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भाग 14: महा-विस्फोट के बाद का सन्नाटा और कबीर की आत्मा का पाताल-भ्रमण
Piyashi Atma · Haunted Places · 12 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- चीखती खामोशियां: देवदार हवेली का अभिशाप
- Chapter
- 14 of 18
- Category
- Haunted Places
- Reading time
- 12 min
- Words
- 2276
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
वह महा-विस्फोट किसी सामान्य बम या बारूद का धमाका नहीं था; वह दो विपरीत ब्रह्मांडीय शक्तियों का ऐसा आध्यात्मिक टकराव था जिसने कुछ पलों के लिए भौतिक संसार के सारे नियमों को शून्य में विलीन कर दिया था।
जनपथ, राजपथ और संसद मार्ग के उस विशाल चौराहे पर फैली वह अंधा कर देने वाली श्वेत और नीली रोशनी धीरे-धीरे शांत होने लगी। रोशनी के उस प्रचंड भंवर के पीछे-पीछे जो सन्नाटा उतरा, वह इतना भारी और गहरा था कि हवा के बहने की सरसराहट भी किसी मंदिर के घंटे जैसी गूंजती हुई प्रतीत हो रही थी।
आसमान में मंडरा रहा वह खूनी, डरावना बवंडर अब बिखर चुका था।
काले, जहरीले बादलों की परतें फट रही थीं और उनके बीच से दोपहर की असली, सुनहरी धूप की किरणें दिल्ली की सड़कों पर उतरने लगी थीं। वह मटमैली गंधक की राख, जो आसमान से बर्फ की तरह गिर रही थी, अब हवा में ही भाप बनकर उड़ चुकी थी। आसमान में चीखते हुए प्रेतों के जो झुंड उड़ रहे थे, वे पाताल के द्वार के बंद होते ही उस अलौकिक खिंचाव में खिंचकर हमेशा के लिए शून्य में समा चुके थे।
जनपथ की मुख्य सड़क पर, जहाँ कुछ क्षण पहले अठारह फीट ऊंचा वह नरभक्षी 'महाकाल असुर' खड़ा था, अब केवल सफेद और काली राख का एक विशाल, दस फीट ऊंचा ढेर लगा हुआ था। वह अभेद्य, पाषाण-रूपी दैत्य उस दिव्य त्रिशूल और कबीर के आत्म-बलिदान की अग्नि में जलकर भस्म हो चुका था।
और उस राख के ढेर के ठीक किनारे... मलबे और टूटे हुए डामर के ऊपर दो देहें शांत पड़ी थीं।
एक देह डॉ. अनिकेत की थी। उसका शरीर अब अपने सामान्य इंसानी आकार में लौट चुका था। उसकी त्वचा से वह स्लेटी कालिख, सींग और पंख पूरी तरह गायब हो चुके थे। उसके चेहरे पर वही चिर-परिचित, शांत और विद्वतापूर्ण सौम्यता लौट आई थी जो कबीर के बचपन के दोस्त की पहचान थी। लेकिन उसकी छाती स्थिर थी; सांसों की कोई हलचल नहीं थी।
और उसके ठीक बगल में... कबीर का शरीर पड़ा था।
कबीर के दोनों हाथ उस तांबे के त्रिशूल के हत्थे पर जमे हुए थे, जो राख के ढेर में गड़ा था। कबीर की आंखें आधी खुली थीं, लेकिन उसकी पुतलियां पूरी तरह स्थिर थीं। उसके शरीर में न तो नाड़ी की कोई धड़कन बची थी और न ही फेफड़ों में हवा का कोई आवागमन था। मेडिकल साइंस के हर पैमाने पर कबीर अब एक मृत देह था।
सड़कों के मुहाने से पुलिस के सायरन, सेना के बख्तरबंद वाहनों की गड़गड़ाहट और राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF) के जवानों के कदमों की तेज आवाजें आने लगी थीं। जवान अपनी ऑटोमैटिक राइफलों को ताने, गैस मास्क पहने, अत्यंत सतर्कता से उस राख के ढेर की ओर बढ़ रहे थे।
लेकिन जो कोई भी उस भौतिक सड़क पर देख रहा था, उसे यह नहीं पता था कि असली कबीर अब उस हाड़-मांस के शरीर में था ही नहीं।
कबीर की चेतना इस समय किसी अज्ञात, असीम और भारहीन आयाम में तैर रही थी।
जब कबीर ने उस महा-अंध शिला के भीतर अपनी आत्मा का प्रक्षेपण किया था, तो उसकी जीवात्मा अपने नश्वर शरीर के बंधनों को तोड़कर सीधे पाताल शिला के आंतरिक लोक—'अंध-आयाम' (The Abyssal Void) में प्रविष्ट हो चुकी थी।
यह एक ऐसा लोक था जहाँ न तो कोई धरती थी, न कोई आसमान, और न ही समय का कोई अस्तित्व था।
चारों तरफ केवल गहरा, स्याह-काला शून्य था, जिसके बीच-बीच में पिघलते हुए काले पत्थरों के विशालकाय खंड हवा में स्थिर तैर रहे थे। दूर क्षितिज पर जमे हुए काले खून की विशाल नदियां बह रही थीं जो किसी भी किनारे से नहीं टकराती थीं। यहाँ न ठंड थी, न गर्मी; केवल एक अगाध, अनंत सन्नाटा था जो आत्मा के अस्तित्व को ही निगल जाने पर आमादा था।
कबीर ने अपने अस्तित्व को देखा।
वह अब किसी हाड़-मांस के शरीर में नहीं था; वह शुद्ध, चमकदार नीली और सुनहरी रोशनी से बनी एक पारदर्शी ऊर्जा-काया था। उसके हाथों में अब भी वह सिद्ध तांबे का त्रिशूल एक दिव्य ज्योति की तरह प्रज्वलित था।
"तो... क्या मैं मर चुका हूँ?" कबीर ने अपने भीतर सोचा।
"मृत्यु केवल एक द्वार है, कबीर... और तुम उस द्वार को लांघकर मेरे घर में आ चुके हो!"
अचानक, उस अनंत शून्य के अंधकार से एक ऐसी आवाज गूंजी जिसने उस पूरे आयाम के तैरते हुए पत्थरों को थरथरा दिया। वह आवाज किसी एक कंठ से नहीं निकली थी; ऐसा लग रहा था मानो वह पूरा अंधकार ही एक विशाल जबड़ा बनकर बोल रहा हो।
शून्य के भीतर से काले धुएं का एक ऐसा विशाल बवंडर उठा जिसका कोई अंत नहीं दिखाई दे रहा था। उस बवंडर के भीतर हजारों लाल, सुलगती हुई आंखें खुल गईं।
वह था 'आदि-असुर'—पाताल की वह मूल, अनादि शक्ति जिसका केवल एक छोटा सा अंश पाताल शिला के रूप में 86 साल पहले धरती पर आया था!
"तुमने मेरे भौतिक माध्यम को जला दिया, मानव!" उस आदिम अंधकार ने भयानक गर्जना की। "तुमने उस शिला को तोड़ दिया, तुमने उस तांत्रिक के शरीर को भस्म कर दिया... लेकिन इस अनंत शून्य में तुम क्या करोगे? यहाँ कोई सूर्य नहीं है, कोई महाकाल का मंदिर नहीं है, कोई प्रार्थना नहीं है! यहाँ तुम केवल मेरी भूख बनोगे। तुम्हारी इस पवित्र आत्मा को मैं करोड़ों वर्षों तक अपने भीतर चबाऊंगा... और जब तुम्हारा दर्द अपनी चरम सीमा पर पहुंचेगा, तो मैं उस दर्द से एक नई, और अधिक भयानक शिला का निर्माण करूंगा जो तुम्हारी पूरी पृथ्वी को लील जाएगी!"
उस अंधकार से काले, चिपचिपे जहरीले नागों जैसे हजारों हाथ बाहर निकले और वे कबीर की उस नीली ज्योति-काया को चारों तरफ से घेरने लगे।
कबीर ने अपने हाथ में मौजूद उस स्वर्णिम त्रिशूल को आगे किया। त्रिशूल से निकलती रोशनी उन काले हाथों को दूर रख रही थी, लेकिन कबीर महसूस कर सकता था कि उस असीम अंधकार के आगे उसकी व्यक्तिगत आत्मा की शक्ति धीरे-धीरे क्षीण हो रही थी।
"मैं अकेला नहीं हूँ..." कबीर ने शांत, अविचल स्वर में कहा। उसकी आवाज में मृत्यु का कोई भय नहीं था। "जहाँ त्याग होता है, वहां संपूर्ण ब्रह्मांड की पवित्र शक्तियां उपस्थित होती हैं। तुमने केवल इंसानी लालच और खौफ को देखा है, अंधकार... तुमने कभी प्रेम और समर्पण की शक्ति को नहीं समझा!"
कबीर ने अपनी दोनों बाहें फैलाईं। उसने अपनी आत्मा के सबसे पवित्र बिंदु से उस 'महाकाल भैरव संहिता' के अंतिम मंत्र का मानसिक उद्घोष किया:
"ॐ ह्रीं क्लीं भैरवाय... आत्म-समर्पणं पाताल-शमनं कुरु कुरु स्वाहा!"
जैसे ही कबीर का यह आह्वान गूंजा, उस काले शून्य में एक चमत्कार घटित हुआ।
कबीर के ठीक पीछे, अंधकार को चीरती हुई सफेद दूधिया रोशनी की एक छोटी सी किरण फूटी। वह किरण तेजी से चौड़ी हुई और एक विशाल, स्वर्णिम द्वार में बदल गई।
उस द्वार से नन्हीं राजकुमारी सुनैना की आत्मा बाहर निकली। उसके चेहरे पर वही मासूम, दिव्य मुस्कान थी।
सुनैना के पीछे रानी राजेश्वरी, ठाकुर विक्रम सिंह का शुद्ध हो चुका साया, और 1939 से लेकर अब तक उस हवेली में मारे गए उन 40 नौकरों तथा दर्जनों राहगीरों की आत्माएं प्रकाश की सेना बनकर उस शून्य में उतर आईं।
और सबसे अंत में... उस प्रकाश-द्वार से एक और आत्मा बाहर आई।
वह चश्मा पहने, शांत और मुस्कुराता हुआ डॉ. अनिकेत था!
"अनिकेत!" कबीर की आत्मा आनंद और विस्मय से भर गई।
"कबीर... तुमने सोचा था कि तुम अकेले ही इस नर्क से लड़ोगे?" अनिकेत ने कबीर के कंधे पर अपना पारदर्शी, प्रकाशमान हाथ रखा। "मैंने अपने जीवन के बीस वर्ष उन प्राचीन ग्रंथों को पढ़ने में बिताए हैं... मैं जानता था कि जब भौतिक अस्त्र काम करना बंद कर देते हैं, तो आत्माओं का संयुक्त संकल्प ही पाताल का संहार कर सकता है।"
अनिकेत ने कबीर के त्रिशूल के हत्थे पर अपना हाथ रख दिया।
सुनैना ने अपनी नन्हीं हथेली उस पर रख दी। रानी राजेश्वरी और उन सैकड़ों मुक्त आत्माओं ने एक-दूसरे के हाथ पकड़कर कबीर और अनिकेत के चारों ओर प्रकाश का एक विशाल, अखंड महा-मंडल बना लिया।
"नहीं! यह असंभव है! आत्माएं मेरे राज्य में प्रकाश नहीं ला सकतीं!" वह आदिम अंधकार खौफ से चीख उठा। उसकी हजारों लाल आंखें उस दिव्य ज्योति के तेज से अंधी होने लगी थीं।
"यह तुम्हारा राज्य नहीं है, दैत्य," कबीर ने कहा। उसकी आवाज अब उन सैकड़ों आत्माओं के संयुक्त स्वर के साथ मिलकर एक महा-नाद बन चुकी थी। "यह वह स्थान है जहाँ तुम्हारी बुराई का अंतिम विसर्जन होगा!"
कबीर, अनिकेत और उन सभी आत्माओं ने अपनी संपूर्ण चेतना को उस त्रिशूल के भालों में केंद्रित कर दिया।
त्रिशूल से सूर्य के समान एक करोड़ सूर्यों की सम्मिलित ऊर्जा का महा-विस्फोट हुआ। वह स्वर्णिम ऊर्जा उस शून्य के कोने-कोने में फैल गई। काले तैरते हुए पत्थर पिघलकर प्रकाश में बदलने लगे, काले खून की नदियां सूखकर अमृत की धाराओं में तब्दील हो गईं, और वह आदि-असुर उस असहनीय पवित्र तेज में जलकर तड़पने लगा।
आssssह!
उसकी अंतिम, गगनभेदी चीख के साथ वह आदिम अंधकार हमेशा-हमेशा के लिए विखंडित होकर ब्रह्मांड की मूल शांति में विलीन हो गया।
पाताल का वह शापित आयाम अब एक अत्यंत शांत, सुंदर और स्वर्णिम लोक बन चुका था जहाँ केवल परमानंद की सुगंध तैर रही थी।
मुक्ति का क्षण आ चुका था।
रानी राजेश्वरी ने अपने पति ठाकुर विक्रम सिंह का हाथ थामा। सुनैना ने अपनी मां की उंगली पकड़ी। उन सभी आत्माओं के चेहरे पर असीम कृतज्ञता थी।
"धन्यवाद, कबीर... धन्यवाद, अनिकेत..." सुनैना ने कबीर के गाल पर अपनी अंतिम, शीतल रश्मि का स्पर्श दिया। "अब हम अपने परम धाम जा रहे हैं... जहाँ कोई अंधकार नहीं, कोई दर्द नहीं है।"
वे सभी आत्माएं प्रकाश की सुंदर, चमकती हुई लकीरें बनकर ऊपर के दिव्य लोकों की ओर उड़ गईं।
अब उस स्वर्णिम मैदान में केवल दो लोग बचे थे—कबीर और अनिकेत।
कबीर ने अनिकेत की ओर देखा। "अनिकेत... चलो, अब हमें भी चलना चाहिए।"
लेकिन अनिकेत अपनी जगह पर खड़ा रहा। उसने मुस्कुराते हुए अपना सिर हिलाया।
"नहीं कबीर... मेरी यात्रा यहीं तक थी," अनिकेत की आवाज में एक गहरा, शांत ठहराव था। "मेरे भौतिक शरीर ने उस पाताल शिला के जहर को इतनी गहराई तक पी लिया था कि यदि मेरी आत्मा उस शरीर में वापस लौटी, तो वह शरीर केवल कुछ पलों में तड़पकर दम तोड़ देगा। मेरा कर्म पूरा हो चुका है कबीर... मुझे इन मुक्त आत्माओं के साथ ही उस पार जाना होगा।"
"नहीं अनिकेत! मैं तुम्हें छोड़कर वापस नहीं जाऊंगा!" कबीर की आत्मा तड़प उठी। "हमने एक साथ इस सफर को शुरू किया था... तुम मेरे भाई हो अनिकेत!"
"और तुम मेरे भाई हो कबीर... इसीलिए तुम्हें वापस जाना होगा," अनिकेत ने कबीर के दोनों हाथों को अपने हाथों में थामा। उसकी आंखों में गहरा वात्सल्य था। "इस संसार को अभी तुम्हारी आवश्यकता है। वह जो ज्ञान तुमने इस युद्ध से अर्जित किया है, वह मानवता की रक्षा के लिए एक ढाल बनेगा। और याद रखना कबीर... जब तक तुम जीवित हो, मैं तुम्हारे भीतर, तुम्हारी हर सांस में, तुम्हारी हर सच्चाई की खोज में जिंदा रहूंगा।"
अनिकेत ने कबीर की छाती पर अपना हाथ रखा और उसे पीछे की ओर, उस स्वर्णिम प्रकाश के भंवर की ओर एक कोमल धक्का दे दिया।
"जाओ कबीर... जागो!" अनिकेत के ये अंतिम शब्द उस लोक में गूंज उठे।
कबीर उस प्रकाश के बवंडर के भीतर खिंचता चला गया। अनिकेत की मुस्कुराती हुई छवि धीरे-धीरे दूर होती गई, और कबीर की चेतना एक भयानक वेग के साथ नीचे, बहुत नीचे, भौतिक संसार के उस भारी, हाड़-मांस के शरीर की ओर गिरने लगी...
धड़क! धड़क!
जनपथ की सड़क पर रखे स्ट्रेचर पर पड़े कबीर के निष्प्राण शरीर ने अचानक एक भयानक, हिचकी भरी लंबी सांस ली!
गैssssस्प!
कबीर की आंखें झटके से पूरी तरह खुल गईं। उसकी छाती तेजी से ऊपर उठी और उसने अपने फेफड़ों में दिल्ली की ठंडी, ताजी हवा को पागलों की तरह खींच लिया।
"डॉक्टर! डॉक्टर साहब! इधर आइए!" स्ट्रेचर के पास खड़े सेना के एक युवा डॉक्टर ने अविश्वास से चिल्लाया। "पेशेंट की पल्स लौट आई है! ही इज अलाइव! यह एक मेडिकल मिरेकल है!"
तुरंत चार-पांच डॉक्टर्स और पैरामेडिक्स कबीर की ओर दौड़े। उन्होंने कबीर के मुंह पर ऑक्सीजन मास्क लगाया और उसकी नब्ज जांचने लगे। कबीर का पूरा शरीर पसीने से भीगा हुआ था, लेकिन उसकी आंखें अब पूरी तरह होश में थीं।
कबीर ने लड़खड़ाते हुए अपनी गर्दन बाईं ओर घुमाई।
उसके बगल वाले स्ट्रेचर पर डॉ. अनिकेत का शरीर रखा हुआ था। दो सैनिक आदरपूर्वक एक सफेद चादर को अनिकेत के शांत, मुस्कुराते हुए चेहरे के ऊपर खींच रहे थे। अनिकेत जा चुका था... हमेशा के लिए।
कबीर की आंखों से खारे आंसुओं की दो धाराएं बह निकलीं। उसने अपने बंधे हुए हाथों को सीने से लगाया और मन ही मन अपने सबसे प्यारे दोस्त को अंतिम नमन किया।
सैनिक और डॉक्टर कबीर को एम्बुलेंस की ओर ले जाने लगे।
तभी, कबीर की नजर अपनी दाहिनी हथेली पर पड़ी।
उसकी हथेली की त्वचा, जो आग से पूरी तरह जल चुकी थी, अब पूरी तरह ठीक हो चुकी थी। लेकिन उसकी हथेली के ठीक केंद्र में... त्वचा के नीचे हल्के नीले रंग का एक सूक्ष्म, त्रिकोणीय निशान स्थायी रूप से उभर आया था।
वह 'पाताल-मुद्रा' (The Mark of the Void) थी! वह इस बात का प्रमाण था कि कबीर की आत्मा उस पाताल के पार जाकर वापस लौटी थी।
कबीर ने चौंककर एम्बुलेंस की खिड़की से बाहर देखा।
दूर, जनपथ के चौराहे के उस पार, रायसीना हिल्स की चढ़ाई पर एक काली, बिना नंबर प्लेट वाली लग्जरी सेडान कार खड़ी थी। कार के पास काले सूट और काले चश्मे में खड़ा एक लंबा, रहस्यमयी व्यक्ति दूरबीन से सीधे कबीर की ओर देख रहा था।
उस व्यक्ति के हाथ में चमड़े का एक पुराना, सीलबंद ब्रीफकेस था, जिस पर 1939 का वही ब्रिटिश शाही राजचिह्न बना हुआ था... और उस ब्रीफकेस के ऊपर लाल अक्षरों में एक नई फाइल का नाम दर्ज था:
"PROJECT DEODAR — PHASE 2: THE AWAKENING"
उस रहस्यमयी व्यक्ति ने अपने कान में लगे वायरलेस सेट पर धीरे से फुसफुसाया:
"सब्जेक्ट-1 (कबीर) जीवित बच गया है... और उसके भीतर पाताल की मूल ऊर्जा समा चुकी है। उसे तुरंत निगरानी में लो... खेल अभी खत्म नहीं हुआ है..."
कबीर ने उस काली कार को देखा। उसकी आंखों में एक नई, अभेद्य चमक कौंध गई।
देवदार हवेली की चीखती खामोशियां भले ही शांत हो चुकी थीं... लेकिन एक नए, कहीं अधिक गहरे और वैश्विक षड्यंत्र का खूनी पर्दा उठने लगा था!