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भाग 10: अस्पताल का रहस्य और अनिकेत का बदलता व्यवहार
Piyashi Atma · Haunted Places · 14 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- चीखती खामोशियां: देवदार हवेली का अभिशाप
- Chapter
- 10 of 18
- Category
- Haunted Places
- Reading time
- 14 min
- Words
- 2636
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
पहाड़ी एम्बुलेंस का सायरन आधी रात के सन्नाटे को चीरता हुआ शिमला की संकरी, बर्फीली सड़कों पर गूंज रहा था। बाहर घना कोहरा छाया हुआ था और देवदार के पेड़ एम्बुलेंस की खिड़कियों के पार किसी काले साए की तरह तेजी से पीछे छूट रहे थे।
कबीर एम्बुलेंस की पिछली सीट पर बैठा था। उसके दोनों हाथों पर डॉक्टर ने जलने की दवा लगाकर मोटी सफेद पट्टियां बांध दी थीं। शरीर के हर जोड़ में दर्द की कसक थी, लेकिन उसका ध्यान अपनी शारीरिक पीड़ा पर बिल्कुल नहीं था। उसकी नजरें स्ट्रेचर पर लेटे डॉ. अनिकेत पर टिकी थीं।
अनिकेत के मुंह पर ऑक्सीजन मास्क लगा था और मॉनिटर पर उसकी दिल की धड़कनें अजीब सी अनियमित गति से चल रही थीं—कभी धड़कनें इतनी धीमी हो जातीं कि मशीन की 'बीप... बीप...' रुकने की कगार पर पहुंच जाती, और कभी अचानक इतनी तेज हो जातीं जैसे कोई इंजन पूरी रफ्तार से दौड़ रहा हो।
और सबसे ज्यादा खौफनाक थी अनिकेत के चेहरे पर छाई वह पीली, मृतप्राय शांति। उसके होंठों पर वही रहस्यमयी, सर्द मुस्कान अब भी जमी हुई थी जो उसने होश में आते वक्त कबीर की ओर देखकर बिखेरी थी।
कबीर ने चुपचाप अपनी जैकेट की भीतरी जेब में हाथ डाला। पट्टियों से बंधी उसकी उंगलियां उस त्रिकोणीय काले पत्थर के टुकड़े से टकराईं।
वह पत्थर... वह बर्फ जैसी ठंडी रात में भी किसी दहकते हुए अंगारे की तरह गर्म था। कबीर को अपनी जांघ पर उसकी तीखी तपिश साफ महसूस हो रही थी। और उससे भी ज्यादा विचलित करने वाली बात यह थी कि पत्थर के भीतर की वह लाल नस अब भी एक जीवित हृदय की तरह स्पंदित हो रही थी—धक... धक... धक...।
"यह क्या बला है?" कबीर ने अपने मन में सोचा। पाताल शिला तो उसकी आंखों के सामने त्रिशूल के प्रहार से चकनाचूर हो गई थी। फिर यह टुकड़ा उसकी जेब में कैसे आया? और सुनैना की वह लकड़ी की गुड़िया कहाँ गायब हो गई?
लगभग एक घंटे के सफर के बाद एम्बुलेंस शिमला के पुराने, ब्रिटिश-कालीन संजौली जिला अस्पताल के आपातकालीन द्वार पर आकर रुकी।
यह अस्पताल 1920 के दशक में अंग्रेजों द्वारा बनाया गया था। ऊंची छतें, लंबी संकरी गैलरी, लकड़ी के पुराने फर्श और पीले रंग की मंद रोशनी वाले लैंप इसे किसी पुराने दौर का अवशेष बना रहे थे। वार्ड ब्वॉयज ने तुरंत अनिकेत के स्ट्रेचर को बाहर निकाला और तेजी से गहन चिकित्सा कक्ष (ICU) की ओर ले गए।
ड्यूटी पर तैनात सीनियर सर्जन डॉ. माथुर ने जब अनिकेत की मेडिकल रिपोर्ट और एक्स-रे देखे, तो उनके माथे पर गहरी सिलवटें पड़ गईं।
"यह असंभव है..." डॉ. माथुर ने एक्स-रे प्लेट को रोशनी के सामने घुमाते हुए अविश्वास से सिर हिलाया।
कबीर, जो गलियारे की बेंच पर बैठा था, उठकर डॉक्टर के पास पहुंचा। "क्या हुआ डॉक्टर साहब? अनिकेत ठीक तो है ना?"
डॉ. माथुर ने चश्मा उतारकर कबीर को देखा। "मिस्टर कबीर, जब आपकी जीप के साथ पुलिस आई थी, तो उन्होंने बताया था कि इनके ऊपर कोई भारी मलबा गिरा है और इनकी कम से कम चार पसलियां टूटी हुई थीं। लेकिन इस एक्स-रे को देखिए... पसलियों की हड्डियां ऐसे जुड़ रही हैं जैसे किसी ने उन्हें कुछ ही घंटों में अंदर से वेल्ड कर दिया हो! और इनका आंतरिक रक्तस्राव अपने आप बंद हो चुका है। सामान्य मेडिकल साइंस में किसी इंसान के शरीर का इतनी तेजी से रीजेनरेट (पुनर्जीवित) होना मुमकिन नहीं है।"
डॉक्टर की बात सुनकर कबीर की रीढ़ की हड्डी में ठंडी सिहरन दौड़ गई। वह जानता था कि यह कोई प्राकृतिक चमत्कार नहीं था; यह उस पाताल शिला के संपर्क का अभिशाप था।
"हम इन्हें रात भर ऑब्जर्वेशन में रखेंगे," डॉ. माथुर ने कहा। "आप भी अपने वार्ड में जाकर आराम कीजिए। आपके हाथों का इन्फेक्शन गहरा है, सिस्टर आपको पेनकिलर का इंजेक्शन लगा देंगी।"
रात के करीब डेढ़ बजे कबीर को प्राइवेट वार्ड नंबर 14 में शिफ्ट कर दिया गया।
कमरे में खिड़की के बाहर तेज हवा से चीड़ के पत्तों की खड़खड़ाहट आ रही थी। कमरे की फ्लोरोसेंट ट्यूबलाइट बार-बार झपझपा रही थी—टिक... टिक... भक! कबीर बिस्तर पर लेटा था, लेकिन नींद उसकी आंखों से कोसों दूर थी।
उसने अपनी जेब से वह काला पत्थर निकाला और साइड टेबल पर रख दिया।
अस्पताल की मंद रोशनी में वह पत्थर किसी काले हीरे की तरह चमक रहा था। उसके केंद्र में मौजूद लाल नस अब पहले से ज्यादा चौड़ी हो चुकी थी। कबीर ने जैसे ही अपनी नजरें उस पत्थर पर टिकायीं, उसके कानों में एक बहुत धीमी, मखमली और सम्मोहक फुसफुसाहट गूंजने लगी:
"कबीर... इसे मत छोड़ना... यह अमरत्व की चाबी है... अनिकेत कमजोर था, लेकिन तुम बलवान हो... इसे अपने रक्त से सींचो..."
कबीर ने झटके से अपना सिर हिलाया। उसने अपनी आंखें मींचीं। आवाज रुक गई। लेकिन कबीर समझ गया कि यह पत्थर कोई साधारण खनिज नहीं था; यह उस पाताल के प्राचीन असुर का एक 'जीवित बीज' (Parasitic Core) था, जो अपने आसपास के इंसानों के दिमाग को अपने वश में करने की क्षमता रखता था।
तभी, गलियारे से किसी के तेज कदमों की आवाज और किसी महिला की दबी हुई चीख सुनाई दी।
कबीर तुरंत बिस्तर से उठा। उसने पत्थर को अपनी जेब में वापस डाला और वार्ड का दरवाजा खोलकर बाहर गलियारे में आ गया।
गलियारा पूरी तरह वीरान था, लेकिन दूर आईसीयू के कांच के दरवाजे के बाहर एक युवा नर्स, सिस्टर शालिनी, जमीन पर बैठी थर-थर कांप रही थी। उसके हाथ से दवाइयों की ट्रे छूटकर फर्श पर गिर चुकी थी और कांच की शीशियां टूटकर बिखर गई थीं।
कबीर तेजी से दौड़कर उसके पास पहुंचा। "सिस्टर! क्या हुआ? आप ठीक तो हैं?"
शालिनी ने कांपती हुई उंगली से आईसीयू के बंद कांच के दरवाजे की ओर इशारा किया। उसका चेहरा पूरी तरह सफेद पड़ चुका था और उसकी आवाज गले में अटक रही थी।
"अंदर... वो... वो पेशेंट..." शालिनी ने घबराते हुए कहा। "मैं... मैं उन्हें नींद का इंजेक्शन देने गई थी। लेकिन... लेकिन वो सो नहीं रहे थे। वो बिस्तर पर सीधे पद्मासन में बैठे थे... और उनके दोनों पैर हवा में जमीन से छह इंच ऊपर तैर रहे थे! जब मैंने उन्हें छुआ, तो उनकी देह बर्फ जैसी ठंडी थी... और उन्होंने अपनी आंखें खोलीं... उनकी आंखों में पुतलियां नहीं थीं कबीर साहब! उनकी पूरी आंखें काली थीं... बिल्कुल स्याह कोयले जैसी!"
कबीर का दिल जोर से धड़का। "और क्या हुआ?"
"उन्होंने... उन्होंने मुझसे कुछ नहीं कहा, लेकिन उनके सीने के भीतर से किसी भारी, गूंजती आवाज ने मेरा नाम पुकारा... और जब मैं भागकर बाहर आई, तो दरवाजे का हैंडल अपने आप घूमकर अंदर से लॉक हो गया!"
कबीर ने सिस्टर को संभाला और उसे ड्यूटी रूम में बैठने को कहा। फिर वह आईसीयू के भारी कांच के दरवाजे के सामने आकर खड़ा हो गया।
उसने कांच के पार देखा।
आईसीयू के भीतर सभी लाइटें बुझ चुकी थीं। केवल ईसीजी मॉनिटर की हरी स्क्रीन चमक रही थी। लेकिन मॉनिटर की 'बीप... बीप...' की आवाज सामान्य नहीं थी। कबीर ने ध्यान से सुना। मॉनिटर की बीप ठीक उसी लय में बज रही थी, जिस लय में देवदार हवेली की पहली मंजिल पर वह 80 साल पुराना शापित पियानो बजा करता था!
टिन... टिन... टिन-टिन-टिन...
कबीर ने दरवाजे के पीतल के हैंडल पर हाथ रखा। हैंडल बर्फ की तरह ठंडा था और जाम हो चुका था।
कबीर ने अपनी जेब से वह प्राचीन तांबे की चाबी निकाली, जो उसने सुनैना की गुड़िया से पाई थी। उस चाबी की नोक को उसने दरवाजे के ताले में डाला और पूरी ताकत से घुमाया।
खट!
ताला खुला और दरवाजा एक झटके में अंदर की ओर खुल गया। अंदर कदम रखते ही कबीर को ऐसा लगा मानो उसने किसी मुर्दाघर के डीप-फ्रीजर में प्रवेश कर लिया हो। तापमान शून्य से नीचे जा चुका था। कबीर की सांसों से सफेद धुआं निकल रहा था।
बिस्तर के ऊपर बंधी ड्रिप की बोतल में मौजूद ग्लूकोज का पानी पूरी तरह जमकर ठोस बर्फ बन चुका था।
और बिस्तर पर... डॉ. अनिकेत बैठा हुआ था।
उसके शरीर पर लगे ईसीजी के तार और पट्टियां टूटकर फर्श पर बिखरी पड़ी थीं। अनिकेत के चेहरे की नसें काली पड़कर उसकी गर्दन और गालों पर उभर आई थीं। उसका सिर नीचे की ओर झुका हुआ था।
"अनिकेत?" कबीर ने धीमी, सतर्क आवाज में पुकारा। उसने अपनी मुट्ठी में तांबे की चाबी को मजबूती से जकड़ लिया।
अनिकेत ने धीरे-धीरे अपना सिर उठाया।
उसका चेहरा देखकर कबीर के रोंगटे खड़े हो गए। सिस्टर शालिनी का कहना बिल्कुल सच था। अनिकेत की आंखों की सफेद पुतलियां पूरी तरह गायब हो चुकी थीं; उनकी जगह केवल दो गहरे, असीम अंधकार से भरे काले गड्ढे थे। उसके चेहरे पर वही शैतानी, सर्द मुस्कान तैर रही थी।
"अनिकेत अब सो रहा है, कबीर," अनिकेत के मुंह से आवाज निकली।
लेकिन वह केवल अनिकेत की आवाज नहीं थी। अनिकेत की परिचित आवाज के नीचे एक अत्यंत प्राचीन, भारी और पाताल जैसी दोहरी गूंज (Dual Demonic Resonance) साफ सुनाई दे रही थी—वही आवाज जो हवेली के तहखाने में गूंजती थी!
"तुम... तुम पाताल शिला का साया हो!" कबीर ने घृणा और दृढ़ता से कहा। "शिला नष्ट हो चुकी है! तुम अनिकेत के शरीर में क्या कर रहे हो? उसे छोड़ दो!"
"नष्ट?" वह साया एक भयानक, धीमी हंसी हंसा। उसकी हंसी से आईसीयू की कांच की खिड़कियां थरथराने लगीं।
"तुच्छ मनुष्य... क्या तुमने सचमुच यह सोच लिया था कि तांबे के एक खिलौने से उस आदिम शक्ति का अंत हो सकता है जो इस पृथ्वी के जन्म से पहले इस ब्रह्मांड के अंधकार में तैर रही थी? ठाकुर विक्रम सिंह एक कमजोर पात्र था... उसका लालच घटिया था। लेकिन अनिकेत... अनिकेत एक विद्वान है! इसके मस्तिष्क में तंत्र, इतिहास और ब्रह्मांड की प्राचीन रेखाओं का ज्ञान है। इसने मुझे वह शरीर दिया है जिसकी मुझे सदियों से तलाश थी!"
अनिकेत का शरीर धीरे-धीरे बिस्तर से ऊपर उठा और हवा में तैरता हुआ फर्श पर उतरा। उसके कदम जमीन को छू नहीं रहे थे; वह हवा में एक इंच ऊपर फिसल रहा था।
वह कबीर की तरफ बढ़ा।
"लेकिन मुझे मेरा पूरा रूप पाने के लिए वह चाहिए जो तुम्हारी जेब में है, कबीर," अनिकेत की आवाज में एक असहनीय खिंचाव पैदा हुआ। उसकी काली आंखें सीधे कबीर की जेब पर टिक गईं।
"वह 'अंश-शिला' है... मेरा हृदय! उसे मुझे सौंप दो कबीर। मैं तुम्हें वचन देता हूँ... मैं तुम्हें वह ज्ञान दूंगा जिससे तुम मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लोगे। हम दोनों मिलकर इस संसार के नियमों को बदल देंगे!"
"कभी नहीं!" कबीर अपनी जगह पर अडिग खड़ा रहा। उसने अपनी जेब पर हाथ रख लिया। "मैंने सुनैना, राजेश्वरी और उन 40 मासूमों की रूहों से वादा किया है कि मैं इस अभिशाप का समूल नाश करूंगा। तू चाहे अनिकेत के शरीर में छिप जा या पाताल की किसी खाई में... मैं तुझे इस धरती पर नहीं रहने दूंगा!"
"तो फिर तू भी मरेगा!" अनिकेत का चेहरा क्रोध से भयानक रूप से विकृत हो गया।
उसने अपना दाहिना हाथ हवा में उठाया।
अचानक आईसीयू में रखी स्टील की ट्रे, कैंची, सर्जिकल ब्लेड और कांच की दवाइयों की बोतलें हवा में उड़ने लगीं। वे सभी नुकीले हथियार किसी अदृश्य चुंबक की तरह कबीर की छाती और आंखों की ओर सीधे तन गए।
सननन!
एक भारी सर्जिकल कैंची पूरी गति से कबीर के चेहरे की ओर लपकी। कबीर ने फुर्ती से अपना सिर झुकाया। कैंची उसके कान को छूती हुई पीछे की लकड़ी की दीवार में दो इंच गहरी धंस गई।
कबीर समझ गया कि अनिकेत के भीतर मौजूद वह शैतान अब पूरी तरह आक्रामक हो चुका था। अगर उसने अनिकेत पर सीधे हथियार से हमला किया, तो अनिकेत का अपना शरीर नष्ट हो जाएगा और उसका दोस्त हमेशा के लिए मारा जाएगा। उसे शैतान को दबाना था, अनिकेत को बचाना था।
कबीर ने अपनी जेब में हाथ डाला। उसने वह त्रिकोणीय काला पत्थर नहीं निकाला; बल्कि उसने अनिकेत के थैले से बची हुई वह सिद्ध तांत्रिक भस्म और गंगाजल की छोटी शीशी निकाली जो अनिकेत ने बगीचे में उपयोग की थी।
कबीर ने अपने दोनों जले हुए हाथों की पीड़ा को भुलाते हुए आगे की ओर छलांग लगाई।
उड़ते हुए सर्जिकल औजारों की परवाह किए बिना, कबीर सीधे अनिकेत के सामने पहुंचा। अनिकेत ने अपने काले पंजों से कबीर का गला घोंटने के लिए हाथ आगे बढ़ाए। कबीर की सांस रुकने ही वाली थी कि कबीर ने अपनी हथेली में भरी सिद्ध भस्म और गंगाजल को सीधे अनिकेत के माथे पर, जहां उसका 'आज्ञा चक्र' (तीसरी आंख का स्थान) होता है, पूरी ताकत से मल दिया!
साथ ही, कबीर ने सुनैना की उस तांबे की चाबी को सीधे अनिकेत के सीने पर दबा दिया।
छपाक... भभक!
एक तेज नीली बिजली की चिंगारी फूटी। अनिकेत के माथे से सफेद धुआं निकलने लगा, जैसे किसी ने जलता हुआ कोयला उसकी त्वचा पर रख दिया हो।
"आaaaaah!"
अनिकेत के मुंह से वह शैतानी आवाज दर्द से चीख उठी। अनिकेत का शरीर हवा से नीचे गिर पड़ा। वह फर्श पर तड़पने लगा। उसकी आंखों का काला रंग धीरे-धीरे हटने लगा और सामान्य इंसानी पुतलियां वापस लौटने लगीं।
कमरे में उड़ रहे सभी सर्जिकल औजार और कांच के टुकड़े एक साथ फर्श पर गिरकर चकनाचूर हो गए।
अनिकेत हांफते हुए, अपनी छाती को पकड़कर घुटनों के बल बैठ गया। उसका शरीर पसीने से नहा चुका था। उसकी नजरें कबीर पर पड़ीं। इस बार उसकी आंखों में वह शैतानी खौफ नहीं था; वहां केवल उसका पुराना, दर्द से कराहता हुआ दोस्त अनिकेत था।
"क... कबीर..." अनिकेत की आवाज बेहद कमजोर और कांपती हुई थी। "वह... वह मेरे भीतर घुस गया है कबीर... जब शिला फटी थी, तो उसका एक सूक्ष्म कण मेरी टूटी पसलियों के घाव से मेरे रक्त में समा गया... मैं... मैं अपनी चेतना खो रहा हूँ..."
कबीर ने तुरंत झुककर अनिकेत को अपने बाहों में सहारा दिया। "अनिकेत! शांत रहो, मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूंगा। बताओ, इसे तुम्हारे शरीर से कैसे बाहर निकाला जाए?"
अनिकेत ने कांपते हाथों से कबीर की जैकेट पकड़ी। उसके मुंह से खून का एक कतरा फिर बाहर आया।
"यहाँ शिमला में कोई इसका इलाज नहीं कर सकता..." अनिकेत ने हांफते हुए कहा। "दिल्ली... दिल्ली के 'राष्ट्रीय अभिलेखागार' (National Archives) के भूमिगत तहखाने में 1939 की उस तिब्बती तांत्रिक पांडुलिपि का दूसरा भाग रखा है... 'महाकाल भैरव संहिता'। उस ग्रंथ में 'रक्त-शोधन' और आत्मा से परजीवी साए को खींचने का अंतिम अनुष्ठान दर्ज है... हमें तुरंत दिल्ली निकलना होगा कबीर... इससे पहले कि वह साया मेरे मस्तिष्क पर पूरी तरह कब्जा कर ले!"
कबीर ने कमरे की स्थिति देखी। फर्श पर खून, टूटे हुए कांच और बिखरे औजार फैले थे। अगर पुलिस या अस्पताल प्रशासन ने यह सब देख लिया, तो वे अनिकेत को किसी पागलखाने या जेल में बंद कर देंगे और उनका दिल्ली पहुंचना नामुमकिन हो जाएगा।
समय उनके खिलाफ था।
"हम अभी निकल रहे हैं," कबीर ने फैसला किया।
कबीर ने अनिकेत को सहारा देकर खड़ा किया। उसने वार्ड के पिछले इमरजेंसी एग्जिट (आपातकालीन सीढ़ी) का रास्ता चुना। अस्पताल का पिछला दरवाजा सीधे पार्किंग एरिया में खुलता था, जहां कबीर की महिंद्रा थार जीप खड़ी थी।
कबीर ने अनिकेत को जीप की पिछली सीट पर लिटाया और उसके ऊपर एक भारी कंबल डाल दिया। उसने खुद ड्राइविंग सीट संभाली। उसके हाथों की पट्टियों पर खून रिस रहा था, लेकिन उसने दांत भींचकर स्टीयरिंग व्हील को थाम लिया।
जीप का इंजन गरजा और गाड़ी शिमला के बर्फीले ढलानों को पार करती हुई दिल्ली-चंडीगढ़ राष्ट्रीय राजमार्ग की ओर दौड़ पड़ी।
रात के तीन बज रहे थे। चारों तरफ गहरा, डरावना अंधकार था।
गाड़ी चलाते हुए कबीर ने राहत की सांस लेने के लिए डैशबोर्ड के ऊपर लगे रियर-व्यू मिरर (पीछे देखने वाले शीशे) पर नजर डाली ताकि वह देख सके कि अनिकेत सो रहा है या नहीं।
लेकिन जो दृश्य कबीर ने उस शीशे में देखा, उसने उसके पैरों के नीचे से ब्रेक दबाने की ताकत भी छीन ली।
पिछली सीट पर लेटा अनिकेत कंबल से बाहर निकल चुका था। वह खिड़की के शीशे की ओर मुंह किए बैठा था। उसकी उंगली से ताजा खून बह रहा था... और वह अपने उस खूनी उंगली से जीप की खिड़की के पारदर्शी कांच पर वही प्राचीन, भयानक पाताल शिला का त्रिकोणीय तांत्रिक प्रतीक बना रहा था!
और जब उसने शीशे में कबीर की घूरती हुई आंखों को देखा, तो अनिकेत ने अपनी गर्दन को एक झटके में 90 डिग्री के कोण पर टेढ़ा किया और अपने होंठों पर उंगली रखकर फुसफुसाया:
"शsssssh... कबीर... हम दिल्ली जा रहे हैं... और दिल्ली अब श्मशान बनेगी..."
कबीर की जीप 100 की रफ्तार से अंधकार में दौड़ रही थी, और उसके भीतर बैठा शैतान अब पूरे देश की राजधानी की ओर बढ़ रहा था!