PretikaHaunted Placesचीखती खामोशियां: देवदार हवेली का अभिशाप

भाग 8: तहखाने का नरक-कुंड और ठाकुर विक्रम सिंह का महा-दैत्य रूप

Piyashi Atma · Haunted Places · 12 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
चीखती खामोशियां: देवदार हवेली का अभिशाप
Chapter
8 of 18
Category
Haunted Places
Reading time
12 min
Words
2316
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

हवेली की 70 फीट ऊंची पश्चिमी मीनार ताश के पत्तों की तरह एक तरफ झुक रही थी। दीवार के विशाल पत्थर उखड़कर नीचे अंधकार में गिर रहे थे और हर गिरते पत्थर के साथ कानफोड़ू धमाके हो रहे थे। कबीर और डॉ. अनिकेत सर्पिलाकार सीढ़ियों से पागलों की तरह नीचे की ओर दौड़ रहे थे। सीढ़ियों की लोहे की रेलिंग मुड़ चुकी थी और उनके ठीक पीछे की सीढ़ियां एक-एक करके भरभराकर नीचे शून्य में समा रही थीं।

"कबीर, रुको मत! सीधे नीचे छलांग लगाओ!" अनिकेत ने अपनी फटी हुई आवाज में पूरी ताकत से चीखा।

सामने मुख्य हवेली की पहली मंजिल का गलियारा दिखाई दे रहा था। कबीर ने अनिकेत की कमर को अपने एक हाथ से कसकर थामा और सीढ़ियों के आखिरी टूटते हुए पायदान से हवा में छलांग लगा दी।

धड़ाम!

दोनों पहली मंजिल के लकड़ी के फर्श पर गिरे और लुढ़कते हुए आगे बढ़े। ठीक उसी क्षण, उनके पीछे की पूरी सर्पिलाकार सीढ़ी और मीनार का आधा हिस्सा भारी मलबे के साथ नीचे गिर पड़ा। धूल और चूने का एक विशाल बवंडर उठा जिसने सांस लेना दूभर कर दिया।

कबीर ने खांसते हुए सिर उठाया। उसने अपनी कलाई की घड़ी देखी—02:53 AM।

अंतिम प्रलय में केवल सात मिनट बचे थे।

लेकिन मुख्य हवेली अब वह हवेली नहीं रह गई थी जहाँ कबीर ने कुछ घंटे पहले कदम रखा था। हवेली का विशाल मुख्य हॉल बीच से फट चुका था। संगमरमर का फर्श दो हिस्सों में बंट गया था और उस 20 फीट चौड़ी विशाल दरार से गहरे लाल और बैंगनी रंग की लपटें उठ रही थीं। उन लपटों के साथ ऐसी तीखी, दमघोंटू गंधक और सड़े हुए मांस की बदबू आ रही थी मानो धरती के सीने को चीरकर सीधे नर्क का प्रवेश द्वार खोल दिया गया हो।

छत पर लगा 80 साल पुराना भारी शीशे का झूमर 'चर्र-चर्र' की आवाज के साथ सीधा उस दरार में जा गिरा और नीचे गिरते ही किसी विस्फोटक की तरह फट गया।

दरार के भीतर से आ रही आवाजें किसी भी जीवित प्राणी की आत्मा को कंपाने के लिए काफी थीं। ऐसा लग रहा था मानो पाताल लोक में लाखों रूहें एक साथ लोहे की सलाखों को पीट रही हों और अपने हिस्से का लहू मांग रही हों।

"चौथी कील... उस दरार के ठीक नीचे है," अनिकेत ने दीवार का सहारा लेकर खड़े होते हुए कहा। उसकी छाती से घरघराहट की आवाज आ रही थी और उसकी कमीज खून से पूरी तरह भीग चुकी थी। उसकी टूटी पसलियां फेफड़ों में चुभ रही थीं, लेकिन उसकी उंगलियों ने उस तांबे के त्रिशूल को इतनी मजबूती से जकड़ रखा था कि उसके पोर सफेद पड़ चुके थे।

"अनिकेत, तुम्हारी हालत बहुत नाजुक है। तुम यहीं रुको, मैं नीचे जाता हूँ," कबीर ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

"नहीं कबीर!" अनिकेत की आंखों में एक अजीब, पवित्र चमक कौंधी। "यह केवल एक लड़ाई नहीं है... यह 86 साल पुराने एक तांत्रिक ऋण का संहार है। उस पाताल शिला का केंद्र केवल शारीरिक बल से नहीं टूटेगा... उसके लिए वैदिक संकल्प की आहुति चाहिए। जब तक मेरी सांस चल रही है, मैं उस शैतान के सामने ढाल बनकर खड़ा रहूंगा। चलो!"

दोनों ने बिना एक पल गंवाए उस धधकती हुई दरार के मुहाने पर कदम रखा। दरार की दीवारों पर टूटे हुए पत्थरों की एक प्राकृतिक सीढ़ी जैसी बन गई थी। कबीर आगे-आगे उतरा और अनिकेत को सहारा देते हुए नीचे की ओर बढ़ा।

जैसे ही वे तहखाने के धरातल पर पहुंचे, उनके पैरों तले की जमीन खिसक गई।

तहखाना अब किसी पत्थर के कमरे जैसा नहीं था। यह एक विशाल, भूमिगत नरक-कुंड में बदल चुका था। चारों तरफ की दीवारें किसी दानव की आंतों की तरह गीली, काली और जीवित थीं—वे नियमित रूप से धड़क रही थीं और उनकी नसों में खून जैसा लाल तरल बहता हुआ साफ दिखाई दे रहा था।

तहखाने के चारों कोनों में उबलते हुए काले खून के छोटे-छोटे कुंड बने थे, जिनमें से लगातार जहरीली गैस के बुलबुले फूट रहे थे। हवा में सैकड़ों पारदर्शी, विकृत मानवीय साए लोहे की भारी जंजीरों में बंधे लटक रहे थे। वे 1940 में मारे गए ठाकुर के 40 नौकर, दरबान, बावरची और पिछले दशकों में गायब हुए राहगीर थे। उनकी आंखें नहीं थीं, केवल खाली गड्ढे थे, और उनके खुले मुंह से सिसकियों की एक निरंतर लहर उठ रही थी।

और उस नरक-कुंड के ठीक केंद्र में... एक गोलाकार काले चबूतरे पर वह बैठी थी—पाताल शिला।

तीनों बाहरी कीलों (उत्तर, पूर्व और पश्चिम) के उखड़ जाने से पाताल शिला का आकार अब पहले से तीन गुना बड़ा हो चुका था। वह लगभग 15 फीट ऊंची एक विशाल, बेडौल, काली चट्टान बन चुकी थी जो किसी विशालकाय धड़कते हुए दिल की तरह फूल और सिकुड़ रही थी।

शिला के सबसे ऊपरी हिस्से पर एक आदमकद, सुलगती हुई रक्त-नेत्र (विशाल लाल आंख) खुल चुकी थी। उस आंख की पुतली किसी सांप की तरह लंबवत (Vertical) थी और उसमें से निकलती हुई गहरी लाल किरणें पूरे तहखाने को एक खूनी रोशनी से नहला रही थीं।

और उस शिला के ठीक नीचे... पत्थरों की छाती में अंतिम, चौथी तांत्रिक महा-कील गड़ी हुई थी! वह कील किसी साधारण लोहे की नहीं थी; वह किसी प्राचीन असुर की रीढ़ की हड्डी जैसी मुड़ी हुई और जीवित प्रतीत हो रही थी। वह बार-बार किसी सांप की तरह हिल रही थी और शिला को पाताल की अनंत गहराइयों से जोड़े हुए थी।

अचानक, पाताल शिला की उस लाल आंख से एक भयानक लाल प्रकाश फूटा।

तहखाने के कोने में उबलते हुए खून के कुंड से एक विशाल, काला बवंडर उठा। उस बवंडर के भीतर से एक ऐसी दहाड़ निकली जिसने तहखाने की पथरीली छत को हिलाकर रख दिया।

कड़कड़ाssssहट!

काले धुएं, आग और खून के छींटों के बीच से वह साया बाहर निकला।

वह ठाकुर विक्रम सिंह था... लेकिन अब वह कोई भूत या साया नहीं था। तीनों कीलों के उखड़ने के बाद शिला ने अपनी सारी अवशिष्ट शैतानी ऊर्जा ठाकुर के साए में उड़ेल दी थी। वह अब 12 फीट ऊंचा एक महा-दैत्य बन चुका था!

उसका शरीर जले हुए काले पत्थरों जैसा सख्त था, जिस पर लावा की तरह लाल लकीरें चमक रही थीं। उसके सिर पर भैंसे के जैसे दो विशाल, मुड़े हुए सींग थे। उसके चार विशाल, विकृत हाथ थे, जिनके पंजों में लोहे के त्रिशूल और गदाएं थीं। और सबसे वीभत्स बात यह थी कि उसकी चौड़ी, भयानक छाती के भीतर उन सभी 40 अभागे इंसानों के कटे हुए, तड़पते हुए चेहरे फंसे हुए थे, जो एक साथ दर्द से चीख रहे थे।

"हाहाहाहाहा!" ठाकुर के महा-दैत्य रूप का अट्टहास पूरे पाताल-कुंड में गूंज उठा। उसकी आवाज में एक साथ कई गर्जनाएं मिली हुई थीं।

"मूर्ख कीड़ों! तुमने तीनों कीलें उखाड़कर कोई उपकार नहीं किया... तुमने केवल मेरी शक्ति के बंधनों को ढीला किया है!" ठाकुर के लाल अंगारे जैसे नेत्र कबीर और अनिकेत पर टिक गए। "अब इस पाताल शिला को केवल एक अंतिम संस्कार चाहिए... दो जीवित ब्राह्मणों और साधकों का ताजा लहू! और देखो... घड़ी की सुइयां क्या कह रही हैं!"

कबीर ने अपनी घड़ी पर नजर डाली। पसीने और खून से सनी स्क्रीन पर समय चमक रहा था—02:56 AM।

केवल चार मिनट!

"चार मिनट बाद यह पाताल शिला पूरे ब्रह्मांड के अंधकार को इस धरती पर खींच लेगी!" ठाकुर ने अपनी गदा हवा में लहराई। "और तुम दोनों मेरी अमरता की पहली आहुति बनोगे!"

ठाकुर ने अपनी चारों बाहें फैलाईं।

तहखाने की हवा में सैकड़ों जलते हुए नरमुंड प्रकट हो गए। वे नरमुंड दांत पीसते हुए और आग उगलते हुए कबीर और अनिकेत की ओर किसी मिसाइल की तरह लपके।

"कबीर, शिला की ओर बढ़ो!" अनिकेत चीखा।

अनिकेत ने अपने लड़खड़ाते पैरों को चबूतरे की पहली सीढ़ी पर जमाया। उसने अपने तांबे के त्रिशूल को दोनों हाथों से अपने सीने के सामने सीधा खड़ा किया। अनिकेत की आंखों में अब कोई मानवीय भय नहीं था; वहां केवल एक तांत्रिक साधक का चरम आत्म-समर्पण था।

अनिकेत ने अपने लहूलुहान गले से 'महा-मृत्युंजय संहारक मंत्र' का घोष किया:
"ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्... उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्! ॐ नमो भगवते रुद्राय... पाताल नाशय नाशय स्वाहा!"

मंत्र के प्रत्येक अक्षर के साथ तांबे के त्रिशूल से सुनहरी और सफेद बिजली की प्रचंड लपटें फूटने लगीं। अनिकेत के चारों ओर एक विशाल, चमकता हुआ दिव्य सुरक्षा-कवच बन गया।

उड़ते हुए जलते नरमुंड उस कवच से टकराए और भयानक विस्फोटों के साथ हवा में ही भस्म हो गए। पूरे तहखाने में रोशनी का ऐसा धमाका हुआ कि कबीर की आंखें चौंधिया गईं।

लेकिन ठाकुर का महा-दैत्य रूप इस दिव्य शक्ति से भयभीत होने के बजाय और अधिक उन्मादी हो गया।

"तू अपनी तुच्छ मंत्र-विद्या से काल को नहीं रोक सकता, पंडित!" ठाकुर ने दहाड़ते हुए अपने विशाल, पत्थर जैसे पैर को जमीन पर पटका।

वह हवा में उछला और अपनी विशाल गदा को पूरी ताकत से अनिकेत के सुरक्षा-कवच पर दे मारा!

कड़ाssssक!

एक ऐसा भयानक धातुई धमाका हुआ मानो दो पहाड़ आपस में टकरा गए हों। अनिकेत का सुनहरी सुरक्षा-कवच कांच की तरह चकनाचूर हो गया। गदा का एक सिरा अनिकेत के बाएं कंधे और सीने से सीधे टकराया।

"अनिकेत!" कबीर पागलों की तरह चीखा।

अनिकेत का शरीर हवा में दस फीट उछला और तहखाने की पथरीली दीवार से जा टकराया। दीवार में एक विशाल गड्ढा बन गया। अनिकेत नीचे खून के कीचड़ में गिरा। उसके मुंह, नाक और कानों से खून की धार बह निकली। उसका बायां हाथ पूरी तरह टूटकर लटक चुका था और त्रिशूल उसके हाथ से छूटकर चबूतरे की सीढ़ियों पर गिर गया था।

ठाकुर का दैत्य रूप अट्टहास करता हुआ अनिकेत की ओर बढ़ा ताकि अपनी गदा से उसका सिर कुचल सके।

अनिकेत ने जमीन पर अपनी अंतिम सांसें गिनते हुए अपनी धुंधली होती आंखों से कबीर को देखा। उसने अपने कांपते दाहिने हाथ से चबूतरे की सीढ़ियों पर गिरे उस जलते हुए तांबे के त्रिशूल की ओर इशारा किया।

"कबीर... मेरी तरफ मत देखो..." अनिकेत के मुंह से खून के बुलबुले फूट रहे थे। "घड़ी... घड़ी देखो कबीर... 02:58 हो चुका है! त्रिशूल उठाओ... और उस पाताल शिला की आंख को फोड़ दो... कबीर, यह पूरी मानव जाति का सवाल है... भागो!"

कबीर के सीने में जैसे कोई ज्वालामुखी फट पड़ा। अनिकेत का वह लहूलुहान चेहरा, सुनैना का रोता हुआ मासूम चेहरा, और 80 सालों से इस हवेली में तड़प रही उन बेकसूर रूहों का दर्द—सब कुछ कबीर के भीतर एक प्रचंड दावानल बनकर धधक उठा।

उसने अपने दोनों जले हुए हाथों की असहनीय पीड़ा को पूरी तरह भुला दिया। उसकी आंखों में केवल वह पाताल शिला और उसकी वह धड़कती हुई लाल आंख दिखाई दे रही थी।

कबीर ने पूरी ताकत से दौड़ लगाई।

उसने हवा में छलांग लगाई और चबूतरे की सीढ़ियों पर गिरे उस भारी तांबे के त्रिशूल को अपने दोनों हाथों में थाम लिया। जैसे ही कबीर के खून से सने हाथों का स्पर्श उस त्रिशूल से हुआ, त्रिशूल के भालों से नीली और सुनहरी दिव्य अग्नि भड़क उठी।

ठाकुर ने पीछे मुड़कर देखा। कबीर को त्रिशूल उठाए देखकर उसकी लाल आंखों में पहली बार खौफ की एक लकीर खिंची।

"रुक जा, कीड़े!" ठाकुर अपनी पूरी 12 फीट की काया के साथ कबीर की ओर झपटा। उसके चारों पंजे कबीर के शरीर के चीथड़े उड़ाने के लिए आगे बढ़े।

लेकिन कबीर ने पीछे हटने के बजाय आगे की ओर कदम बढ़ाया।

उसने अपनी जैकेट के भीतर से सुनैना की वह पुरानी लकड़ी की गुड़िया निकाली और अपनी पूरी शक्ति से उसे उस पाताल शिला के आधार की ओर फेंक दिया।

गुड़िया जैसे ही शिला के आधार पर टकराई, उसमें से एक नन्हीं, दिव्य रोशनी की किरण फूटी और राजकुमारी सुनैना का पवित्र साया प्रकट हो गया। सुनैना ने अपने दोनों नन्हे हाथ हवा में उठाए।

हवा में लटकी हुई उन 40 अभागे नौकरों और ग्रामीणों की आत्माओं की जंजीरें एक झटके में टूट गईं!

"अब तुम्हारा अंत आ गया है, बापू!" सुनैना की आवाज गूंजी।

उन 40 आत्माओं ने एक साथ नीचे उतरकर ठाकुर के चारों विशाल हाथों और पैरों को अपने पारदर्शी, बर्फीले हाथों से जकड़ लिया। वे सब मिलकर उस महा-दैत्य को पीछे की ओर खींचने लगीं। ठाकुर दर्द और क्रोध से दहाड़ उठा, लेकिन उन 40 आत्माओं के सम्मिलित प्रतिशोध के आगे उसका शरीर कुछ सेकंडों के लिए एक जगह जम गया।

कबीर के पास केवल वही कुछ सेकंड थे।

वह पाताल शिला के ठीक सामने खड़ा था। शिला की वह 15 फीट ऊंची काली देह किसी जीवित अंगारे की तरह तप रही थी। उसकी विशाल लाल आंख से निकलती काली किरणें कबीर के चेहरे की चमड़ी को झुलसा रही थीं।

कबीर ने नीचे देखा। शिला के आधार पर वह अंतिम चौथी तांत्रिक कील धंसी हुई थी।

कील जीवित थी! जैसे ही कबीर ने उसे देखा, कील ने किसी जहरीले नाग की तरह अपना फन उठाया और कबीर के दाहिने पैर पर डसने के लिए लपकी। कबीर ने अपने बूट की एड़ी से उस कील के फन को पत्थरों में दबा दिया और अपने दोनों हाथों से तांबे के त्रिशूल को उल्टा करके सीधे उस कील के सिर पर दे मारा!

खनन्नन!

त्रिशूल के वार से वह चौथी तांत्रिक कील जड़ से उखड़कर दूर जा गिरी!

चौथी कील के उखड़ते ही पाताल शिला की धुरी टूट गई। लेकिन पाताल शिला ने अपनी हार स्वीकार नहीं की।

शिला की उस विशाल लाल आंख से काले धुएं का एक विशाल, दैत्याकार हाथ बाहर निकला। उस हाथ ने कबीर के गले को इतनी क्रूरता से जकड़ लिया कि कबीर का शरीर जमीन से पांच फीट ऊपर हवा में उठ गया!

कबीर की आंखें बाहर आने को हो गईं। उसकी सांस पूरी तरह रुक गई। त्रिशूल उसके एक हाथ से फिसलने लगा।

कबीर ने अपनी कलाई की घड़ी पर अंतिम नजर डाली।

लाल बत्ती चमक रही थी—02:59:45 AM!

अंतिम प्रलय में केवल पंद्रह सेकंड बाकी थे!

पाताल शिला का मुंह अब पूरी तरह खुल चुका था, जिसके भीतर अनंत नर्क की काली लपटें नाच रही थीं। वह कबीर को सीधे अपने मुंह के भीतर खींच रही थी।

ज़मीन पर पड़े लहूलुहान डॉ. अनिकेत ने अपनी अंतिम बची हुई सांस से चीखते हुए कबीर की ओर देखा:
"कबीर... त्रिशूल... आंख में... आंख ही उसका दिल है... मारो कबीर!"

हवा में झूलती सुनैना की रूह ने अपनी पूरी शक्ति कबीर की बांहों में फूंक दी।

कबीर ने अपनी दोनों आंखों को बंद किया, अपने फेफड़ों की अंतिम हवा को समेटा, और दोनों हाथों से जलते हुए तांबे के त्रिशूल को कसकर पकड़ लिया।

घड़ी का कांटा हिला—02:59:55 AM... केवल पांच सेकंड!

कबीर ने हवा में अपने पूरे शरीर को मोड़ते हुए उस तांबे के त्रिशूल को सीधे उस पाताल शिला की धड़कती हुई विशाल लाल आंख के केंद्र की ओर झोंक दिया...

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