
कबीर हवा से नीचे गुफा के फर्श पर उतरा। उसकी कलाई से बहता खून अपने आप बंद हो चुका था और उस कटे हुए स्थान पर एक नया, हल्का स्वर्णिम निशान बन चुका था।
"न... नहीं! यह असंभव है!" हेनरिक वोल्फ अपनी आंखों पर विश्वास नहीं कर पा रहा था। उसका चेहरा सफेद पड़ चुका था और उसका पूरा शरीर क्रोध और निराशा से कांप रहा था।
"मेरी बीस साल की मेहनत... मेरी रक्त-शिला... तुमने इसे एक साधारण पत्थर बना दिया?!" वोल्फ पागलों की तरह चीखा। उसने अपनी पिस्तौल कबीर के माथे की ओर तान दी।
"तुम्हारा खेल खत्म हो चुका है, वोल्फ," कबीर ने शांत कदमों से उसकी ओर बढ़ते हुए कहा।
"खत्म? कभी नहीं!" वोल्फ की आंखों में एक उन्मादी, आत्मघाती पागलपन उतर आया। "यदि मैं इस शिला से संसार पर राज नहीं कर सकता... तो मैं उस प्राचीन तांत्रिक के साए को जीवित करूंगा जो तुम्हें और इस पूरी घाटी को जिंदा चबा जाएगा!"
वोल्फ तेजी से पीछे हटा और गुफा के उस स्टील के चबूतरे की ओर लपका, जहां वह पारदर्शी क्रायोजेनिक संदूक रखा था।
उसने अपनी जेब से काले तरल से भरी एक तांत्रिक शीशी निकाली और अपनी खुद की हथेली काटकर अपना खून उस शीशी में मिला दिया। उसने उस मिश्रण को सीधे उस संदूक के भीतर रखे 86 साल पुराने उस सूखे, ममीकृत कंकाल पर उड़ेल दिया!
वह कंकाल 1940 के उसी कुख्यात तांत्रिक कापालिक अघोरानंद का था!
सड़ssss... कड़कड़ाहट!
जैसे ही वह रक्त-मिश्रण उस कंकाल की हड्डियों पर पड़ा, क्रायोजेनिक संदूक का कांच जोरदार धमाके के साथ चकनाचूर हो गया।
उस सूखे कंकाल की हड्डियों से काला, बदबूदार धुआं निकलने लगा। कंकाल की पसलियां अपने आप हिलने लगीं और उसकी बिना धड़ वाली खोपड़ी हवा में तैरती हुई सीधे उस कंकाल की गर्दन पर आकर जुड़ गई! खोपड़ी के दोनों खाली गड्ढों में हरी, जहरीली आग की लपटें जल उठीं।
अघोरानंद का वह 86 साल पुराना प्रेत-कंकाल अपने पैरों पर खड़ा हो गया!
"हाहाहाहा!" अघोरानंद के जबड़े आपस में टकराए और गुफा की दीवारों को हिलाती हुई एक भयानक आवाज गूंजी। "किसने मेरे विश्राम को तोड़ा? कौन है जो महाकाल के दूत के सामने खड़ा है?"
"अघोरानंद! इस लड़के को मार डालो!" वोल्फ चिल्लाया। "इसके पास वह नक्शा मत जाने दो!"
अघोरानंद के कंकाल ने अपने दोनों हाथ हवा में उठाए। गुफा की छत से नुकीले, पत्थर के भाले टूटकर कबीर की ओर गिरने लगे।
तभी, गुफा के पिछले मलबे से एक जोरदार गर्जना हुई:
"कबीर, नीचे झुक जाओ!"
धड़-धड़-धड़-धड़-धड़!
कर्नल रणवीर शेखावत और उनके दो जीवित कमांडो मलबे से बाहर निकल चुके थे। उनके हाथों में भारी .50 कैलिबर की एंटी-मैटीरियल राइफलें थीं। कर्नल ने सीधे डॉ. हेनरिक वोल्फ के सीने और पैरों पर गोलियों की पूरी मैगजीन खाली कर दी।
तांबे और टंगस्टन की विशेष गोलियों ने वोल्फ के आधुनिक केवलर कवच को चीर दिया। वोल्फ के मुंह से खून का फव्वारा छूटा। वह लड़खड़ाया और पीछे बने उस खौलते हुए तांत्रिक रासायनिक कुंड में जा गिरा!
छपाक... भभक!
तेजाबी रसायनों में गिरते ही वोल्फ का शरीर कुछ ही सेकंडों में जलकर धुएं और राख में तब्दील हो गया। उसका अंत उसी के बनाए जहर में हुआ।
लेकिन अघोरानंद का वह प्रेत-कंकाल गोलियों से नहीं मरा। गोलियां उसकी हड्डियों को पार करके पत्थरों में धंस रही थीं, लेकिन वह कंकाल अपनी हरी लपटों के साथ कबीर की ओर बढ़ता आ रहा था। उसके हाथों में काले पत्थरों से बना एक प्राचीन त्रिशूल प्रकट हो चुका था।
"तूने देवदार हवेली में मेरे साए को हराया था, बालक..." अघोरानंद की खोपड़ी से आवाज आई। "लेकिन यह मेरी मूल अस्थियां हैं... इन्हें कोई नश्वर अस्त्र नहीं तोड़ सकता!"
"तुम भूल रहे हो अघोरानंद..." कबीर की आंखों में स्वर्णिम तेज चमक उठा। "मैं अब केवल एक नश्वर मनुष्य नहीं हूँ। मैं उस अनिकेत का संकल्प हूँ जिसे तुमने 86 साल पहले छलने की कोशिश की थी!"
कबीर ने अपने दोनों हाथ आगे किए। उसकी हथेली की 'पाताल-मुद्रा' से नीली और सुनहरी आग का एक विशाल त्रिशूल आकार लेने लगा।
कबीर ने कामाख्या के उस पवित्र गर्भगृह की संपूर्ण भूमिगत ऊर्जा का आह्वान किया और सीधे उस कंकाल के सीने पर छलांग लगा दी!
कड़ाssssक!
कबीर का वह आध्यात्मिक त्रिशूल सीधे अघोरानंद के कंकाल की मुख्य रीढ़ की हड्डी और पसलियों के आर-पार उतर गया।
"ॐ ऐं ह्रीं क्लीं... कामाख्या पाताल-विनाशाय नमः!" कबीर की गर्जना गूंज उठी।
पवित्र अग्नि के प्रवेश करते ही अघोरानंद का वह 86 साल पुराना कंकाल अंदर से जलने लगा। उसकी हरी आग की लपटें नीली दिव्य ज्वाला में बदल गईं। कंकाल दर्द से चीखता हुआ हवा में ही सफेद राख के बारीक कणों में बिखर गया।
गुफा में अचानक गहरा, शांत सन्नाटा छा गया।
कर्नल रणवीर और कमांडो तेजी से कबीर के पास पहुंचे। कर्नल ने कबीर के कंधे पर हाथ रखा। उनकी आंखों में असीम आदर था। "कबीर... तुमने कामाख्या को बचा लिया। वे दस बंधक जीवित हैं।"
कबीर ने झुककर उस चबूतरे की राख को हटाया, जहां वह क्रायोजेनिक संदूक रखा था।
राख के ढेर के बीच से एक प्राचीन, भारी सोने का पत्र (Golden Tablet) बाहर निकला। उस पत्र पर किसी प्राचीन खंजर से एक नक्शा और कुछ भयानक शब्द उकेरे गए थे।
कबीर और कर्नल रणवीर ने उस नक्शे को रोशनी में देखा।
नक्शे के शीर्ष पर रक्त-चंदन से लिखा था:
"त्रिनेत्र पाताल — तृतीय एवं अंतिम महा-केंद्र: अग्नि-शिला (The Stone of Embers)"
और नीचे का स्थान देखकर कर्नल रणवीर के होश उड़ गए।
वह स्थान था—राजस्थान के जैसलमेर जिले में स्थित 300 साल पुराना शापित और वीरान गांव... 'कुलधरा' (Kuldhara)!
नक्शे के नीचे एक अंतिम चेतावनी दर्ज थी:
"जब उत्तर की अंध-शिला और पूर्व की रक्त-शिला शांत हो जाएंगी, तो उनकी समस्त पाताल-ऊष्मा सीधे पश्चिम के मरुस्थल में स्थित 'अग्नि-शिला' के केंद्र में समा जाएगी। कल की अमावस्या की ठीक मध्यरात्रि (12:00 AM) को कुलधरा के खंडहरों के नीचे की रेत पिघलकर लावा बन जाएगी... और पाताल का महा-अग्नि असुर इस धरती पर अवतरित होगा... यदि उसे 12:00 बजे से पहले शांत नहीं किया गया, तो संपूर्ण भारतवर्ष एक दहकते हुए अंगारे में बदल जाएगा!"
"कुलधरा..." कर्नल रणवीर का गला सूख गया। "वह गांव 1825 से वीरान और शापित है। पालीवाल ब्राह्मणों ने एक ही रात में उस गांव को खाली करते वक्त एक महा-श्राप दिया था... अब समझ में आया कि उन्होंने वह गांव क्यों छोड़ा था! वे उस गांव के नीचे सोई इस अग्नि-शिला की तपिश को पहचान चुके थे!"
"हमारे पास कितना समय है कर्नल?" कबीर ने उस सोने के नक्शे को संभालते हुए पूछा।
कर्नल ने अपनी सामरिक घड़ी देखी।
समय हो रहा था—सुबह के 08:15 AM।
"कल रात 12:00 बजे तक... यानी हमारे पास केवल सोलह घंटे बचे हैं!" कर्नल ने कहा।
तभी, कर्नल रणवीर की बेल्ट पर लगा सिक्योर सैटेलाइट फोन पागलों की तरह बजने लगा। कर्नल ने तुरंत फोन कान से लगाया।
"कर्नल रणवीर स्पीकिंग। रिपोर्ट करो!"
फोन के उस पार से आर्मी के वेस्टर्न कमांड (जोधपुर/जैसलमेर हेडक्वार्टर) के ब्रिगेडियर की बेहद घबराई हुई, कांपती आवाज गूंजी:
"कर्नल रणवीर! तुरंत जैसलमेर की ओर मूव कीजिए! कुलधरा गांव के आसपास की स्थिति पूरी तरह बेकाबू हो चुकी है!"
"क्या हुआ ब्रिगेडियर? स्पष्ट बताओ!"
"सर... कुलधरा के खंडहरों में तापमान अचानक 70 डिग्री सेल्सियस पार कर चुका है! जमीन की रेत अपने आप उबल रही है और उससे नीली आग की लपटें निकल रही हैं! और सबसे खौफनाक बात... कुलधरा के पुराने कुएं और हवेलियों के मलबे से 1940 के दौर के सैकड़ों कंकाल अपने आप जमीन फाड़कर बाहर निकल आए हैं... उन्होंने पूरे इलाके को घेर लिया है! हमारी एक टोही टुकड़ी वहां गई थी... उनमें से कोई वापस नहीं लौटा!"
कर्नल रणवीर ने कबीर की ओर देखा।
कबीर की आंखों में अब कोई संकोच नहीं था। उसकी हथेली की 'पाताल-मुद्रा' अब पश्चिम दिशा की ओर, राजस्थान के तपते थार मरुस्थल की ओर संकेत कर रही थी।
"कर्नल, वायुसेना का सबसे तेज लड़ाकू विमान तैयार कीजिए," कबीर ने अपनी मुट्ठी बांधते हुए कहा। "हम सीधे जैसलमेर उतरेंगे। इस 86 साल पुराने अभिशाप की अंतिम आहुति अब कुलधरा के उस जलते हुए श्मशान में दी जाएगी!"