PretikaHaunted Placesचीखती खामोशियां: देवदार हवेली का अभिशाप

भाग 11: कालका हाईवे का खूनी सफर और वीरान ढाबे का तांडव

Piyashi Atma · Haunted Places · 14 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
चीखती खामोशियां: देवदार हवेली का अभिशाप
Chapter
11 of 18
Category
Haunted Places
Reading time
14 min
Words
2609
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

पहाड़ी हाईवे पर चारों तरफ ऐसा घना, दूधिया कोहरा फैला था कि महिन्द्रा थार जीप की तेज फॉग-लाइट्स भी केवल दस फीट आगे तक का रास्ता दिखा पा रही थीं। सड़क के एक तरफ कालका की गहरी, अंधी खाइयां थीं और दूसरी तरफ काले, विशालकाय पहाड़, जो इस धुंध में किसी खड़े हुए दैत्यों जैसे प्रतीत हो रहे थे।

कबीर के दोनों हाथों की पट्टियों से रिसता खून अब स्टीयरिंग व्हील के चमड़े पर सूखकर चिपचिपा हो चुका था। हर तीखे मोड़ पर स्टीयरिंग घुमाते वक्त उसकी हथेलियों में ऐसी असहनीय चुभन होती थी मानो सैकड़ों जलती हुई सुइयां उसकी नसों में उतारी जा रही हों।

लेकिन उस शारीरिक पीड़ा से कहीं अधिक भयानक था वह खौफ, जो जीप की पिछली सीट पर बैठा हुआ था।

रियर-व्यू मिरर में कबीर लगातार पीछे की सीट पर नजर रखे हुए था। खिड़की के कांच पर अपने ही खून से वह त्रिकोणीय तांत्रिक प्रतीक बनाने के बाद अनिकेत अब बिल्कुल शांत बैठा था। उसका सिर उसकी छाती पर झुका हुआ था, लेकिन उसकी उंगलियां लगातार अपनी ही जांघों को इतनी जोर से खुरच रही थीं कि उसकी पैंट फट चुकी थी और मांस से खून रिस रहा था।

अचानक, जीप का रेडियो, जो बंद पड़ा था, एक भयानक चरचराहट के साथ अपने आप चालू हो गया।

खड़-खड़... सर्रर्र...

रेडियो के स्पीकर्स से कोई सामान्य स्टेशन नहीं बज रहा था। उसमें से 1940 के दौर का वही पुराना, उदास और बेसुरा पियानो बजने लगा। उस धुन के पीछे-पीछे दर्जनों औरतों के विलाप और किसी जलते हुए इंसान की चीखें साफ सुनाई दे रही थीं।

कबीर ने अपना एक हाथ बढ़ाकर रेडियो का नॉब घुमाया और उसे बंद करने की कोशिश की। लेकिन नॉब जाम हो चुका था।

उसी क्षण, पिछली सीट से एक कमजोर, कांपती हुई और सिसकती हुई आवाज आई:
"क... कबीर..."

कबीर ने झटके से शीशे में देखा।

यह आवाज उस शैतान की नहीं थी। यह उसके बचपन के दोस्त, सीधे-सादे और विद्वान अनिकेत की अपनी आवाज थी। अनिकेत की आंखों में सामान्य इंसानी पुतलियां वापस आ गई थीं, जिनमें से बेबसी के आंसू बह रहे थे। उसका पूरा शरीर ऐसे कांप रहा था जैसे उसे मलेरिया का तेज बुखार चढ़ा हो।

"अनिकेत! तुम होश में हो भाई?" कबीर ने जीप की रफ्तार थोड़ी धीमी करते हुए पूछा।

"कबीर... गाड़ी रोको... मुझे... मुझे इस खाई में फेंक दो कबीर!" अनिकेत दोनों हाथों से अपना सिर पकड़कर रो पड़ा। उसकी आवाज में इतना असीम दर्द था कि कबीर का कलेजा मुंह को आ गया।

"तुम होश में नहीं हो अनिकेत, हम दिल्ली जा रहे हैं, वहां उस तांत्रिक संहिता से तुम्हें ठीक कर लिया जाएगा!" कबीर ने ढांढस बंधाने की कोशिश की।

"नहीं कबीर... तुम नहीं समझ रहे!" अनिकेत पागलों की तरह अपनी छाती पीटने लगा। "वह... वह मेरी रीढ़ की हड्डी के भीतर रेंग रहा है! वह पाताल का कीड़ा मेरे दिमाग की एक-एक नस को अपने वश में कर रहा है। जब वह जागता है, तो मैं अपने ही शरीर के भीतर एक बंधक की तरह कैद हो जाता हूँ... मैं सब कुछ देखता हूँ, सुनता हूँ, लेकिन अपनी उंगली भी नहीं हिला पाता! वह... वह दिल्ली जाना चाहता है कबीर... क्योंकि दिल्ली के नेशनल आर्काइव्स में उस संहिता के साथ पाताल शिला का दूसरा, उससे भी बड़ा हिस्सा 'महा-अंध शिला' दफन है! अगर वह वहां पहुंच गया, तो वह पूरे शहर को एक ही रात में श्मशान बना देगा!"

अनिकेत की सांसें उखड़ने लगीं। उसके मुंह से सफेद झाग निकलने लगा।

"कबीर... मेरी पिस्तौल... डैशबोर्ड में रखी है... निकालो और मेरी खोपड़ी में गोली मार दो... इससे पहले कि वह दोबारा जागे... कबीर, मार दो मुझे!" अनिकेत चीख उठा।

"मैं अपने भाई पर गोली नहीं चलाऊंगा अनिकेत! हमने देवदार हवेली के उस नर्क को मात दी है, हम इसे भी हराएंगे!" कबीर ने दृढ़ता से कहा।

लेकिन कबीर के ये शब्द हवा में खत्म भी नहीं हुए थे कि अनिकेत का शरीर एक भयानक झटके के साथ सीधा तन गया।

उसकी गर्दन में 'कड़कड़ाहट' की आवाज हुई। उसकी आंखों की पुतलियां एक सेकंड के भीतर फिर से पूरी तरह गायब हो गईं और उनकी जगह स्याह, अंधी कालिख ने ले ली। उसके चेहरे की रोती हुई मुद्रा अचानक एक कुटिल, अमानवीय और घिनौनी मुस्कान में बदल गई।

"हाहाहा! बड़ा भाईचारा है तुम दोनों में!"

वह आवाज फिर से बदल चुकी थी। वह पाताल के उस प्राचीन परजीवी शैतान की वही दोहरी, भारी और भयानक आवाज थी।

इससे पहले कि कबीर कुछ समझ पाता, अनिकेत ने बिजली की तेजी से पिछली सीट से छलांग लगाई और अपने दोनों लोहे जैसे पंजों से कबीर की गर्दन को पीछे से दबोच लिया!

घोंssssट!

अनिकेत के नाखूनों ने कबीर के गले की त्वचा को चीर दिया। कबीर की सांसें एक झटके में रुक गईं। उसकी आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा। कबीर के पैरों ने नियंत्रण खो दिया और जीप का एक्सीलेटर दब गया।

जीप 120 की रफ्तार से कोहरे में दौड़ पड़ी। सामने एक अंधा मोड़ था जिसके पार 500 फीट गहरी खाई थी!

"मर जाओ कबीर! तुम्हारा रक्त इस रास्ते को पवित्र करेगा!" शैतान अनिकेत के मुंह से दहाड़ रहा था।

कबीर का दम घुट रहा था। उसकी जीभ बाहर आने को हो गई थी। उसने अपनी पूरी जान लगाकर अपने दाहिने हाथ से जीप का हैंडब्रेक ऊपर की ओर खींच दिया और स्टीयरिंग को बाईं ओर पहाड़ी की दीवार की तरफ मोड़ दिया!

चीssssख! धड़ाम!

टायरों के जलने की भयानक बदबू के साथ जीप सड़क पर तीन बार घूमी और उसका बायां हिस्सा सीधे पहाड़ की पथरीली दीवार से जा टकराया। जोरदार झटके से अनिकेत का सिर जीप की छत से टकराया और उसकी पकड़ कबीर के गले से ढीली पड़ गई।

कबीर ने खांसते हुए अपनी सीटबेल्ट खोली और हांफते हुए ताजी हवा को अपने फेफड़ों में खींचा।

गाड़ी रुक चुकी थी। कबीर ने तुरंत अपनी जेब से वह पवित्र तांबे की चाबी निकाली और पीछे मुड़कर सीधे अनिकेत के माथे पर अड़ा दी।

छनन्नन!

नीली चिंगारी फूटी और अनिकेत का शरीर निष्प्राण होकर पिछली सीट पर गिर पड़ा। वह बेहोश हो चुका था, लेकिन उसकी सांसें बहुत तेज-तेज चल रही थीं।

कबीर ने कांपते हाथों से जीप को दोबारा स्टार्ट करने की कोशिश की। इंजन ने एक घुरघुराहट की और बंद हो गया। कबीर की नजर डैशबोर्ड के फ्यूल गेज पर गई।

सुई बिल्कुल लाल निशान से नीचे जा चुकी थी। एक्सीडेंट के झटके से जीप की फ्यूल लाइन लीक हो गई थी और सारा पेट्रोल सड़क पर बह चुका था।

कबीर ने बाहर देखा। वे पहाड़ों की तलहटी में, कालका और पिंजौर के बीच किसी सुनसान जंगली इलाके में थे। समय हो रहा था—सुबह के 04:20 AM।

सड़क के किनारे, घने कोहरे के बीच लगभग पचास मीटर आगे एक मंद, पीली रोशनी टिमटिमा रही थी। वहां लोहे के खंभे पर एक पुराना, जंग लगा बोर्ड लटका था—'हिमाचल पंजाबी ढाबा — 24 घंटे खुला'।

कबीर ने राहत की सांस ली। उसे जीप के लिए ईंधन (डीजल/पेट्रोल) और अनिकेत के घावों के लिए साफ पानी और प्राथमिक उपचार की सख्त जरूरत थी।

उसने जीप की पिछली सीट पर पड़े अनिकेत को देखा। अनिकेत अभी बेहोश था, लेकिन कबीर कोई जोखिम नहीं ले सकता था। उसने अनिकेत के दोनों हाथों को सीटबेल्ट के मजबूत पट्टे से बांध दिया और जीप की चारों खिड़कियों को पूरी तरह चढ़ाकर ताला लगा दिया।

उसने अपनी जेब से वह त्रिकोणीय काला पत्थर निकाला। वह पत्थर अब पहले से ज्यादा गर्म था और उसका वजन किसी तोप के गोले जैसा भारी महसूस हो रहा था। कबीर ने उसे अपनी जेब में गहराई से दबाया, हाथ में लोहे की एक भारी रॉड थामी और कोहरे को चीरते हुए उस ढाबे की ओर बढ़ गया।

ढाबा बेहद पुराना और वीरान लग रहा था। एस्बेस्टस की टूटी हुई छत के नीचे कनातें लटकी थीं। बाहर तीन पुराने, धूल से सने ट्रक खड़े थे जिनके शीशे टूटे हुए थे। ढाबे के सामने एक बड़ा सा चूल्हा जल रहा था, जिस पर चाय की एक विशाल तांबे की केतली खौल रही थी।

खद-बद... खद-बद...

चारों तरफ एक अजीब सा, भारी सन्नाटा था। न तो कोई ढाबे वाला नजर आ रहा था और न ही कोई ट्रक ड्राइवर।

"कोई है?" कबीर ने अपनी भारी आवाज में पुकारा। उसकी आवाज सन्नाटे में गूंजकर लौट आई। "मुझे गाड़ी के लिए पेट्रोल चाहिए... कोई है यहाँ?"

कोई जवाब नहीं आया। केवल चूल्हे में जलती लकड़ियों की 'चट-चट' आवाज आ रही थी।

कबीर ढाबे के भीतर रखे लकड़ी के गंदे मेज-कुर्सियों के बीच से होता हुआ काउंटर की तरफ बढ़ा। काउंटर पर एक पुराना रेडियो रखा था, और उस पर भी वही मनहूस पियानो की धुन बज रही थी जो कबीर की जीप में बजी थी!

कबीर के कदम ठिठक गए। उसके रोंगटे खड़े हो गए।

तभी, ढाबे के पिछले हिस्से (रसोई) के पर्दे में हलचल हुई।

पर्दा हटा और एक अधेड़ उम्र का, भारी शरीर वाला ढाबा मालिक बाहर निकला। उसके पीछे दो नौजवान लड़के और तीन ट्रक ड्राइवर भी बाहर आए। उनके कपड़े गंदे और फटे हुए थे।

"साहब... क्या चाहिए?" ढाबा मालिक ने पूछा।

लेकिन जैसे ही कबीर ने उन लोगों के चेहरों को देखा, उसके हाथ से लोहे की रॉड लगभग छूट ही गई।

उन पांचों आदमियों की गर्दनें एक अजीब, अप्राकृतिक कोण पर दाईं ओर 45 डिग्री मुड़ी हुई थीं, जैसे किसी ने उनकी गर्दन की हड्डियां तोड़ दी हों। उनकी आंखें सामान्य नहीं थीं; उनकी आंखों की पुतलियां पूरी तरह से दूधिया-सफेद थीं, जिनमें कोई जीवन, कोई भाव नहीं था। उनके मुंह से गाढ़ा, बदबूदार लार टपककर उनकी कमीजों पर गिर रहा था।

और उनके हाथों में... बड़े-बड़े कसाई वाले छुरे, लोहे की भारी जंजीरें और जलती हुई लकड़ियां थीं!

कबीर ने अपनी जेब पर हाथ रखा। वह त्रिकोणीय काला पत्थर उसकी जेब के भीतर पागलों की तरह तेजी से धड़क रहा था—धक-धक-धक-धक!

कबीर समझ गया। उस काले पत्थर की शैतानी तरंगें इतनी शक्तिशाली थीं कि उसने कबीर के यहां पहुंचने से पहले ही इस पूरे ढाबे के इंसानों की आत्माओं को कुचलकर उनके शरीरों को अपना कठपुतली (Zombies/Possessed) बना लिया था!

"अंश-शिला... हमारे स्वामी का हृदय... हमें सौंप दो..."

वे पांचों आदमी एक साथ, एक ही भयानक और सपाट आवाज में बोले। उनके जबड़े अजीब तरह से हिल रहे थे।

इससे पहले कि कबीर पीछे मुड़कर भाग पाता, ढाबा मालिक ने अपने हाथ का भारी छूरा पूरी ताकत से कबीर की ओर फेंका। छूरा कबीर के कान को छूता हुआ पीछे लकड़ी के खंभे में धंस गया।

कबीर ने बिना एक पल गंवाए अपने हाथ की लोहे की रॉड से सामने खड़े एक लड़के के हाथ पर वार किया और उसे गिरा दिया। लेकिन वे इंसान दर्द महसूस नहीं कर रहे थे। टूटा हुआ हाथ होने के बावजूद वह लड़का जमीन से तुरंत उठा और अपनी उंगलियों से कबीर का पैर पकड़ने लगा।

कबीर पीछे की ओर हटा। उसने जलते हुए चूल्हे के पास रखी खौलती हुई चाय की तांबे की केतली उठाई और पूरी ताकत से उन हमलावरों के चेहरों पर फेंक दी!

छपाक... फुस्स!

खौलता हुआ पानी और चाय पत्ती उनके चेहरों पर पड़ी, लेकिन वे चीखे भी नहीं। उनकी सफेद चमड़ी जलकर फफोले बन गई, फिर भी वे अपनी वही सफेद आंखों से घूरते हुए आगे बढ़ते रहे।

तभी, बाहर से एक भयानक कांच टूटने की आवाज आई!

कड़ाssssक!

कबीर ने खिड़की से देखा। उसकी जीप का पिछला शीशा अंदर से चकनाचूर हो चुका था।

और उस टूटे हुए शीशे से... डॉ. अनिकेत बाहर रेंग रहा था!

अनिकेत अब अपने पैरों पर नहीं चल रहा था। वह किसी चौपाया जानवर या मकड़ी की तरह, अपनी छाती को जमीन की तरफ और अपने हाथ-पैरों को उल्टा मोड़कर बर्फ और कीचड़ पर तेजी से दौड़ता हुआ ढाबे की ओर आ रहा था। उसके मुंह से अमानवीय, घिनौनी गुर्राहट निकल रही थी।

"कबीर! तू मुझसे भाग नहीं सकता!" अनिकेत का शरीर ढाबे के दरवाजे को तोड़ता हुआ अंदर आ गिरा।

ढाबे के वे पांचों वश में आए लोग अनिकेत को देखते ही जमीन पर घुटनों के बल बैठ गए, मानो अपने साक्षात ईश्वर के सामने नतमस्तक हो गए हों।

अनिकेत की काली आंखें कबीर पर टिक गईं। उसका चेहरा अब अनिकेत जैसा लग ही नहीं रहा था; उसकी त्वचा काली पड़ चुकी थी और उसके नाखूनों से काले रंग का जहर टपक रहा था।

"तूने देखा कबीर? यह तो केवल एक छोटा सा नमूना है," अनिकेत की दोहरी आवाज गूंजी। "जैसे-जैसे हम दिल्ली के करीब पहुंच रहे हैं, मेरी शक्ति बढ़ती जा रही है। यह पूरा देश, यह पूरी मानवता मेरी दास बनेगी! मुझे वह पत्थर दे दो... और मैं तुम्हें अपने इस नए साम्राज्य का पहला सेनापति बनाऊंगा!"

"मैं तेरी इस सड़ी हुई दुनिया की राख पर थूकता हूँ!" कबीर ने दहाड़ते हुए कहा।

कबीर की नजर काउंटर के पीछे रखे 200 लीटर के एक बड़े नीले प्लास्टिक के ड्रम पर पड़ी, जिस पर लाल अक्षरों में लिखा था—'डीजल'।

कबीर ने अपनी जान की अंतिम बाजी लगाने का फैसला किया।

उसने अपनी जेब से लाइटर निकाला। उसके जले हुए अंगूठे ने दर्द के बावजूद लाइटर का पहिया घुमाया। लौ जल उठी।

कबीर ने अपनी लोहे की रॉड से उस डीजल के ड्रम के निचले हिस्से पर पूरी ताकत से प्रहार किया। प्लास्टिक फट गया और गाढ़ा, पीला डीजल पूरे ढाबे के लकड़ी के फर्श पर किसी सैलाब की तरह फैल गया।

"अनिकेत... मुझे माफ करना भाई!" कबीर चिल्लाया।

उसने जलता हुआ लाइटर उस डीजल के ताल पर फेंक दिया!

भभकssss!

एक सेकंड के भीतर पूरा ढाबा आग के एक विशाल, नारंगी बवंडर में बदल गया। आग की लपटें छत को छूने लगीं। वे पांचों वश में आए लोग आग की लपटों में घिरकर तड़पने लगे और उनकी देह जलकर काली पड़ने लगी।

अग्नि की इस प्रचंड लपट को पाताल का वह साया सहन नहीं कर सका। अनिकेत का शरीर आग के ताप से पीछे हटा और दर्द से चीखने लगा।

कबीर आग की दीवार को चीरता हुआ बाहर की ओर कूदा। उसके कपड़े सुलग रहे थे, लेकिन उसने बर्फ पर लुढ़ककर आग बुझाई।

वह तुरंत ढाबे के बाहर खड़े एक पुराने ट्रक के पास पहुंचा। उसने ट्रक के डीजल टैंक की नली तोड़ी और अपनी जीप के खुले कैन में लगभग दस लीटर डीजल भर लिया।

कबीर तेजी से जीप के पास पहुंचा, डीजल को जीप की टंकी में उड़ेला और ड्राइविंग सीट पर कूद गया।

तभी, जलते हुए ढाबे के मलबे से एक जलता हुआ, काला साया बाहर निकला।

वह अनिकेत था! उसका आधा शरीर आग से झुलस चुका था, लेकिन वह अब भी अपनी उसी शैतानी ताकत से जीप की ओर छलांग लगाने के लिए तैयार था।

कबीर ने बिना झिझके जीप का अगला गियर डाला और गाड़ी को सीधे अनिकेत के पास ले जाकर ब्रेक मारा। उसने जीप का बायां दरवाजा खोला और अपनी दोनों बांहों से अनिकेत के जलते हुए शरीर को खींचकर अंदर खींच लिया!

उसने तुरंत सुनैना की वह तांबे की चाबी निकाली और अनिकेत के सीने के ठीक बीच में पूरी ताकत से गाड़ दी!

छनन्नन!

अनिकेत के मुंह से काले धुएं का एक विशाल गुबार निकला और वह जीप के फर्श पर अचेत होकर गिर पड़ा। वह मरा नहीं था, लेकिन तांबे के उस पवित्र प्रहार ने उस शैतान को कुछ घंटों के लिए गहरी मूर्छा में धकेल दिया था।

कबीर ने जीप का एक्सीलेटर दबा दिया।

थार जीप धूल और धुएं को चीरती हुई दिल्ली की ओर जाने वाले नेशनल हाईवे-44 पर 120 की रफ्तार से दौड़ पड़ी।

सुबह के 05:45 AM बज रहे थे।

सर्दियों का धुंधला, मटमैला सवेरा हो रहा था। जीप अब हरियाणा के पानीपत और सोनीपत को पार करते हुए दिल्ली के सिंघु बॉर्डर के करीब पहुंच चुकी थी।

कबीर ने हांफते हुए अपनी जैकेट की जेब में हाथ डाला ताकि वह उस काले पत्थर को देख सके।

लेकिन जैसे ही उसकी उंगलियों ने उस पत्थर को छुआ, कबीर की रूह कांप उठी।

वह पत्थर... जो रात को केवल एक अंगूठे जितना बड़ा था... अब फूलकर एक बड़े सेब के आकार का हो चुका था! उसकी सतह से गाढ़ा, चिपचिपा लाल खून लगातार रिस रहा था जिसने कबीर की पूरी जेब और पैंट को लाल कर दिया था।

और जब कबीर ने सामने दिल्ली के आसमान की ओर देखा, तो सुबह की सुनहरी धूप की जगह... पूरी दिल्ली के क्षितिज पर गहरे, खून जैसे लाल और काले बादलों का एक विशालकाय, घूमता हुआ चक्रवात मंडरा रहा था!

उस चक्रवात का केंद्र सीधे नई दिल्ली के जनपथ रोड पर स्थित 'राष्ट्रीय अभिलेखागार' (National Archives) के ठीक ऊपर टिका हुआ था!

दिल्ली की दहलीज पर मौत और महा-विनाश का सबसे बड़ा चक्रव्यूह उनका इंतजार कर रहा था...

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