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भाग 15: रायसीना हिल्स का गुप्त संगठन और 'प्रोजेक्ट देवदार' का असली सच
Piyashi Atma · Haunted Places · 13 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- चीखती खामोशियां: देवदार हवेली का अभिशाप
- Chapter
- 15 of 18
- Category
- Haunted Places
- Reading time
- 13 min
- Words
- 2526
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
जनपथ के महा-विस्फोट के बाद कबीर को किसी सामान्य सरकारी या निजी अस्पताल में नहीं ले जाया गया था। जब उसकी सांसें लौटी थीं, तो गृह मंत्रालय और सेना के शीर्ष अधिकारियों ने तुरंत पूरे इलाके को 'रेड ज़ोन' घोषित कर दिया था। आम जनता और मीडिया के लिए यह खबर दबा दी गई थी कि जनपथ पर अचानक जमीन धंसने और गैस पाइपलाइन फटने से एक बड़ा औद्योगिक हादसा हुआ था।
वास्तविकता से केवल सात लोग वाकिफ थे।
कबीर को एक पूरी तरह बुलेटप्रूफ, खिड़की-रहित सैन्य वाहन में डालकर दिल्ली छावनी (Delhi Cantt) स्थित 'आर्मी रिसर्च एंड रेफरल (R&R) अस्पताल' के सबसे निचले, भूमिगत स्तर—'बंकर 4-बी' में स्थानांतरित कर दिया गया था।
यह बंकर जमीन से साठ फीट नीचे बना एक अभेद्य, सीलबंद बायो-क्वारंटाइन कक्ष था। कमरे की दीवारें तीन फीट मोटी सीसे (Lead) और कंक्रीट से बनी थीं ताकि किसी भी प्रकार का रेडियोधर्मी या अलौकिक विकिरण बाहर न जा सके। कमरे में केवल एक सख्त धातुई पलंग, मॉनिटर्स और भारी स्टील का स्वचालित दरवाजा था।
कबीर पलंग पर बैठा था। उसने अपने शरीर को देखा।
यह किसी भी जैविक विज्ञान के लिए एक असंभव पहेली थी। कबीर के दोनों हाथों की हथेलियां, जो देवदार हवेली की जलती हुई अग्नि-वेदी और तांत्रिक कीलों को पकड़ने से पूरी तरह कोयले जैसी जल चुकी थीं, अब बिना किसी निशान के पूरी तरह स्वस्थ हो चुकी थीं। नई त्वचा सामान्य से कहीं अधिक चिकनी, मजबूत और हल्की पीली चमक लिए हुए थी। उसके शरीर पर दर्जनों फ्रैक्चर और घाव थे, लेकिन इस समय उसके शरीर में दर्द की एक भी लहर नहीं थी।
लेकिन सबसे विस्मयकारी चीज़ उसकी दाहिनी हथेली पर थी।
उसकी हथेली के ठीक केंद्र में, त्वचा के ठीक नीचे, नीले रंग का एक सूक्ष्म, त्रिकोणीय निशान स्थायी रूप से उकेरा गया था—'पाताल-मुद्रा' (The Mark of the Void)। जब कबीर अपनी सांसों को धीमा करता, तो वह त्रिकोण बहुत धीमी, शीतल नीली रोशनी से चमकने लगता था।
और उससे भी ज्यादा हैरान करने वाला था कबीर के भीतर आया मानसिक परिवर्तन।
उसकी पांचों इंद्रियां अब किसी आम इंसान की तरह काम नहीं कर रही थीं। बंकर की साठ फीट मोटी कंक्रीट की दीवारों के पार भी, वह ऊपर धौला कुआं की सड़क पर दौड़ती गाड़ियों के इंजनों की घुरघुराहट सुन सकता था। वह कमरे के कोने में लगे क्लोज्ड-सर्किट कैमरे के तारों के भीतर दौड़ते विद्युत प्रवाह (Electrons) की झनझनाहट को अपनी त्वचा पर महसूस कर सकता था।
और जब वह अपनी आंखें बंद करता, तो उसे अपने अवचेतन मन में एक शांत, असीम पुस्तकालय दिखाई देता था—जहाँ डॉ. अनिकेत का चेहरा मुस्कुराता हुआ उपस्थित था। अनिकेत के जीवन भर का तांत्रिक ज्ञान, संस्कृत के गुप्त श्लोक और 1939 के वे सारे गुप्त दस्तावेज अब कबीर की अपनी स्मृति का हिस्सा बन चुके थे!
"मैं... मैं क्या बन चुका हूँ?" कबीर ने अपनी हथेली को देखते हुए खुद से पूछा।
क्लिक... फुssssश!
कमरे का भारी स्टील का दरवाजा हाइड्रोलिक दबाव के साथ धीरे-धीरे खुला। कमरे की फ्लोरोसेंट ट्यूबलाइट्स अचानक हल्की सी झिलमिलाईं।
दरवाजे से एक लंबा, सुगठित देह वाला व्यक्ति अंदर प्रविष्ट हुआ। उसकी उम्र पचास के आसपास थी। उसने बिना किसी बैज वाला गहरा काला सैन्य सूट पहना था। उसके बाल छोटे कटे थे और चेहरे पर बाईं आंख से लेकर जबड़े तक एक पुराना, गहरा कट का निशान था जो किसी प्राचीन खंजर या छर्रे का लग रहा था। उसकी चाल में सैन्य अनुशासन की अदम्य सख्ती और आंखों में एक गहरी, भेदती हुई बौद्धिक चमक थी।
वही व्यक्ति... जो जनपथ पर रायसीना हिल्स के मुहाने पर खड़ी उस काली सेडान कार के पास दूरबीन लिए खड़ा था!
उसके पीछे दो कमांडो आधुनिक असॉल्ट राइफलों के साथ दरवाजे पर ही सतर्क खड़े हो गए। उस व्यक्ति के हाथ में वही पुराना, 1939 का ब्रिटिश शाही मुहर लगा काला चमड़े का ब्रीफकेस था।
उस व्यक्ति ने कबीर के सामने रखी स्टील की कुर्सी खींची और बैठ गया। उसने कुछ पलों तक बिना पलक झपकाए कबीर की आंखों में देखा।
"अपने होश में लौटने की बधाई, कबीर साहब," उसकी आवाज गहरी, शांत और प्रभावशाली थी। "साधारणतया जो लोग उस पाताल के दरवाजे के पार जाते हैं, वे या तो राख बनकर लौटते हैं या फिर अपनी आत्मा खोकर एक जिंदा लाश बन जाते हैं। लेकिन तुम... तुम न केवल वापस आए, बल्कि उस दरवाजे की चाबी अपने साथ अपनी हथेली में बांधकर लाए हो।"
"आप कौन हैं?" कबीर ने सीधे उस व्यक्ति की आंखों में देखते हुए पूछा। उसकी आवाज में कोई घबराहट नहीं थी। "और मुझे इस बंकर में कैदियों की तरह क्यों रखा गया है?"
उस व्यक्ति ने एक हल्की सी सर्द मुस्कान बिखेरी। उसने अपनी जेब से एक विशेष पहचान पत्र निकाला और मेज पर रख दिया।
कार्ड पर भारत के राष्ट्रीय प्रतीक के साथ लाल अक्षरों में लिखा था:
कर्नल रणवीर शेखावत — निदेशक, प्रभाग-9 (Division-9: Special Anomalous Research & Defence)
"मुझे कर्नल रणवीर कह सकते हो," उसने कहा। "और तुम्हें यहाँ कैदी बनाकर नहीं, बल्कि इस देश की सबसे मूल्यवान और सबसे खतरनाक धरोहर की तरह सुरक्षित रखा गया है। बाहर की दुनिया तुम्हें एक बहादुर पत्रकार मान रही है जो एक गैस हादसे में चमत्कारिक रूप से बच गया। लेकिन इस कमरे के भीतर... हम दोनों जानते हैं कि तुमने कल रात क्या संहार किया है।"
कर्नल रणवीर ने वह काला चमड़े का ब्रीफकेस मेज पर रखा। उसने ब्रीफकेस के ताले पर एक जटिल छह अंकों का कोड डाला।
खट!
ब्रीफकेस खुला। अंदर लाल मखमली कपड़े पर पीले पड़ चुके कुछ बेहद गोपनीय औपनिवेशिक दस्तावेज, श्वेत-श्याम पुरानी तस्वीरें और एक तांबे का प्राचीन कंपास रखा था, जिसकी सुई पागलों की तरह कबीर की हथेली की ओर घूम रही थी।
कर्नल ने एक मोटी फाइल बाहर निकाली, जिस पर लाल अक्षरों में छपा था:
"SECRET / BRITISH CROWN ARCHIVES — 1939: PROJECT DEODAR"
"कबीर, जो तुमने देवदार हवेली में देखा, और जो तुमने कल जनपथ के तलघर में लड़ा... वह केवल एक अधूरी कहानी का एक छोटा सा पन्ना था," कर्नल रणवीर ने फाइल के पन्ने पलटते हुए कहा। "तुम्हारे मित्र डॉ. अनिकेत एक महान इतिहासकार थे, लेकिन वे भी उस पूरे षड्यंत्र को नहीं समझ पाए थे जो 1939 में इस देश की छाती पर रचा गया था।"
"कैसा षड्यंत्र?" कबीर की भौंहें तन गईं।
कर्नल ने मेज पर एक पुरानी, 1939 की श्वेत-श्याम तस्वीर रखी।
तस्वीर में ब्रिटिश भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो, कुछ ब्रिटिश सैन्य अधिकारी, और उनके बीच खड़े... नाजी जर्मनी के कुख्यात गुप्त तांत्रिक संगठन 'अहनेनर्बे' (Ahnenerbe) के तीन जर्मन अधिकारी दिखाई दे रहे थे! उनके पीछे देवदार हवेली की वही जानी-पहचानी रूपरेखा खड़ी थी।
"द्वितीय विश्व युद्ध से ठीक पहले, हिटलर और उसकी नाजी तांत्रिक कोर यह मानती थी कि इस पृथ्वी पर तीन ऐसे प्राचीन 'ऊर्जा-बिंदु' हैं जहाँ पाताल लोक की आदिम शक्तियां सीधे पृथ्वी के गर्भ से जुड़ी हैं," कर्नल रणवीर ने बताना शुरू किया। "वे इन्हें 'त्रिनेत्र पाताल' (The Three Eyes of the Abyss) कहते थे। ब्रिटिश हुकूमत और नाजियों ने गुप्त रूप से हाथ मिलाकर भारत के तीन कोनों में इन शिलाओं को खोज निकाला था।"
कर्नल ने भारत के नक्शे पर अपनी उंगली से तीन बिंदु बनाए:
उत्तरी केंद्र (The Eye of the North): "नील घाटी, हिमाचल की देवदार हवेली। यह 'मन और आत्मा' का केंद्र था, जहाँ पाताल शिला का ऊपरी हिस्सा स्थापित था। इसे तुमने और अनिकेत ने कल रात अपने प्राणों की बाजी लगाकर भस्म कर दिया।"
पूर्वी केंद्र (The Eye of the East): "असम की गुवाहाटी में नीलाचल पर्वत की तलहटी और जयंतिया हिल्स की एक प्राचीन गुप्त गुफा—'रक्त-शिला' (The Stone of Blood)। यह 'प्राण और रक्त' का केंद्र है, जो सीधे तंत्र-पीठ कामाख्या की भूमिगत ऊर्जा रेखाओं से जुड़ी है।"
पश्चिमी केंद्र (The Eye of the West): "राजस्थान के थार मरुस्थल के भीतर, जैसलमेर के पास कुलधरा के वीरान खंडहरों के नीचे दबा 'अग्नि-कुंड शिला' (The Stone of Embers)। यह 'विनाश और भौतिक संहार' का केंद्र है।"
कबीर की सांसें तेज हो गईं। "इसका मतलब... देवदार हवेली केवल एक हिस्सा थी?"
"हाँ!" कर्नल रणवीर की आवाज भारी हो गई। "1940 में जब ठाकुर विक्रम सिंह के लालच और अघोरानंद के पागलपन से देवदार हवेली में नरसंहार हुआ, तो ब्रिटिश सरकार डर गई। उन्होंने आनन-फानन में तांत्रिक कीलों से उस हवेली को बांध दिया और उसके मुख्य आधार—'महा-अंध शिला' को काटकर दिल्ली के उस भूमिगत तलघर में छिपा दिया। उन्हें लगा कि उन्होंने शैतान को दबा दिया है। लेकिन वे यह नहीं जानते थे कि ये तीनों शिलाएं आपस में क्वांटम स्तर पर जुड़ी हुई हैं!"
कर्नल रणवीर ने सीधे कबीर की हथेली पर बने उस नीले त्रिकोण की ओर इशारा किया।
"जब कल रात तुमने अपने आत्म-बलिदान से उस महा-अंध शिला को नष्ट किया, तो उत्तरी केंद्र का संतुलन हमेशा के लिए टूट गया। ब्रह्मांडीय संतुलन का नियम है कबीर—जब एक सिरा कटता है, तो बाकी दोनों सिरे अपनी शक्ति को दोगुना कर लेते हैं ताकि उस खालीपन को भर सकें। इस समय, जैसे हम यहाँ बात कर रहे हैं... असम के नीलाचल पर्वत के नीचे दबी वह 'रक्त-शिला' अपने 86 साल के प्रसुप्त काल (Hibernation) से जाग चुकी है!"
"और इसका मुझसे क्या संबंध है?" कबीर ने पूछा।
"तुम्हारा संबंध ही सब कुछ है कबीर!" कर्नल ने जोर देकर कहा। "तुम साधारण इंसान नहीं रहे। पाताल के उस शून्य में जाकर जीवित लौटने वाले तुम इस धरती के एकमात्र प्राणी हो। तुम्हारी हथेली की यह 'पाताल-मुद्रा' कोई घाव नहीं है; यह उस आदिम शून्य की 'लिविंग सील' (जीवित ताला) है। केवल तुम्हारा रक्त और तुम्हारी यह मुद्रा ही बाकी दोनों शिलाओं को बिना किसी महा-विस्फोट के स्थाई रूप से शांत कर सकती है। यदि तुम नहीं गए... तो असम और राजस्थान की धरती फट जाएगी और जो प्रलय कल दिल्ली में टला था, वह पूरे देश को लील जाएगा!"
कबीर कुछ बोलने ही वाला था कि अचानक...
भक! भक! खट!
बंकर की सभी फ्लोरोसेंट ट्यूबलाइट्स एक साथ बुझ गईं।
पूरा कमरा घोर, स्याह अंधकार में डूब गया। केवल कबीर की दाहिनी हथेली पर बना वह नीला त्रिकोण अंधेरे में एक चमकदार मशाल की तरह जल उठा।
वूऊऊऊ... वूऊऊऊ... वूऊऊऊ!
बंकर के बाहर गलियारे में आपातकालीन लाल सायरन पागलों की तरह बजने लगा। लेकिन सायरन की आवाज के साथ-साथ गोलियों की तड़तड़ाहट, ग्रेनेड के धमाके और सैनिकों की दर्दनाक चीखें भी गूंजने लगीं।
तड़-तड़-तड़-तड़! बूम!
कर्नल रणवीर एक ही झटके में अपनी कुर्सी से उछले। उन्होंने अपनी कमर से आधुनिक ग्लॉक पिस्तौल निकाली और दरवाजे पर तैनात कमांडो की ओर लपके।
"कंट्रोल रूम! रिपोर्ट करो! यह कौन सा हमला है?" कर्नल ने अपने कॉलर पर लगे वायरलेस सेट पर चिल्लाकर पूछा।
वायरलेस के स्पीकर से भारी घरघराहट और गोलियों की आवाजों के बीच एक सैनिक की हांफती हुई, खौफजदा आवाज आई:
"सर... वे सामान्य घुसपैठिए नहीं हैं! वे... वे काले लबादे पहने हुए हैं... हमारी गोलियों का उन पर कोई असर नहीं हो रहा है! वे 'द ब्लैक ऑर्डर' (The Black Order) के लड़ाके हैं... वे बंकर 4-बी की तरफ बढ़ रहे हैं... वे उस लड़के को लेने आए हैं... आssssह!"
एक भयानक चीख के साथ वायरलेस पर संपर्क टूट गया।
"ब्लैक ऑर्डर..." कर्नल रणवीर के जबड़े भिंच गए। "वे नाजी तांत्रिक संगठन के आधुनिक वारिस हैं। वे दशकों से इन शिलाओं को खोज रहे हैं। उन्हें पता चल चुका है कि देवदार हवेली की ऊर्जा तुम्हारे शरीर में समा चुकी है!"
धड़ाम!
कमरे का तीन इंच मोटा स्टील का भारी दरवाजा किसी खिलौने की तरह अंदर की ओर मुड़कर उखड़ गया।
धुएं और धूल के गुबार के बीच दरवाजे की चौखट पर तीन साए प्रकट हुए।
वे तीनों सात फीट लंबे, काले अभेद्य केवलर और प्राचीन लबादे पहने हुए थे। उनके चेहरों पर प्राचीन तिब्बती नरमुंडों जैसे धातुई मुखौटे लगे थे। उनके हाथों में आधुनिक असॉल्ट राइफलों के साथ-साथ काले पत्थरों से बनी अजीबोगरीब तांत्रिक तलवारें थीं, जिनकी धार से नीली, विषैली आग निकल रही थी।
उनकी आंखें उन मुखौटों के पीछे से लाल अंगारों जैसी चमक रही थीं।
"कर्नल रणवीर... हट जाओ," बीच में खड़े उस विशाल नकाबपोश ने एक भारी, यांत्रिक और गूंजती आवाज में कहा। "सब्जेक्ट-1 (कबीर) हमारा है। उसकी देह का रक्त हमारे स्वामी की कामाख्या वाली रक्त-शिला को पूर्ण करेगा!"
दरवाजे पर खड़े दोनों भारतीय कमांडो ने अपनी राइफलों से गोलियों की बौछार कर दी—तड़-तड़-तड़!
लेकिन गोलियां उन नकाबपोशों के शरीरों से टकराकर चिंगारियां छोड़ती हुई नीचे गिर गईं, मानो वे किसी लोहे की चट्टान पर लगी हों। एक नकाबपोश ने अपनी तांत्रिक तलवार हवा में लहराई। एक नीली आग की तरंग निकली जिसने दोनों कमांडो को एक ही सेकंड में हवा में काटकर दीवार से चिपका दिया।
कर्नल रणवीर ने अपनी पिस्तौल से सीधे उस नकाबपोश के मुखौटे की आंख पर तीन गोलियां दागीं। हमलावर केवल एक कदम पीछे हटा, लेकिन उसे कोई नुकसान नहीं हुआ। उसने अपनी तलवार कर्नल रणवीर की गर्दन की ओर तान दी।
"रणवीर, पीछे हटो!"
अचानक, कबीर के कंठ से निकली एक ऐसी आवाज गूंजी जिसने उस पूरे बंकर के पत्थरों को थरथरा दिया।
कबीर पलंग से नीचे उतरा। उसकी दोनों आंखें अब सामान्य नहीं थीं; उनमें वही स्वर्णिम और नीली दिव्य ज्वाला नाच रही थी जो कल जनपथ पर जली थी। अनिकेत की स्मृति ने कबीर के मस्तिष्क में तुरंत उस तांत्रिक वार की काट उजागर कर दी थी।
कबीर ने अपनी दाहिनी हथेली को आगे बढ़ाया।
उसकी हथेली पर बनी वह 'पाताल-मुद्रा' किसी सूर्य की तरह चमक उठी। कबीर ने अपनी उंगलियों को मोड़कर हवा में 'काल-भैरव वज्र-मुद्रा' बनाई और पूरी ताकत से आगे की ओर एक अदृश्य प्रहार कर दिया!
कड़ाssssक!
कबीर की हथेली से नीली बिजली का एक ऐसा प्रचंड महा-विस्फोट निकला जिसने कमरे के तीनों सात फीट लंबे नकाबपोशों को हवा में उड़ा दिया। उनकी तांत्रिक तलवारें कांच की तरह चकनाचूर हो गईं और उनके भारी, अभेद्य शरीर बंकर के बाहर गलियारे की कंक्रीट की दीवार को तोड़ते हुए बीस फीट दूर जा गिरे। उनके मुखौटे फट गए और उनके मुंह से काला, बदबूदार खून बहने लगा।
कर्नल रणवीर ने अविश्वास से कबीर की ओर देखा। कबीर की सांसें शांत थीं, लेकिन उसकी आंखों में एक ऐसा अदम्य, प्राचीन तेज था जिसे देखकर सेना का वह वरिष्ठ अधिकारी भी नतमस्तक होने को विवश हो गया।
"हमारे पास अब दिल्ली में रुकने का एक सेकंड भी नहीं है, कर्नल," कबीर ने अपनी मुट्ठी बांधते हुए कहा। उसकी आवाज में अब एक सेनापति जैसा दृढ़ संकल्प था। "वे असम की रक्त-शिला को जगाने की कोशिश कर रहे हैं। अगर वह शिला जाग गई, तो कामाख्या की धरती से खून का महासागर बह निकलेगा। हमें अभी इसी वक्त असम के लिए निकलना होगा!"
कर्नल रणवीर ने अपनी पिस्तौल संभाली और सिर हिलाया। "बेस की छत पर हमारा स्पेशल ऑपरेशंस का एमआई-17 हेलीकॉप्टर तैयार है। हम सीधे पालम एयरबेस जाएंगे और वहां से सुखोई और स्पेशल ट्रांसपोर्ट विमान से गुवाहाटी!"
दोनों तेजी से सीढ़ियों की ओर दौड़े।
पंद्रह मिनट बाद।
रात के करीब दो बजे का समय था। आर्मी बेस की छत से भारतीय वायुसेना का वह भारी, काला सैन्य हेलीकॉप्टर पूरी गर्जना के साथ दिल्ली के आसमान में ऊपर उठ रहा था।
नीचे दिल्ली की बत्तियां किसी शांत समंदर की तरह टिमटिमा रही थीं, जहाँ कल के महा-विनाश के निशान अभी भी मलबे और धुएं के रूप में दिखाई दे रहे थे।
कबीर हेलीकॉप्टर की खुली खिड़की के पास बैठा था। ठंडी, तेज हवा उसके बालों को उड़ा रही थी। उसने अपनी दाहिनी हथेली को देखा, जो लगातार पूर्व दिशा की ओर संकेत कर रही थी।
कबीर ने अपनी नजरें पूर्व के क्षितिज पर, असम और हिमालय की पहाड़ियों की ओर उठाईं।
दूर, सैकड़ों किलोमीटर दूर, घने काले बादलों के पीछे... कामाख्या और नीलाचल की पहाड़ियों के ऊपर आसमान में एक विशाल, खूनी-लाल रंग का त्रिशूल बादलों के बीच धधकता हुआ साफ दिखाई दे रहा था!
हवा में एक जानी-पहचानी, रोंगटे खड़े कर देने वाली फुसफुसाहट कबीर के कानों में गूंजी:
"कबीर... आओ... कामाख्या की रक्त-वेदी तुम्हारा ही लहू मांग रही है..."
कबीर के जबड़े भिंच गए।
देवदार हवेली का साया अब खत्म हो चुका था... लेकिन 'रक्त-शिला' का महा-संग्राम अब शुरू होने वाला था!