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भाग 13: दिल्ली का महा-प्रलय और जनपथ पर रूहों का तांडव
Piyashi Atma · Haunted Places · 11 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- चीखती खामोशियां: देवदार हवेली का अभिशाप
- Chapter
- 13 of 18
- Category
- Haunted Places
- Reading time
- 11 min
- Words
- 2153
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
राष्ट्रीय अभिलेखागार का वह भूमिगत तलघर अब किसी प्रयोगशाला या पुराने दस्तावेजों का कक्ष नहीं रहा था; वह साक्षात प्रलय की भट्टी बन चुका था।
बुलेटप्रूफ कांच के चैंबर के परखच्चे उड़ने के बाद, अंदर रखी वह विशालकाय 'महा-अंध शिला' किसी जागते हुए ज्वालामुखी की तरह दहक रही थी। शिला से निकलने वाली काली और बैंगनी लपटें सीधे डॉ. अनिकेत के उस विकराल दैत्य-शरीर में समा रही थीं। दोनों के बीच ऊर्जा का ऐसा अदृश्य गुरुत्वाकर्षण खिंचाव पैदा हुआ कि कमरे के भौतिक नियम पूरी तरह ध्वस्त हो गए।
भारी लोहे की अलमारियां, ब्रिटिश काल के भारी संदूक, और फर्श पर बिखरे लाखों दस्तावेज गुरुत्वाकर्षण खोकर हवा में किसी सूखे पत्तों की तरह गोल-गोल तैरने लगे।
कड़कड़ाssssहट!
तलघर की कंक्रीट की मजबूत छत बीच से फट गई। ऊपर की तीनों मंजिलों का भार, लाल बलुआ पत्थर के भारी खंभे और संगमरमर की सीढ़ियां भरभराकर नीचे गिरने लगीं। लेकिन वे मलबे नीचे गिरने के बजाय, उस महा-अंध शिला और अनिकेत के मिलन से बने उस काले ऊर्जा-बवंडर के भीतर खिंचकर हवा में ही धूल और बारूद की तरह पिसते जा रहे थे।
कबीर दीवार के एक कोने में मलबे के नीचे दबा पड़ा था। उसके सिर से बहता खून उसकी आंखों को धुंधला कर रहा था, और सीने की पसलियों में असहनीय दर्द की कसक थी। लेकिन उसके दोनों हाथों ने उस दिव्य तांबे के त्रिशूल और 'महाकाल भैरव संहिता' के भोजपत्र को इतनी मजबूती से सीने से चिपका रखा था कि उस अलौकिक मलबे का एक भी भारी पत्थर उसकी खोपड़ी पर नहीं गिर सका। त्रिशूल से निकली सुनहरी और नीली दिव्य ज्वाला ने कबीर के चारों ओर एक पारदर्शी रक्षा-कवच बना दिया था।
कबीर ने कांपती पलकों से सामने देखा।
सामने जो खड़ा था, उसे देखकर किसी भी इंसान का मस्तिष्क भय से सुन्न हो सकता था।
अनिकेत का मानवीय शरीर अब पूरी तरह लुप्त हो चुका था। उसकी जगह 'महाकाल असुर' का अठारह फीट ऊंचा, विशालकाय और भयानक रूप खड़ा था। उसकी त्वचा स्लेटी चट्टानों जैसी खुरदरी और अभेद्य थी, जिसके भीतर नसों की जगह पिघला हुआ लाल लावा बह रहा था। उसकी पीठ से चमगादड़ के जैसे दो विशाल, कांटेदार काले पंख निकल आए थे जो हवा को काटते हुए भयानक फुफकार पैदा कर रहे थे। उसके चार हाथ थे, जिनके पंजों में लोहे के विशाल त्रिशूल और नरमुंडों की मालाएं थीं।
और सबसे भयानक थी उसकी छाती...
उसकी चौड़ी छाती के ठीक मध्य में वह महा-अंध शिला अब एक जीवित, विशाल हृदय की तरह पूरी तरह धंस चुकी थी। शिला के बीच में वह खूनी लाल आंख अब एक फुट चौड़ी होकर खुल चुकी थी, जिससे निकलती काली किरणें अंतरिक्ष की गहराइयों तक जा रही थीं।
"हाहाहाहाहा! आज से काल का नया नियम लिखा जाएगा!"
महाकाल असुर की गगनभेदी गर्जना ने तलघर की बची-खुची दीवारों को भी उड़ा दिया। उसने अपने दोनों विशाल पंख फैलाए और एक ही झटके में हवा में छलांग लगा दी।
धड़ाम! बूमssss!
राष्ट्रीय अभिलेखागार की पूरी ऐतिहासिक इमारत एक भयानक विस्फोट के साथ ऊपर की ओर फट गई। लाखों टन मलबा, पत्थर और धूल का एक विशाल बवंडर आसमान की ओर उड़ा, और वह अठारह फीट का महा-दैत्य उस मलबे को चीरता हुआ सीधे ऊपर जनपथ रोड की मुख्य सड़क पर आ खड़ा हुआ!
कबीर ने अपने मुंह में भरे खून को थूका। उसने अपने शरीर पर पड़े पत्थरों को पूरी ताकत से हटाया और लड़खड़ाते हुए उस फटे हुए तलघर से बाहर की ओर दौड़ लगाई।
जैसे ही कबीर जमीन की सतह पर पहुंचा और उसने दिल्ली की सड़कों पर नजर डाली, उसका कलेजा कांप उठा।
दिन के करीब एक बज रहे थे, लेकिन आसमान में सूरज का नामो-निशान नहीं था। दिल्ली का पूरा आसमान एक गहरे, स्याह काले और खून जैसे लाल रंग के चक्रवात में डूब चुका था। बादलों के बीच से लगातार लाल रंग की बिजली कौंध रही थी—कड़क... कड़क!—लेकिन उस बिजली में कोई बारिश नहीं थी, केवल सूखी, दमघोंटू गंधक की राख आसमान से बर्फ की तरह गिर रही थी।
जनपथ, राजपथ (कर्तव्य पथ) और संसद मार्ग की चौड़ी सड़कें किसी भयानक भूकंप के कारण जगह-जगह से फट चुकी थीं। सड़कों के बीच दस-दस फीट गहरी दरारें पड़ गई थीं, जिनमें से पाताल का काला धुआं और चीखें बाहर आ रही थीं।
गाड़ियां पलट चुकी थीं, मेट्रो के खंभों में दरारें आ गई थीं और स्ट्रीटलाइट्स के खंभे मुड़कर जमीन पर आ गिरे थे।
और सबसे वीभत्स दृश्य था हवा का...
उस महा-अंध शिला के जागते ही पाताल लोक का वह प्राचीन द्वार, जो सदियों से बंद था, अब दिल्ली के सीने पर खुल चुका था।
1939 की उस खूनी देवदार हवेली से लेकर आज तक की हजारों अतृप्त, विकृत और भूखी प्रेत-आत्माएं उस काले धुएं के साथ बाहर निकल आई थीं। वे साए किसी टिड्डी दल की तरह दिल्ली के आसमान में उड़ रहे थे। वे इमारतों के शीशों को फोड़ रहे थे, सड़कों पर भागते बेबस लोगों के मस्तिष्कों में घुसकर उन्हें पागल कर रहे थे। चारों तरफ केवल सायरनों की चीख-पुकार, लोगों का क्रंदन और पाताल के असुरों का अट्टहास गूंज रहा था।
"बचाओ... भगवान के लिए कोई बचाओ!" दूर जनपथ की सड़क पर लोग बदहवास होकर भाग रहे थे, लेकिन आत्माओं के काले साए उनके पैरों को जकड़कर उन्हें जमीन में धंसा रहे थे।
सड़क के ठीक बीचों-बीच, जनपथ और मौलाना आजाद रोड के चौराहे पर, वह 18 फीट का महाकाल असुर खड़ा था। वह अपने चारों हाथ आसमान की ओर उठाए हुए था और इंडिया गेट तथा संसद भवन की ओर मुंह करके पाताल के मुख्य अधिपति को धरती पर बुलाने का अंतिम तांत्रिक आह्वान कर रहा था।
"हे पाताल के अनंत अंधकार! इस संपूर्ण नगरी का रक्त स्वीकार करो!" असुर के कंठ से निकली आवाज लाउडस्पीकरों की तरह कई किलोमीटर तक गूंज रही थी।
कबीर लहूलुहान अवस्था में, फटी हुई कमीज और खून से लथपथ पट्टियों के साथ मलबे से बाहर निकला। उसके हाथ में वह तांबे का त्रिशूल था और बगल में दबी थी 'महाकाल भैरव संहिता'।
कबीर ने देखा कि अगर यह शैतान अगले पांच मिनट तक इसी तरह आह्वान करता रहा, तो पाताल का मुख्य केंद्र पूरी तरह से खुल जाएगा और दिल्ली की धरती फटकर सीधे नर्क के महासागर में समा जाएगी।
कबीर ने संहिता के उस पन्ने को दोबारा देखा।
पन्ने पर स्पष्ट लिखा था:
"जब महा-शिला और असुर का मिलन आरंभ हो जाए, तो ब्रह्मांड का कोई अस्त्र उसे बाहर से नहीं भेद सकता। इसका संहार केवल वही आत्मा कर सकती है जो स्वेच्छा से अपने प्राणों की आहुति देकर उस शिला के भीतर अपनी चेतना का विस्फोट कर दे... एक जीवन के बदले... पूरी सृष्टि की रक्षा!"
कबीर की आंखों से एक आंसू की बूंद टपकी और उसके गाल पर जमे खून को धोती हुई नीचे गिर गई।
उसकी आंखों के सामने उसका पूरा जीवन एक चलचित्र की तरह घूम गया—उसकी मां का प्यार, उसका पत्रकार बनने का सपना, अनिकेत के साथ बिताए कॉलेज के वे बेपरवाह दिन, और देवदार हवेली के अंधेरे में सुनैना का वह मासूम, सिसकता हुआ चेहरा।
"तो यही मेरी नियति थी..." कबीर ने अपने मन में एक गहरा, शांत संकल्प लिया। "अनिकेत ने अपनी आत्मा को दांव पर लगाया... अब मेरी बारी है। अगर एक कबीर के मरने से यह पूरी मानवता और यह देश बच सकता है... तो यह सौदा मुझे मंजूर है।"
कबीर के चेहरे से सारा डर, सारा संशय और सारी घबराहट एक झटके में गायब हो गई। उसकी जगह एक असीम, दिव्य तेज ने ले ली।
उसने सड़क पर गिरे एक टूटे हुए कांच के टुकड़े से अपनी कलाई पर एक गहरा चीरा लगाया।
छपाक!
ताजा, लाल खून की धार बही। कबीर ने उस खून से सड़क के डामर पर तेजी से एक विशाल 'काल-भैरव महा-यंत्र' खींच दिया। उसने यंत्र के चारों कोनों पर संहिता के पन्नों को रखा और बीच में अपने दोनों घुटने टिका दिए।
कबीर ने अपने दोनों हाथ जोड़े और ब्रह्मांड की समस्त पवित्र शक्तियों, महादेव और नन्हीं सुनैना की आत्मा का पूरे अंतर्मन से आह्वान किया:
"हे महाकाल! हे श्मशान-वासी रुद्र! आज मैं, कबीर, अपनी संपूर्ण इच्छा से, बिना किसी भय या लोभ के, अपने प्राण, अपनी आत्मा और अपनी चेतना को इस पाताल शिला के संहार के लिए अर्पित करता हूँ! मेरे रक्त की हर बूंद इस सृष्टि की रक्षा की आहुति बने... मुझे वह शक्ति दो कि मैं इस अंधकार के केंद्र को भीतर से भस्म कर सकूं!"
जैसे ही कबीर का यह अंतिम आत्म-बलिदान का संकल्प पूरा हुआ, एक ऐसा चमत्कार हुआ जिसे देखकर आसमान में उड़ते प्रेत भी कांप उठे।
कबीर के सीने से नीली और स्वर्णिम रोशनी की एक ऐसी प्रचंड किरण फूटी जो सीधे आसमान के उस खूनी बवंडर को चीरती हुई अंतरिक्ष तक चली गई।
हवा में नन्हीं सुनैना की रूह प्रकट हुई। उसके साथ रानी राजेश्वरी और उन 40 मुक्त आत्माओं का दिव्य साया भी उपस्थित हो गया। सुनैना ने रोते हुए कबीर के सिर पर अपना हाथ रखा:
"कबीर भैया... तुम्हारे इस त्याग को युगों-युगों तक याद रखा जाएगा... हम सब तुम्हारे भीतर समा रहे हैं... उठो और प्रहार करो!"
वे सभी पवित्र आत्माएं एक साथ प्रकाश की एक विशाल धारा बनकर कबीर के शरीर और उस तांबे के त्रिशूल के भीतर समा गईं!
कबीर की देह में असीम ऊर्जा का संचार हुआ। उसके जले हुए हाथों की त्वचा सोने जैसी चमकने लगी। उसकी आंखें दिव्य नीली अग्नि से प्रज्वलित हो उठीं। उसके पैरों के नीचे की जमीन से रोशनी के फव्वारे फूटने लगे।
कबीर ने उस दहकते हुए तांबे के त्रिशूल को अपने दोनों हाथों में सीधा थामा और जनपथ की चौड़ी सड़क पर उस 18 फीट ऊंचे असुर की ओर दौड़ लगा दी!
असुर ने पीछे मुड़कर देखा।
कबीर को उस दिव्य, जलते हुए रूप में अपनी ओर आते देखकर असुर की लाल आंखों में पहली बार अगाध, सच्चा खौफ उभरा।
"रुक जा, तुच्छ कीट! तू मुझे नहीं मार सकता!" असुर दहाड़ा।
असुर ने अपने चारों हाथों से हवा में उड़ रही चार विशाल डीटीसी बसों और कारों को उठाया और पूरी ताकत से कबीर की ओर फेंक दिया।
वे भारी गाड़ियां किसी उल्कापिंड की तरह कबीर की ओर लपकीं। लेकिन कबीर रुका नहीं। उसने हवा में त्रिशूल को एक चक्कर घुमाया। त्रिशूल से निकली नीली तलवार जैसी ऊर्जा की तरंग ने उन उड़ती हुई बसों को बीच से काटकर दो टुकड़ों में हवा में ही भस्म कर दिया!
कबीर मलबे के शोलों को चीरता हुआ सीधे असुर के पैरों के पास पहुंच गया।
तभी, एक अभूतपूर्व घटना घटी।
असुर के उस भयानक, पाषाण-रूपी चेहरे की बाईं आंख अचानक फड़कने लगी। उसकी स्लेटी त्वचा के नीचे से एक परिचित, दर्द से तड़पता हुआ इंसानी चेहरा उभर आया।
वह डॉ. अनिकेत था!
अनिकेत की बची हुई इंसानी आत्मा ने कबीर के उस दिव्य त्याग के संकल्प को महसूस कर लिया था। अनिकेत ने अपने ही असुर-शरीर के भीतर से उस शैतानी नियंत्रण के खिलाफ अपनी अंतिम शक्ति से बगावत कर दी थी!
अनिकेत का बायां हाथ, जो असुर का पंजा बन चुका था, कांपते हुए उठा और उसने अपनी ही छाती में धंसी उस महा-अंध शिला को दोनों तरफ से कसकर पकड़ लिया ताकि वह हिल न सके!
"कबीर!" अनिकेत का अपना परिचित, रोता हुआ स्वर असुर के मुंह से फूटा। "कबीर भाई... मुझे क्षमा कर देना... मैं ज्यादा देर इस शैतान को नहीं रोक पाऊंगा! मारो कबीर... मेरी छाती के आर-पार त्रिशूल उतार दो... इस नर्क को खत्म करो कबीर... मारो!"
"अनिकेत नहीं! यह तेरा शरीर है!" असुर की दूसरी आवाज दहाड़ी। असुर का दाहिना पंजा अपने ही बाएं पंजे को तोड़ने के लिए लपका।
कबीर के पास केवल वही दो सेकंड थे।
कबीर ने अपनी दोनों आंखों से बहते आंसुओं को पोंछा। उसके चेहरे पर एक अलौकिक मुस्कान तैर गई।
"अनिकेत... हम दोनों ने एक साथ शुरू किया था... और हम दोनों एक साथ इसे खत्म करेंगे!" कबीर ने गर्जना की।
कबीर ने अपने पैरों को डामर की सड़क पर जमाया और अपनी पूरी आत्मा की शक्ति झोंकते हुए सीधे हवा में बीस फीट ऊंची छलांग लगा दी!
वह हवा में उड़ता हुआ सीधे उस 18 फीट ऊंचे असुर की छाती के सामने पहुंचा।
कबीर ने अपने दोनों हाथों से उस महा-त्रिशूल को थामा, जिसके भालों पर महाकाल भैरव संहिता की अंतिम अग्नि नाच रही थी। उसने अपनी छाती को सीधे उस महा-अंध शिला के केंद्र की ओर कर दिया।
कड़ाssssक!
कबीर ने पूरे वेग से उस त्रिशूल को सीधे उस महा-अंध शिला की लाल आंख और अनिकेत के सीने के ठीक आर-पार उतार दिया!
और उसी क्षण, कबीर ने अपना दूसरा हाथ आगे बढ़ाकर उस दहकती हुई शिला के भीतर अपनी उंगलियां धंसा दीं।
छपाक... भभक!
संहिता का वह अंतिम वचन सत्य हो गया—कबीर की जीवित आत्मा और चेतना उस शिला के भीतर एक आत्मघाती विस्फोट की तरह प्रविष्ट हो गई!
कबीर का अपना दिल और वह महा-अंध शिला एक ही तार से जुड़ गए। एक ऐसा अंधा कर देने वाला, नीला और श्वेत प्रकाश का महा-विस्फोट हुआ जिसने पूरे जनपथ, संसद मार्ग और दिल्ली के आकाश को दिन के उजाले से भी सौ गुना अधिक चमका दिया।
असुर का 18 फीट का शरीर उस रोशनी के भीतर तड़पने लगा।
कबीर और अनिकेत—दोनों के चेहरे उस दिव्य रोशनी के बीच आमने-सामने थे। दोनों ने एक-दूसरे की आंखों में देखा। दर्द का अंत हो चुका था। अनिकेत के चेहरे पर भी वही शांति लौट आई थी जो कबीर के चेहरे पर थी।
"धन्यवाद... मेरे भाई..." अनिकेत के होंठों से अंतिम शब्द निकले।
"अलविदा... अनिकेत..." कबीर ने मुस्कुराते हुए अपनी आंखें मूंद लीं।
और फिर... पूरी दिल्ली के केंद्र में वह महा-विस्फोट घटित हुआ जिसने पाताल लोक के उस द्वार को हमेशा-हमेशा के लिए सील कर दिया...