PretikaHaunted Placesचीखती खामोशियां: देवदार हवेली का अभिशाप

भाग 12: दिल्ली का राष्ट्रीय अभिलेखागार और सीलबंद तलघर

Piyashi Atma · Haunted Places · 12 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
चीखती खामोशियां: देवदार हवेली का अभिशाप
Chapter
12 of 18
Category
Haunted Places
Reading time
12 min
Words
2225
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

सुबह के लगभग साढ़े छह बज रहे थे।

महिन्द्रा थार जीप जब सिंघु बॉर्डर को पार करके दिल्ली की सीमा में प्रविष्ट हुई, तो कबीर की आंखों के सामने जो दृश्य उभरा, उसने उसके बचे-खुचे हौसले को भी झकझोर कर रख दिया। यह देश की राजधानी की वह जानी-पहचानी, भागती-दौड़ती सुबह बिल्कुल नहीं थी।

सड़कों पर एक अजीब, भारी और मनहूस सन्नाटा पसरा हुआ था। दिल्ली का आसमान किसी जहरीले, मटमैले कोहरे और खूनी-लाल रंग के बादलों की मोटी चादर में लिपटा हुआ था। आसमान में हजारों काले चील और कौवे सामान्य रूप से उड़ने के बजाय, एक विशाल, गोल चक्रवात के रूप में एक ही दिशा की ओर चक्कर काट रहे थे। स्ट्रीटलाइट्स अजीब तरह से झिलमिला रही थीं—टिक... टिक... भक!—और उन खंभों के नीचे से गुजरते वक्त जीप के रेडियो से लगातार सिसकियों और कराहने की ध्वनियां गूंज रही थीं।

सड़कों पर इक्का-दुक्का जो गाड़ियां चल रही थीं, उनके ड्राइवर किसी सम्मोहन में डूबे हुए लग रहे थे; उनकी गति धीमी थी और चेहरे पीले पड़े थे।

कबीर ने अपनी जेब पर हाथ रखा। उसकी सांस गले में अटक गई।

वह त्रिकोणीय काला पत्थर... अब पूरी तरह से एक बड़े, भारी पत्थर के गोले का रूप ले चुका था। उसका वजन कम से कम पांच किलो महसूस हो रहा था। पत्थर की सतह पर उभरी वह लाल नस अब केवल धड़क नहीं रही थी, बल्कि उसमें से गाढ़ा, चिपचिपा काला-लाल खून रिसकर कबीर की पूरी पैंट और जीप की सीट को भिगो चुका था। उस खून से वही गंधक और सड़े हुए मांस की असहनीय बदबू आ रही थी जो देवदार हवेली के तहखाने में थी।

कबीर ने रियर-व्यू मिरर में देखा।

पिछली सीट पर लेटा डॉ. अनिकेत अभी भी अचेत था। उसके सीने के ठीक बीच में वह प्राचीन तांबे की चाबी गड़ी हुई थी, जिसके चारों तरफ से नीली रोशनी की हल्की-हल्की लकीरें निकलकर अनिकेत की त्वचा में समा रही थीं। अनिकेत के चेहरे की नसें काली पड़ चुकी थीं, और उसके होंठ लगातार किसी अज्ञात, प्राचीन भाषा के अक्षरों को बुदबुदा रहे थे:
"अंध-काराय नमः... महा-पातालाय जाग्रय... जाग्रय..."

कबीर ने जीप की रफ्तार तेज कर दी। मुकरबा चौक, आजादपुर, कश्मीरी गेट और आईटीओ के चौराहों को पार करते हुए जीप सीधे लुटियंस दिल्ली के केंद्र—जनपथ रोड पर पहुंची।

आसमान में मंडरा रहे उस खूनी बादलों के चक्रवात का केंद्र ठीक यहीं टिका हुआ था।

सामने लाल बलुआ पत्थर (Red Sandstone) और धौलपुरी पत्थरों से बनी अंग्रेजों के जमाने की वह विशाल, ऐतिहासिक इमारत खड़ी थी—'राष्ट्रीय अभिलेखागार' (National Archives of India)।

सामान्य दिनों में यहाँ सुरक्षा गार्डों का कड़ा पहरा, पर्यटकों और शोधकर्ताओं की भीड़ होती थी। लेकिन आज, इस सर्द सुबह में, लोहे के विशाल मुख्य फाटक आधे खुले पड़े थे। मुख्य द्वार के सिक्योरिटी केबिन में दो गार्ड अपनी कुर्सियों पर पीछे की ओर लुढ़के हुए थे; उनकी गर्दनें एक तरफ मुड़ी थीं और वे गहरी, अचेत निद्रा में थे। पाताल शिला की काली तरंगों ने यहाँ के पहरेदारों को पहले ही सुला दिया था।

कबीर ने जीप को अभिलेखागार की मुख्य सीढ़ियों के पास रोका।

उसने तुरंत गाड़ी का पिछला दरवाजा खोला। अनिकेत का शरीर बर्फ की तरह भारी और ठंडा हो चुका था। कबीर ने अपने दोनों जले हुए, दर्द से फटने वाले हाथों से अनिकेत को सहारा दिया और उसे अपनी पीठ और कंधे पर लाद लिया। कबीर के घावों से फिर से खून का रिसाव शुरू हो गया, लेकिन उसने अपने होंठ भींच लिए।

वह भारी कदमों से अभिलेखागार के विशाल, नक्काशीदार लकड़ी के मुख्य द्वार को धक्का देकर भीतर दाखिल हुआ।

इमारत के भीतर सन्नाटा इतना गहरा था कि कबीर के जूतों की आवाज ऊंची छतों से टकराकर लौट रही थी। चारों तरफ हवा में पुराने, पीले पड़ चुके कागजों, स्याही और दीमक-रोधी रसायनों की बासी गंध भरी थी। कबीर ने अनिकेत के कोट की भीतरी जेब टटोली। वहां से अनिकेत का सरकारी पहचान पत्र (Research Officer's Clearance Badge) और एक छोटी सी पीतल की कुंजी मिली, जिस पर लिखा था—'भूमिगत तलघर: अनुभाग-4' (Vault-4)।

कबीर अनिकेत को लेकर मुख्य लॉबी के पार गया। वहां लगी पुरानी लोहे की लिफ्ट बंद पड़ी थी; उसके तारों से चिंगारियां निकल रही थीं।

लिफ्ट के ठीक बगल में एक संकरा, अंधेरा रास्ता नीचे की ओर जा रहा था, जिस पर लोहे का एक जंग लगा ग्रिल का दरवाजा लगा था। कबीर ने अनिकेत के बैज को दरवाजे के इलेक्ट्रॉनिक स्कैनर पर लगाया और पीतल की चाबी ताले में घुमाई।

क्लिक... चर्रर्र!

भारी ग्रिल खुली। कबीर अनिकेत को संभालते हुए कंक्रीट की उन सीढ़ियों से नीचे उतरने लगा।

जैसे-जैसे वे नीचे जा रहे थे, तापमान में चौंकाने वाली गिरावट आ रही थी। बाहर दिल्ली में सुबह की सामान्य ठंड थी, लेकिन इस तलघर में तापमान शून्य से कम से कम दस डिग्री नीचे महसूस हो रहा था। सीढ़ियों की दीवारों पर बर्फ की पतली परत जमी हुई थी।

सीढ़ियां खत्म होते ही कबीर एक बहुत लंबे, संकरे गलियारे में पहुंचा। यह गलियारा स्वतंत्रता-पूर्व 1930 के दशक में ब्रिटिश सरकार द्वारा गोपनीय फाइलों और प्रतिबंधित ऐतिहासिक अवशेषों को सुरक्षित रखने के लिए बनाया गया था। दोनों तरफ मोटे लोहे के रैक लगे थे, जिन पर लाल फीते से बंधी हजारों धूल भरी फाइलें रखी थीं।

गलियारे के सबसे आखिरी छोर पर एक भारी, सीसे (Lead) और काले फौलाद का बना एक विशाल सीलबंद दरवाजा था।

उस दरवाजे पर पीतल की एक बड़ी प्लेट लगी थी, जिस पर अंग्रेजी में उकेरा गया था:
"CLASSIFIED & RESTRICTED — OCCULT RECORDS & RELICS: 1939 (DEODAR ESTATE INCIDENT)"

और उस प्लेट के ठीक नीचे, काले रंग से एक भयानक तांत्रिक अष्टकोण (Octagram) बना था, जिसके बीचों-बीच वही खोपड़ी का निशान था जो कबीर ने हवेली के तहखाने में देखा था!

कबीर ने जैसे ही उस दरवाजे के करीब कदम रखा, उसकी जेब में रखा वह भारी काला पत्थर अचानक किसी जीवित परजीवी की तरह छटपटाने लगा। वह इतनी जोर से धड़क रहा था कि कबीर की छाती की पसलियां कांप उठीं।

धड़... धड़... धड़!

दरवाजे के धातुई पैनल से लाल रंग की रोशनी की किरणें फूटने लगीं। कबीर ने अपनी जेब से वह काला पत्थर निकाला।

पत्थर अब किसी इंसान के सिर जितना बड़ा हो चुका था! उसकी सतह पर उभरी नसें तेजी से फड़क रही थीं और उससे बहता काला खून कबीर के दोनों हाथों पर लिपट रहा था। जैसे ही कबीर ने उस पत्थर को दरवाजे के बीच बने उस तांत्रिक अष्टकोण के पास किया, पत्थर से निकले एक खून के फव्वारे ने अष्टकोण के केंद्र को छू लिया।

कड़ाssssक!

अंदर लगे भारी गियर और लोहे के लीवर अपने आप घूमने लगे। सदियों पुराना वह सीलबंद दरवाजा भारी घुरघुराहट के साथ धीरे-धीरे अंदर की ओर खुलता चला गया।

कबीर ने अनिकेत को दीवार के सहारे नीचे बिठाया और खुद उस सीलबंद कक्ष के भीतर कदम रखा।

कमरे के भीतर का दृश्य देखकर कबीर की आंखें फटी की फटी रह गईं।

यह कोई साधारण अभिलेख कक्ष नहीं था; यह एक वैज्ञानिक और तांत्रिक प्रयोगशाला का मिश्रण था। कमरे की दीवारों पर चारों तरफ मोटे तांबे के तार और शीशे के इंसुलेटर लगे थे। कमरे के ठीक बीचों-बीच, एक भारी स्टील के चबूतरे पर, बुलेटप्रूफ कांच और तांबे की जाली से बना एक विशाल, वैक्यूम-सील्ड चैंबर रखा था।

और उस चैंबर के भीतर... एक बहुत बड़ी, काली, चिकनी शिला रखी हुई थी!

वह देवदार हवेली की पाताल शिला का मूल आधार था—'महा-अंध शिला' (The Mother Core)! 1939 में ब्रिटिश सेना के गुप्त तांत्रिक दस्ते ने जब हवेली पर छापा मारा था, तो वे पाताल शिला के ऊपरी हिस्से को तो नष्ट नहीं कर पाए थे, लेकिन उसकी मुख्य जड़ (इस विशाल आधार) को काटकर गुप्त रूप से दिल्ली के इस भूमिगत तलघर में ले आए थे ताकि इसके अलौकिक विकिरण पर शोध किया जा सके!

उस महा-शिला के आकार और ऊर्जा के सामने कबीर के हाथ में मौजूद वह काला पत्थर केवल एक छोटा सा बीज जैसा लग रहा था।

और उस कांच के चैंबर के ठीक सामने, शीशम की एक प्राचीन मेज पर, रेशमी लाल कपड़े में लिपटी एक मोटी, हस्तलिखित तांत्रिक पांडुलिपि रखी थी।

कबीर तेजी से मेज की तरफ बढ़ा। उसने कांपते हाथों से उस लाल कपड़े को हटाया।

भोजपत्र की सुनहरी-काली जिल्द पर रक्त-चंदन से बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था:
'महाकाल भैरव संहिता — पाताल संहार एवं रक्त-शोधन विधान'

कबीर के सीने में उम्मीद की एक किरण जागी। उसने जल्दी-जल्दी संहिता के पन्ने पलटना शुरू किया। पन्नों पर प्राचीन संस्कृत के श्लोक और जटिल तांत्रिक रेखाचित्र बने थे। कबीर ने उस पृष्ठ को ढूंढ निकाला जिस पर अनिकेत ने निशान लगाया था—“असुर-बीज निष्कासन एवं पाताल-द्वार रोधन” (शरीर से परजीवी शैतान को निकालने की विधि)।

कबीर ने श्लोक पढ़ना शुरू किया:

"यदि पाताल-शिला का सूक्ष्म अंश किसी जीवित प्राणी के रक्त में समा जाए, तो वह धीरे-धीरे उसकी आत्मा को भस्म करके उस देह को साक्षात असुर का रूप दे देता है। इसका एकमात्र निवारण 'रक्त-विनिमय' और 'अग्नि-तर्पण' है... उस व्यक्ति के हृदय पर सिद्ध तांबे के त्रिशूल से प्रहार करके उस शिला-अंश को बाहर खींचना होगा... परंतु यदि महा-अंध शिला और अंश-शिला का मिलन हो गया, तो वह प्राणी संपूर्ण पृथ्वी का संहारक बन जाएगा..."

"अनिकेत के हृदय पर त्रिशूल से प्रहार..." कबीर के हाथ कांप उठे। इसका मतलब था कि अनिकेत को बचाने की यह प्रक्रिया उसके प्राण भी ले सकती थी!

तभी, कमरे के प्रवेश द्वार से एक भारी, धातुई ताली बजने की आवाज आई।

तड़ाक... तड़ाक... तड़ाक!

कबीर चौंककर पीछे घूमा। उसकी रीढ़ की हड्डी में बर्फ जम गई।

कमरे की चौखट पर डॉ. अनिकेत खड़ा था।

लेकिन वह अब किसी भी रूप में अनिकेत नहीं था। उसके सीने में गड़ी हुई वह पवित्र तांबे की चाबी मुड़कर फर्श पर गिर चुकी थी, मानो किसी ने उसे अंदर से पिघलाकर बाहर फेंक दिया हो। अनिकेत का शरीर अब सामान्य इंसान से कहीं ज्यादा लंबा और चौड़ा हो चुका था। उसकी त्वचा का रंग गहरा राख जैसा स्लेटी हो चुका था, और उसकी गर्दन और चेहरे की नसों में खून की जगह नीला जहर दौड़ रहा था।

उसकी आंखें पूरी तरह से लाल अंगारों जैसी दहक रही थीं, और उसके सिर के दोनों तरफ माथे की हड्डियों से छोटे-छोटे काले सींग बाहर निकल आए थे!

"वाह कबीर... अद्भुत!"

अनिकेत के मुंह से निकली वह आवाज इतनी भारी, गूंजती और भयानक थी कि कमरे की कांच की अलमारियां थरथराने लगीं। उस आवाज में एक साथ हजारों मरे हुए इंसानों की चीखें मिली हुई थीं।

"तूने मेरी यात्रा को कितना सुगम बना दिया!" वह शैतान अनिकेत के शरीर से एक अमानवीय हंसी हंसा। "अगर तू मुझे उस देवदार हवेली के मलबे से निकाल कर यहाँ दिल्ली न लाता... तो मुझे अपने इस मूल शरीर—'महा-अंध शिला' तक पहुंचने में सदियों लग जाते! तूने सोचा कि तू मुझे बचाने आया है? मूर्ख मानव... तू तो केवल मेरा वह गधा था जो मेरे हृदय को मेरी देह तक ढोकर लाया है!"

"अनिकेत... अपने भीतर के उस शैतान से लड़ो!" कबीर ने मेज पर रखी उस प्राचीन संहिता को अपनी छाती से चिपकाते हुए चिल्लाकर कहा। "तुम एक विद्वान हो अनिकेत! अपनी आत्मा को इस पाताल के कीड़े के आगे मत बेचो!"

"अनिकेत अब केवल मेरी सांसों का ईंधन है!" शैतान ने दहाड़ते हुए अपना हाथ आगे बढ़ाया।

एक अदृश्य, प्रचंड गुरुत्वाकर्षण की शक्ति ने कबीर को फर्श से उठाया और सीधे कमरे की कंक्रीट की दीवार पर पूरी ताकत से दे मारा!

धड़ाम!

कबीर के मुंह से खून का एक फव्वारा छूटा और उसकी पीठ की हड्डियां कराह उठीं। वह जमीन पर गिर पड़ा। उसके हाथ से वह काला पत्थर छूटकर फर्श पर लुढ़क गया।

शैतान उस काले पत्थर की ओर बढ़ा। उसने झुककर उस पत्थर को अपने लंबे, काले पंजों में उठा लिया। जैसे ही वह पत्थर शैतान के हाथों में आया, दोनों के बीच काले धुएं और बिजली का एक भयानक विस्फोट हुआ। पत्थर पिघलकर अनिकेत के सीने के भीतर समा गया!

अनिकेत के शरीर का आकार और बढ़ गया। उसकी रीढ़ की हड्डी से 'कड़कड़ाहट' की आवाजें आईं और उसकी पीठ से दो विशाल, चमगादड़ जैसे काले पंख फटने लगे।

"अब... मेरा महाकाल असुर रूप पूर्ण होगा!" शैतान ने उस बुलेटप्रूफ कांच के चैंबर की ओर अपनी नजरें घुमाईं, जिसके भीतर वह विशाल 'महा-अंध शिला' रखी थी।

शैतान ने अपनी लोहे जैसी मुट्ठी हवा में उठाई और उस बुलेटप्रूफ कांच के चैंबर पर पूरी ताकत से प्रहार कर दिया!

कड़ाssssक!

तीन इंच मोटा बुलेटप्रूफ कांच और तांबे की सुरक्षा-जाली मकड़ी के जाले की तरह बिखर गई।

अंदर रखी वह विशालकाय महा-अंध शिला स्वतंत्रता पाकर जीवित हो उठी। शिला से निकली काली लपटों ने अनिकेत के उस दैत्य-रूपी शरीर को चारों तरफ से लपेट लिया। दोनों के मिलने से ऊर्जा का एक ऐसा महा-विस्फोट हुआ कि पूरे राष्ट्रीय अभिलेखागार की इमारत किसी 8.0 तीव्रता के भूकंप की तरह हिलने लगी।

ऊपर दिल्ली की सड़कों पर जमीन फटने लगी, गाड़ियां पलट गईं और आसमान का वह खूनी बवंडर सीधे अभिलेखागार की छत को चीरता हुआ नीचे तलघर की ओर उतरने लगा!

कबीर लहूलुहान अवस्था में फर्श पर पड़ा था। उसकी नजरें जमीन पर बिखरे 'महाकाल भैरव संहिता' के पन्नों पर पड़ीं।

एक पन्ने पर, जो अनिकेत के गिरे हुए खून से भीग चुका था, अंतिम मंत्र के नीचे लाल अक्षरों में एक भयानक और अंतिम सत्य चमक रहा था:

"जब महा-शिला और असुर का मिलन आरंभ हो जाए, तो ब्रह्मांड का कोई अस्त्र उसे नहीं मार सकता। इसका संहार केवल वही आत्मा कर सकती है जो स्वेच्छा से अपने प्राणों की आहुति देकर उस शिला के भीतर अपनी चेतना का विस्फोट कर दे... एक जीवन के बदले... पूरी सृष्टि की रक्षा!"

कबीर ने कांपते हाथों से अपनी बेल्ट में खोंसा हुआ वह तांबे का त्रिशूल निकाला। त्रिशूल की नोक अभी भी सुनैना की पवित्र अग्नि से सुलग रही थी।

कबीर ने लड़खड़ाते हुए अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश की। सामने उस काले बवंडर के बीच अनिकेत का शरीर अब पूरी तरह से उस विशाल पाताल असुर में बदल रहा था, जिसकी लाल आंखें सीधे दिल्ली के विनाश का फरमान लिख रही थीं...

समय अब सेकंडों में नहीं, कबीर की अंतिम सांसों में बचा था!

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