PretikaHaunted Placesचीखती खामोशियां: देवदार हवेली का अभिशाप

भाग 16: गुवाहाटी का रहस्य, कामाख्या की गुप्त गुफा और रक्त-शिला का जागरण

Piyashi Atma · Haunted Places · 12 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
चीखती खामोशियां: देवदार हवेली का अभिशाप
Chapter
16 of 18
Category
Haunted Places
Reading time
12 min
Words
2304
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

भारतीय वायुसेना का विशेष सी-130जे सुपर हरक्यूलिस परिवहन विमान रात के घने सन्नाटे को चीरता हुआ 30,000 फीट की ऊंचाई पर पूर्व की ओर उड़ रहा था। केबिन के भीतर केवल लाल रंग की मंद सामरिक लाइटें जल रही थीं।

कबीर विमान की खिड़की के पास बैठा था। उसकी दाहिनी हथेली पर बना वह नीला त्रिकोण—'पाताल-मुद्रा'—अब लगातार हल्की-हल्की स्पंदन कर रहा था, मानो वह किसी दूर स्थित विशाल चुंबक की ओर खिंच रहा हो। जैसे-जैसे विमान पूर्व की ओर बढ़ रहा था, कबीर के मस्तिष्क में एक अजीब सी गूंज तेज होती जा रही थी। वह आवाज किसी झरने के गिरने जैसी थी, लेकिन वह पानी का झरना नहीं था; वह लाखों लीटर खौलते हुए खून के बहने की ध्वनि थी।

विमान के कार्गो बे में कर्नल रणवीर शेखावत अपने लैपटॉर और सैटेलाइट नक्शों के सामने बैठे थे। उनके साथ 'प्रभाग-9' के छह विशेष कमांडो बैठे थे, जिनके पास आधुनिक सिग-सॉअर राइफलों के साथ-साथ शुद्ध तांबे की गोलियां और सिद्ध भोजपत्र के कवच थे।

"कबीर, यहाँ देखो," कर्नल रणवीर ने स्क्रीन की ओर इशारा करते हुए गंभीर स्वर में कहा।

कबीर उठकर कर्नल के पास आया। स्क्रीन पर पूर्वोत्तर भारत का सैटेलाइट थर्मल मैप खुला हुआ था। असम के गुवाहाटी शहर और विशेषकर नीलाचल पर्वत के ऊपर एक विशाल, रक्त-लाल रंग का थर्मल सिग्नेचर धधक रहा था।

"यह आज सुबह 4 बजे का थर्मल स्कैन है," कर्नल ने बताया। "जब तुमने दिल्ली में पाताल शिला के उत्तरी केंद्र को नष्ट किया, तो इसका सीधा असर गुवाहाटी के नीलाचल पर्वत पर पड़ा। पौराणिक रूप से कामाख्या देवी की यह भूमि 51 शक्तिपीठों में सर्वोच्च 'योनि-पीठ' (सृष्टि के सृजन और प्राण का केंद्र) मानी जाती है। लेकिन 1939 में अंग्रेजों ने इस पवित्र पर्वत के सबसे निचले, अवचेतन गर्भ में एक अत्यंत प्राचीन और विकृत पाषाण खोज निकाला था—'रक्त-शिला' (The Stone of Blood)।"

"इसकी प्रकृति देवदार हवेली वाली शिला से कितनी अलग है, कर्नल?" कबीर ने पूछा।

"देवदार हवेली की शिला 'मन और आत्मा' का भक्षण करती थी; वह भ्रम और भय पैदा करती थी," कर्नल रणवीर ने एक प्राचीन ब्रिटिश रिपोर्ट का पन्ना दिखाते हुए समझाया। "लेकिन कामाख्या की यह रक्त-शिला सीधे 'प्राण और रक्त' (Biological Life-force) पर वार करती है। यह पृथ्वी के जैविक चक्र को सोखती है। यदि यह पूरी तरह जाग गई, तो यह जीवित मनुष्यों के शरीर से खून और जीवन-शक्ति को हवा के माध्यम से खींच लेगी। कुछ ही घंटों में पूरा पूर्वोत्तर एक विशाल श्मशान बन जाएगा जहाँ केवल सूखे कंकाल मिलेंगे!"

"और 'द ब्लैक ऑर्डर' का इससे क्या लेना-देना है?"

कर्नल के चेहरे पर नफरत की लकीरें खिंच गईं। "ब्लैक ऑर्डर का मौजूदा मुखिया एक जर्मन तांत्रिक-वैज्ञानिक है—डॉ. हेनरिक वोल्फ। उसका दादा हिटलर के अहनेनर्बे संगठन का प्रमुख था। वोल्फ पिछले बीस वर्षों से यूरोप के काले धन और आधुनिक जेनेटिक्स (आनुवंशिकी) के दम पर इन शिलाओं को खोज रहा था। उसका मानना है कि यदि वह रक्त-शिला को अपनी तकनीक से जोड़ ले, तो वह एक ऐसा 'अमर जैविक सिंडिकेट' बना सकता है जो पूरी दुनिया की सरकारों को अपने घुटनों पर ला देगा। और सबसे बुरी बात... वोल्फ और उसके कमांडो पिछले 48 घंटों से नीलाचल की उस गुप्त गुफा पर कब्जा जमाए बैठे हैं!"

सुबह के लगभग 05:30 AM बज रहे थे जब हरक्यूलिस विमान गुवाहाटी के लोकप्रिय गोपीनाथ बोरदोलोई हवाई अड्डे के सैन्य रनवे पर उतरा।

जैसे ही कबीर ने विमान से बाहर कदम रखा, असम की नम, ठंडी हवा उसके चेहरे से टकराई। लेकिन उस हवा में कामरूप-कामाख्या के जंगलों की सामान्य खुशबू नहीं थी; हवा में गाढ़े, सड़े हुए खून और कपूर की ऐसी तीखी गंध भरी थी जिससे कबीर का सिर चकराने लगा।

हवाई अड्डे से बाहर निकलते ही कर्नल रणवीर की दो बख्तरबंद गाड़ियां उन्हें सीधे नीलाचल पर्वत की तलहटी की ओर ले गईं।

रास्ते में जब गाड़ी ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे से गुजरी, तो कबीर ने खिड़की से जो दृश्य देखा, उसने उसके रोंगटे खड़े कर दिए।

विशाल, अथाह ब्रह्मपुत्र नदी का पानी... जो सामान्यतः मटमैला या नीला होता था... इस समय पूरी तरह से गाढ़े लाल रंग में बह रहा था! नदी के किनारों पर लाखों मरी हुई मछलियां और जलीय जीव उतराए हुए थे। नदी की सतह से हल्का लाल धुआं उठ रहा था।

नीलाचल पर्वत के ऊपर आसमान में हजारों गिद्ध और चीलें किसी खूनी पहरेदार की तरह गोल-गोल चक्कर काट रही थीं। मंदिर के मुख्य द्वार की ओर जाने वाली सड़कें सेना द्वारा सील कर दी गई थीं, और स्थानीय निवासियों को घरों के भीतर रहने के निर्देश दिए गए थे।

"हम मुख्य मंदिर के रास्ते नहीं जा सकते," कर्नल रणवीर ने कहा। "गुफा पर्वत के पिछले, वीरान ढलान पर है, जिसे स्थानीय लोग 'भुवनेश्वरी गर्त' (The Chasm of Darkness) कहते हैं। लेकिन वहां कदम रखने से पहले, हमें उस व्यक्ति से मिलना होगा जो इस पर्वत की रक्षा 80 सालों से कर रहा है।"

गाड़ियां पर्वत के पिछले हिस्से में एक घने, प्राचीन बरगद के जंगल के सामने रुकीं।

जंगल के बीचों-बीच एक छोटा सा, पत्थरों का अखाड़ा बना था जहाँ एक विशाल धूनी (पवित्र अग्नि) जल रही थी। धूनी के पास, बाघ की छाल पर एक वृद्ध अघोरी साधु पद्मासन में बैठे थे।

उनकी देह पर केवल भस्म लिपटी थी, जटाएं जमीन तक छू रही थीं और गले में काले रुद्राक्ष और नरमुंडों की मनके लटके थे। उनकी उम्र कम से कम 100 वर्ष प्रतीत हो रही थी, लेकिन उनकी दोनों आंखों में ऐसी प्रचंड, भेदती हुई ज्वाला थी जिसे देखकर कबीर अनायास ही नतमस्तक हो गया।

वे थे—बाबा भैरवानंद।

कबीर के कदम जैसे ही अखाड़े की सीमा में पड़े, बाबा भैरवानंद ने अपनी बंद आंखें एक झटके में खोल दीं। उनकी दृष्टि सीधे कबीर की दाहिनी हथेली पर जाकर ठहर गई।

"आ गया... शून्य का वाहक आ गया!" बाबा भैरवानंद की आवाज किसी प्राचीन शंख के नाद जैसी भारी और गूंजती हुई थी।

बाबा अपने आसन से उठे। वे लड़खड़ाए बिना सीधे कबीर के सामने आकर खड़े हो गए। उन्होंने अपने कांपते, भस्म से सने हाथों से कबीर की दाहिनी हथेली को पकड़ा। जैसे ही बाबा का स्पर्श हुआ, कबीर की हथेली का वह नीला त्रिकोण और बाबा की भस्म के बीच नीली चिंगारियां फूट पड़ीं।

"तुझ पर महाकाल और उस नन्हीं देवी (सुनैना) का आशीर्वाद है, बालक," बाबा ने कबीर के माथे पर भस्म का तिलक लगाते हुए कहा। "तूने उत्तर का मुख तो बंद कर दिया... लेकिन पूर्व का यह मुख अत्यंत भूखा है। 86 वर्ष पूर्व, जब देवदार हवेली में वह कापालिक अघोरानंद रक्त बहा रहा था, तो उसी रात उसके एक शिष्य ने इस गुफा में आकर इस रक्त-शिला को अपनी बलि देकर बांध दिया था।"

"बाबा, इसे कैसे शांत किया जाए?" कबीर ने व्यग्रता से पूछा।

बाबा भैरवानंद ने धूनी से जलता हुआ एक त्रिशूल उठाया।

"यह शिला किसी अस्त्र से नहीं टूटेगी, कबीर," बाबा ने गंभीर स्वर में कहा। "यह रक्त-शिला है... यह केवल रक्त की भाषा समझती है। यदि इस पर किसी असुर या पापी का रक्त चढ़ा, तो यह संपूर्ण पृथ्वी का रक्त पी लेगी। लेकिन यदि इस पर किसी ऐसे व्यक्ति का रक्त समर्पित किया जाए जिसने स्वयं मृत्यु को परास्त करके पाताल के शून्य को छुआ हो... तो यह शिला पाषाण बनकर हमेशा के लिए सो जाएगी! और वह रक्त केवल तेरा है, कबीर!"

"कबीर का रक्त?" कर्नल रणवीर चौंक पड़े। "लेकिन बाबा, कबीर पहले ही दिल्ली में अपने प्राणों की बाजी लगा चुका है!"

"यही इसकी नियति है, कर्नल," बाबा ने शांत स्वर में कहा। "परंतु सावधान... गुफा के भीतर वह विदेशी शैतान (हेनरिक वोल्फ) बैठा है। उसने विज्ञान के यंत्रों से उस शिला को विकृत कर दिया है। वह गुफा अब किसी मरण-जाल से कम नहीं है!"

सुबह के करीब सात बजे।

कबीर, कर्नल रणवीर, चार विशेष कमांडो और बाबा भैरवानंद के दो शिष्य नीलाचल पर्वत के पश्चिमी ढलान पर स्थित उस गुप्त दरार के सामने पहुंचे।

वह दरार दो विशाल काले पत्थरों के बीच एक संकरा, अंधेरा सुराख थी जो सीधे पर्वत के पाताल-गर्भ में उतरती थी। दरार के मुहाने से बाहर आ रही हवा इतनी गर्म और सड़ी हुई थी मानो किसी जलते हुए बूचड़खाने का निकास द्वार खुला हो।

कमांडो ने अपनी नाइट-विजन गॉगल्स और साइलेंसर लगी राइफल्स संभालीं। कबीर ने अपनी हथेली की शक्ति को केंद्रित किया और वे सब एक कतार में उस अंधेरी गुफा के भीतर उतर गए।

गुफा के भीतर का भूगोल अत्यंत भयानक था।

दीवारें प्राकृतिक चूना-पत्थर की थीं, लेकिन उन पर सिंदूर और सूखे खून की ऐसी मोटी परतें चढ़ी थीं जो छूने पर चिपचिपी महसूस हो रही थीं। गुफा के फर्श पर लाल रंग का गर्म पानी घुटनों तक बह रहा था।

जैसे ही वे मुख्य कंदरा के मोड़ पर पहुंचे, सामने का दृश्य देखकर सबके कदम रुक गए।

गुफा का विशाल मध्य हॉल किसी हाई-टेक सैन्य बंकर में तब्दील हो चुका था। दीवारों पर पोर्टेबल जनरेटर, सैटेलाइट केबल और नीली लेजर लाइटें लगी थीं।

और हॉल के चारों तरफ पहरा दे रहे थे—द ब्लैक ऑर्डर के साइबरनेटिक-तांत्रिक कमांडो!

वे सात-आठ फीट लंबे लड़ाके थे, जिनके शरीर पर केवलर के साथ-साथ लोहे के एक्सोस्केलेटन (Exoskeleton) बंधे थे। उनके चेहरों पर धातुई मुखौटे थे और उनकी नसों में आधुनिक स्टेरॉयड और तांत्रिक रसायनों का मिश्रण बह रहा था। उनके हाथों में भारी मशीनगनें और काले पत्थरों से बनी नुकीली तलवारें थीं।

"घुसपैठिए! फायर!" एक भारी, जर्मन लहजे वाली आवाज गूंजी।

तड़-तड़-तड़-तड़-तड़!

अचानक पूरी गुफा गोलियों की तड़तड़ाहट और धमाकों से गूंज उठी।

कर्नल रणवीर और उनके कमांडो ने तुरंत पत्थरों की आड़ ली और अपनी असॉल्ट राइफलों से जवाबी फायरिंग शुरू कर दी। तांबे की विशेष गोलियां जैसे ही उन साइबरनेटिक लड़ाकों के सीने में धंसीं, उनके एक्सोस्केलेटन से चिंगारियां निकलीं और वे चीखते हुए नीचे लाल पानी में गिर पड़े।

लेकिन बाकी हमलावर गोलियों की परवाह किए बिना अपनी तांत्रिक तलवारें लहराते हुए कबीर की ओर लपके।

कबीर ने अपनी दाहिनी हथेली आगे की।

उसकी हथेली की 'पाताल-मुद्रा' से नीली बिजली का एक विशाल चाबुक निकला। कबीर ने उस चाबुक को हवा में लहराया। नीली ऊर्जा की उस तरंग ने सामने आ रहे तीन विशालकाय लड़ाकों के एक्सोस्केलेटन को एक ही झटके में पिघलाकर उनके शरीरों को हवा में उड़ा दिया।

"आगे बढ़ो कबीर! गर्भगृह का दरवाजा सामने है!" कर्नल रणवीर ने एक ग्रेनेड फेंकते हुए चिल्लाकर कहा।

कबीर, कर्नल रणवीर और बाबा के शिष्य गोलियों और आग के बवंडर को चीरते हुए गुफा के सबसे भीतरी, विशाल कक्ष में दाखिल हुए।

और वहां का दृश्य देखकर कबीर का कलेजा मुंह को आ गया।

यह गुफा का मुख्य गर्भगृह था।

कक्ष के ठीक बीचों-बीच, लगभग बीस फीट ऊंची, लाल मखमली क्रिस्टल जैसी एक विशालकाय शिला स्थापित थी—'रक्त-शिला'! वह शिला किसी पारदर्शी कांच के विशाल दिल जैसी दिख रही थी, जिसके भीतर गाढ़ा, खौलता हुआ लाल रक्त तेजी से घूम रहा था। वह शिला नियमित रूप से धड़क रही थी—धप... धप... धप...—और उसकी हर धड़कन के साथ पूरे नीलाचल पर्वत की नींव कांप रही थी।

लेकिन सबसे अमानवीय और क्रूर बात यह थी कि उस शिला के चारों तरफ स्टील के दस बड़े मेडिकल बेड लगे थे।

उन बिस्तरों पर गुवाहाटी के आसपास से अपहृत किए गए दस निर्दोष युवक-युवतियां बंधी हुई थीं। उनकी नसों में मोटी-मोटी पारदर्शी नलियां घुसी थीं, जिनके जरिए उनका ताजा खून लगातार खींचा जा रहा था और प्लास्टिक के पाइपों के जरिए सीधे उस रक्त-शिला के आधार पर चढ़ाया जा रहा था! उन अभागे लोगों के चेहरे पूरी तरह पीले पड़ चुके थे और वे लगभग अचेत अवस्था में थे।

और उस शिला के ठीक सामने खड़ा था वह शैतान।

उसने काले रंग का डिजाइनर सैन्य कोट पहना था, सुनहरे बाल थे और आंखों पर गोल चश्मा लगा था। उसके चेहरे पर एक वैज्ञानिक की ठंडी क्रूरता और एक उन्मादी तांत्रिक का पागलपन साफ झलक रहा था।

वह था—डॉ. हेनरिक वोल्फ!

"अद्भुत... अत्यंत अद्भुत!" हेनरिक वोल्फ ने जर्मन लहजे में ताली बजाते हुए कबीर को देखा।

"सब्जेक्ट-1... कबीर! मुझे विश्वास था कि तुम यहाँ आओगे। देवदार हवेली का वह मूर्ख विक्रम सिंह केवल एक लालची जमींदार था, लेकिन तुम... तुम तो पाताल के शून्य के जीवित अवतार हो!"

"इन निर्दोष लोगों को छोड़ दो, वोल्फ!" कबीर ने अपनी मुट्ठियां भींचते हुए कहा। उसकी आंखों से नीली चिंगारियां निकल रही थीं। "तेरा यह शैतानी खेल आज इसी गुफा में दफन होगा!"

"छोड़ दूँ?" वोल्फ ठहाका मारकर हंसा। "मूर्ख लड़के, ये दस लोग तो केवल इस शिला की भूख को जगाने का क्षुद्र साधन थे। इस रक्त-शिला को अपने पूर्ण महा-रूप में आने के लिए केवल एक अंतिम बूंद चाहिए... उस मनुष्य का रक्त जो पाताल के शून्य से जीवित लौटा हो!"

वोल्फ ने अपनी जेब से एक रिमोट कंट्रोल निकाला और लाल बटन दबा दिया।

कड़कड़ाssssहट!

गुफा के फर्श से स्टील का एक विशाल, पारदर्शी क्रायोजेनिक संदूक ऊपर आया।

उस संदूक के भीतर... किसी ममी की तरह सुरक्षित रखा हुआ 1940 के उस दुष्ट तांत्रिक कापालिक अघोरानंद का सूखा हुआ, बिना सिर वाला धड़ और उसका कटा हुआ सिर रखा था! और उस संदूक के ऊपर सोने के तारों से उकेरा गया एक प्राचीन नक्शा चमक रहा था—थार मरुस्थल की तीसरी 'अग्नि-शिला' का गुप्त प्रवेश द्वार!

"तुम बहुत देर से आए हो, कबीर!" वोल्फ ने अपनी पिस्तौल कबीर की ओर तानते हुए चिल्लाया। "यह रक्त-शिला अब जागेगी... और तुम्हारे ही हाथों जागेगी!"

वोल्फ ने दीवार पर लगे एक विशाल लीवर को नीचे खींच दिया।

भभकssss!

रक्त-शिला की लाल क्रिस्टल देह से खौलते हुए खून की एक विशाल, बीस फीट ऊंची लहर उठी। उस लहर ने किसी सुनामी की तरह कर्नल रणवीर और कमांडो को हवा में उड़ाकर गुफा की पथरीली दीवारों से चिपका दिया।

और उसी क्षण, शिला के केंद्र से काले लोहे की चार विशाल चुंबकीय जंजीरें निकलीं। वे जंजीरें किसी जीवित सांप की तरह हवा में लहराईं और उन्होंने कबीर के दोनों पैरों और उसकी बाईं बांह को इतनी क्रूरता से जकड़ लिया कि कबीर का शरीर जमीन से पांच फीट ऊपर खिंच गया!

कबीर की दाहिनी हथेली—जिस पर वह नीली पाताल-मुद्रा चमक रही थी—उस दहकती हुई, खौलती रक्त-शिला के ठीक केंद्र की ओर खिंचने लगी!

शिला की विशाल लाल सतह पर एक भयानक, खूनी जबड़ा खुल रहा था जो कबीर की उस हथेली को सीधे अपने भीतर निगलने के लिए आतुर था।

वोल्फ अपनी पिस्तौल ताने, उन्माद से हंस रहा था:
"अपनी हथेली इस शिला को सौंप दो, कबीर... और देखो कि कैसे यह पृथ्वी एक ही रात में रक्त का महासागर बनती है!"

कबीर की हथेली उस खौलते हुए लाल जबड़े से केवल छह इंच दूर थी... उसकी त्वचा की नसें खिंचाव से फटने लगी थीं...

समय अब सांसों में नहीं, कबीर के अंतिम फैसले पर टिका था!

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