PretikaHaunted Placesचीखती खामोशियां: देवदार हवेली का अभिशाप

भाग 9: महा-विस्फोट: पाताल शिला का विखंडन और 03:00 AM का अंतिम संहार

Piyashi Atma · Haunted Places · 13 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
चीखती खामोशियां: देवदार हवेली का अभिशाप
Chapter
9 of 18
Category
Haunted Places
Reading time
13 min
Words
2402
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

समय का पहिया उस एक बिंदु पर आकर जैसे पूरी तरह ठहर गया था।

कबीर की कलाई पर बंधी घड़ी की लाल डिजिटल स्क्रीन पर अंतिम सेकंड्स का खेल चल रहा था—02:59:59 AM... और फिर एक सूक्ष्म टिक के साथ स्क्रीन पर अंक बदल गए—03:00:00 AM!

ठीक उसी सहस्रांश (मिलीसेकंड) पर, कबीर के दोनों जले हुए, लहूलुहान हाथों ने अपनी आत्मा की समस्त ऊर्जा को समेटकर उस सिद्ध तांबे के त्रिशूल को आगे की ओर झोंक दिया।

कड़ाssssक!

त्रिशूल के तीनों भालों की नुकीली नोक सीधे उस पंद्रह फीट ऊंची पाताल शिला की विशाल, धड़कती हुई लाल आंख के ठीक केंद्र में धंस गई।

उस वार का प्रभाव ऐसा था मानो दो विशाल आकाशीय पिंड अंतरिक्ष में पूरी गति से आपस में टकरा गए हों। एक सेकंड के दसवें हिस्से के लिए तहखाने का पूरा अंधकार एक अंधा कर देने वाली, दूधिया-सफेद रोशनी के महा-विस्फोट में विलीन हो गया। कबीर को ऐसा लगा जैसे उसकी आंखों के रेटिना जल गए हों; रोशनी इतनी तीव्र थी कि उसे अपने हाथों की नसें और हड्डियां तक त्वचा के आर-पार पारदर्शी दिखाई देने लगीं।

फिर, वह ध्वनि उठी।

वह किसी सामान्य विस्फोट की गड़गड़ाहट नहीं थी। वह पाताल लोक के किसी प्राचीन, भूखे दैत्य के सीने में सीधे त्रिशूल उतरने की असहनीय, कानफोड़ू और अमानवीय चीख थी। उस चीख के कंपन से तहखाने की ग्रेनाइट की पथरीली छत में मकड़ी के जाले की तरह चौड़ी दरारें पड़ने लगीं।

सड़ssss... भभक!

पाताल शिला की उस फूटी हुई आंख से खून नहीं, बल्कि पिघला हुआ काला लावा और बैंगनी रंग की विषैली गैस का एक विशाल फव्वारा छूटा। वह तेजाबी लावा इतनी तेजी से बाहर निकला कि कबीर के सीने पर बंधी जैकेट का कपड़ा जलकर धुआं हो गया। लेकिन कबीर ने त्रिशूल के हत्थे को नहीं छोड़ा। उसने अपने पैरों को शिला के चबूतरे पर जमाए रखा और त्रिशूल को और गहरा, शिला के हृदय के भीतर घुमा दिया।

"ॐ नमः शिवाय! हे महाकाल... इस अंधकार का संहार करो!" कबीर अपने फटे हुए गले से पूरी शक्ति से गर्जना कर उठा।

त्रिशूल के मध्य में जड़े हुए उस तांत्रिक ताबीज से गंगाजल और भस्म की शक्ति प्रस्फुटित हुई। त्रिशूल से सुनहरी बिजली की सैकड़ों शाखाएं निकलीं और वे शिला के भीतर नसों की तरह फैलने लगीं।

उधर, चबूतरे के दूसरी ओर खड़ा ठाकुर विक्रम सिंह का 12 फीट ऊंचा महा-दैत्य रूप दर्द से छटपटाने लगा।

जैसे ही शिला की आंख विदीर्ण हुई, ठाकुर के काले, पाषाण-रूपी शरीर से जुड़ी ऊर्जा की डोरियां एक-एक करके कटने लगीं। उसकी विशाल गदा हाथ से छूटकर नीचे गिर पड़ी। उसकी चौड़ी छाती के भीतर फंसे उन 40 अभागे इंसानों और नौकरों के चेहरे एक-एक करके उस काले मांस से बाहर निकलने लगे। उनकी आंखों का खौफ अब शांत हो रहा था; वे मुक्त हो रहे थे।

"नहीं! नहीं! 86 साल की तपस्या... मेरा अमरत्व... यह नहीं हो सकता!" ठाकुर की आवाज किसी ढहते हुए पहाड़ की तरह गूंजी।

उसने अपने चारों पंजे फैलाए और अपनी बची-खुची शैतानी ताकत से कबीर की ओर एक आत्मघाती छलांग लगाई ताकि कबीर की खोपड़ी को अपने पंजों से मसल सके।

लेकिन इससे पहले कि ठाकुर का पंजा कबीर के सिर तक पहुंच पाता, हवा में नीली और सफेद रोशनी का एक अलौकिक बवंडर घूमा।

उस बवंडर के भीतर से दो रूहें प्रकट हुईं।

एक थी नन्हीं राजकुमारी सुनैना, और दूसरी थी सफेद दिव्य वस्त्रों में लिपटी रानी राजेश्वरी!

राजेश्वरी के चेहरे पर अब कोई शैतानी विकृति नहीं थी। उसका चेहरा एक राजपूतानी रानी के असीम तेज और गरिमा से दमक रहा था। सुनैना अपनी मां की उंगली पकड़े हुए थी। दोनों मां-बेटी ने हवा में तैरते हुए ठाकुर के उस जलते हुए, विकराल साए को अपने दोनों हाथों से थाम लिया।

"विक्रम..." रानी राजेश्वरी की आवाज तहखाने के सन्नाटे में किसी शांत संगीत की तरह गूंजी। "लालच का यह खेल अब समाप्त हो चुका है। तुमने हमारे संसार को नर्क बनाया, लेकिन अब हमारे प्रायश्चित का समय आ गया है। इस निर्दोष बालक को छोड़ दो... और हमारे साथ उस अनंत अंधकार में चलो जहाँ से कोई वापस नहीं आता।"

"अम्मा... बापू को क्षमा कर दो... अब हमें शांति चाहिए," सुनैना ने रोते हुए अपने पिता के उस खौफनाक, जलते हुए चेहरे पर अपना नन्हा हाथ रख दिया।

अपनी बेटी और पत्नी के पवित्र स्पर्श ने ठाकुर के उस महा-दैत्य रूप के भीतर बची 86 साल पुरानी इंसानी चेतना को झकझोर दिया। ठाकुर के अंगारे जैसे लाल नेत्रों से अचानक पश्चाताप के खारे, खूनी आंसू बह निकले। उसके सिर के सींग टूटने लगे और उसका 12 फीट का विकराल ढांचा तेजी से सिकुड़कर एक साधारण बूढ़े इंसान के साए में बदलने लगा।

ठाकुर विक्रम सिंह ने अपने दोनों कांपते हाथ जोड़े। उसने दूर खड़े, त्रिशूल थामे कबीर की ओर देखा।

"मुझे... मुझे क्षमा कर दो, पुत्र..." ठाकुर के होंठों से एक धीमी, कांपती फुसफुसाहट निकली। "तुमने... तुमने इस अभिशाप को काट दिया..."

अगले ही पल, सुनैना, राजेश्वरी और ठाकुर—तीनों के साए एक साथ दिव्य सफेद रोशनी के एक विशाल पुंज में समा गए। वह पुंज हवा में एक परिक्रमा लगाकर आसमान की ओर विलीन हो गया। उनके साथ ही तहखाने में लटकी हुई उन 40 अभागे नौकरों और मुसाफिरों की रूहें भी नीली तितलियों की तरह रोशनी बनकर ऊपर की ओर उड़ गईं।

86 साल पुराना प्रेत-बंधन टूट चुका था।

लेकिन पाताल शिला का विनाश अभी अपनी अंतिम और सबसे खतरनाक अवस्था में था।

कड़कड़ाssssहट! धड़ाम!

त्रिशूल के प्रचंड प्रहार से पाताल शिला की काली चट्टान के बीचों-बीच एक विशाल दरार पड़ी। दरार से लाल और काली ज्वालाएं बाहर निकलने लगीं। शिला की आंतरिक संरचना किसी पुराने परमाणु रिएक्टर की तरह चरमराने लगी थी। वह अब फटने वाली थी!

कबीर ने अपने दोनों हाथ त्रिशूल से हटाए। आघात के प्रतिघात (Recoil) ने कबीर को हवा में उछालकर दस फीट दूर पत्थरों के ढेर पर फेंक दिया।

कबीर हांफते हुए, कोहनियों के बल घिसटता हुआ उठा। उसका पूरा शरीर लहूलुहान था, सिर से बहता खून उसकी बाईं आंख को धुंधला कर रहा था। लेकिन उसकी नजर तुरंत तहखाने के कोने में दीवार के सहारे पड़े डॉ. अनिकेत पर गई।

अनिकेत निष्प्राण से पड़े थे। उनका बायां हाथ मुड़ा हुआ था, छाती से खून का रिसाव हो रहा था और उनका चेहरा पूरी तरह पीला पड़ चुका था।

"अनिकेत!" कबीर अपनी सारी बची हुई ताकत लगाकर पागलों की तरह घिसटता हुआ अनिकेत के पास पहुंचा।

उसने अनिकेत की कलाई थामी। नाड़ी की धड़कन इतनी धीमी और कमजोर थी कि उसे महसूस करने के लिए कबीर को अपनी सांसें रोकनी पड़ीं।

धम... धम... कड़ाक!

तहखाने की 20 फीट ऊंची छत से एक कार के आकार का विशाल पत्थर ठीक उस जगह गिरा जहां कुछ सेकंड पहले कबीर खड़ा था। पूरी देवदार हवेली की नींव अब पाताल कुंड के भीतर धंस रही थी। तीन मंजिला इमारत का भारी वजन अब नीचे की ओर गिर रहा था। अगर वे अगले दो मिनट के भीतर इस तहखाने से बाहर नहीं निकले, तो वे दोनों जीवित ही इस पाषाण कब्र में दफन हो जाएंगे।

"अनिकेत... उठना होगा भाई! हम हार नहीं सकते... हमने कर दिखाया अनिकेत!" कबीर ने रोते हुए अनिकेत के गालों को थपथपाया।

अनिकेत की पलकें थोड़ी सी कांपीं। उसने अपनी आधी खुली आंखों से कबीर को देखा। उसके होंठों से केवल एक फुसफुसाहट निकली: "क... कबीर... शिला... फट रही है... भागो..."

कबीर ने एक क्षण भी व्यर्थ नहीं किया। उसने अपने जले हुए, दर्द से फटने वाले हाथों से अनिकेत के भारी शरीर को अपने दाहिने कंधे पर लाद लिया।

जैसे ही कबीर अनिकेत का वजन लेकर उठा, उसकी रीढ़ की हड्डी में असहनीय दर्द की बिजली कौंध गई। उसकी दोनों हथेलियों से ताजा खून टपककर अनिकेत की कमीज को भिगोने लगा। लेकिन कबीर ने अपने होंठ इतने जोर से भींच लिए कि उसके मसूड़ों से खून निकल आया।

उसने तहखाने के पिछले हिस्से में बनी उस संकरी जल-सुरंग की ओर कदम बढ़ाए, जो सीधे बाहर बलि के कुएं की ओर जाती थी।

पीछे चबूतरे पर... पाताल शिला का महा-विस्फोट हुआ!

बूमssss!

एक ऐसा भयानक धमाका हुआ जिसने धरती के सीने को हिलाकर रख दिया। पाताल शिला कांच के करोड़ों सुलगते हुए टुकड़ों की तरह चारों दिशाओं में बिखर गई। उन टुकड़ों से निकलने वाली काली अग्नि ने तहखाने के खंभों को एक ही झटके में भस्म कर दिया। हवा के दबाव का ऐसा प्रचंड झोंका उठा कि कबीर और अनिकेत उस संकरी सुरंग के मुहाने के भीतर दस फीट दूर जा गिरे।

कबीर ने अनिकेत के ऊपर खुद को ढाल बनाकर ढक लिया। पीछे तहखाना पूरी तरह ढह गया; लाखों टन मलबा और पत्थर गिरकर उस नरक-कुंड को हमेशा के लिए बंद कर चुके थे।

सुरंग के भीतर घुप्प अंधेरा था और धूल का ऐसा घना गुबार था कि सांस लेना नामुमकिन लग रहा था। कबीर ने अनिकेत को घसीटते हुए आगे बढ़ाना शुरू किया।

सुरंग में अब कोई बर्फीला पानी नहीं था; पाताल शिला के नष्ट होते ही सारा पानी सूख चुका था। कबीर अपने घुटनों और कोहनियों के बल अनिकेत को खींचता हुआ आगे बढ़ रहा था। हर इंच की दूरी तय करना किसी पर्वत को पार करने जैसा लग रहा था।

लगभग पांच मिनट के जानलेवा संघर्ष के बाद, कबीर उस पुराने सूखे कुएं के तल पर पहुंचा।

ऊपर देखने पर उसे कुएं के मुहाने से रात का गहरा नीला आसमान दिखाई दिया। लेकिन अब आसमान में वह खूनी लाल चांद नहीं था; बादल छंट चुके थे और आसमान में ठंडे, शांत तारे टिमटिमा रहे थे।

कबीर ने कुएं की दीवार पर लगे लोहे के सरियों को देखा। अनिकेत को अपने कंधे पर लादकर 40 फीट ऊंची सीधी चढ़ाई चढ़ना किसी भी साधारण मनुष्य के लिए असंभव था। लेकिन उस समय कबीर के भीतर साधारण मनुष्यता बची ही नहीं थी; वह अपने भाई समान मित्र को मौत के मुंह में नहीं छोड़ सकता था।

उसने अपनी बेल्ट और जैकेट के फटे हुए कपड़ों से अनिकेत के शरीर को अपनी पीठ से कसकर बांध लिया।

उसने लोहे का पहला सरिया पकड़ा।

चर्रर्र...

कबीर की उंगलियों की जली हुई चमड़ी लोहे से चिपकती और उधड़ती रही। कबीर हर पायदान पर अपने मुंह से चीख निकालता, भगवान का नाम लेता, और एक पायदान ऊपर चढ़ता।

दस फीट... बीस फीट... तीस फीट...

कबीर की आंखों के आगे लाल और काले चकत्ते नाच रहे थे। उसका दिल छाती को फाड़कर बाहर आने को मचल रहा था। जब उसका हाथ कुएं की ऊपरी मुंडेर के पत्थर पर पड़ा, तो उसकी उंगलियों में पकड़ने की रत्ती भर भी ताकत नहीं बची थी।

कबीर ने अपनी ठुड्डी और कोहनियों का सहारा लिया और पूरी जान लगाकर खुद को और अनिकेत को कुएं से बाहर बर्फ पर खींच लिया!

धड़ाम!

दोनों हवेली के पिछले बगीचे की ठंडी, स्वच्छ बर्फ पर गिर पड़े।

कबीर ने पीठ के बल लेटकर आसमान की ओर देखा। ठंडी, ताजी हवा उसके फेफड़ों में उतरी तो उसे अहसास हुआ कि वे जीवित हैं।

लेकिन तभी, जमीन एक बार फिर कांप उठी।

कबीर ने लड़खड़ाते हुए अपना सिर उठाया।

सामने, अस्सी साल पुरानी वह विशालकाय, गॉथिक शैली की देवदार हवेली अपनी अंतिम सांसें ले रही थी।

हवेली की तीन मंजिला दीवारें बीच से फट रही थीं। उसकी विशाल खिड़कियों से आग और धुएं के फव्वारे छूट रहे थे। क्लॉक टॉवर की बची हुई मीनार भरभराकर मुख्य छत पर गिर पड़ी। और फिर, एक भयानक, गगनभेदी धमाके के साथ, वह पूरी हवेली अंदर की ओर ढह गई। 80 साल का खौफ, दर्द और रक्त का साम्राज्य कुछ ही सेकंडों में मलबे, राख और धूल के एक विशाल ढेर में तब्दील हो गया।

घाटी में अचानक एक गहरा, अलौकिक सन्नाटा छा गया।

हवा का चलना रुक गया था। चीड़ और देवदार के पेड़ों की सांय-सांय की डरावनी आवाजें अब शांत थीं। केवल जलती हुई लकड़ी की 'चट-चट' की आवाज हवा में गूंज रही थी।

कबीर ने राहत की एक लंबी सांस ली। उसने करवट बदलकर अनिकेत को देखा।

"अनिकेत... हम बच गए भाई... सब खत्म हो गया," कबीर ने कांपते हुए कहा।

लेकिन अनिकेत की तरफ से कोई जवाब नहीं आया।

अनिकेत की गर्दन एक तरफ लुढ़की हुई थी। उसकी आंखें पथरा चुकी थीं और उसके होंठ नीले पड़ चुके थे। कबीर ने घबराकर अनिकेत की गर्दन की कैरोटिड आर्टरी (नाड़ी) पर अपनी उंगलियां रखीं।

वहां कोई धड़कन नहीं थी!

"अनिकेत! नहीं... नहीं अनिकेत! तुम मुझे ऐसे नहीं छोड़ सकते!" कबीर पागलों की तरह चीख पड़ा। उसने अनिकेत की छाती पर दोनों हाथों से सीपीआर (कार्डियक मसाज) देना शुरू किया। "उठो अनिकेत! हमने शैतान को हरा दिया... तुम ऐसे नहीं मर सकते!"

पंप... पंप... पंप...

कबीर के अपने हाथों से खून बहकर अनिकेत की छाती पर गिर रहा था। वह रो रहा था, गिड़गिड़ा रहा था। इस वीरान घाटी में दूर-दूर तक कोई अस्पताल, कोई डॉक्टर या कोई इंसान नहीं था।

अचानक, सन्नाटे को चीरती हुई एक आवाज आई।

वह आवाज घाटी के मोड़ से आ रही थी—गाड़ी के हॉर्न और तेजी से बर्फ को चीरते हुए टायरों की आवाज!

कबीर ने चौंककर देखा। मुख्य सड़क के मुहाने पर, जहां लोहे का फाटक ढह चुका था, तीन गाड़ियां तेजी से अंदर दाखिल हुईं। सबसे आगे एक पुलिस की जीप थी, और उसके पीछे लाल बत्ती वाली एक पहाड़ी एम्बुलेंस और एक स्थानीय ग्रामीणों की बोलेरो गाड़ी थी।

गाड़ियों से कई लोग टॉर्च लिए बाहर निकले। सबसे आगे वही ढाबे वाला बूढ़ा मंगलू और घाटी के स्थानीय पुलिस इंस्पेक्टर थे।

"साहब! कबीर साहब!" मंगलू चिल्लाता हुआ दौड़ा। "जब रात को 2:30 बजे हवेली की तरफ से बिजली की चमक और धमाके होने लगे, तो हमें लगा कि अनहोनी हो गई... हम पुलिस और डॉक्टर को लेकर भागे आए!"

डॉक्टर और कंपाउंडर तुरंत स्ट्रेचर और मेडिकल किट लेकर अनिकेत की तरफ लपके। डॉक्टर ने अनिकेत की नब्ज जांची, तुरंत उसकी छाती पर डिफाइब्रिलेटर और एड्रेनालिन का इंजेक्शन लगाया।

कबीर बर्फ पर बैठा शून्य में देख रहा था।

कंपाउंडर कबीर के जले हुए हाथों पर पट्टी बांधने लगा। कबीर ने अपनी फटी हुई जैकेट की जेब में हाथ डाला। उसे लगा कि सुनैना की वह लकड़ी की गुड़िया अभी भी उसकी जेब में होगी।

लेकिन जब कबीर की उंगलियों ने जेब के भीतर टटोला, तो वहां लकड़ी की गुड़िया नहीं थी।

उसकी जगह कबीर की हथेली में एक छोटा सा, त्रिकोणीय, चिकना काला पत्थर का टुकड़ा आया।

वह पाताल शिला का एक टूटा हुआ अवशेष था!

कबीर ने उस काले पत्थर को अपनी हथेली पर रखकर देखा। सुबह की पहली धुंधली रोशनी में, उस काले पत्थर के भीतर से लाल रंग की एक बहुत महीन, सूक्ष्म नस जैसी लकीर चमक रही थी... और वह पत्थर कबीर की हथेली पर ठीक उसी तरह बहुत धीमी गति से धड़क रहा था, जैसे कोई नन्हा सा दिल धड़कता है!

धक... धक... धक...

और ठीक उसी पल, स्ट्रेचर पर पड़े डॉ. अनिकेत ने एक भयानक, लंबी हिचकी ली और उसकी आंखें अचानक पूरी तरह खुल गईं। लेकिन उन आंखों में अनिकेत की पुरानी सौम्यता नहीं थी... अनिकेत की दोनों पुतलियां कुछ सेकंड के लिए पूरी तरह रक्त-जैसी लाल हो गईं, और उसने कबीर की हथेली में बंद उस काले पत्थर की ओर देखकर एक अजीब, सर्द मुस्कान बिखेर दी!

कबीर के पूरे शरीर का खून जम गया।

क्या पाताल शिला सचमुच नष्ट हो चुकी थी... या फिर शैतान ने खत्म होने से पहले अपना नया ठिकाना ढूंढ लिया था?

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